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  "type": "article",
  "title": "बांध में हरसूद डूबने के बाद शून्य से शुरू किया सफर, खंडवा के अभय जैन ने 24 शहरों में खड़ा किया 47 प्रोजेक्ट्स का रियल एस्टेट साम्राज्य",
  "summary": "इंदिरा सागर बांध निर्माण के दौरान हरसूद में घर, दुकान और खेत गंवाने वाले अभय जैन ने 24 लाख रुपये के मुआवजे से खंडवा में नई शुरुआत की और आज मध्य प्रदेश के 24 शहरों में 47 कॉलोनी प्रोजेक्ट्स चला रहे हैं।",
  "content": "मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में जब इंदिरा सागर बांध की विशाल परियोजना शुरू हुई, तो कई आबाद बस्तियां और फलते-फूलते गांव पानी में समा गए। वर्ष 2005 में ऐतिहासिक कस्बा हरसूद पूरी तरह जलमग्न हो गया था। इस बड़े विस्थापन ने हजारों परिवारों को अपनी पुश्तैनी जमीन, घर, दुकानें और दशकों की मेहनत से संजोया गया जीवन पीछे छोड़ने पर मजबूर कर दिया। ज्यादातर लोग अपनी जड़ों से उखड़ने के सदमे से सालों तक नहीं उबर सके, लेकिन कुछ ऐसे भी साहसी लोग थे जिन्होंने इस विपदा को अपने नए भविष्य की नींव बना लिया। ऐसे ही कर्मठ व्यक्तियों में खंडवा के जाने-माने व्यवसायी और समाजसेवी अभय जैन का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। हरसूद की उपजाऊ मिट्टी में खेती करने वाले अभय जैन को बांध के पानी के कारण अपना सब कुछ खोना पड़ा था, लेकिन टूटने के बजाय उन्होंने नए सिरे से संघर्ष का रास्ता चुना और रियल एस्टेट क्षेत्र में सफलता की एक असाधारण मिसाल कायम की।\n\n हरसूद के विस्थापन का आघात झेलकर खंडवा पहुंचे अभय जैन ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने जमीन की खरीद-बिक्री में मध्यस्थता यानी प्रॉपर्टी ब्रोकरेज से अपने कारोबारी जीवन की दूसरी पारी शुरू की थी। बाजार और ग्राहकों की नब्ज पहचानते हुए वे धीरे-धीरे जमीन विकास और आवासीय कॉलोनियां बसाने के क्षेत्र में उतरे। आज उनका व्यवसाय मध्य प्रदेश के 24 अलग-अलग शहरों में फैल चुका है, जहां 47 विभिन्न स्थानों पर उनके आवासीय कॉलोनी प्रोजेक्ट्स संचालित हो रहे हैं। स्वयं खंडवा शहर में ही उनके कई प्रोजेक्ट्स मौजूद हैं। कभी दूध बेचकर और खेतों में पसीना बहाकर परिवार का पेट पालने वाले अभय जैन आज प्रदेश के बड़े और प्रतिष्ठित कॉलोनाइजर के रूप में अपनी मजबूत पहचान बना चुके हैं।\n\n \n\nहरसूद की मिट्टी में खेती के अनूठे प्रयोग और संघर्ष भरा बचपन\n\nअभय जैन मूल रूप से हरसूद क्षेत्र के एक साधारण किसान परिवार से आते हैं। खेती उनके परिवार का पारंपरिक पेशा थी और उन्हें खुद भी मिट्टी और फसलों से गहरा लगाव था। सामान्य पारंपरिक फसलों तक सीमित रहने के बजाय उन्होंने हमेशा लीक से हटकर सोचने का साहस दिखाया। जिस दौर में हरसूद इलाके में नकदी फसलों का चलन बहुत कम था, उस समय उन्होंने पारंपरिक खेती के साथ-साथ हल्दी, जीरा और गन्ने जैसी फसलों की खेती के सफल प्रयोग किए। इन गैर-पारंपरिक फसलों को अपनाकर उन्होंने इलाके में खेती के नए आयाम स्थापित किए और बेहतर पैदावार हासिल करके अपनी मेहनत का लोहा मनवाया।\n\n हालांकि खेती में प्रयोगों के बावजूद परिवार की आर्थिक स्थिति कभी बहुत मजबूत या सुगम नहीं रही। बचपन से लेकर युवावस्था तक उन्हें कई तरह की भारी जिम्मेदारियां संभालनी पड़ीं। जब वे मैट्रिक यानी दसवीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब घर के रोजमर्रा के कामों में हाथ बंटाने के साथ-साथ उन्हें दूध बेचने तक का काम करना पड़ता था। इसके बाद जब वे कॉलेज पहुंचे, तब भी परिवार के हालात इतने अनुकूल नहीं थे कि वे बिना किसी तनाव के अपनी उच्च शिक्षा पूरी कर सकें। उन्होंने खेतों में दिन-रात काम करते हुए अपनी कॉलेज की पढ़ाई जारी रखी और किसानी के साथ ही ग्रेजुएशन की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। वे मानते हैं कि इन शुरुआती वर्षों की तंगहाली और कड़े परिश्रम ने ही उन्हें जीवन की सबसे बड़ी सीख दी।\n\n \n\n2005 में जब जलमग्न हुआ हरसूद, 24 लाख के मुआवजे से नई राह\n\nसाल 2005 अभय जैन और पूरे हरसूद के इतिहास में एक गहरा मोड़ लेकर आया। इंदिरा सागर बांध के विशाल जलाशय का फैलाव हुआ और पूरा हरसूद कस्बा डूब क्षेत्र में समा गया। अभय जैन के परिवार का रिहायशी मकान, चलती हुई दुकान और उपजाऊ खेती की जमीन, सब कुछ पानी के हवाले हो गए। अपनी पुश्तैनी धरोहर को अपनी आंखों के सामने डूबते देखना किसी भी परिवार के लिए बेहद पीड़ादायक था। विस्थापन के उस कठिन दौर में उनके परिवार को कुल करीब 24 लाख रुपये का सरकारी मुआवजा मिला था। किसी भी इंसान के लिए वर्षों से बसी-बसाई गृहस्थी और रोजगार को अचानक छोड़कर नई जगह जाना अत्यंत कठिन होता है, लेकिन हरसूद की जनता ने राष्ट्र के बड़े हित को देखते हुए अपने घर-बार का बलिदान दिया।\n\n इस विस्थापन से जुड़ी एक दिलचस्प और ऐतिहासिक घटना यह भी है कि जब अभय जैन महज 17 वर्ष के थे, तब दूरदर्शन के एक विशेष कार्यक्रम में उनसे बांध निर्माण और डूब क्षेत्र को लेकर सवाल पूछा गया था। उस कम उम्र में भी उन्होंने एक परिपक्व नागरिक की तरह जवाब देते हुए कहा था कि यदि बांध का निर्माण राष्ट्रीय हित और देश की तरक्की के लिए जरूरी है, तो यह अवश्य बनना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट रूप से यह मांग भी रखी थी कि जिन विस्थापितों की जमीन और आशियाने छीने जा रहे हैं, उन्हें शासन की ओर से जमीन के बदले जमीन और मकान के बदले मकान मिलना चाहिए ताकि उनका जीवन बर्बाद न हो।\n\n \n\nदलाली से शुरुआत कर कॉलोनाइजर बनने का सफर\n\nहरसूद के जलमग्न होने के बाद अभय जैन अपने परिवार के साथ खंडवा आकर बस गए। वहां उनके सामने जीवन को नए सिरे से संवारने की गंभीर चुनौती थी। उन्होंने रियल एस्टेट और प्रॉपर्टी के काम को अपनी नई दिशा के रूप में चुना। शुरुआत में उनके पास बड़ा पूंजी निवेश करने की स्थिति नहीं थी, इसलिए उन्होंने जमीन की खरीद-बिक्री में दलाली का काम शुरू किया। इस जमीनी काम ने उन्हें प्रॉपर्टी बाजार के नियमों, कानूनी पहलुओं, खरीदारों की अपेक्षाओं और जमीन की वास्तविक कीमतों की गहरी समझ प्रदान की।\n\n विस्थापन के समय मिले 24 लाख रुपये के मुआवजे को उन्होंने यूं ही खर्च करने के बजाय पूरी तरह से अपने व्यापार में पूंजी के रूप में लगाया। हरसूद की खेती के दिनों में सीखी गई कड़ी मेहनत और धैर्य की आदत खंडवा के बाजार में उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। धीरे-धीरे उन्होंने ब्रोकरेज के दायरे से बाहर निकलकर स्वयं पूरी कॉलोनियां विकसित करने का जोखिम उठाया। शुरुआत में कई कानूनी, वित्तीय और प्रशासनिक अड़चनें सामने आईं, लेकिन ईमानदारी और पारदर्शी तरीके से काम करते हुए वे कदम-दर-कदम आगे बढ़ते गए। धीरे-धीरे उनके काम का दायरा खंडवा से निकलकर आसपास के अन्य जिलों तक फैलता चला गया।\n\n \n\nअमेरिका से बेटे की वापसी और 51 एकड़ की स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट\n\nकारोबार जैसे-जैसे विस्तार ले रहा था, परिवार का सहयोग भी इस सफलता की धुरी बनता गया। अभय जैन के बेटे जब उच्च शिक्षा और अनुभव हासिल करने के बाद अमेरिका से स्वदेश लौटे, तो उनके कारोबार को एक नई आधुनिक सोच और जबरदस्त तकनीकी रफ्तार मिली। पिता के पारंपरिक अनुभव और बेटे की आधुनिक कार्यशैली के संगम ने प्रोजेक्ट्स के आकार और गुणवत्ता दोनों को बदल दिया। आज स्थिति यह है कि मध्य प्रदेश के 24 अलग-अलग शहरों में 47 स्थानों पर उनके आवासीय प्रोजेक्ट्स सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं।\n\n अकेले खंडवा शहर में ही उनके 10 से 15 स्थानों पर विभिन्न आवासीय प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं। इनमें शहर के भीतर 51 एकड़ के विशाल क्षेत्र में विकसित की जा रही स्मार्ट सिटी कॉलोनी उनके ग्रुप की सबसे प्रतिष्ठित और पहचान बन चुकी परियोजनाओं में शुमार है। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर, दूध बेचने और पारंपरिक किसानी से आगे बढ़ते हुए प्रदेश के 24 शहरों तक कारोबार का विस्तार करना किसी सपने से कम नहीं है। अभय जैन का कहना है कि प्रारंभिक दौर के अभावों ने उन्हें न केवल मेहनत करना सिखाया, बल्कि इंसानों की कद्र करना और सामाजिक रिश्ते बनाना भी सिखाया। वे स्पष्ट रूप से मानते हैं कि रियल एस्टेट का व्यापार सिर्फ जमीन खरीदने या अंधाधुंध पैसा लगाने से नहीं चलता, बल्कि इसके लिए खरीदारों का अटूट विश्वास जीतना अनिवार्य होता है।\n\n \n\nरिश्तों को माना पूंजी, ग्राहकों के साथ पारिवारिक व्यवहार\n\nअभय जैन अपने पूरे व्यावसायिक दर्शन का केंद्र ग्राहकों के भरोसे को मानते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने किसी भी ग्राहक को केवल प्लॉट खरीदने वाला सामान्य खरीदार नहीं माना, बल्कि हमेशा अपने परिवार के सदस्य की तरह आदर और संरक्षण दिया। जब कभी किसी ग्राहक को आर्थिक तंगी के कारण किस्तों या भुगतानों में देरी हुई, तो उन्होंने दबाव बनाने के बजाय उसकी पारिवारिक परिस्थितियों को समझा और समय दिया। इतना ही नहीं, यदि किसी ग्राहक ने किसी मजबूरी में खरीदा हुआ प्लॉट वापस भी करना चाहा, तो उन्होंने बिना किसी दुर्भावना के पूरी ईमानदारी के साथ उसका पूरा लेन-देन निपटाया।\n\n वे अक्सर कहते हैं कि व्यापार में रास्ते कागजी समझौतों से ज्यादा आपसी रिश्तों से बनते हैं। आज उनके साथ सैकड़ों कर्मचारी और सहयोगी जुड़े हुए हैं और हजारों संतुष्ट ग्राहक उनके परिवार का हिस्सा बन चुके हैं। उनका स्पष्ट संदेश है कि ईमानदारी, साफ नीयत और अटूट परिश्रम के साथ किया गया कोई भी काम कभी व्यर्थ नहीं जाता। हो सकता है कि सफलता मिलने में थोड़ा वक्त लगे और परिस्थितियां इम्तिहान लें, लेकिन निरंतर और सही दिशा में किए गए प्रयासों से हर बंद दरवाजा खुल जाता है।\n\n \n\nसंघर्ष को जीवन की सबसे बड़ी पाठशाला मानते हैं अभय\n\nअभय जैन जीवन में आने वाली हर बाधा और संघर्ष को एक अनमोल वरदान की तरह देखते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि संघर्ष ही इस दुनिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, जहां इंसान को किसी भी किताब से बढ़कर व्यावहारिक अनुभव की ठोस शिक्षा मिलती है। हरसूद के खेतों में हल्दी और जीरे के प्रयोगों से लेकर दूध बेचने और फिर विस्थापन के बाद खंडवा की गलियों में दलाली करने तक का हर अनुभव उनके लिए जीवन का एक अहम अध्याय रहा है। आपदा के सामने घुटने टेकने के बजाय अपने आत्मबल से अपनी तकदीर दोबारा लिखना ही उनकी सफलता का मूलमंत्र रहा है।\n\nइसका आप पर असर\nयह कहानी दर्शाती है कि विस्थापन जैसी भारी विपदा और वित्तीय संकट के बावजूद योजनाबद्ध निवेश और ईमानदारी से बड़ा व्यवसाय खड़ा किया जा सकता है।\n\n• भारत में: यह प्रेरणादायक उदाहरण देश के लाखों विस्थापित परिवारों और उभरते उद्यमियों को दिखाता है कि पुनर्वास से मिली सीमित राशि का सही व्यावसायिक इस्तेमाल कैसे नई जिंदगी गढ़ सकता है। किसी भी क्षेत्र में पारदर्शी कार्यशैली और ग्राहकों का विश्वास ही दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करता है।\n• मध्य प्रदेश में: खंडवा, निमाड़ और प्रदेश के 24 शहरों में रहने वाले आम नागरिकों और घर खरीदारों के लिए यह समूह 47 प्रोजेक्ट्स के जरिए किफायती और सुनियोजित आवासीय विकल्प उपलब्ध करा रहा है। 51 एकड़ जैसी स्मार्ट सिटी परियोजनाओं से स्थानीय स्तर पर निर्माण क्षेत्र में सैकड़ों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर बने हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह घटनाक्रम 2005 में नर्मदा नदी पर इंदिरा सागर बांध निर्माण के दौरान पूरे हरसूद कस्बे के जलमग्न होने और प्रभावित लोगों के पुनर्वास के कारण उत्पन्न हुआ था।\n\n• बांध निर्माण और जलमग्नता: इंदिरा सागर बहुउद्देशीय परियोजना के विशाल जलाशय के विस्तार के चलते हरसूद कस्बे को आधिकारिक तौर पर डूब क्षेत्र घोषित कर खाली कराया गया था। इसके कारण हजारों परिवारों को अपने पुश्तैनी मकान, दुकानें और खेत छोड़ने पड़े।\n• मुआवजा और पुनर्वास नीति: प्रभावित परिवारों को सरकार की ओर से पुनर्वास पैकेज के तहत वित्तीय मुआवजा दिया गया था, जिसके तहत अभय जैन के परिवार को 24 लाख रुपये की राशि मिली थी। इस पूंजी ने उन्हें खंडवा शहर में बसकर नया कारोबार शुरू करने का प्रारंभिक सहारा दिया।\n• कृषि पृष्ठभूमि से रियल एस्टेट का रुख: गांव में खेती की जमीन डूबने के बाद जमीन के कारोबार की समझ का उपयोग करते हुए उन्होंने खंडवा में ब्रोकरेज शुरू की, जिससे उन्हें भूमि विकास और कॉलोनाइजर बनने की राह मिली।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. अभय जैन मूल रूप से कहां के रहने वाले हैं और वे पहले क्या करते थे?\nअभय जैन मूल रूप से मध्य प्रदेश के हरसूद क्षेत्र के रहने वाले हैं, जहां उनका परिवार खेती करता था और वे खुद भी हल्दी, जीरा तथा गन्ने जैसी फसलों की खेती करते थे।\n\n2. अभय जैन को अपना घर, दुकान और खेत क्यों छोड़ना पड़ा?\nसाल 2005 में इंदिरा सागर बांध परियोजना के कारण हरसूद कस्बा डूब क्षेत्र में आ गया था, जिसके चलते उन्हें अपना सब कुछ छोड़कर खंडवा विस्थापित होना पड़ा।\n\n3. विस्थापन के समय अभय जैन के परिवार को कितना मुआवजा मिला था?\nविस्थापन के समय उनके परिवार को करीब 24 लाख रुपये का मुआवजा मिला था, जिसे उन्होंने खंडवा में नए कारोबार की शुरुआत में लगाया।\n\n4. खंडवा आने के बाद अभय जैन ने अपने कारोबार की शुरुआत कैसे की?\nउन्होंने शुरुआत में जमीन की खरीद-बिक्री में दलाली का काम किया और बाजार की बारीकियां समझने के बाद खुद आवासीय कॉलोनियां विकसित करना शुरू किया।\n\n5. वर्तमान में अभय जैन के रियल एस्टेट कारोबार का कितना विस्तार हो चुका है?\nआज मध्य प्रदेश के 24 शहरों में 47 स्थानों पर उनके कॉलोनी प्रोजेक्ट्स संचालित हो रहे हैं, जिनमें खंडवा में 51 एकड़ की स्मार्ट सिटी कॉलोनी भी शामिल है।\n\n6. अभय जैन के बेटे ने कारोबार को आगे बढ़ाने में क्या भूमिका निभाई?\nअमेरिका से उच्च शिक्षा और अनुभव लेकर लौटने के बाद उनके बेटे ने पारिवारिक कारोबार को नई आधुनिक गति और विस्तार दिया।\n\nप्रेरणा और सबक\nअभय जैन की यह संघर्ष यात्रा साबित करती है कि जीवन में सब कुछ छिन जाने के बाद भी अटूट हौसला और साफ नीयत शून्य से सफलता का नया मुकाम बना सकती है।\n\n• विपत्ति को अवसर में बदलना: 2005 में पुश्तैनी घर, दुकान और खेत डूबने पर निराश होने के बजाय उन्होंने विस्थापन से मिली 24 लाख रुपये की राशि को भविष्य के कारोबार में निवेश कर नया रास्ता चुना।\n• प्रयोगशीलता और निरंतर सीखना: हरसूद में पारंपरिक खेती के दौरान हल्दी और जीरे की खेती के प्रयोग किए, और खंडवा में शून्य अनुभव के बावजूद जमीन की दलाली से व्यापार की हर बारीकी सीखी।\n• ग्राहक के साथ मानवीय रिश्ता: ग्राहकों को मात्र खरीदार समझने के बजाय परिवार का सदस्य माना, जिससे बाजार में विश्वसनीयता और स्थायी विश्वास की नींव तैयार हुई।\n• परिवार की शक्ति और आधुनिकीकरण: बेटे की अमेरिका से वापसी के बाद आधुनिक दृष्टिकोण को जोड़ा, जिससे कारोबार 24 शहरों और 47 प्रोजेक्ट्स तक विस्तृत हो सका।",
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