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  "type": "article",
  "title": "बाड़मेर के कातरला गांव में ग्रामीणों की अनूठी पहल, अमृता देवी रेस्क्यू सेंटर में 1000 से अधिक वन्यजीवों को मिल रहा जीवनदान",
  "summary": "कोविड महामारी के दौरान बाड़मेर के कातरला गांव में शुरू हुआ अमृता देवी वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर आज 1000 से अधिक पशु-पक्षियों का सुरक्षित ठिकाना बन चुका है।",
  "content": "राजस्थान के बाड़मेर जिले स्थित कातरला गांव के स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों ने पर्यावरण तथा जीव संरक्षण की मिसाल कायम की है। कोरोना महामारी के दौरान शुरू हुई एक छोटी सी मुहिम अब एक विशाल सुरक्षा केंद्र में तब्दील हो चुकी है। धोरीमन्ना क्षेत्र के पास स्थित अमृता देवी वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर में वर्तमान में 1,000 से अधिक घायल और बेसहारा वन्यजीवों तथा पक्षियों की नियमित देखरेख और इलाज किया जा रहा है।\n\nप्रशासनिक मदद न मिलने पर ग्रामीणों ने उठाया कदम\nइस सराहनीय प्रयास की शुरुआत कोविड काल के दौरान हुई थी, जब इलाके में दुर्घटनाग्रस्त और बीमार वन्यजीव बिना इलाज के दम तोड़ रहे थे। कातरला गांव में हुई एक हिरण के शिकार की घटना ने स्थानीय लोगों को झकझोर कर रख दिया। ग्रामीणों ने पुलिस और स्थानीय प्रशासन से वन्यजीव संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने और रेस्क्यू सेंटर स्थापित करने की गुहार लगाई थी। जब सरकारी स्तर पर कोई सहायता नहीं मिली, तो ग्रामीणों ने स्वयं संगठित होकर जिम्मेदारी संभालने का फैसला लिया।\n\nकातरला के निवासी सगराम खिलेरी ने इस पुनीत कार्य के लिए मुख्य सड़क के किनारे अपनी एक बीघा जमीन दान कर दी। इसके बाद ग्रामीणों ने मिलकर अमृता देवी वन्यजीव संरक्षण संस्थान का गठन किया। संस्थान के अध्यक्ष जगदीश भादू के अनुसार, जब सरकारी तंत्र से कोई मदद नहीं मिल सकी, तब गांव के लोगों ने एकजुट होकर अपनी संस्था बनाई। आज यह संस्थान बिना किसी सरकारी अनुदान के 29 ग्रामीणों की सक्रिय सहभागिता और स्थानीय भामाशाहों के आर्थिक सहयोग से निरंतर संचालित हो रहा है।\n\n1,000 से ज्यादा वन्यजीवों और पक्षियों का सुरक्षित ठिकाना\nधोरीमन्ना उपखंड मुख्यालय से मात्र 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह रेस्क्यू सेंटर आज मरुस्थलीय क्षेत्र के बेजुबानों के लिए वरदान साबित हो रहा है। इस समय सेंटर परिसर में 1,000 से अधिक जीवों की देखरेख की जा रही है। इनमें लगभग 125 हिरण, 400 कबूतर, 15 खरगोश, 1 बतख, 2 हंस के अलावा कछुए, मोर और कई अन्य प्रजातियों के वन्यजीव शामिल हैं। क्षेत्र में कहीं भी दुर्घटना या संकट की सूचना मिलने पर ग्रामीण तुरंत मौके पर पहुंचकर घायल जीव को रेस्क्यू करते हैं।\n\nइलाज के बाद जंगल में वापसी और स्थायी देखभाल\nरेस्क्यू सेंटर में लंबे समय से निस्वार्थ सेवा दे रहे रामजीवन के अनुसार, यहां अधिकतर ऐसे जानवरों को लाया जाता है जो सड़क दुर्घटनाओं, शिकारियों के हमलों या अन्य प्राकृतिक हादसों में गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। सेंटर में लाए गए जीवों का प्राथमिकता के आधार पर समुचित उपचार किया जाता है। नियमित देखभाल और उपचार के बाद जब जानवर पूरी तरह स्वस्थ और सक्षम हो जाते हैं, तो उन्हें पुनः उनके प्राकृतिक आवास यानी जंगल में छोड़ दिया जाता है।\n\nवहीं दूसरी ओर, कुछ वन्यजीव ऐसे भी होते हैं जो गंभीर शारीरिक चोटों या दिव्यांगता के कारण जंगलों में अकेले रहने या अपना शिकार ढूंढने में असमर्थ हो जाते हैं। ऐसे असहाय जीवों के लिए यह रेस्क्यू सेंटर ही उनका स्थायी आशियाना बन चुका है, जहां उन्हें ताउम्र भोजन, पानी और सुरक्षा प्रदान की जाती है।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: यह घटना दर्शाती है कि बिना सरकारी मदद के भी स्थानीय समुदाय एकजुट होकर वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में बड़े बदलाव ला सकते हैं।\n\nराजस्थान (बाड़मेर) में: बाड़मेर और आसपास के मरुस्थलीय इलाकों में सड़क हादसों या शिकार में घायल होने वाले बेजुबान जीवों को तुरंत इलाज और सुरक्षित आशियाना मिल रहा है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. अमृता देवी वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर कहां स्थित है?\nयह रेस्क्यू सेंटर राजस्थान के बाड़मेर जिले में धोरीमन्ना उपखंड मुख्यालय से 8 किलोमीटर दूर कातरला गांव में स्थित है।\n\n2. इस रेस्क्यू सेंटर की शुरुआत कब और क्यों हुई?\nइसकी शुरुआत कोरोना महामारी के दौरान हुई थी, जब घायल पशु-पक्षियों के इलाज के लिए सरकारी मदद न मिलने पर स्थानीय ग्रामीणों ने स्वयं पहल की।\n\n3. वर्तमान में रेस्क्यू सेंटर में कितने वन्यजीव मौजूद हैं?\nइस समय सेंटर में 1,000 से अधिक वन्यजीव और पक्षी सुरक्षित हैं, जिनमें 125 हिरण, 400 कबूतर, 15 खरगोश, 1 बतख, 2 हंस, कछुए और मोर शामिल हैं।\n\n4. रेस्क्यू सेंटर के लिए जमीन किसने दान की?\nकातरला गांव के निवासी सगराम खिलेरी ने मुख्य सड़क के किनारे अपनी एक बीघा जमीन इस रेस्क्यू सेंटर के लिए दान दी थी।\n\n5. क्या इस रेस्क्यू सेंटर को सरकारी फंडिंग मिलती है?\nनहीं, यह रेस्क्यू सेंटर सरकारी मदद के बिना 29 स्थानीय ग्रामीणों की देखरेख और स्थानीय भामाशाहों के सहयोग से संचालित होता है।\n\nप्रेरणा और सबक\nप्रेरणा और सीख:\n\n• सरकारी मदद का इंतजार न करें: कातरला के ग्रामीणों ने दिखाया कि जनभागीदारी से किसी भी सामाजिक या पर्यावरण संकट का समाधान निकाला जा सकता है।\n• छोटी शुरुआत से बड़ा बदलाव: महामारी के बीच शुरू हुई एक छोटी सी मुहिम आज 1,000 से अधिक जीवों का सहारा बन चुकी है।\n• सामूहिक प्रयास की शक्ति: 29 ग्रामीणों और भामाशाहों के सहयोग से बिना किसी सरकारी अनुदान के एक स्थाई संस्थान का सफल संचालन संभव हुआ।",
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  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-08-03",
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