# बाड़मेर के थुंबली गांव के लाखाराम का डॉक्टर बनने का सपना NEET में 586 अंकों के साथ हुआ साकार

> छुट्टियों में मजदूरी करने और रोज 14 किलोमीटर पैदल स्कूल जाने वाले किसान परिवार के लाखाराम ने दूसरे प्रयास में नीट पास कर 586 अंक और AIR 15283 हासिल की है।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-07-19 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/barmer-ke-thumbli-ganva-ke-lakharam-ka-doktara-banane-ka-sapana-neet-men-586-ankon-ke-satha-hua-sakara-8647 · **Language:** Hindi
**Tags:** नीट सफलता, बाड़मेर न्यूज, गरीब किसान परिवार, फिफ्टी विलेजर्स, थुंबली गांव, डॉक्टर बनने का सपना

राजस्थान के बाड़मेर जिले में शिव क्षेत्र के थुंबली गांव से एक प्रेरक कहानी सामने आई है, जो बताती है कि गरीबी हौसलों के आगे टिक नहीं पाती। किसान पिता की संतान लाखाराम, जिनके घर में कुल नौ भाई-बहन हैं, ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट में 586 अंक और ऑल इंडिया रैंक (AIR) 15283 हासिल कर अपने गांव का नाम रोशन कर दिया है।

## तंगहाली में बीता बचपन, पिता उठाते थे बोरियों का बोझ
लाखाराम का बचपन आर्थिक मुश्किलों के साये में गुजरा। संयुक्त परिवार में कमाई का कोई ठोस जरिया न होने से घर चलाना ही चुनौती था, और इसी वजह से लाखाराम अपने परिवार में उच्च शिक्षा हासिल करने वाले पहले सदस्य बने। उनके पिता कभी गुजरात में मजदूरी करते हुए बोरियां उठाया करते थे। इसके बाद उन्हें अपने ही गांव में एक जगह नौकरी मिल गई, जहां से महीने में करीब 12 हजार रुपये मिलते हैं। घर की तंगी इतनी थी कि छुट्टियों के दौरान लाखाराम को भी मजदूरी करनी पड़ती थी, फिर भी उन्होंने कभी किताबों से नाता नहीं तोड़ा। उनका कहना है कि कई मौकों पर हालात इतने बिगड़े कि पढ़ाई बीच में छोड़ने का ख्याल आया, मगर माता-पिता के भरोसे ने उन्हें हर बार संभाला। परिवार की परेशानियां दूर करने और डॉक्टर बनकर लोगों की सेवा करने का सपना ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

## रोज 14 किलोमीटर का पैदल सफर तय कर पहुंचते थे स्कूल
शुरुआती पढ़ाई के दिन लाखाराम के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं थे। स्कूल जाने के लिए उन्हें रोजाना करीब 14 किलोमीटर दूर बोथिया जागीर तक पैदल चलना पड़ता था। इतनी दूरी तय करने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई में लगन नहीं छोड़ी। दसवीं के बाद उन्हें फिफ्टी विलेजर्स नाम की संस्था में जगह मिली, जहां रहने-खाने का पूरा खर्च संस्था ने उठाया। यहीं से उनके सपनों को नई उड़ान मिली और उन्होंने पूरी गंभीरता से नीट की तैयारी शुरू की।

## दूसरे प्रयास में मिली कामयाबी, ओबीसी में रैंक 7120
लाखाराम का पहला प्रयास पूरी तरह सफल नहीं रहा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और दोबारा जुट गए। दूसरी बार की मेहनत आखिरकार रंग लाई। उन्होंने बताया कि ओबीसी कैटेगरी में उनकी रैंक 7120वीं आई है, जबकि उनकी ऑल इंडिया रैंक (AIR) 15283 दर्ज हुई है। इस नतीजे के साथ ही डॉक्टर बनने का उनका सपना अब हकीकत के करीब पहुंच गया है।

## माता-पिता, गुरुजनों और डॉ. भरत सारण को दिया श्रेय
अपनी इस कामयाबी को लाखाराम अकेले अपनी मेहनत का नतीजा नहीं मानते, बल्कि इसमें माता-पिता के त्याग, गुरुजनों के मार्गदर्शन, डॉ. भरत सारण के सहयोग और फिफ्टी विलेजर्स सेवा संस्थान की टीम की मेहनत को भी बराबर की भागीदार बताते हैं। थुंबली गांव का यह युवक आज उन तमाम छात्रों के लिए मिसाल बन चुका है जो पैसों की तंगी और सीमित साधनों को अपने सपनों की सबसे बड़ी दीवार मान बैठते हैं। लाखाराम की कहानी बताती है कि सीमित साधनों में भी लगातार मेहनत और परिवार का भरोसा किसी को भी उसकी मंजिल तक पहुंचा सकता है।

## इसका आप पर असर
- **देश भर में:** यह कहानी उन लाखों नीट अभ्यर्थियों को हौसला देती है जो आर्थिक तंगी के कारण तैयारी बीच में छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं।
- **बाड़मेर, राजस्थान में:** थुंबली जैसे गांवों के गरीब परिवारों के छात्रों के लिए फिफ्टी विलेजर्स जैसी निःशुल्क रहने-पढ़ने की सुविधा देने वाली संस्थाएं एक भरोसेमंद विकल्प बन सकती हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. लाखाराम कहां के रहने वाले हैं?
वे राजस्थान के बाड़मेर जिले के शिव क्षेत्र स्थित थुंबली गांव के रहने वाले हैं।

### 2. लाखाराम ने NEET में कितने अंक हासिल किए?
उन्होंने NEET में 586 अंक हासिल किए और उनकी ऑल इंडिया रैंक (AIR) 15283 रही।

### 3. उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी थी?
वे नौ भाई-बहनों वाले एक गरीब किसान परिवार से हैं, जिनके पिता कभी गुजरात में मजदूरी करते थे और अब गांव में काम करके करीब 12 हजार रुपये महीना कमाते हैं।

### 4. लाखाराम को पढ़ाई के दौरान किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा?
उन्हें छुट्टियों में मजदूरी करनी पड़ती थी और प्रारंभिक शिक्षा के लिए रोजाना करीब 14 किलोमीटर पैदल चलकर बोथिया जागीर जाना पड़ता था।

### 5. उनकी OBC श्रेणी में रैंक क्या रही?
OBC कैटेगरी में उनकी रैंक 7120वीं रही।

### 6. क्या यह उनका पहला NEET प्रयास था?
नहीं, यह उनका दूसरा प्रयास था जिसमें उन्हें सफलता मिली।

### 7. लाखाराम अपनी सफलता का श्रेय किसे देते हैं?
वे अपने माता-पिता, गुरुजनों, डॉ. भरत सारण और फिफ्टी विलेजर्स सेवा संस्थान की टीम को श्रेय देते हैं।

## प्रेरणा और सबक
लाखाराम की कहानी से कई सीख मिलती हैं:

- **हालात चाहे जैसे भी हों, पढ़ाई से नाता न तोड़ें:** छुट्टियों में मजदूरी करने के बावजूद उन्होंने किताबें कभी नहीं छोड़ीं।
- **असफलता को आखिरी मौका न मानें:** पहले प्रयास में सफलता न मिलने पर भी उन्होंने दोबारा तैयारी की और दूसरे प्रयास में सफल हुए।
- **सही सहारा तलाशते रहें:** फिफ्टी विलेजर्स जैसी निःशुल्क सुविधा देने वाली संस्था से जुड़कर उन्होंने अपने संसाधनों की सीमाओं को पार किया।
- **परिवार का भरोसा सबसे बड़ी ताकत है:** मुश्किल वक्त में माता-पिता के हौसले ने उन्हें पढ़ाई छोड़ने से रोका।
- **लक्ष्य साफ रखें:** डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करने के सपने ने उन्हें हर मुश्किल में आगे बढ़ने की ताकत दी।

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