बस्तर के किसानों को भाई मोंगरा की खेती, 15 डिसमिल खेत में पौधे लगाकर हर साल कमा रहे बंपर मुनाफा छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में किसान अब पारंपरिक फसलों के बजाय मोंगरा के फूलों की खेती से मुनाफा कमा रहे हैं। एक बार पौधा लगाने के बाद किसान 7 महीने तक हर किलो पर 400 से 500 रुपये का भाव हासिल कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में कृषि परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। यहां के किसान अब पारंपरिक धान और अनाज की फसलों से इतर व्यावसायिक बागवानी की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। इस बदलाव में मोंगरा फूलों की खेती किसानों के लिए बेहद कम लागत में लंबे समय तक कमाई देने वाला एक बेहतरीन जरिया बनकर उभरी है। एक बार सही तरीके से रोपाई कर देने के बाद यह फसल कई वर्षों तक लगातार उत्पादन देती है, जिससे किसानों को बार-बार बीज और बुआई का भारी खर्च नहीं उठाना पड़ता। कम बीमारी और बाजार में माला-गजरा की भारी मांग मोंगरा की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सामान्य फसलों की तुलना में बीमारियों का खतरा काफी कम होता है। स्थानीय बाजारों में मोंगरा के खुशबूदार फूलों की मांग साल भर बनी रहती है। मुख्य रूप से इसका इस्तेमाल सुंदर गजरे और पूजा की मालाएं तैयार करने के लिए व्यापक स्तर पर किया जाता है। विशेष रूप से विवाह समारोहों और त्योहारों के सीजन में मोंगरा की मांग कई गुना बढ़ जाती है। बाजार में इसके ताजा फूलों की कीमत 400 रुपये से लेकर 500 रुपये प्रति किलोग्राम तक आसानी से मिल जाती है। मोंगरा का पौधा लगाने की सटीक तकनीक और खाद का तालमेल क्षेत्र के किसान नीलेश पटेल 15 डिसमिल जमीन पर मोंगरा की सफल खेती कर रहे हैं। उनके अनुभव के अनुसार, मोंगरा का बाग लगाने से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करना अनिवार्य है। इसके बाद डेढ़ फीट गहरा गड्ढा तैयार किया जाता है, जिसमें शुरुआती पोषण के लिए डीएपी और पोटाश खाद डाली जाती है। रोपाई के बाद पौधों की समय-समय पर कटिंग करना जरूरी होता है और कटिंग को मिट्टी में दबाया जाता है। मोंगरा के पौधे को पूरी तरह विकसित होने और व्यावसायिक स्तर पर फूल देने में लगभग डेढ़ से दो साल का समय लगता है, हालांकि शुरुआती बढ़त में एक साल से अधिक समय लग जाता है। 7 महीने की तुड़ाई और 40,000 रुपये तक का शुद्ध लाभ मोंगरा के पौधे साल में करीब सात महीने तक लगातार फूल देते हैं। फरवरी और मार्च के दौरान जब शादियों का सीजन शुरू होता है, तब इनमें कलियां खिलने लगती हैं। यह सिलसिला पूरी बरसात खत्म होने तक निरंतर जारी रहता है और बारिश रुकते ही फूल आना बंद हो जाते हैं। पौधों को स्वस्थ रखने के लिए किसान 19:19 और 13:52:34 जैसे विशेष पोषक तत्वों का उपयोग करते हैं। फसल में तना छेदक और फूलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों से सुरक्षा के लिए रोगर तथा अन्य कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है। नीलेश पटेल बताते हैं कि महज 15 डिसमिल के छोटे से रकबे से सात महीनों के सीजन में 30,000 रुपये से लेकर 40,000 रुपये तक की सीधी कमाई आसानी से हो जाती है। इसका आप पर असर भारत में: पारंपरिक फसलों से अलग बागवानी और फूलों की खेती छोटे और सीमांत किसानों के लिए कम जमीन में भी नियमित आय का स्थायी विकल्प बन सकती है। बस्तर में: स्थानीय किसान महज 15 डिसमिल जैसी छोटी जोत पर मोंगरा उगाकर शादी-त्योहारों के सीजन में 40,000 रुपये तक की अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं। सवाल-जवाब 1. मोंगरा के फूल साल में कितने महीने आते हैं? मोंगरा का पौधा साल में लगभग सात महीने तक फूल देता है। यह तुड़ाई फरवरी-मार्च से शुरू होकर बरसात खत्म होने तक चलती है। 2. मोंगरा की खेती में बाजार में क्या भाव मिलता है? बाजार में मोंगरा के फूलों की कीमत 400 रुपये से लेकर 500 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिलती है, खासकर गजरा और माला बनाने के लिए इसकी भारी मांग रहती है। 3. मोंगरा का पौधा लगाने के लिए गड्ढा कितना गहरा खोदना चाहिए? मोंगरा के पौधे की रोपाई के लिए डेढ़ फीट गहरा गड्ढा खोदा जाता है और उसमें डीएपी तथा पोटाश खाद मिलाकर पौधा लगाया जाता है। 4. 15 डिसमिल जमीन में मोंगरा की खेती से कितनी कमाई हो सकती है? किसान नीलेश पटेल के अनुसार, 15 डिसमिल जमीन में मोंगरा का प्लांट तैयार होने पर 7 महीने के सीजन में 30,000 से 40,000 रुपये तक की कमाई हो सकती है। 5. मोंगरा की फसल में कौन से मुख्य कीड़े लगते हैं और उनका बचाव कैसे होता है? मोंगरा की फसल में मुख्य रूप से तना छेदक और फूल खाने वाले कीड़े लगते हैं, जिनके नियंत्रण के लिए रोगर और उपयुक्त कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है। प्रेरणा और सबक मोंगरा खेती से प्रेरणादायक सबक: • पारंपरिक पैटर्न से बाहर निकलना: केवल धान या गेहूं पर निर्भर रहने के बजाय बाजार की मांग वाले व्यावसायिक फूलों की खेती अपनाएं। • दीर्घकालिक सोच: मोंगरा का पौधा तैयार होने में 1.5 से 2 साल का समय लेता है, लेकिन धैर्य रखने पर यह कई सालों तक लगातार आमदनी देता है। • सटीक तकनीक और पोषण: 1.5 फीट गहरा गड्ढा, डीएपी, पोटाश और 19:19 तथा 13:52:34 जैसी खादों का संतुलन पौध स्वास्थ्य और बेहतर उपज की कुंजी है। • छोटी जोत का अधिकतम उपयोग: महज 15 डिसमिल जैसी छोटी जमीन पर भी अनुशासित प्रबंधन से 40,000 रुपये तक की शुद्ध कमाई संभव है। https://trendkia.com/success-stories/bastar-ke-kisanon-ko-bhai-mongara-ki-kheti-15-disamila-kheta-men-paudhe-lagakara-hara-sala-kama-rahe-bnpara-munapha-17424 TrendKia — Har trend, sabse pehle.