बिहार के एक स्कूल ड्रॉपआउट ने सरकारी योजना से 10 लाख का लोन लेकर खड़ी की फूड मशीनरी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट तंगहाली के कारण 15 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ने वाले इमाम अली ने कोरोना काल में नौकरी जाने के बाद हार नहीं मानी और प्रधानमंत्री योजना से 10 लाख रुपये का लोन लेकर बिहार में ही खुद की फूड मशीनरी बनाने की फैक्ट्री शुरू कर दी। बिहार के सारण जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर खुद की मशीन मैन्युफैक्चरिंग यूनिट खड़ी करने वाले इमाम अली की कहानी संघर्ष और कामयाबी की एक अनोखी मिसाल है। महज 15 साल की उम्र में जब बच्चे अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करते हैं, तब तंगहाली के कारण इमाम को पढ़ाई छोड़कर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। लेकिन आज वह न केवल खुद एक सफल उद्यमी बन चुके हैं, बल्कि कई लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं। उन्होंने संकट के समय में सरकारी सहायता का लाभ उठाकर अपनी किस्मत को पूरी तरह से बदल दिया है। परिवार की आर्थिक तंगहाली और दिल्ली-कोलकाता का सफर सारण जिले के गरखा प्रखंड के अंतर्गत आने वाले बीबीपुर गांव के रहने वाले इमाम अली के पिता एक बेहद साधारण किसान थे। उनके पास खेती के लिए बहुत कम जमीन थी, जिससे होने वाली मामूली कमाई से पूरे परिवार का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था। घर की बेहद दयनीय स्थिति को देखते हुए इमाम अली ने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। केवल 15 वर्ष की आयु में वह दिल्ली के लिए रवाना हो गए, जहां उन्होंने एक फैक्ट्री में मजदूरी करना शुरू किया। कुछ समय दिल्ली में बिताने के बाद वह कोलकाता चले गए। कोलकाता की एक मशीन बनाने वाली फैक्ट्री में उन्हें लंबे समय तक काम करने का अवसर मिला। यहीं पर उन्होंने अलग-अलग प्रकार की मशीनों को तैयार करने की पेचीदा प्रक्रिया को बहुत करीब से सीखा और उसमें महारत हासिल की। उनकी मेहनत और कौशल को देखते हुए वहां उन्हें 35,000 रुपये से अधिक की मासिक सैलरी मिलने लगी थी, जो उस समय उनके परिवार के लिए बहुत बड़ा सहारा थी। कोरोना का संकट और गांव वापसी की मजबूरी जब पूरे देश में कोरोना वायरस की महामारी ने दस्तक दी, तो बड़े-बड़े शहरों में फैक्ट्रियां और उद्योग-धंधे अचानक बंद होने लगे। कोलकाता में जिस फैक्ट्री में इमाम काम करते थे, वह भी देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से बंद हो गई। कोई और रास्ता न देखकर इमाम वापस अपने गांव बीबीपुर लौट आए। शुरुआती दिनों में तो उन्होंने अपने पास बची हुई जमा-पूंजी से घर खर्च चलाया, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, उनकी सारी बचत खत्म होने लगी। उनके सामने एक बार फिर गहरा आर्थिक संकट खड़ा हो गया था और भविष्य पूरी तरह से अंधकारमय नजर आने लगा था। प्रधानमंत्री योजना से मिला 10 लाख का लोन और नई शुरुआत इस विकट परिस्थिति में इमाम अली ने हार मानने के बजाय खुद का कुछ काम शुरू करने का फैसला किया। उनके पास मशीनें बनाने का हुनर तो था, लेकिन अपना सेटअप लगाने के लिए जरूरी पूंजी नहीं थी। इस समस्या का समाधान करने के लिए उन्होंने सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी जुटाई और प्रधानमंत्री योजना के तहत 10 लाख रुपये के लोन के लिए आवेदन किया। लोन स्वीकृत होने के बाद उन्हें वह वित्तीय सहायता मिल गई जिसकी उन्हें सख्त जरूरत थी। इस लोन की राशि का उपयोग करके इमाम अली ने अपने ही घर पर मशीनें बनाने का एक छोटा कारखाना स्थापित किया। उन्होंने खुद ही अलग-अलग प्रकार की खाद्य प्रसंस्करण (फूड प्रोसेसिंग) मशीनें डिजाइन और तैयार करना शुरू कर दिया। उनके भीतर का हुनर अब एक नए व्यापार के रूप में उभरकर सामने आने लगा था। विभिन्न राज्यों में मशीनों की मांग और स्थानीय लोगों को रोजगार इमाम की इस फैक्ट्री में अब बड़े पैमाने पर व्यापारिक उपयोग की मशीनें बनाई जाती हैं। इनमें मुख्य रूप से आटा गूंधने वाली मशीन, रोटियां बनाने वाली मशीन, बर्गर और बिस्कुट बनाने की मशीन, तथा पिज्जा और चाऊमीन तैयार करने वाली मशीनें शामिल हैं। इन मशीनों की गुणवत्ता इतनी बेहतरीन है कि अब इनकी बिक्री न केवल बिहार में, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों में बड़े पैमाने पर हो रही है। अपने इस सफल व्यवसाय के जरिए इमाम अली ने न केवल अपनी किस्मत बदली है, बल्कि अपने गांव के 10 से अधिक लोगों को रोजगार देकर उनके परिवारों को भी सहारा दिया है। इमाम का कहना है कि उनकी बनाई इन मशीनों को खरीदकर अन्य लोग भी अपना छोटा व्यवसाय शुरू कर सकते हैं और आत्मनिर्भर बन सकते हैं। इसका आप पर असर • देशभर में: यह कहानी दर्शाती है कि कैसे सरकारी स्टार्टअप लोन ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को साधारण मजदूर से सफल उद्यमी बनने और दूसरों को रोजगार देने के लिए सशक्त बना सकते हैं। • बिहार में: यह सारण जिले में सूक्ष्म उद्योगों की बढ़ती क्षमता को रेखांकित करता है, जिससे साबित होता है कि स्थानीय स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देकर पलायन को रोका जा सकता है। सवाल-जवाब 1. इमाम अली कौन हैं? इमाम अली बिहार के सारण जिले के बीबीपुर गांव के रहने वाले एक उद्यमी हैं, जिन्होंने आर्थिक तंगहाली को पीछे छोड़कर एक सफल मशीन निर्माता के रूप में अपनी पहचान बनाई है। 2. इमाम अली ने 15 साल की उम्र में पढ़ाई क्यों छोड़ दी थी? अपने परिवार की बेहद खराब आर्थिक स्थिति में सुधार लाने और छोटे किसान पिता की मदद करने के लिए उन्होंने कम उम्र में ही स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी थी। 3. उन्होंने फूड प्रोसेसिंग मशीनें बनाना कैसे सीखा? दिल्ली में काम करने के बाद इमाम कोलकाता चले गए, जहां उन्होंने एक फैक्ट्री में सालों तक काम करते हुए विभिन्न प्रकार की मशीनों को बनाने का व्यावहारिक ज्ञान हासिल किया। 4. कोविड-19 महामारी ने उनके जीवन को कैसे बदल दिया? लॉकडाउन के कारण कोलकाता की फैक्ट्री बंद हो गई और इमाम को गांव लौटना पड़ा, जहां उन्होंने प्रधानमंत्री योजना के तहत 10 लाख का लोन लेकर खुद का व्यवसाय शुरू किया। 5. इमाम की फैक्ट्री में किस तरह की मशीनें बनाई जाती हैं? उनकी यूनिट में आटा गूंधने, रोटी बनाने, बर्गर, बिस्कुट, पिज्जा और चाऊमीन बनाने वाली कमर्शियल मशीनें तैयार की जाती हैं। प्रेरणा और सबक • व्यावहारिक कौशल हासिल करें: इमाम ने कोलकाता में रहकर मशीनों के निर्माण का बारीक हुनर सीखा, जो आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। • संकट को अवसर में बदलें: महामारी के दौरान नौकरी जाने पर निराश होने के बजाय उन्होंने इस संकट को खुद का व्यवसाय शुरू करने के अवसर के रूप में लिया। • सरकारी योजनाओं का लाभ उठाएं: प्रधानमंत्री योजना के तहत 10 लाख रुपये का लोन लेकर उन्होंने पूंजी की कमी को अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया। • मांग वाले उत्पादों पर ध्यान दें: रोटियां और बिस्कुट बनाने जैसी कमर्शियल फूड प्रोसेसिंग मशीनों का निर्माण कर उन्होंने बाजार की बड़ी जरूरत को पूरा किया। https://trendkia.com/success-stories/bihar-ke-eka-skula-dropaauta-ne-sarakari-yojana-se-10-lakha-ka-lona-lekara-khari-ki-phuda-mashinari-mainyuphaikcharinga-yunita-10526 TrendKia — Har trend, sabse pehle.