# बिहार के खलीलचक में सरकारी मदद से शुरू हुआ नूडल्स उद्यम, दस परिवारों को मिला सहारा

> शेखपुरा के एक छोटे से गांव में रहने वाले दंपती ने सरकारी सहायता की बदौलत खाद्य प्रसंस्करण इकाई शुरू कर न केवल अपनी माली हालत सुधारी, बल्कि स्थानीय ग्रामीणों को भी आजीविका दी है।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-11-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/bihar-ke-khalilchak-men-sarakari-madada-se-shuru-hua-nudalsa-udyama-dasa-parivaron-ko-mila-sahara-55070 · **Language:** Hindi
**Tags:** शेखपुरा, बरबीघा, सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण, स्वरोजगार, स्मृति नूडल्स, सफलता की कहानी

बिहार के ग्रामीण अंचल में स्वरोजगार के प्रयासों ने सामाजिक और आर्थिक स्तर पर बड़ा बदलाव लाना शुरू कर दिया है। शेखपुरा जिले के बरबीघा प्रखंड अंतर्गत खलीलचक गांव में रहने वाले एक दंपती ने सरकारी योजना का लाभ उठाकर खाद्य उत्पादन क्षेत्र में एक सफल मिसाल कायम की है। संजय कुमार और उनकी जीवनसंगिनी रंजना कुमारी ने विपरीत पारिवारिक परिस्थितियों के बीच नूडल्स तैयार करने का एक छोटा कारखाना स्थापित किया। आज इस निर्माण इकाई के जरिए वे अपने क्षेत्र के 10 जरूरतमंद महिला और पुरुष कामगारों को नियमित काम उपलब्ध करा रहे हैं, जिससे ग्रामीण स्तर पर ही लोगों को आत्मनिर्भरता की राह मिली है।

## घरेलू तंगहाली से उद्यम स्थापना तक का सफर
कुछ समय पहले तक इस परिवार की माली हालत काफी चिंताजनक दौर से गुजर रही थी। लगातार बढ़ती घरेलू जरूरतों और बच्चों की स्कूल फीस का भुगतान करने में रोजमर्रा की दिक्कतें पेश आ रही थीं। रंजना कुमारी उस दौर में केवल घर की जिम्मेदारियों तक सीमित थीं, मगर वे लगातार किसी ऐसे स्वतंत्र काम की तलाश में थीं जिससे आमदनी का जरिया बन सके। इसी दौरान उन्हें केंद्र सरकार द्वारा संचालित सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम से जुड़ी योजना की जानकारी हासिल हुई। कागजी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उन्हें वित्तीय और तकनीकी मदद स्वीकृत हुई, जिससे संयंत्र लगाने का रास्ता साफ हुआ।

रंजना कुमारी के मुताबिक, सरकारी मदद के बिना उनके लिए इस तरह के निर्माण संयंत्र की परिकल्पना करना भी मुमकिन नहीं था। उन्होंने बताया कि इस पहल ने उन्हें समाज में एक नई पहचान दी है और आज वे अपने पूरे परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों को मजबूती से निभा रही हैं। उद्यम के मुनाफे से बच्चों की उच्च शिक्षा की राह आसान हुई और उनकी बेटी अपनी पढ़ाई पूरी करके आत्मनिर्भर बन चुकी है।

## मशीनों की स्थापना और क्षेत्रीय बाजारों तक पहुंच
योजना के तहत मिली पूंजी से कारखाने में आधुनिक मशीनें स्थापित की गईं और स्मृति नूडल्स नाम से उत्पादन की शुरुआत हुई। कारखाने के प्रबंधन में हाथ बंटाने वाले संजय कुमार बताते हैं कि शुरुआत में संसाधनों की कमी सबसे बड़ी रुकावट थी, लेकिन सरकारी मदद ने राह आसान बना दी। उत्पादन शुरू होने के बाद उत्पाद की गुणवत्ता के चलते आसपास के बाजारों में मांग तेजी से बढ़ने लगी।

वर्तमान में इस ग्रामीण कारखाने में बने नूडल्स की आपूर्ति शेखपुरा के अलावा नालंदा, नवादा और राजगीर के थोक एवं खुदरा बाजारों में की जा रही है। लगातार मिल रहे आर्डर को देखते हुए दंपती अब उत्पादन क्षमता बढ़ाने और अतिरिक्त कामगारों को जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं ताकि क्षेत्रीय स्तर पर और लोगों को रोजगार मिल सके।

## पलायन रोकने में मददगार बनी स्थानीय इकाई
इस निर्माण इकाई ने गांव के युवाओं को घर के करीब ही काम करने का बेहतरीन विकल्प दिया है। कारखाने में काम कर रहे देवानंद कुमार पहले आजीविका कमाने के लिए उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में रहकर नौकरी करते थे। अपने गांव के पास ही सम्मानजनक काम मिलने से वे अब अपने घर लौट आए हैं। देवानंद का कहना है कि घर के निकट रोजगार मिलने से रोजमर्रा का जीवन काफी सुगम हो गया है और वे जल्द ही अपने पूरे परिवार को वापस गांव में ही बसाने की तैयारी कर रहे हैं।

## इसका आप पर असर
इस तरह के सूक्ष्म उद्यम ग्रामीण अर्थव्यवस्था में स्थानीय रोजगार और स्वरोजगार के व्यावहारिक रास्ते खोलते हैं।

- **भारत में:** खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में सरकारी सहायता छोटे उद्यमियों को अपने कारखाने लगाने के लिए वित्तीय साधन उपलब्ध कराती है। इसके जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे विनिर्माण केंद्र स्थापित करके शहरी पलायन की मजबूरी को कम किया जा सकता है।
- **शेखपुरा में:** स्थानीय स्तर पर नूडल्स निर्माण इकाई चलने से नवादा, राजगीर और नालंदा के खुदरा विक्रेताओं को पास से ही ताजा उत्पाद मिल रहा है। गांव के 10 श्रमिकों को घर के पास आजीविका मिलने से उनके जीवनयापन का खर्च काफी कम हुआ है।
- **महिलाओं के लिए:** घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित रहने वाली महिलाओं को अपना कारोबार शुरू करने का सीधा रास्ता मिलता है। आत्मनिर्भर होने से परिवार के बच्चों की उच्च शिक्षा और अन्य मूलभूत जरूरतों को आसानी से पूरा किया जा सकता है।
- **कामगारों के लिए:** बड़े शहरों में रहने और काम करने का खर्च बचाकर श्रमिक अपने पैतृक गांव में रहकर काम कर सकते हैं। इससे परिवारों का अलगाव खत्म होता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलती है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह उद्यम परिवार की गंभीर आर्थिक तंगी और केंद्र सरकार की सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण सहायता योजना के समन्वय से संभव हुआ।

- **सीधा कारण:** घरेलू खर्चों में भारी बढ़ोतरी और बच्चों की पढ़ाई का खर्च वहन करने में असमर्थता ने दंपती को नया व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित किया। रंजना कुमारी एक स्वतंत्र आमदनी का साधन स्थापित करना चाहती थीं।
- **योजना की मदद:** दंपती को प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना की समय पर जानकारी मिली, जिसके तहत मशीनरी लगाने के लिए सरकारी अनुदान और ऋण सहायता प्राप्त हुई।
- **बाजार की मांग:** शेखपुरा के आसपास नालंदा, नवादा और राजगीर में रेडी-टू-कुक नूडल्स की निरंतर मांग मौजूद थी, जिसने इस उद्यम को तेजी से लाभदायक बना दिया।

## सवाल-जवाब

### 1. यह नूडल्स निर्माण इकाई बिहार के किस जिले में स्थापित की गई है?
यह कारखाना बिहार के शेखपुरा जिले में बरबीघा प्रखंड के अंतर्गत आने वाले खलीलचक गांव में स्थापित किया गया है।

### 2. इस उद्यम को शुरू करने वाले दंपती का नाम क्या है?
इस व्यवसाय की शुरुआत संजय कुमार और उनकी पत्नी रंजना कुमारी ने मिलकर की है।

### 3. इस व्यवसाय की स्थापना के लिए किस सरकारी योजना का सहारा लिया गया?
इस कारखाने को प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना (पीएमएफएमई) के तहत मिली सहायता से शुरू किया गया।

### 4. वर्तमान में इस कारखाने में कितने लोग काम कर रहे हैं?
इस इकाई में फिलहाल 10 महिला और पुरुष कामगार काम कर रहे हैं।

### 5. इस इकाई में तैयार नूडल्स किन बाजारों में बेचे जा रहे हैं?
शेखपुरा के अलावा नालंदा, नवादा और राजगीर के बाजारों में इन नूडल्स की आपूर्ति की जा रही है।

### 6. कामगार देवानंद कुमार पहले कहां काम करते थे?
देवानंद कुमार गांव में रोजगार मिलने से पहले आजीविका के लिए गाजियाबाद में काम करते थे।

## प्रेरणा और सबक
खलीलचक के इस दंपती का सफर सिखाता है कि सीमित साधनों के बावजूद सही योजना से आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है।

- **पहला सबक:** घरेलू सीमाओं से बाहर निकलकर सरकारी योजनाओं की सही जानकारी लेना और उनका समय पर उपयोग करना जीवन बदल सकता है।
- **दूसरा सबक:** बड़े पैमाने पर काम शुरू करने के बजाय छोटे स्तर पर खाद्य निर्माण से शुरुआत करके स्थानीय बाजारों की मांग पूरी की जा सकती है।
- **तीसरा सबक:** अपनी सफलता के साथ-साथ समुदाय के अन्य लोगों और बाहर गए कामगारों को स्थानीय स्तर पर रोजगार देना सच्ची प्रगति है।

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