# बिहार के मंटू चंद्रवंशी ने पारंपरिक नुस्खों से खड़ा किया देसी मिठाई का कारोबार, 15 से 20 महिलाओं को मिला सहारा

> सासाराम में दादा की पुरानी डायरी के आधार पर मंटू चंद्रवंशी ने देसी घी और गुड़ से 15 तरह के पारंपरिक लड्डू तैयार कर एक नया मुकाम हासिल किया है, जिससे स्थानीय महिलाओं को भी काम मिला है।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-11-01 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/bihar-ke-mantu-chandrawanshi-ne-parnparika-nuskhon-se-khara-kiya-desi-mithai-ka-karobara-15-se-20-mahilaon-ko-mila-sahara-54216 · **Language:** Hindi
**Tags:** मंटू चंद्रवंशी, सासाराम, हर्बल लड्डू, श्री नारायणी स्वयं सहायता समूह, जीविका, खादी मॉल पटना

आधुनिक जीवनशैली में खान-पान की बदलती आदतों के बीच सासाराम के एक उद्यमी ने पुरानी धरोहर को आजीविका का जरिया बना दिया है। रोहतास जिले के रहने वाले मंटू चंद्रवंशी ने दादा के आयुर्वेदिक ज्ञान को नए रूप में ढालकर पारंपरिक मिठाइयों की एक श्रृंखला पेश की है। श्री नारायणी स्वयं सहायता समूह की नींव रखकर उन्होंने ग्रामीण इलाकों में रोजगार की नई जमीन तैयार की है, जहां शुद्ध देसी सामग्री से तैयार खाद्य पदार्थों को बाजार तक पहुंचाया जा रहा है।

## पारिवारिक ज्ञान और डायरी के पन्नों से निकली प्रेरणा
इस कारोबार की जड़ें मंटू के पारिवारिक परिवेश से जुड़ी हैं। उनके दादा एक वैद्य थे, जिनके पास जड़ी-बूटियों और स्वास्थ्यवर्धक खान-पान का गहरा अनुभव था। बचपन के उसी माहौल और घर में रखी पुरानी डायरी में दर्ज विवरणों ने मंटू को पुरानी खान-पान परंपरा पर काम करने की दिशा दिखाई। उनका मकसद उन व्यंजनों को दोबारा जीवन देना था जो आधुनिक बाजार की चकाचौंध में लोगों के घरों से दूर होते जा रहे थे।

शुरुआती दौर में मंटू मुंबई में कार्यरत थे। वहां की परिस्थितियों के चलते उन्हें गृह राज्य लौटना पड़ा था। घर पर एक लंबा वक्त बिताने के बाद उन्होंने अपनी ही मिट्टी में कुछ नया करने का संकल्प लिया। उन्होंने करीब 40-50 हजार रुपये की बेहद सीमित पूंजी से इस काम की शुरुआत की। आगे चलकर उनकी पत्नी जीविका परियोजना से जुड़ीं, जिसके बाद पूरे कामकाज को श्री नारायणी समूह के बैनर तले एक संगठित पहचान दी गई।

## शुद्धता पर जोर और 15 तरह की खास किस्में
श्री नारायणी समूह की सबसे बड़ी खासियत इसकी विविध किस्में हैं। इस इकाई में कुल 15 किस्मों के पारंपरिक और औषधीय लड्डू तैयार किए जाते हैं। इनमें प्रमुख रूप से अश्वगंधा लड्डू, हल्दी-मेथी लड्डू, अलसी-तीसी लड्डू, गोंद लड्डू, सोंठ लड्डू, ड्राई फ्रूट लड्डू और बल-बुद्धि वर्धक भोग शामिल हैं। इन सभी उत्पादों का निर्माण देसी घी और गुड़ के सहयोग से किया जाता है। मंटू का स्पष्ट कहना है कि वे निर्माण प्रक्रिया में कृत्रिम रंगों अथवा रसायनों से पूरी तरह परहेज करते हैं।

कीमतों की बात करें तो गोंद का 400 ग्राम का पैकेट लगभग 300 रुपये में मिलता है। इसी मूल्य वर्ग में 21 अलग-अलग जड़ी-बूटियों के अर्क से बना एक विशेष उत्पाद भी ग्राहकों को दिया जाता है। इस खास मिश्रण को तैयार करने के लिए हर्रे, बहेड़ा, आंवला, अजवाइन, मेथी और सौंफ का उपयोग किया जाता है। सूखे मेवों के प्रेमियों के लिए ड्राई फ्रूट लड्डू में कई मेवों का संतुलन रखा जाता है।

## उम्र और स्वास्थ्य की जरूरतों के हिसाब से सामग्री का चयन
विभिन्न आयु वर्गों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उत्पादों में तत्वों का संयोजन तय किया गया है। दिमाग के विकास और शक्ति संवर्धन के लिए तैयार बल-बुद्धि वर्धक भोग में अश्वगंधा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, शतावरी और सफेद मूसली जैसी जड़ी-बूटियों को मिलाया जाता है। छोटे बच्चों की मानसिक सक्रियता के लिए बनाए जाने वाले लड्डू में शंखपुष्पी, ब्राह्मी, शतावरी, तुलसी, अश्वगंधा और कच्ची हल्दी का उपयोग होता है।

मौसम के बदलाव और मौसमी तकलीफों से राहत देने के लिए सोंठ के लड्डू तैयार होते हैं। इसमें सोंठ के अलावा दालचीनी, मुलेठी, इलायची, पिप्पली और लौंग को उचित अनुपात में पकाया जाता है। हर घटक का चयन शरीर की आंतरिक शक्ति को मजबूत करने के दृष्टिकोण से किया गया है।

## महिलाओं की भागीदारी और बिक्री का ताना-बाना
इस पूरी पहल ने स्थानीय महिलाओं के जीवन में भी आर्थिक बदलाव लाने का काम किया है। सासाराम में लगभग 15 से 20 महिलाएं इस उद्यम के उत्पादन पक्ष की जिम्मेदारी संभालती हैं। लड्डू बनाने से लेकर पैकिंग तक का काम महिलाएं करती हैं, जबकि मंटू खुद उत्पादों की मार्केटिंग और बिक्री के लिए विभिन्न स्थानों का दौरा करते हैं।

जीविका के साथ जुड़ने से समूह को एक ढांचा तो मिला, लेकिन स्थायी बिक्री केंद्र न होने के चलते उत्पादों की पहुंच बनाना एक चुनौती रही है। इस कमी को पूरा करने के लिए मंटू हाट, महिला बाजार, प्रदर्शनियों और मॉल जैसे मौकों का सहारा लेते हैं। राजधानी पटना में गांधी मैदान के गेट नंबर 7 के समीप स्थित खादी मॉल में भी ये उत्पाद खरीदारी के लिए उपलब्ध कराए गए हैं। इसके अलावा दूर-दराज के उपभोक्ताओं के लिए 6299280880 पर संपर्क कर कूरियर से सामान मंगाने की सुविधा भी दी गई है।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक खान-पान और ग्रामीण स्तर पर शुरू हुए इस छोटे उद्यम से शुद्ध पौष्टिक विकल्पों के साथ स्थानीय आजीविका को बढ़ावा मिल रहा है।

- **बिहार में:** सासाराम की 15 से 20 महिलाओं को घर के पास काम और नियमित आय का साधन मिला है। गांधी मैदान के पास खादी मॉल में उपलब्ध होने से पटना के ग्राहकों को सीधे शुद्ध हर्बल उत्पाद मिल रहे हैं।
- **उपभोक्ताओं के लिए:** मिलावटी मिठाइयों के मुकाबले लोगों को देसी घी, गुड़ और जड़ी-बूटियों से बने स्वस्थ विकल्प मिल रहे हैं। फोन कॉल 6299280880 के माध्यम से अन्य शहरों के ग्राहक भी कूरियर से इन्हें मंगवा सकते हैं।
- **छोटे उद्यमियों के लिए:** 40-50 हजार रुपये की कम लागत में पारंपरिक ज्ञान से सफल उद्यम खड़ा करने का व्यावहारिक मॉडल सामने आया है। स्थानीय उत्पादों को हाट और मेलों से जोड़कर बिना बड़े शोरूम के भी बाजार बनाया जा सकता है।
- **स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के लिए:** बच्चों और बुजुर्गों के लिए रसायन-मुक्त और बिना कृत्रिम रंग वाली मिठाइयां उपलब्ध कराई गई हैं। मौसमी बीमारियों से बचाव के लिए सोंठ और औषधीय लड्डू का चयन किया जा सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
मंटू चंद्रवंशी का यह उद्यम मुंबई से गृह राज्य लौटने और पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान को व्यावसायिक रूप देने की सोच के कारण अस्तित्व में आया।

- **पारिवारिक पृष्ठभूमि:** मंटू के दादा पेशे से वैद्य थे और घर में पारंपरिक नुस्खों व जड़ी-बूटियों की डायरी मौजूद थी। इसी संचित जानकारी ने उन्हें विलुप्त हो रहे पुराने व्यंजनों को दोबारा तैयार करने की राह दिखाई।
- **मुंबई से वापसी:** परिस्थितियों के कारण मुंबई की नौकरी छोड़कर उन्हें बिहार वापस आना पड़ा था। लंबे समय तक खाली बैठने के बजाय उन्होंने 40-50 हजार रुपये की पूंजी से खुद का काम शुरू करने का फैसला किया।
- **जीविका का सहयोग:** मंटू की पत्नी के स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद काम को संस्थागत रूप मिला। श्री नारायणी समूह के गठन से ग्रामीण महिलाओं को एकजुट कर उत्पादन बढ़ाने में मदद मिली।

## सवाल-जवाब

### 1. श्री नारायणी समूह द्वारा कितने प्रकार के लड्डू तैयार किए जाते हैं?
इस समूह द्वारा अश्वगंधा, गोंद, हल्दी-मेथी, अलसी और सोंठ सहित कुल 15 तरह के पारंपरिक लड्डू बनाए जाते हैं।

### 2. इन लड्डुओं में कौन-से मुख्य आधारभूत तत्वों का इस्तेमाल होता है?
इन्हें शुद्ध देसी घी और गुड़ के साथ तैयार किया जाता है, जिनमें किसी भी प्रकार के रसायन या कृत्रिम रंग नहीं मिलाए जाते।

### 3. गोंद के लड्डू का क्या दाम तय किया गया है?
गोंद का लड्डू 400 ग्राम के पैकेट में लगभग 300 रुपये में उपलब्ध कराया जाता है।

### 4. पटना में इन उत्पादों को कहां से खरीदा जा सकता है?
पटना में गांधी मैदान के गेट नंबर 7 के पास स्थित खादी मॉल से इन लड्डुओं को खरीदा जा सकता है।

### 5. क्या दूसरे शहरों के लोग भी इन उत्पादों को मंगा सकते हैं?
हां, दूसरे शहरों के ग्राहक मोबाइल नंबर 6299280880 पर संपर्क कर कूरियर के जरिए इन्हें मंगा सकते हैं।

### 6. इस उद्यम से कितनी महिलाओं को रोजगार मिला है?
सासाराम में करीब 15 से 20 महिलाएं इन लड्डुओं के निर्माण और पैकेजिंग के काम से जुड़ी हैं।

## प्रेरणा और सबक
महानगर की नौकरी छूटने के बाद भी निराश न होकर पैतृक ज्ञान और सीमित साधनों से मंटू चंद्रवंशी ने प्रेरणादायक मुकाम हासिल किया है।

- **विपरीत समय में आत्मनिर्भरता:** जब शहर से गांव लौटना पड़ा तो उन्होंने खाली बैठने के बजाय अपनी जड़ों में छुपे अवसरों को पहचाना।
- **कम पूंजी में बड़ी शुरुआत:** सिर्फ 40-50 हजार रुपये की साधारण राशि से काम शुरू करके उन्होंने साबित किया कि संकल्प बड़ा होना चाहिए।
- **सामूहिक विकास की सोच:** अपनी सफलता को अकेले तक सीमित न रखकर उन्होंने गांव की 15-20 महिलाओं को उत्पादन से जोड़कर सशक्त बनाया।
- **पुरानी धरोहर का सम्मान:** दादा की डायरी के पारंपरिक नुस्खों को आधुनिक बाजार की मांग के अनुकूल ढालकर उन्होंने एक नई पहचान बनाई।

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