# बिहार के मिथिलांचल से निकले मखाने की देशव्यापी मांग, मधुबनी के दंपति ने पारंपरिक काम को दिया बड़ा बाजार

> मधुबनी के किशोरी लाल चौक निवासी सुनीता गुप्ता और दीपक प्रसाद गुप्ता ने 100 साल पुराने पुश्तैनी मखाना व्यवसाय को आधुनिक आपूर्ति व्यवस्था से जोड़कर देश भर में फैला दिया है।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-09-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/bihar-ke-mithilanchal-se-nikle-makhane-ki-deshvyapi-mang-madhubani-ke-dampati-ne-paramparik-kam-ko-diya-bada-bazar-35213 · **Language:** Hindi
**Tags:** मधुबनी, मखाना कारोबार, मिथिलांचल, सुनीता गुप्ता, दीपक प्रसाद गुप्ता, पूर्णिया, कृषि व्यवसाय

बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र की पहचान देश भर में मखाना उत्पादन के प्रमुख केंद्र के रूप में होती रही है। इस इलाके में कई परिवार ऐसे हैं जो पीढ़ियों से मखाना तैयार करने और बेचने के काम में रमे हुए हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मधुबनी के किशोरी लाल चौक इलाके में रहने वाले सुनीता गुप्ता और उनके पति दीपक प्रसाद गुप्ता ने अपने पुश्तैनी काम को एक नई दिशा दी है। उनके परिवार में मखाने की खरीद-बिक्री का यह सिलसिला 100 साल से अधिक समय से चला आ रहा है। पहले यह कारोबार केवल मिथिलांचल के स्थानीय बाजारों तक सिमटा हुआ था, लेकिन इस दंपति ने अपनी नई सोच और बेहतर आपूर्ति व्यवस्था के दम पर इसे पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचा दिया है।

## सीजन में भारी खरीदारी और कच्चा माल जुटाने की रणनीति
मखाना कारोबार की प्रकृति ऐसी है कि इसमें साल के कुछ खास महीनों के दौरान ही कच्चे माल की सबसे ज्यादा खरीदारी करनी पड़ती है। मखाने के कच्चे बीज को स्थानीय भाषा में गौरिया कहा जाता है। दंपति इस सीजन में भारी मात्रा में गौरिया की खरीद करते हैं। कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए वे केवल मधुबनी के स्थानीय तालाबों पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि पूर्णिया सहित आसपास के अन्य प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों से भी बड़े पैमाने पर बीज मंगाते हैं। एक बार जब पर्याप्त मात्रा में कच्चा बीज इकट्ठा हो जाता है, तो उसे गद्दी पर पारंपरिक विधि से प्रोसेस करने की प्रक्रिया शुरू की जाती है। पूरी तरह तैयार मखाने को सुरक्षित तरीके से स्टॉक करके रखा जाता है, ताकि साल के बाकी महीनों में मांग आने पर थोक और खुदरा दोनों तरह के खरीदारों को माल भेजा जा सके।

## करोड़ों की पूंजी और सरकारी योजनाओं का सहारा
सुनीता गुप्ता के अनुसार इस पूरे व्यापार चक्र में शुरुआत में ही भारी आर्थिक निवेश की दरकार होती है। फसल के समय बड़ी मात्रा में गौरिया खरीदने और उसे प्रोसेस करके सुरक्षित रखने के लिए करोड़ों रुपये की पूंजी लगानी पड़ती है। जब तक तैयार माल की बिक्री शुरू नहीं होती, तब तक यह पूंजी इसी प्रक्रिया में फंसी रहती है। बाद में जैसे-जैसे साल भर बाजार से मांग निकलती है, वैसे-वैसे तैयार मखाना बिकता है और मुनाफा निकलकर सामने आता है। अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए यह दंपति सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाले मखाना व्यवसाय ऋण और अन्य वित्तीय प्रोत्साहनों का भी नियमित रूप से लाभ लेता है। 100 साल पुराने पारिवारिक अनुभव के चलते उन्हें मखाने की गुणवत्ता, बाजार के उतार-चढ़ाव और ग्राहकों की प्राथमिकताओं की गहरी समझ है। यही वजह है कि आज बिहार से बाहर के व्यापारी और खुदरा ग्राहक भी उनसे सीधा संपर्क साधते हैं।

## मशीन के बजाय हाथों से पारंपरिक प्रोसेसिंग
आजकल तमाम तरह के प्रसंस्करण कार्यों में मशीनों का दखल बढ़ चुका है, लेकिन इस दंपति के कारखाने में आज भी पूरी प्रक्रिया पारंपरिक तरीके से ही अपनाई जाती है। गद्दी पर मखाने को भूनने और उसकी पॉपिंग यानी लावा निकालने का नाजुक काम मशीनों से नहीं, बल्कि कारीगरों के हाथों से ही किया जाता है। इस काम के लिए करीब 5 से 6 महीने तक सात परिवारों के सदस्य दिन-रात मेहनत करते हैं। वे सुबह से शाम तक मखाने की छंटाई, भुनाई और पॉपिंग के काम में जुटे रहते हैं। जब मखाना पूरी तरह तैयार हो जाता है, तो उसे बोरियों में भरकर गोदामों में सुरक्षित भंडारण किया जाता है। इसके बाद जैसे-जैसे देश भर से थोक और खुदरा ग्राहकों के ऑर्डर आते हैं, उसी अनुपात में मखाने की सुरक्षित पैकेजिंग कर गंतव्य तक रवाना किया जाता है।

## स्थानीय गद्दी से राष्ट्रीय बाजार तक का सफर
सुनीता और दीपक गुप्ता ने अपने बुजुर्गों से विरासत में मिले काम को केवल रस्म अदायगी या पेट पालने का जरिया नहीं माना, बल्कि उसे एक संगठित व्यापार मॉडल में तब्दील कर दिया। स्थानीय मंडी से निकला उनका मखाना अब देश के कई राज्यों में पहुंच रहा है। साल भर माल का बफर स्टॉक रखने की चतुराई, प्रामाणिक और पारंपरिक हाथ से की जाने वाली प्रोसेसिंग, और मांग के अनुसार त्वरित आपूर्ति ने उनके इस 100 साल पुराने पारिवारिक काम को एक मजबूत पहचान दिला दी है।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक कृषि उत्पादों को बड़े पैमाने पर स्टॉक और प्रोसेस करके स्थानीय व्यापारी राष्ट्रीय स्तर पर अपना कारोबार फैला सकते हैं।

- **भारत में:** देश भर के उपभोक्ताओं और व्यापारियों को साल भर उच्च गुणवत्ता वाले हाथ से बने पारंपरिक मखाने की सीधी आपूर्ति मिल सकेगी। इससे बिचौलियों पर निर्भरता कम होगी और खुदरा खरीदारों को सीजन खत्म होने के बाद भी स्थिर दरों पर मखाना उपलब्ध रहेगा।
- **बिहार में:** मधुबनी और पूर्णिया जैसे जिलों के किसानों को अपनी कच्ची गौरिया फसल बेचने के लिए स्थानीय स्तर पर ही मजबूत खरीदार मिल रहे हैं। इसके साथ ही मखाना निकालने वाले पारंपरिक 7 परिवारों के कारीगरों को साल में 5 से 6 महीने तक लगातार रोजगार की गारंटी मिलती है।
- **कारोबारियों के लिए:** खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में उतरने वाले युवा उद्यमी सरकारी लोन योजनाओं का लाभ उठाकर अपने पुश्तैनी काम को बड़े उद्यम में बदल सकते हैं। भारी अग्रिम पूंजी की व्यवस्था होने पर मौसमी उत्पादों को साल भर बेचकर अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है।
- **पारंपरिक कारीगरों के लिए:** हाथ से मखाना फोड़ने की कला को संरक्षित रखकर कारीगर मशीनी युग में भी अपने हुनर की वाजिब कीमत और निरंतर काम पा सकते हैं। संगठित व्यापार से जुड़ने पर ग्रामीण श्रमिकों की मौसमी आय में स्थिरता आती है।

## ऐसा क्यों हुआ
मधुबनी के इस परिवार ने 100 साल पुराने पुश्तैनी व्यवसाय को केवल स्थानीय मंडी तक सीमित रखने के बजाय आधुनिक आपूर्ति और भंडारण प्रणाली से जोड़ दिया।

- **सीजनल उपलब्धता और मांग का तालमेल:** मखाने की कटाई साल के निश्चित महीनों में होती है जबकि इसकी खपत साल भर देश भर में बनी रहती है। दंपति ने फसल के वक्त भारी मात्रा में कच्ची गौरिया खरीदकर और उसे स्टॉक करके ऑफ-सीजन की मांग को भुनाया।
- **कच्चे माल के स्रोतों का विस्तार:** सिर्फ स्थानीय स्तर पर निर्भर रहने के बजाय उन्होंने पूर्णिया और आसपास के अन्य जिलों से भी कच्चा माल मंगाना शुरू किया। इस व्यापक नेटवर्क की वजह से उन्हें प्रोसेसिंग के लिए निरंतर और पर्याप्त मात्रा में कच्चा बीज मिलता रहा।
- **वित्तीय समर्थन और लोन का उपयोग:** इस कारोबार में करोड़ों रुपये का अग्रिम निवेश लगता है जिसे पूरा करने के लिए दंपति ने सरकारी योजनाओं और वित्तीय ऋण का सहारा लिया। इस पूंजीगत सहायता ने उन्हें बड़े पैमाने पर माल खरीदने और साल भर होल्ड करने की वित्तीय ताकत दी।

## सवाल-जवाब

### 1. सुनीता गुप्ता और दीपक प्रसाद गुप्ता कहां के रहने वाले हैं?
सुनीता गुप्ता और उनके पति दीपक प्रसाद गुप्ता बिहार के मधुबनी जिले में स्थित किशोरी लाल चौक के निवासी हैं।

### 2. यह परिवार कितने समय से मखाना कारोबार से जुड़ा हुआ है?
यह परिवार पिछले 100 साल से अधिक समय से मखाने के पारंपरिक कारोबार से जुड़ा हुआ है।

### 3. कच्चा मखाना बीज यानी गौरिया कहां से खरीदा जाता है?
गौरिया की खरीद मधुबनी के आसपास के स्थानीय तालाबों के साथ-साथ पूर्णिया और अन्य पड़ोसी क्षेत्रों से की जाती है।

### 4. इस व्यवसाय में मखाने की प्रोसेसिंग किस प्रकार की जाती है?
मखाने की प्रोसेसिंग मशीनों के बजाय गद्दी पर पूरी तरह पारंपरिक तरीके से हाथ द्वारा की जाती है।

### 5. मखाना प्रोसेसिंग कार्य में कितने लोग और कितने समय तक जुड़े रहते हैं?
करीब सात परिवारों के लोग 5 से 6 महीने तक सुबह से शाम तक मखाना तैयार करने के काम में जुटे रहते हैं।

### 6. इस कारोबार में पूंजी की व्यवस्था कैसे की जाती है?
इसमें करोड़ों रुपये की शुरुआती पूंजी लगती है, जिसके लिए दंपति सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत मिलने वाले ऋण और वित्तीय मदद का लाभ लेते हैं।

### 7. तैयार मखाने की बिक्री किस तरह और कहां की जाती है?
तैयार मखाने को गोदामों में स्टॉक करके रखा जाता है और मांग के आधार पर पूरे साल देश के विभिन्न हिस्सों में थोक व खुदरा ग्राहकों को बेचा जाता है।

## प्रेरणा और सबक
पुरानी पारिवारिक परंपराओं को आधुनिक व्यापारिक दृष्टि और वित्तीय साधनों के साथ जोड़कर एक साधारण स्थानीय काम को भी राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया जा सकता है।

- **पुश्तैनी ज्ञान का सम्मान:** पीढ़ियों से मिले मखाना परखने और प्रोसेसिंग के हुनर को नजरअंदाज करने के बजाय उसे अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाएं। पारिवारिक विरासत बाजार की बारीकियों को समझने में बहुत मददगार साबित होती है।
- **गुणवत्ता से समझौता न करना:** मशीनों की होड़ में भी हाथ से मखाना तैयार करने की पारंपरिक विधि को बनाए रखकर अपने उत्पाद की विशिष्ट पहचान कायम रखी जा सकती है। प्रामाणिक गुणवत्ता से दूरदराज के ग्राहकों का भरोसा जीतना आसान होता है।
- **सरकारी योजनाओं का सही लाभ:** पूंजी की कमी को कभी अपने व्यवसाय की रुकावट न बनने दें, बल्कि क्षेत्र से जुड़ी सरकारी क्रेडिट योजनाओं का फायदा उठाएं। औपचारिक वित्तीय साधनों से मौसमी व्यापार को भी बड़े आकार में बदला जा सकता है।
- **बाजार का दायरा बढ़ाना:** स्थानीय सीमाओं से बाहर निकलकर दूसरे जिलों और राज्यों के खरीदारों तक पहुंचने का निरंतर प्रयास करें। जब उत्पाद में प्रामाणिकता हो, तो भौगोलिक दूरियां व्यापार में कभी बाधा नहीं बनतीं।

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