{
  "type": "article",
  "title": "बिलासपुर में भाई के इलाज के लिए भेल-दबेली बेच रही हैं दुर्गा रानी, 11 घंटे की मेहनत से लिख रहीं संघर्ष की दास्तां",
  "summary": "बिलासपुर की दुर्गा रानी ठाकुर अपने बीमार भाई के इलाज और परिवार के भरण-पोषण के लिए रोजाना 11 घंटे भेल-दबेली की दुकान चलाती हैं।",
  "content": "कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी यदि मनुष्य के भीतर दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो हर बाधा को पार किया जा सकता है। इस बात को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर की रहने वाली दुर्गा रानी ठाकुर ने अपनी जिंदगी के जरिए साबित कर दिखाया है। शहर के कंपनी गार्डन गेट के बाहर भेल-दबेली का एक छोटा सा स्टॉल चलाने वाली दुर्गा रानी आज न सिर्फ अपने घर का खर्च उठा रही हैं, बल्कि गंभीर रूप से बीमार अपने भाई के इलाज का पूरा खर्च भी खुद ही संभाल रही हैं। सुबह 9 बजे से लेकर रात के करीब 8:30 बजे तक लगातार काम करने वाली दुर्गा रानी का मानना है कि महिलाओं को कभी भी दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय खुद स्वावलंबी बनने की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए।\n\nभाई की बीमारी के बाद संभाली दुकान\nदुर्गा रानी के इस संघर्षपूर्ण सफर के पीछे पारिवारिक जिम्मेदारियों का बड़ा हाथ है। वह बताती हैं कि यह स्टॉल पहले उनके भाई द्वारा चलाया जाता था। हालांकि, जब उनके भाई की सेहत अचानक काफी बिगड़ गई और वह काम करने में असमर्थ हो गए, तब दुर्गा रानी ने बिना एक पल गंवाए इस काम की कमान अपने हाथों में ले ली। आज वह खुद कंपनी गार्डन के बाहर बैठकर भेल-दबेली बेचती हैं और इस दुकान से होने वाली आमदनी से ही घर का चूल्हा जलाने के साथ-साथ भाई की दवाइयों का खर्च भी निकाल रही हैं।\n\nसुबह से रात तक पसीना बहाती हैं दुर्गा रानी\nउनकी रोजमर्रा की दिनचर्या बेहद व्यस्त और कड़ी मेहनत से भरी होती है। दुर्गा रानी हर दिन सुबह करीब 9 बजे दुकान पर पहुंच जाती हैं और रात के लगभग 8:30 बजे तक वहीं डटी रहती हैं। काम खत्म होने के बाद उनका भाई रात के समय ऑटो लेकर उन्हें लेने आता है और दोनों साथ घर लौटते हैं। इस काम में उनकी मां भी पूरा साथ देती हैं। भेल और दबेली के लिए जरूरी सामग्री की शुरुआती तैयारी घर पर उनकी मां द्वारा की जाती है, जिसे दुर्गा रानी दुकान पर लाकर ग्राहकों की पसंद के अनुसार तैयार करके बेचती हैं।\n\nसंडे और त्योहारों के दिनों में होती है बेहतर कमाई\nदुकान की बिक्री को लेकर उनका कहना है कि सामान्य दिनों में ग्राहकों का आना-जाना लगा रहता है और कई बार रोजाना की बिक्री 1,000 से 2,000 रुपये तक हो जाती है। वहीं वीकेंड यानी रविवार के दिन कंपनी गार्डन के आसपास पर्यटकों और घूमने आने वाले लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है, जिसके कारण रविवार की बिक्री बढ़कर 2,500 से 3,000 रुपये या उससे भी अधिक तक पहुंच जाती है। इसके अलावा, विभिन्न त्योहारों के सीजन में भी उनके स्टॉल पर ग्राहकों की संख्या में इजाफा होता है, जिससे आमदनी में भी सुधार होता है।\n\nपीढ़ियों पुराना है परिवार का यह व्यवसाय\nयह काम दुर्गा रानी के परिवार के लिए नया नहीं है, बल्कि उनका इस जगह से पुराना नाता रहा है। वह साझा करती हैं कि उनके नानी-नाना और परिवार के अन्य बुजुर्ग भी इसी स्थान पर अपनी दुकानें लगाकर अलग-अलग चीजें बेचते रहे हैं। वर्तमान में उनके परिवार में उनकी मां, उनके बीमार भाई और खुद दुर्गा रानी हैं। भाई के स्वास्थ्य खराब होने के बाद से घर की चारदीवारी से लेकर बाहर की सभी जिम्मेदारियों का बोझ अब अकेले दुर्गा रानी के कंधों पर आ गया है, जिसे वह पूरी निष्ठा के साथ निभा रही हैं।\n\nमहिलाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत बनीं दुर्गा रानी\nदुर्गा रानी का मानना है कि हमारे समाज में आज भी कई महिलाएं घरों से बाहर कदम रखने में झिझकती हैं या डरती हैं। लेकिन उनका स्पष्ट संदेश है कि यदि मन में पक्का इरादा और आत्मविश्वास हो, तो दुनिया की हर मुश्किल परिस्थिति का डटकर मुकाबला किया जा सकता है। वह कहती हैं कि यदि समाज में कोई ताने कसे या कुछ कहे भी, तो उससे घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि अपने लक्ष्य की ओर मजबूती से आगे बढ़ते रहना चाहिए।\n\nदूसरों को आत्मनिर्भर बनने का संदेश\nअपनी इस कहानी के जरिए दुर्गा रानी उन तमाम महिलाओं और युवतियों के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं जो जीवन में कुछ करना चाहती हैं। उनका कहना है कि जो महिलाएं अपने पैरों पर खड़े होना चाहती हैं, उन्हें डर का त्याग करके आगे आना चाहिए। उन्होंने अपनी बहनों को संदेश देते हुए कहा, “मैं अपनी बहनों से यही विनती करूंगी कि अपने पैरों पर खुद खड़े होकर खुद कमाएं और खुद खाएं।” उनकी यह आत्मनिर्भरता और अटूट संघर्ष उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो विपरीत हालात के आगे घुटने टेकने के बजाय डटकर खड़े रहते हैं।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: यह कहानी उन लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो कठिन आर्थिक परिस्थितियों में भी अपने परिवार का संबल बनती हैं।\n• बिलासपुर में: कंपनी गार्डन के पास आने वाले स्थानीय ग्राहकों और दुकानदारों के लिए यह एक मिसाल है कि किस तरह मेहनत और लगन से हर चुनौती का सामना किया जा सकता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. दुर्गा रानी बिलासपुर में क्या काम करती हैं?\nदुर्गा रानी कंपनी गार्डन गेट के सामने भेल-दबेली की दुकान चलाती हैं।\n\n2. दुर्गा रानी रोजाना कितने घंटे काम करती हैं?\nवह हर दिन सुबह 9 बजे से रात करीब 8:30 बजे तक यानी करीब 11 घंटे मेहनत करती हैं।\n\n3. दुर्गा रानी ने दुकान की जिम्मेदारी क्यों संभाली?\nउनके भाई की तबीयत खराब होने और काम करने में असमर्थ होने के कारण उन्होंने दुकान की कमान संभाली।\n\n4. दुर्गा रानी की दुकान पर रविवार को कितनी बिक्री होती है?\nरविवार को भीड़ अधिक होने के कारण बिक्री 2,500 से 3,000 रुपये या उससे अधिक तक पहुंच जाती है।\n\nप्रेरणा और सबक\n• आत्मनिर्भरता अपनाएं: किसी भी परिस्थिति में दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय खुद कमाने और अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयास करें।\n• कड़ी मेहनत से न डरें: लंबी और कठिन कार्यशैली (जैसे 11 घंटे की मेहनत) से घबराने के बजाय अपने लक्ष्य पर अडिग रहें।\n• पारिवारिक जिम्मेदारी निभाएं: संकट के समय पीछे हटने के बजाय आगे बढ़कर परिवार की कमान संभालें।\n• आत्मविश्वास बनाए रखें: समाज की बातों से डरने के बजाय अपने हौसले और आत्मविश्वास के साथ हर चुनौती का सामना करें।",
  "url": "https://trendkia.com/success-stories/bilasapura-men-bhai-ke-ilaja-ke-lie-bhel-dabeli-becha-rahi-hain-durga-rani-11-ghnte-ki-mehanata-se-likha-rahin-sngharsha-ki-dastan-21853",
  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-08-25",
  "tags": [
    "दुर्गा रानी",
    "बिलासपुर",
    "भेल दबेली",
    "संघर्ष",
    "महिला सशक्तिकरण",
    "छत्तीसगढ़"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}