बिना किसी सरकारी मदद के बिहार में लगातार 1100 दिनों से रात में बेघरों का पेट भर रही युवाओं की रसोई पूर्णिया में कोरोना महामारी के दौरान शुरू हुई जय श्रीकृष्ण सेवा ट्रस्ट की सामूहिक रसोई बिना किसी सरकारी अनुदान के 1100 दिनों से लगातार जारी है, जो रोजाना करीब 200 मानसिक रूप से अस्वस्थ और बेघर लोगों को रात में गर्म खाना खिलाती है। बिहार के पूर्णिया जिले में समाज सेवा और इंसानियत का एक अनोखा उदाहरण देखने को मिल रहा है। कड़ाके की ठंड हो, भीषण गर्मी हो या फिर मूसलाधार बारिश, शहर की सड़कों पर हर रात एक ऐसी गाड़ी निकलती है जो बेसहारा लोगों के लिए उम्मीद की रोशनी बनती है। जय श्रीकृष्ण सेवा ट्रस्ट नव भारत सामूहिक रसोई नाम का यह सेवा अभियान पिछले 1100 दिनों से बिना किसी रुकावट के लगातार जारी है। सड़क किनारे रात बिताने वाले बेघर, मानसिक रूप से अस्वस्थ और दिव्यांग लोगों के पेट की आग बुझाने का यह काम पिछले तीन सालों से भी अधिक समय से बिना एक दिन भी रुके चल रहा है। हाल ही में इस 1100 दिनों की अटूट सेवा यात्रा के पूरा होने पर संस्था के सदस्यों ने मिलकर केक काटा और इस पवित्र संकल्प को हर हाल में जारी रखने का निर्णय दोहराया। कोरोना महामारी की दिल दहला देने वाली घटना से हुई शुरुआत इस विशाल सेवा अभियान की नींव किसी संस्थागत योजना से नहीं, बल्कि एक बेहद दर्दनाक व्यक्तिगत अनुभव से पड़ी थी। इस मुहिम की शुरुआत करने वाले शशि कुमार उर्फ मिट्ठू बताते हैं कि कोरोना काल के संकटपूर्ण दिनों में उन्होंने पूर्णिया शहर में दो बेहद हृदयविदारक दृश्य देखे थे। सदर अस्पताल के समीप उन्होंने एक मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति को नाली से उठाकर खाना खाते देखा, वहीं लाइन बाजार इलाके में एक अत्यंत लाचार व्यक्ति कचरे के डस्टबिन से भोजन की तलाश कर रहा था। इंसानी बेबसी के इस भयावह मंजर ने उनके मन को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया। उसी पल शशि कुमार ने प्रण लिया कि वे अपनी आंखों के सामने किसी भी असहाय व्यक्ति को भूख से तड़पने नहीं देंगे। उन्होंने तुरंत अपने करीबी साथियों चंदन तिवारी और रमन कुमार से बात की और मिलकर इस सामुदायिक रसोई का खाका तैयार किया। हर मौसम और आंधी-तूफान में भी नहीं रुकते युवाओं के कदम शुरुआत भले ही छोटे स्तर पर हुई थी, लेकिन देखते ही देखते यह प्रयास एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। वर्तमान समय में इस सामूहिक रसोई के जरिए रोजाना रात को लगभग 200 जरूरतमंद लोगों को ताजा, गर्म और पौष्टिक खाना परोसा जाता है। संस्था के युवा कार्यकर्ता हर रात गाड़ियों में खाना लादकर शहर के अलग-अलग चौक-चौराहों, फुटपाथों और रेलवे स्टेशन के आसपास घूमते हैं। उनका एक ही स्पष्ट ध्येय है कि पूर्णिया की सरजमीं पर कोई भी बेबस इंसान रात में भूखे पेट न सोए। इस कठिन काम को रोज धरातल पर उतारने में समर्पित युवाओं की एक पूरी टीम जुटी रहती है। इसमें विकास वर्मा, शनि कुमार, सुमित यादव, संगम यादव, पुष्पराज, धीरज यादव, आशु वर्मा, कन्हैया, दिव्यांशू, पुष्कर और प्रशांत सिंह जैसे उत्साही कार्यकर्ता शामिल हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के हर दिन इस सेवा कार्य में अपना योगदान देते हैं। बिना सरकारी मदद और क्राउडफंडिंग के मॉडल की सफलता जय श्रीकृष्ण सेवा सदन की इस मुहिम की सबसे बड़ी खासियत इसकी पारदर्शी कार्यशैली और जनभागीदारी है। यह पूरा नेटवर्क बिना किसी सरकारी आर्थिक सहायता या किसी बड़े कॉरपोरेट फंड के संचालित हो रहा है। संस्था ने एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया है, जिससे केवल पूर्णिया ही नहीं, बल्कि बिहार के अन्य जिलों, देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों में रहने वाले प्रबुद्ध नागरिक और युवा जुड़े हुए हैं। इस डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से लोग अपने व्यक्तिगत उत्सवों का तरीका बदल रहे हैं। लोग अपने जन्मदिन, शादी की सालगिरह या पूर्वजों की पुण्यतिथि पर बड़ी-बड़ी पार्टियां देने या अनावश्यक खर्च करने के बजाय सामूहिक रसोई के लिए राशन या आर्थिक सहयोग भेजते हैं। इस तरह हर छोटे-बड़े योगदान से रसोई का चूल्हा लगातार जल रहा है। सच्ची इंसानियत और निःस्वार्थ भाव का संदेश संस्था के अध्यक्ष शशि कुमार का मानना है कि असहायों के चेहरे पर भोजन मिलने के बाद जो राहत और मुस्कान दिखती है, वही उनकी टीम के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार और ताकत है। उनके अनुसार, लोगों का अटूट विश्वास और स्नेह ही इस 1100 दिनों से अधिक के सफर का असली आधार रहा है। पूर्णिया की सड़कों पर उपेक्षा और कड़ाके की ठंड झेल रहे बेघर लोगों के लिए यह युवा मंडली किसी फरिश्ते से कम साबित नहीं हो रही है। यह पहल पूरे समाज को यह सीख देती है कि जब नीयत साफ हो और मकसद पवित्र हो, तो बिना किसी बड़ी व्यवस्था या सरकारी मदद के भी मानवता की रक्षा के लिए बड़े से बड़े मुकाम हासिल किए जा सकते हैं। इसका आप पर असर • भारत में: यह पहल दर्शाती है कि सरकारी अनुदान के बिना भी पारदर्शी सामुदायिक नेटवर्क और डिजिटल ग्रुप्स के माध्यम से लंबे समय तक सामाजिक भलाई के कार्य सफलतापूर्वक चलाए जा सकते हैं। • पूर्णिया (बिहार) में: शहर की सड़कों, फुटपाथों और सार्वजनिक स्थलों पर रात बिताने वाले लगभग 200 मानसिक रूप से अस्वस्थ और बेघर लोगों को हर रात गर्म और गरिमापूर्ण भोजन प्राप्त होता है। सवाल-जवाब 1. जय श्रीकृष्ण सेवा ट्रस्ट की सामूहिक रसोई कहां संचालित होती है? यह सामूहिक रसोई बिहार के पूर्णिया शहर के विभिन्न चौक-चौराहों, सड़कों और फुटपाथों पर रात के समय संचालित होती है। 2. इस सेवा अभियान की शुरुआत किसने और क्यों की? इसकी शुरुआत शशि कुमार उर्फ मिट्ठू ने कोरोना काल में बेघर और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों को नाली और डस्टबिन से खाना खाते देखकर की थी। 3. इस रसोई से रोज कितने लोगों को खाना मिलता है? इस रसोई के माध्यम से हर रात लगभग 200 असहाय, बेघर और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों को गर्म खाना परोसा जाता है। 4. क्या इस संस्था को कोई सरकारी मदद मिलती है? नहीं, यह अभियान बिना किसी सरकारी अनुदान के पूरी तरह आम लोगों के सहयोग और जनभागीदारी से चलता है। 5. सामूहिक रसोई को चलाने के लिए फंड और राशन कैसे जुटाया जाता है? संस्था के व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए लोग अपने जन्मदिन, शादी की सालगिरह या परिजनों की पुण्यतिथि पर आर्थिक सहयोग और खाद्य सामग्री दान करते हैं। प्रेरणा और सबक • संवेदनशीलता को संकल्प में बदलें: समाज की किसी पीड़ा या समस्या को देखकर केवल दुख व्यक्त करने के बजाय उसे दूर करने का तुरंत ठोस निर्णय लें। • शुरुआत के लिए संसाधनों का इंतजार न करें: एक बड़े विचार को छोटे कदम और सच्चे दोस्तों के साथ मिलकर तुरंत शुरू किया जा सकता है। • उत्सवों का तरीका बदलें: जन्मदिन या सालगिरह जैसी निजी खुशियों में फिजूलखर्च करने के बजाय उस पैसे से जरूरतमंदों की मदद करें। • पारदर्शिता से बनाएं भरोसा: काम में पारदर्शिता रखकर आप बिना सरकारी फंड के भी देश और दुनिया के लोगों को जोड़कर अभियान को सालों-साल चला सकते हैं। https://trendkia.com/success-stories/bina-kisi-sarakari-madada-ke-bihar-men-lagatara-1100-dinon-se-rata-men-begharon-ka-peta-bhara-rahi-yuvaon-ki-rasoi-20587 TrendKia — Har trend, sabse pehle.