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  "type": "article",
  "title": "बीड़ी बनाकर अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने वाले केशवराम पिद्दा आज बने कृषि अधिकारी",
  "summary": "छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में तैनात वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी केशवराम पिद्दा ने अपने जीवन में बीड़ी बनाने के काम से लेकर सरकारी अफसर बनने तक का कठिन सफर तय किया है। आज वे किसानों को आधुनिक खेती और सरकारी योजनाओं से जोड़कर उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने का कार्य कर रहे हैं।",
  "content": "छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी (SADO) के रूप में तैनात केशवराम पिद्दा आज किसानों के लिए एक बड़ी मिसाल बने हुए हैं। उनका जीवन संघर्ष, अटूट मेहनत और शिक्षा के माध्यम से सफलता पाने की एक जीवंत गाथा है। जिस केशवराम ने बचपन में अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए बीड़ी बनाने जैसा कठिन काम किया था, आज वे कृषि विभाग के एक जिम्मेदार पद पर बैठकर किसानों को बेहतर कृषि तकनीकों और सरकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाने का काम कर रहे हैं।\n\nशुरुआती जीवन और संघर्ष\nकेशवराम पिद्दा का संबंध कांकेर जिले की चारामा तहसील के ग्राम जैसाकर्रा से है। एक साधारण किसान परिवार में जन्मे केशवराम के लिए शिक्षा का सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। परिवार की आजीविका चलाने के लिए उन्हें बचपन में बीड़ी कारखाने में काम करना पड़ा था। उस समय बीड़ी बनाना ही उनकी आय का मुख्य जरिया था, लेकिन केशवराम ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने अपने मन में यह स्पष्ट कर लिया था कि वे इसी काम में सीमित नहीं रहेंगे। उन्होंने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित किया और सरकारी नौकरी हासिल करने का संकल्प लेकर मेहनत जारी रखी।\n\nकरियर की शुरुआत और पदोन्नति\nउनकी सरकारी नौकरी का सफर 1999 में शुरू हुआ। वर्ष 1997 में जब ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी की भर्ती निकली, तो उन्होंने इसके लिए आवेदन किया। वर्ष 1998 में साक्षात्कार देने के बाद मेरिट सूची में उनका चयन हुआ और 23 फरवरी 1999 को उन्हें कांकेर जिले में पहली नियुक्ति मिली। करीब 8 वर्षों तक सुदूर इलाकों में किसानों के साथ काम करने के बाद, उन्होंने अपनी शिक्षा को और आगे बढ़ाने का फैसला किया। शासन से अनुमति मिलने के बाद उन्होंने कृषि विषय में स्नातक की डिग्री पूरी की।\n\nउनकी मेहनत का फल 2014 में पदोन्नति के रूप में मिला, जब उन्हें कृषि विकास अधिकारी के पद पर बालोद जिले में नियुक्त किया गया। उन्हें पीपरछेड़ी क्षेत्र की बागडोर सौंपी गई, जहाँ उन्होंने कृषि योजनाओं को ज़मीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया। उनके उत्कृष्ट कार्यों को देखते हुए वर्ष 2022 में उन्हें फिर से पदोन्नत किया गया और वे बालोद विकासखंड में वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी (SADO) बने।\n\nकिसानों के बीच प्रेरणा\nपिछले चार वर्षों से इस पद पर रहते हुए केशवराम पिद्दा ने बालोद विकासखंड के 89 गांवों में कृषि योजनाओं का संचालन किया है। उनके मार्गदर्शन में लगभग 50 ऐसे गांव हैं, जहाँ किसान अब फसल विविधीकरण की ओर रुख कर रहे हैं। खरीफ सीजन में धान की पारंपरिक खेती के अलावा अब किसान रबी सीजन में चना, गेहूं, मटर, सरसों और गन्ने जैसी फसलों की खेती कर अपनी अतिरिक्त कमाई बढ़ा रहे हैं। वे लगातार किसानों को आधुनिक तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, ताकि उनकी आय में वृद्धि हो सके। केशवराम पिद्दा का सफर युवाओं के लिए एक बड़ा सबक है कि कठिन परिस्थितियां कभी भी सफलता की राह में रुकावट नहीं होतीं, बल्कि वे आगे बढ़ने की एक बड़ी प्रेरणा बन सकती हैं।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूक होकर किसान अपनी फसल विविधता और तकनीक में सुधार कर आय बढ़ा सकते हैं।\n\nबालोद में: केशवराम पिद्दा द्वारा संचालित कृषि कार्यक्रमों से जुड़कर स्थानीय किसान रबी और खरीफ दोनों मौसमों में आधुनिक फसलें उगाकर लाभ ले सकते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. केशवराम पिद्दा वर्तमान में किस पद पर तैनात हैं?\nकेशवराम पिद्दा वर्तमान में छत्तीसगढ़ के बालोद विकासखंड में वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी (SADO) के पद पर तैनात हैं।\n\n2. केशवराम पिद्दा ने अपनी पढ़ाई का खर्च कैसे निकाला था?\nउन्होंने अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए चारामा क्षेत्र में स्थित बीड़ी कारखाने में काम किया था।\n\n3. केशवराम पिद्दा के मार्गदर्शन में किसान किन फसलों की खेती कर रहे हैं?\nकिसान खरीफ सीजन में धान के साथ-साथ रबी सीजन में चना, गेहूं, मटर, सरसों और गन्ने की खेती कर रहे हैं।\n\n4. केशवराम पिद्दा का सरकारी सेवा में करियर कब शुरू हुआ?\nउनकी सरकारी सेवा की शुरुआत 23 फरवरी 1999 को ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी के रूप में हुई थी।\n\nप्रेरणा और सबक\n• संकल्प ही सफलता की कुंजी है: कठिन परिस्थितियों में भी अगर लक्ष्य स्पष्ट हो, तो उसे पाया जा सकता है।\n• शिक्षा का महत्व: अपनी स्थिति सुधारने के लिए पढ़ाई को हमेशा प्राथमिकता दें, भले ही परिस्थितियां प्रतिकूल हों।\n• सीखने की भूख: 8 वर्षों के कार्य अनुभव के बाद भी उच्च शिक्षा पूरी करने का निर्णय यह दर्शाता है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती।\n• जमीनी स्तर पर बदलाव: एक जिम्मेदार अधिकारी के रूप में, लोगों की समस्याओं को समझकर और उन्हें सही दिशा दिखाकर बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।",
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  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-07-13",
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    "सरकारी नौकरी"
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