# ब्रिक्स सम्मेलन में पीएम मोदी के साथ दिखे आईएफएस अधिकारी सिद्धार्थ बाबू, जानिए मैकेनिकल इंजीनियर से शीर्ष कूटनीतिज्ञ बनने का सफर

> ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच मौजूद आईएफएस अधिकारी सिद्धार्थ बाबू की तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं। जानिए यूपीएससी में 15वीं रैंक लाने वाले इस अधिकारी ने आईएएस के स्थान पर विदेश सेवा को क्यों चुना।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-09-13 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/brics-sammelan-mein-pm-modi-ke-sath-dikhe-ifs-adhikari-siddharth-babu-janie-mechanical-engineer-se-shirsh-kootneetik-banne-ka-safa-31812 · **Language:** Hindi
**Tags:** सिद्धार्थ बाबू, आईएफएस अधिकारी, पीएम नरेंद्र मोदी, ब्रिक्स सम्मेलन, यूपीएससी, आईएएस बनाम आईएफएस

दुनिया के सबसे प्रभावशाली मंचों में से एक ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान अंतरराष्ट्रीय मीडिया और कैमरों की नजरें मुख्य रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग जैसे शीर्ष वैश्विक नेताओं पर टिकी थीं। हालांकि, उच्च स्तरीय द्विपक्षीय वार्ताओं की तस्वीरों में एक भारतीय अधिकारी लगातार प्रधानमंत्री के ठीक बगल में मौजूद नजर आए। ये अधिकारी हैं भारतीय विदेश सेवा (IFS) के सदस्य सिद्धार्थ बाबू, जो प्रधानमंत्री के आधिकारिक राजनयिक अनुवादक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वैश्विक नेताओं की बंद कमरे में हुई गोपनीय वार्ताओं के दौरान भाषा की दूरी को मिटाने वाले सिद्धार्थ बाबू की तस्वीरें सामने आने के बाद उनके करियर और पृष्ठभूमि को लेकर लोगों में खासी दिलचस्पी देखने को मिल रही है।

## कॉर्पोरेट दुनिया से सिविल सेवा का सफर
केरल के तटीय शहर कोच्चि के रहने वाले सिद्धार्थ बाबू की शुरुआती पढ़ाई और करियर कूटनीति से काफी अलग क्षेत्र में शुरू हुआ था। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल की और इसके बाद निजी क्षेत्र की बहुराष्ट्रीय और ई-कॉमर्स कंपनियों में कार्यरत रहे। कॉर्पोरेट जगत में काम करने के बावजूद उनके मन में देश सेवा और अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रति गहरा आकर्षण था। इसी प्रेरणा से उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की तैयारी शुरू की। साल 2016 की सिविल सेवा परीक्षा में सिद्धार्थ बाबू ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए पूरे देश में 15वीं रैंक (AIR 15) हासिल की।

## आईएएस का विकल्प छोड़कर क्यों चुनी विदेश सेवा?
यूपीएससी परीक्षा में ऑल इंडिया 15वीं रैंक प्राप्त करने के कारण सिद्धार्थ बाबू के पास भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) चुनने का पूरा अवसर उपलब्ध था। सिविल सेवा अभ्यर्थियों के बीच आईएएस सबसे लोकप्रिय विकल्प माना जाता है, लेकिन सिद्धार्थ बाबू ने अपने व्यक्तिगत रुझान और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में रुचि के कारण भारतीय विदेश सेवा (IFS) को प्राथमिकता दी। वह 2017 बैच के आईएफएस अधिकारी बने। वर्तमान में वह विदेश मंत्रालय (MEA) में यूरोप और यूरेशिया मामलों के उप सचिव के पद पर कार्यरत हैं। ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पीएम मोदी के बीच बातचीत का अनुवाद करते हुए उनकी तस्वीरों ने उन्हें इंटरनेट पर चर्चा का केंद्र बना दिया।

## आईएएस और आईएफएस के काम और वेतन में अंतर
सिविल सेवा के इन दो शीर्ष पदों को लेकर अक्सर लोगों के मन में कार्यशैली और सुविधाओं को लेकर उत्सुकता रहती है। आईएएस अधिकारी मुख्य रूप से देश के भीतर रहकर जिला प्रशासन, राज्य के विभागों, कानून व्यवस्था और जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को संभालते हैं। उनका सीधा जुड़ाव आम जनता और घरेलू प्रशासनिक व्यवस्था से होता है। इसके विपरीत, आईएफएस अधिकारी विदेशों में भारत के दूतावासों और उच्चायोगों में राजदूत या राजनयिक के रूप में कार्य करते हैं। उनका मुख्य काम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के हितों की रक्षा करना, दूसरे देशों के साथ द्विपक्षीय समझौतों को रूप देना और कूटनीतिक संबंध मजबूत करना होता है।

वेतन और भत्तों की बात करें तो दोनों सेवाओं के अधिकारियों की शुरुआती बेसिक सैलरी 7वें वेतन आयोग के लेवल 10 से शुरू होती है और पदोन्नति के साथ कैबिनेट सचिव या विदेश सचिव जैसे शीर्ष पदों (लेवल 18) तक पहुंचती है। इस प्रकार दोनों का मूल वेतनमान एक समान रहता है। हालांकि, जब आईएफएस अधिकारियों की तैनाती विदेश में होती है, तो उन्हें भारत सरकार द्वारा 'फॉरेन अलाउंस' यानी विदेशी भत्ता प्रदान किया जाता है। विदेशी मुद्रा दर, संबंधित देश में रहने के खर्च और राजनयिक आवश्यकताओं को देखते हुए यह भत्ता दिया जाता है, जिसके कारण विदेशों में पदस्थ आईएफएस अधिकारियों का कुल वेतन और सुविधाएं काफी अधिक हो जाती हैं।

## इसका आप पर असर
यह समाचार सिविल सेवा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों और विदेश नीति में रुचि रखने वाले नागरिकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

- **भारत में अभ्यर्थियों के लिए:** यह कहानी दर्शाती है कि कॉर्पोरेट करियर छोड़कर भी यूपीएससी में शीर्ष रैंक हासिल की जा सकती है। इससे अभ्यर्थियों को अपने व्यक्तिगत रुझान के अनुसार सही सेवा चुनने की प्रेरणा मिलती है।
- **केरल में युवाओं के लिए:** कोच्चि के सिद्धार्थ बाबू की यह सफलता राज्य के छात्रों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रेरित करती है।
- **प्रशासनिक समझ:** इससे आम नागरिकों को आईएएस और आईएफएस अधिकारियों के कार्यों, वेतन भत्तों और राजनयिक भूमिकाओं के अंतर को समझने में मदद मिलती है।
- **वैश्विक कूटनीति:** यह दिखाता है कि देश के शीर्ष नेताओं की द्विपक्षीय बैठकों में भाषा और अनुवाद व्यवस्था कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

## ऐसा क्यों हुआ
सिद्धार्थ बाबू का चर्चा में आना उनकी विशिष्ट राजनयिक भूमिका और कॉर्पोरेट जगत से विदेश सेवा तक के प्रेरणादायक बदलाव का परिणाम है।

- **राजनयिक अनुवादक की भूमिका:** ब्रिक्स सम्मेलन जैसे शीर्ष वैश्विक मंचों पर राष्ट्रप्रमुखों के बीच गोपनीय चर्चाओं को सटीक रूप से अनुवादित करने के लिए योग्य आईएफएस अधिकारियों को तैनात किया जाता है।
- **व्यक्तिगत रुचि और निर्णय:** सिविल सेवा परीक्षा 2016 में 15वीं रैंक मिलने पर आईएएस चुनने का अवसर होने के बावजूद उन्होंने विदेश नीति में अपनी रुचि के कारण आईएफएस को प्राथमिकता दी।
- **कॉर्पोरेट से सिविल सेवा में बदलाव:** मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई और ई-कॉमर्स कंपनियों में काम करने के बाद देश सेवा और वैश्विक मामलों के प्रति रुझान उन्हें यूपीएससी की ओर ले आया।
- **सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल:** व्लादिमीर पुतिन और नरेंद्र मोदी जैसे ताकतवर नेताओं के बीच उनकी मौजूदगी की तस्वीरों ने इंटरनेट पर लोगों का ध्यान खींचा।

## सवाल-जवाब

### 1. सिद्धार्थ बाबू कौन हैं?
सिद्धार्थ बाबू 2017 बैच के भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) अधिकारी हैं, जो विदेश मंत्रालय में उप सचिव के पद पर कार्यरत हैं और प्रधानमंत्री के राजनयिक अनुवादक की भूमिका निभाते हैं।

### 2. ब्रिक्स सम्मेलन में सिद्धार्थ बाबू क्यों चर्चा में आए?
ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच बैठकों में राजनयिक अनुवादक के रूप में मौजूद रहने के कारण उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं।

### 3. यूपीएससी परीक्षा में सिद्धार्थ बाबू की रैंक क्या थी?
उन्होंने साल 2016 की यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया 15वीं रैंक हासिल की थी।

### 4. सिद्धार्थ बाबू ने आईएएस के बजाय आईएफएस क्यों चुना?
अंतरराष्ट्रीय मामलों, विदेश नीति और कूटनीति में गहरी रुचि होने के कारण उन्होंने आईएएस का विकल्प होने के बावजूद आईएफएस को चुना।

### 5. आईएएस और आईएफएस अधिकारी के वेतन में क्या अंतर होता है?
दोनों का मूल वेतन 7वें वेतन आयोग के तहत समान होता है, लेकिन विदेशों में तैनात आईएफएस अधिकारियों को अतिरिक्त विदेशी भत्ता मिलता है।

## प्रेरणा और सबक
सिद्धार्थ बाबू का सफर यूपीएससी अभ्यर्थियों और युवाओं के लिए कई महत्वपूर्ण सीख प्रस्तुत करता है।

- **अपनी वास्तविक रुचि को पहचानें:** आईएएस का विकल्प मौजूद होने के बावजूद उन्होंने अपनी रुचि के अनुरूप विदेश सेवा को चुना।
- **करियर में बदलाव से न डरें:** इंजीनियरिंग और कॉर्पोरेट नौकरी के बाद भी सिविल सेवा में सफलता पाई जा सकती है।
- **सटीकता और निष्ठा:** अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी भूमिका को जिम्मेदारी से निभाना ही असली पहचान दिलाता है।

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