बुंदेलखंड की सूखी धरती पर प्राकृतिक खेती से बदली तस्वीर, चित्रकूट के पांच किसानों ने दिखाया लाखों की कमाई का रास्ता बुंदेलखंड के चित्रकूट में जहां पलायन आम बात है, वहीं पांच स्थानीय किसानों ने जैविक खाद, औषधीय पौधों और चंदन की बागवानी से सालाना लाखों रुपये कमाकर मिसाल पेश की है। बुंदेलखंड के चित्रकूट अंचल में लंबे समय से कृषि को कम मुनाफे वाला पेशा मानकर कई ग्रामीण आजीविका की तलाश में दूसरे शहरों की तरफ रुख करते रहे हैं। पथरीली जमीन और पानी की कमी के चलते खेतों को छोड़कर बाहर काम ढूंढना कई परिवारों की मजबूरी बन चुका था। हालांकि, इसी क्षेत्र में कुछ ऐसे जागरूक किसान भी मौजूद हैं जिन्होंने परंपरागत तौर-तरीकों से आगे बढ़कर जमीन की ताकत को पहचाना है। आधुनिक सोच, प्राकृतिक खाद और मूल्यवान फसलों के तालमेल से इन काश्तकारों ने न सिर्फ खेती को आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि हर साल लाखों रुपये की आमदनी अर्जित कर अन्य ग्रामीणों के सामने भी एक मजबूत विकल्प खड़ा किया है। शिक्षक से सफल बागवान बने नत्थूराम का मॉडल कर्वी तहसील अंतर्गत बैहार गांव के निवासी नत्थूराम सेवानिवृत्त शिक्षक हैं। उन्होंने सेवाकाल समाप्त होने के उपरांत वर्ष 2022 में प्राकृतिक तरीकों से खेती की शुरुआत की। शुरुआती दौर में उन्होंने अपने खेत में मूली उगाने का निर्णय लिया। जब इस पहली कोशिश से उत्साहजनक लाभ प्राप्त हुआ, तो उन्होंने अपनी रणनीति का दायरा बढ़ा दिया। वर्तमान में वह रबी और खरीफ के प्रमुख खाद्यान्नों के साथ-साथ मौसमी फल और हरी सब्जियों का व्यापक स्तर पर उत्पादन कर रहे हैं। कुल 18 बीघे रकबे में फैली उनकी इस खेती और फलदार बागवानी से उन्हें हर वर्ष 4 से 5 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा मिल रहा है। कोठारी सिंह पटेल: खुद तैयार की जैविक खाद, बदली लागत मानिकपुर तहसील के ग्राम बरहट के रहने वाले किसान कोठारी सिंह पटेल ने वर्ष 2023 से रासायनिक खादों का प्रयोग छोड़कर जैविक पद्धतियों को अपनाया। वह अपने खेतों में धान, अरहर और ज्वार जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई करते हैं। कोठारी सिंह पटेल बाजार से महंगे रसायन खरीदने के बजाय अपने घर पर ही देशी खाद तैयार करते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि प्राकृतिक खेती में भारी वित्तीय पूंजी लगाने की जगह नियमित शारीरिक श्रम और देखरेख की ज्यादा जरूरत पड़ती है। इसी प्राकृतिक विधि से प्राप्त आय के दम पर वह अपने पूरे परिवार की जीविका भली-भांति चला रहे हैं। पाठा के रामलाल मिश्रा: चंदन के पेड़ों से दीर्घकालिक संपत्ति चित्रकूट के पाठा इलाके में रहने वाले रामलाल मिश्रा ने नकदी फसलों के साथ दीर्घकालिक निवेश पर ध्यान केंद्रित किया है। उन्होंने अपने फार्म हाउस पर अलग-अलग किस्मों के फलों की बागवानी के साथ चंदन के पौधे भी लगाए हैं। उनके प्रक्षेत्र में दो अलग-अलग प्रकार के चंदन के वृक्ष तैयार हो रहे हैं। रामलाल मिश्रा के अनुसार, चंदन के एक पौधे को पूर्ण रूप से परिपक्व होने में करीब 10 साल का समय लग जाता है। जब यह 10 वर्ष बाद तैयार होता है, तो प्रति पेड़ से लगभग एक लाख रुपये की भारी आमदनी प्राप्त होती है, जो किसी भी पारंपरिक फसल से कई गुना अधिक है। विजय सिंह: औषधीय पौधों से आवारा मवेशियों का हल और अच्छी पैदावार पाठा क्षेत्र के मानिकपुर निवासी विजय सिंह विगत 20 वर्षों से इस इलाके में कृषि कार्य से जुड़े हुए हैं। उन्होंने उस दौर में अपने सफर की नींव रखी थी जब इलाके में पानी की भारी किल्लत थी, और उन्होंने सबसे पहले कम पानी की जरूरत वाले बालीदार गेहूं की पैदावार सफलतापूर्वक की। बदलते समय के साथ उन्होंने विभिन्न प्रकार की खेती अपनाई और अपनी आय में इजाफा किया। पाठा में फसलों को चरने वाले बेसहारा और छुट्टा पशुओं से बचाने के लिए उन्होंने एक अनोखा तरीका निकाला। उन्होंने खेतों की मेड़ों पर अश्वगंधा, सोनामुखी और सतावर जैसे औषधीय पौधे लगा दिए। मवेशी इन औषधीय पौधों को नहीं खाते, जिससे मुख्य फसल सुरक्षित रहती है और इन औषधियों को बाजार में बेचकर वह अलग से लाखों रुपये कमा रहे हैं। योगेश जैन: 50 किसानों के क्लस्टर से सामूहिक विपणन की ताकत कर्वी तहसील के बेड़ी पुलिया क्षेत्र के काश्तकार योगेश जैन वर्ष 2010 से ही जैविक और प्राकृतिक कृषि के मॉडल पर निरंतर कार्य कर रहे हैं। अपने प्रक्षेत्र में वह आंवला, पपीता, धान और अरहर जैसी विविध नकदी एवं खाद्य फसलों की पैदावार करते हैं। अकेले काम करने के बजाय योगेश जैन ने क्षेत्र के करीब 50 किसानों को जोड़कर एक मजबूत समूह बनाया है। यह क्लस्टर अपनी जैविक उपज को सीधे बाजार में एक साथ बेचता है, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त होती है और किसानों को सही दाम मिलता है। इस सामूहिक प्रयास और विविधीकरण के माध्यम से वह हर साल करीब 8 से 9 लाख रुपये का मुनाफा प्राप्त कर रहे हैं। कृषि विभाग की गांव-गांव पहुंच और बढ़ती जागरूकता क्षेत्र के किसानों के इन सफल प्रयोगों को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए अब सरकारी मशीनरी भी सक्रिय भूमिका निभा रही है। कृषि विभाग के अधिकारी और कर्मचारी विभिन्न ग्राम पंचायतों में जाकर चौपालें आयोजित कर रहे हैं। इन अभियानों के जरिए किसानों को उन्नत तकनीकों, प्राकृतिक खेती की बारीकियों और सरकारी अनुदान योजनाओं की जानकारी दी जा रही है। नई योजनाओं की सुलभता और सफल किसानों के अनुभव देखकर बुंदेलखंड के अन्य ग्रामीण भी अब पारंपरिक पलायन का रास्ता छोड़कर अपनी पैतृक भूमि को हरा-भरा और उत्पादक बनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। इसका आप पर असर चित्रकूट के इन किसानों का सफल प्रयोग यह साबित करता है कि पारंपरिक रासायनिक खेती पर अत्यधिक निर्भरता कम करके भी बुंदेलखंड जैसे सूखाग्रस्त इलाकों में खेती को बेहद लाभदायक बनाया जा सकता है। • लागत में बचत: रासायनिक कीटनाशक और महंगे उर्वरक बंद करके किसान अपनी इनपुट लागत लगभग शून्य कर सकते हैं। घर पर जैविक खाद बनाकर खेती करने से कर्ज का बोझ नहीं बढ़ता। • फसल सुरक्षा का विकल्प: खेतों की मेड़ पर अश्वगंधा, सतावर और सोनामुखी जैसे औषधीय पौधे लगाने से छुट्टा पशु फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते। यह प्राकृतिक बाड़ खुद एक नकदी फसल बनकर अतिरिक्त आय देती है। • सामूहिक विपणन का लाभ: अकेले उपज बेचने के बजाय 40 से 50 किसानों का समूह बनाकर सीधे बाजार में बेचने से बिचौलियों का कमीशन खत्म होता है। इससे प्रत्येक किसान को अपनी फसल का अधिक समर्थन और उचित मूल्य मिलता है। • दीर्घकालिक आय की सुरक्षा: फलदार बागवानी और मेड़ों पर चंदन के पेड़ लगाना भविष्य के लिए भारी पूंजी तैयार करता है। 10 वर्ष बाद प्रति वृक्ष एक लाख रुपये की संभावित आय किसानों के लिए मजबूत बचत साबित हो सकती है। ऐसा क्यों हुआ बुंदेलखंड के चित्रकूट क्षेत्र में भीषण जल संकट, पथरीली भूमि और छुट्टा मवेशियों के खतरे के कारण खेती लंबे समय से घाटे का सौदा बनी हुई थी, जिससे युवाओं का बड़े शहरों की ओर पलायन बढ़ रहा था। इन किसानों ने परिस्थितियों के आगे झुकने के बजाय स्थानीय जलवायु के अनुकूल फसलों, खुद तैयार की गई जैविक खाद और सामूहिक विपणन को अपनाकर इस संकट का व्यावहारिक हल निकाला। • महंगी लागत और जल संकट की चुनौती: पारंपरिक फसलों में रासायनिक उर्वरक और अत्यधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है, जो सूखे बुंदेलखंड में घाटे का कारण बनती थी। किसानों ने कम पानी वाली फसलों और जैविक खादों को प्राथमिकता देकर उत्पादन खर्च को घटाया। • आवारा पशुओं का प्रकोप: पाठा क्षेत्र में खुले घूमने वाले मवेशी खड़ी फसलों को चर जाते थे। किसानों ने इस संकट का समाधान खेतों के चारों ओर कड़वे औषधीय पौधे लगाकर निकाला, जिन्हें पशु नहीं खाते। • एकल फसल के नुकसान से बचाव: सिर्फ गेहूं या धान पर निर्भर रहने के बजाय किसानों ने फलदार बागवानी, मौसमी सब्जियां और चंदन की मिश्रित खेती चुनी। इससे सूखा पड़ने पर भी पूरे साल आमदनी का क्रम नहीं टूटता। • बिचौलियों की निर्भरता खत्म करना: अलग-अलग उपज बेचने पर स्थानीय मंडियों में उचित दाम नहीं मिल पाते थे। 50 किसानों का क्लस्टर बनाकर एक साथ जैविक उत्पाद बेचने की रणनीति ने मुनाफे को कई गुना बढ़ा दिया। सवाल-जवाब 1. चित्रकूट के नत्थूराम सालाना कितना मुनाफा कमा रहे हैं? नत्थूराम अपने 18 बीघे खेत में रबी, खरीफ, फल और सब्जियों की जैविक बागवानी से सालाना 4 से 5 लाख रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं। 2. कोठारी सिंह पटेल जैविक खेती के लिए खाद का प्रबंध कैसे करते हैं? कोठारी सिंह पटेल बाजार से खाद खरीदने के बजाय अपने घर पर ही पूरी तरह से खुद जैविक खाद तैयार करते हैं। 3. रामलाल मिश्रा के अनुसार चंदन का एक पेड़ कितने समय में और कितनी आमदनी देता है? रामलाल मिश्रा के अनुसार चंदन का पेड़ लगभग 10 वर्ष में तैयार होता है और एक पेड़ से करीब एक लाख रुपये की आमदनी होती है। 4. विजय सिंह ने खेतों को आवारा जानवरों से बचाने के लिए क्या उपाय किया? विजय सिंह ने खेतों के किनारों पर अश्वगंधा, सोनामुखी और सतावर जैसे औषधीय पौधे लगाए हैं, जिन्हें जानवर नहीं खाते और फसल सुरक्षित रहती है। 5. योगेश जैन कितने किसानों का क्लस्टर चलाते हैं और उनकी वार्षिक आय क्या है? योगेश जैन लगभग 50 किसानों का क्लस्टर बनाकर जैविक उत्पाद बेचते हैं और इससे उन्हें सालाना करीब 8 से 9 लाख रुपये का मुनाफा होता है। 6. चित्रकूट में किसानों की मदद के लिए कृषि विभाग क्या कदम उठा रहा है? कृषि विभाग गांव-गांव जाकर किसानों को आधुनिक खेती के प्रति जागरूक कर रहा है और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिला रहा है। प्रेरणा और सबक चित्रकूट के इन किसानों का संघर्ष और सफलता यह सिखाती है कि विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों और कम संसाधनों के बावजूद सही योजना, नवाचार और धैर्य से अपनी तकदीर बदली जा सकती है। • सीखने और प्रयोग करने का साहस: सेवानिवृत्ति के बाद नत्थूराम ने नई शुरुआत की और मूली से शुरुआत कर 18 बीघे का सफल फार्म खड़ा किया। उम्र या पृष्ठभूमि कभी नई शुरुआत में बाधा नहीं बनती। • संसाधनों की जगह श्रम पर भरोसा: कोठारी सिंह पटेल ने यह साबित किया कि महंगे रसायनों के बिना खुद बनाई गई खाद और कड़ी मेहनत से भी बेहतर पैदावार हासिल की जा सकती है। • समस्या को अवसर में बदलना: विजय सिंह ने आवारा पशुओं की समस्या से हार मानने के बजाय मेड़ों पर औषधीय पौधे लगाकर एक नई लाभदायक फसल तैयार कर ली। संकट का समाधान नई आय का स्रोत बन सकता है। • संगठन और एकता की शक्ति: योगेश जैन ने अकेले लाभ कमाने के बजाय 50 किसानों को जोड़कर क्लस्टर बनाया। मिलकर काम करने से बड़े बाजारों तक सीधी पहुंच संभव हो जाती है। https://trendkia.com/success-stories/bundelkhand-ki-sukhi-dharati-para-prakritika-kheti-se-badali-tasvira-chitrakoot-ke-pancha-kisanon-ne-dikhaya-lakhon-ki-kamai-ka-ra-42648 TrendKia — Har trend, sabse pehle.