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  "type": "article",
  "title": "चंबल के बीहड़ों से निकली सफलता की दास्तान, देव प्रभाकर तोमर ने विदेशी नौकरी छोड़ पास की यूपीएससी",
  "summary": "चंबल के बागी परिवार की पृष्ठभूमि से निकलकर देव प्रभाकर सिंह तोमर ने पहले आईआईटी और नीदरलैंड में नौकरी की, फिर तीसरे प्रयास में यूपीएससी क्रैक कर इतिहास रच दिया।",
  "content": "मध्य प्रदेश का चंबल क्षेत्र दशकों से बीहड़ों, हथियारों की गूंज और खूंखार डकैतों की कहानियों के लिए चर्चा में रहा है। जब भी इस अंचल की बात होती है, लोगों के जेहन में अपराध और संघर्ष की पुरानी तस्वीरें तैरने लगती हैं। लेकिन सामाजिक बदलाव की बयार अब इन घाटियों की तस्वीर पूरी तरह बदल रही है। जिस परिवार का अतीत कभी पुलिस रिकॉर्ड और बंदूकों की साये में बीता था, उसी की नई पीढ़ी ने कलम और किताबों की ताकत से पूरे देश में मिसाल कायम की है। यह प्रेरक दास्तान है देव प्रभाकर सिंह तोमर की, जिन्होंने अपनी लगन के दम पर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा में शानदार मुकाम हासिल किया है।\n\nदेव प्रभाकर सिंह तोमर के दादा किसी जमाने में चंबल के कुख्यात बागी माने जाते थे। प्रशासन और सरकारी तंत्र के साथ उनके तीखे वैचारिक मतभेदों ने ऐसा मोड़ लिया कि वे व्यवस्था की नजरों में बागी और डकैत बन गए। उस समय परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। घर में भुखमरी जैसी नौबत आ गई थी और दो वक्त की रोटी जुटाना भी बेहद कठिन हो गया था। लेकिन देव के पिता ने अपराध और तंगहाली के इस दुष्चक्र को तोड़ने की ठानी। उन्होंने अपना पुश्तैनी गांव छोड़ दिया और मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर का रुख किया। वहां उन्होंने विपरीत हालात में दिन-रात एक करके पढ़ाई की और आखिरकार एक शिक्षक बनकर परिवार की जिंदगी को नई दिशा दी।\n\nग्वालियर से स्कूली शिक्षा और आईआईटी का सपना\nपिता के अध्यापक बनने के बाद घर के आर्थिक हालात धीरे-धीरे पटरी पर लौटने लगे। देव प्रभाकर सिंह तोमर की शुरुआती तालीम मध्य प्रदेश बोर्ड के स्कूल से पूरी हुई। इसके बाद उनके पिता ने बेहतर भविष्य की उम्मीद में उनका दाखिला सीबीएसई बोर्ड के अंग्रेजी माध्यम स्कूल में करा दिया। हिंदी माध्यम की पृष्ठभूमि से अचानक अंग्रेजी माध्यम में आने की वजह से देव को शुरुआती दिनों में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। भाषा की इस दीवार ने उन्हें कई बार असहज किया, मगर उन्होंने हार मानने के बजाय सीखने की जिद को अपना हथियार बना लिया।\n\nस्कूली दिनों के दौरान जब उनके सहपाठियों ने प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों और आईआईटी की चर्चा शुरू की, तो देव के दिल में भी देश के शीर्ष संस्थान तक पहुंचने की महत्वाकांक्षा जाग उठी। उन्होंने इस सपने को साकार करने के लिए पूरी लगन झोंक दी। अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत उन्होंने पहले ही प्रयास में संयुक्त प्रवेश परीक्षा (JEE) पास कर ली और आईआईटी रोपड़ में बीटेक पाठ्यक्रम में दाखिला हासिल कर लिया।\n\nनीदरलैंड में कॉर्पोरेट करियर छोड़कर दिल्ली का रुख\nआईआईटी रोपड़ से इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी करने के बाद देव प्रभाकर के सामने संभावनाओं के नए द्वार खुल गए। उनका चयन नीदरलैंड स्थित बहुराष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी फिलिप्स में हो गया। यूरोप में लाखों रुपये के सालाना पैकेज, आधुनिक सुख-सुविधाओं और आरामदायक जीवनशैली के बावजूद उनका मन वहां नहीं लगा। उन्हें लगातार यह अहसास होता रहा कि उनका असली मकसद अपने वतन लौटकर समाज और राष्ट्र निर्माण में सीधी भागीदारी निभाना है।\n\nदेश सेवा की इसी तड़प के चलते उन्होंने विदेश की आलीशान जिंदगी और आकर्षक नौकरी को अलविदा कह दिया और भारत वापस आ गए। नई दिल्ली पहुंचकर उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी का फैसला किया। आर्थिक आत्मनिर्भरता बनाए रखने और अपने खर्च पूरे करने के लिए उन्होंने दिल्ली की गलियों में बच्चों को कोचिंग और ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। दिन में अध्यापन और रात में घंटों तक गंभीर अध्ययन करते हुए उन्होंने अपनी तैयारी को धार दी।\n\nशुरुआती असफलताओं के बाद रेलवे सेवा में चयन\nसिविल सेवा परीक्षा की राह देव प्रभाकर के लिए आसान नहीं रही। अपने शुरुआती दो प्रयासों में उन्हें असफलता का कड़वा घूंट पीना पड़ा। लगातार दो बार चयन न होने के बावजूद उन्होंने अपना आत्मविश्वास नहीं खोया। उन्होंने अपनी पिछली गलतियों का बारीकी से विश्लेषण किया, कमजोर विषयों पर नए सिरे से काम किया और तीसरे प्रयास में पूरी ताकत झोंक दी।\n\nउनकी यह अटूट साधना यूपीएससी 2025 की परीक्षा में रंग लाई, जहां उन्होंने 629वीं ऑल इंडिया रैंक हासिल कर सफलता का परचम लहरा दिया। इस शानदार उपलब्धि के साथ उनका चयन प्रतिष्ठित इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस (IRTS) के लिए हुआ। आज वे भारत सरकार के रेल मंत्रालय में एक प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं और साबित कर चुके हैं कि इंसान का भविष्य उसके पुरखों के अतीत से नहीं, बल्कि उसकी अपनी मेहनत और फैसलों से तय होता है।\n\nइसका आप पर असर\nयह प्रेरक यात्रा साबित करती है कि प्रतिकूल पारिवारिक पृष्ठभूमि और शुरुआती असुविधाएं किसी भी युवा के बड़े लक्ष्यों में स्थायी बाधा नहीं बन सकतीं।\n\n• प्रतियोगी छात्रों के लिए: भाषा बदलने या शुरुआती असफलताओं से घबराने के बजाय अपनी कमजोरियों का विश्लेषण करना चाहिए। लगातार दो बार असफल होने के बाद भी रणनीति में सुधार करके राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा निकाली जा सकती है।\n• करियर मार्गदर्शन: विदेशी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर भी लोक सेवा में आकर देश के लिए काम करने का विकल्प हमेशा खुला रहता है। निजी क्षेत्र का अनुभव प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने में मददगार साबित होता है।\n• आर्थिक स्वावलंबन: तैयारी के दौरान ट्यूशन पढ़ाकर अपने खर्चे खुद निकालना एक व्यावहारिक मॉडल है। इससे परिवार पर आर्थिक बोझ नहीं पड़ता और आत्मविश्वास भी बना रहता है।\n• सामाजिक संदेश: पुरखों की पहचान या आपराधिक इतिहास नई पीढ़ी की काबिलियत तय नहीं कर सकता। शिक्षा और अनुशासन के दम पर कोई भी परिवार अपनी सामाजिक स्थिति को पूरी तरह बदल सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह बदलाव इसलिए संभव हुआ क्योंकि परिवार ने अपराध और अभाव के माहौल से निकलकर शिक्षा को अपना मुख्य संबल बनाया।\n\n• पिता का साहसिक फैसला: देव के दादा के प्रशासनिक विवादों के कारण परिवार भुखमरी के कगार पर पहुंच गया था। इस चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए उनके पिता ने चंबल का पैतृक गांव छोड़कर ग्वालियर में शिक्षक बनने का कठोर निर्णय लिया।\n• शिक्षा के प्रति समर्पण: हिंदी माध्यम से अचानक अंग्रेजी माध्यम में जाने की बाधाओं को देव ने अपनी कड़ी मेहनत से दूर किया। इसके चलते उन्होंने पहले ही प्रयास में जेईई परीक्षा पास कर आईआईटी में जगह बनाई।\n• देश सेवा का संकल्प: नीदरलैंड में फिलिप्स कंपनी की लाखों की नौकरी और सुविधाएं होने के बावजूद उनका झुकाव राष्ट्र निर्माण की ओर था। इसी उद्देश्य ने उन्हें आरामदायक विदेशी करियर छोड़कर दिल्ली की गलियों में संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया।\n• गलतियों से सीख: सिविल सेवा परीक्षा में लगातार दो बार मिली असफलता के बाद उन्होंने हार नहीं मानी। तीसरे प्रयास में अपनी रणनीति को दुरुस्त कर उन्होंने 629वीं रैंक हासिल की।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. देव प्रभाकर सिंह तोमर कौन हैं?\nदेव प्रभाकर सिंह तोमर चंबल पृष्ठभूमि से आने वाले एक प्रशासनिक अधिकारी हैं, जिन्होंने यूपीएससी 2025 में 629वीं रैंक हासिल की है।\n\n2. देव प्रभाकर के परिवार का चंबल से क्या नाता रहा है?\nउनके दादा सरकारी अधिकारियों से विवादों के चलते चंबल के बागी बन गए थे, जिसके बाद परिवार को भारी गरीबी और संकट झेलना पड़ा।\n\n3. देव के पिता ने परिवार की स्थिति कैसे बदली?\nउनके पिता ने पैतृक गांव छोड़कर ग्वालियर का रुख किया, जहां उन्होंने दिन-रात पढ़ाई कर शिक्षक की नौकरी हासिल की और परिवार को संभाला।\n\n4. देव प्रभाकर ने उच्च शिक्षा कहां से हासिल की?\nउन्होंने अपने पहले ही प्रयास में जेईई परीक्षा पास की और आईआईटी रोपड़ से बीटेक की डिग्री प्राप्त की।\n\n5. विदेश में वे किस कंपनी में कार्यरत थे?\nआईआईटी के बाद उनका चयन नीदरलैंड में प्रसिद्ध इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी फिलिप्स में हुआ था, जहां वे लाखों के पैकेज पर काम कर रहे थे।\n\n6. दिल्ली में यूपीएससी की तैयारी के दौरान उन्होंने क्या काम किया?\nदिल्ली में अपने खर्च उठाने और तैयारी जारी रखने के लिए वे स्कूली बच्चों को ट्यूशन और कोचिंग पढ़ाया करते थे।\n\n7. यूपीएससी परीक्षा में उन्हें किस प्रयास में सफलता मिली?\nशुरुआती दो प्रयासों में असफल रहने के बाद उन्हें अपने तीसरे प्रयास में ऑल इंडिया रैंक 629 के साथ सफलता मिली।\n\n8. वर्तमान में वे किस सेवा में पदस्थ हैं?\nवे इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस (IRTS) में चयनित हुए हैं और रेल मंत्रालय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nदेव प्रभाकर तोमर का जीवन हर उस युवा को प्रेरित करता है जो सीमित संसाधनों और असफलताओं से जूझ रहा है।\n\n• विरासत से ऊपर उठें: पारिवारिक अतीत चाहे जितना भी चुनौतीपूर्ण रहा हो, आपकी अपनी मेहनत ही आपकी पहचान तय करती है। पुरानी कड़वाहटों को भूलकर शिक्षा को हथियार बनाएं।\n• आराम छोड़कर लक्ष्य चुनें: यूरोप के आरामदायक जीवन और मोटी तनख्वाह को छोड़कर देश सेवा का रास्ता चुनना यह सिखाता है कि आत्मसंतुष्टि और उद्देश्य हमेशा पैसे से बड़े होते हैं।\n• असफलता से न डरें: दो बार यूपीएससी में चयन न होने के बाद भी हिम्मत न हारना यह साबित करता है कि निरंतर प्रयास से बंद दरवाजे भी खुल जाते हैं। गलतियों को पहचानें और उन्हें सुधारें।\n• स्वावलंबी बनें: दिल्ली में ट्यूशन पढ़ाते हुए पढ़ाई का खर्च खुद उठाना यह संदेश देता है कि स्वाभिमान और मेहनत हर अभाव को परास्त कर सकती है।",
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  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-10-03",
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