चंदौली के मवई कला में स्वयं सहायता समूहों से संवरी ग्रामीण महिलाओं की तकदीर, गीता देवी ने बटाई पर खेती कर पेश की आत्मनिर्भरता की मिसाल चंदौली के नियमताबाद ब्लॉक में गीता देवी स्वयं सहायता समूहों के जरिए दर्जनों महिलाओं को स्वावलंबी बना रही हैं और खुद भी बटाई पर खेती कर बेहतर आमदनी जुटा रही हैं, हालांकि बाढ़ और मुआवजे के नियम अब भी परेशानी बने हुए हैं। उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में स्थित मुगलसराय विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत नियमताबाद ब्लॉक का मवई कला गांव आज महिला सशक्तिकरण की एक जमीनी कहानी पेश कर रहा है। यहां स्वयं सहायता समूहों की मदद से ग्रामीण महिलाओं के जीवन में एक बड़ा सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। इस सामाजिक और आर्थिक बदलाव की मुख्य सूत्रधार गांव की गीता देवी हैं, जो साल 2019 से समूह सखी की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। गीता देवी न केवल गांव की दूसरी महिलाओं को बचत, बैंकिंग सेवाओं और सरकारी योजनाओं से जोड़कर स्वावलंबी बनने की राह दिखा रही हैं, बल्कि उन्होंने खुद भी प्रतिकूल आर्थिक परिस्थितियों से निकलकर बटाई पर खेती करते हुए अपनी आजीविका को पूरी तरह मजबूत किया है। उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा से गांव की महिलाएं खेती, बकरी पालन, सिलाई, ब्यूटी पार्लर और किराना दुकान जैसे विभिन्न स्वरोजगार के जरिए अपने परिवारों की तकदीर संवार रही हैं। साल 2019 में सीआरपी दीदियों के आगमन से हुआ बदलाव का सूत्रपात मवई कला में महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन की यह यात्रा अचानक नहीं शुरू हुई। गीता देवी के अनुसार, साल 2019 से पहले उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब और तंगहाली से भरी थी। घर का सामान्य खर्च चलाना भी भारी पड़ता था और परिवार कर्ज के बोझ में फंसा हुआ था। इसी दौरान वर्ष 2019 में गांव में सीआरपी (सामुदायिक संसाधन व्यक्ति) दीदियों का आगमन हुआ। उन दीदियों ने गांव की ग्रामीण महिलाओं को एक जगह इकट्ठा किया और उन्हें स्वयं सहायता समूह के गठन, उसके नियमों और सामूहिक ताकत के बारे में विस्तार से समझाया। सीआरपी दीदियों ने महिलाओं को नियमित छोटी-छोटी बचत करने, बैंक शाखाओं में खाते खुलवाने और वित्तीय अनुशासन अपनाने के फायदे गिनाए। इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तहत मिलने वाले वित्तीय लाभों की जानकारी दी। महिलाओं को बताया गया कि समूह बनाने के बाद उन्हें सरकार से स्टार्टअप फंड, रिवॉल्विंग फंड (आरएफ) और सामुदायिक निवेश निधि (सीआईएफ) जैसी महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता रियायती शर्तों पर मिलती है। गीता देवी ने इन जानकारियों को गंभीरता से समझा और समूह से जुड़ने का फैसला किया। इसके बाद समूह से आसान किस्तों पर मिली वित्तीय मदद और उपलब्ध संसाधनों के सहारे महिलाओं ने खेती-बाड़ी और छोटे-मोटे व्यवसाय शुरू किए। इससे न सिर्फ महिलाओं की आय में वृद्धि हुई, बल्कि पुराने कर्ज को चुकाने में भी उन्हें बड़ी राहत मिली। 15 समूहों का किया गठन, 10 नए समूह बनाने का लक्ष्य समूह सखी के रूप में गीता देवी का दायरा लगातार बढ़ रहा है। वह अब तक मवई कला और आसपास के क्षेत्र में 15 स्वयं सहायता समूहों का सफल गठन करा चुकी हैं। उनकी योजना आने वाले दिनों में 10 और नए समूह तैयार करने की है, ताकि क्षेत्र की अधिक से अधिक जरूरतमंद ग्रामीण महिलाओं को सीधे तौर पर स्वरोजगार और वित्तीय सुरक्षा से जोड़ा जा सके। वह प्रतिदिन महिलाओं को घर-घर जाकर नियमित बचत करने और समूह की सक्रिय सदस्य बनने के लिए प्रेरित करती हैं। गीता देवी का कहना है कि समूह से जुड़ने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि किसी भी महिला को अपने नए काम की शुरुआत के लिए साहूकारों के चक्कर नहीं काटने पड़ते। महिलाएं अपनी आवश्यकता के अनुसार समूह से उचित आर्थिक सहायता लेकर आत्मनिर्भर बन रही हैं। आज उनके समूह की कई महिलाएं ब्यूटी पार्लर चला रही हैं, कई ने किराना दुकान खोली है, जबकि अन्य महिलाएं सब्जी उत्पादन और उन्नत बकरी पालन के जरिए नियमित कमाई कर रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत समूह सखी के रूप में किए जाने वाले कार्यों के आधार पर गीता देवी को प्रोत्साहन राशि भी मिलती है। उनका मानना है कि महिलाओं की कड़ी मेहनत और समर्पण के अनुरूप उनकी आय में और अधिक बढ़ोतरी होनी चाहिए ताकि ग्रामीण महिलाएं पूरी तरह वित्तीय स्वतंत्रता हासिल कर सकें। बटाई की जमीन पर आधुनिक सब्जी उत्पादन का मॉडल दूसरों को प्रेरणा देने के साथ-साथ समूह सखी गीता देवी स्वयं भी मेहनत की एक मिसाल हैं। परिवार के पास अपनी पर्याप्त कृषि भूमि नहीं होने के बावजूद उन्होंने खेती को ही अपनी आजीविका का मजबूत आधार बनाया। वह दूसरों की जमीन सालाना करीब एक हजार रुपये प्रति बिस्वा के हिसाब से किराये पर लेती हैं। इस काम में उनके पति दिनेश मौर्या कंधे से कंधा मिलाकर उनका पूरा सहयोग करते हैं। पति-पत्नी मिलकर पूरे समर्पण के साथ खेतों में पसीना बहाते हैं। गीता देवी बताती हैं कि लगभग 4 बीघे जमीन पर सब्जियों की सघन खेती करने में बीज, जुताई, खाद, सिंचाई और देखरेख मिलाकर करीब 50 हजार रुपये की कुल लागत आ जाती है। यदि मौसम पूरी तरह अनुकूल रहे और बाजार में सब्जियों के भाव अच्छे मिल जाएं, तो एक सीजन में सब्जियों की बिक्री से लगभग एक लाख रुपये तक की कुल आमदनी हो जाती है। हालांकि, वह यह स्पष्ट करती हैं कि एक लाख रुपये केवल कुल बिक्री की राशि होती है, जिसमें से 50 हजार रुपये खेती की लागत निकालनी पड़ती है। इस प्रकार शुद्ध मुनाफा बाजार के उतार-चढ़ाव और मौसम पर निर्भर करता है। गीता देवी का मुख्य जोर इस बात पर रहता है कि खेत किसी भी महीने खाली न रहें। वह साल भर फसल चक्र अपनाते हुए मौसमी सब्जियां उगाती हैं। उनके खेतों में खीरा, करेला, भिंडी, नेनुआ, लौकी, गोभी, पालक, हरी धनिया, शिमला मिर्च, तरबूज और खरबूजे जैसी फसलों का उत्पादन चक्र चलता रहता है। खेतों से तोड़ी गई इन ताजी सब्जियों को वे पास की मुगलसराय सब्जी मंडी में ले जाकर बेचते हैं, जिससे मिलने वाले पैसे से उनके परिवार का जीवनयापन सम्मानजनक तरीके से चल रहा है। गंगा की बाढ़ और मुआवजे के नियम बने सबसे बड़ी रुकावट मेहनत और खेती से बेहतर आमदनी की संभावनाओं के बीच गीता देवी और उनके पति दिनेश मौर्या के सामने गंगा नदी की बाढ़ एक बहुत बड़ा संकट बनकर खड़ी होती है। मवई कला गांव गंगा के कछार क्षेत्र के पास होने के कारण बरसात के दिनों में बाढ़ का पानी खेतों में घुस जाता है। बाढ़ का पानी भर जाने से खेतों में लहलहाती हरी सब्जियां और बोए गए महंगे बीज पूरी तरह गलकर सड़ जाते हैं। जब पूरी फसल तबाह हो जाती है, तो परिवार को अगली फसल की बुवाई और खेती को दोबारा शुरू करने के लिए फिर से कर्ज का सहारा लेना पड़ता है। इसके अलावा, वर्तमान सरकारी नियमों के तहत मिलने वाला आपदा मुआवजा भी बटाईदार किसानों के लिए एक बड़ी विडंबना बना हुआ है। दिनेश मौर्या बताते हैं कि जमीन किराये पर लेकर खेती करने वाले वास्तविक किसानों को फसल नुकसान की स्थिति में सरकारी मुआवजे का कोई लाभ नहीं मिल पाता। व्यवस्था ऐसी है कि प्राकृतिक आपदा के समय आर्थिक सहायता और मुआवजे की राशि सीधे जमीन के पंजीकृत मालिक के खाते में चली जाती है, जबकि खेत में अपनी पूंजी, बीज, खाद और दिन-रात का पसीना लगाने वाला किरायेदार किसान पूरी तरह खाली हाथ रह जाता है। इस परिवार का स्पष्ट कहना है कि सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव कर जमीन पर वास्तविक रूप से खेती करने वाले बटाईदार किसानों के लिए भी विशेष आर्थिक सहायता की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि फसल डूबने की स्थिति में बच्चों की स्कूली पढ़ाई और घर का चूल्हा प्रभावित न हो। इसका आप पर असर चंदौली के मवई कला की यह घटना दर्शाती है कि स्वयं सहायता समूह ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का सशक्त साधन हैं, लेकिन बटाईदार किसानों के लिए मुआवजे की कमी अब भी बड़ी चुनौती है। • भारत में: राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर ग्रामीण महिलाएं स्वरोजगार के लिए स्टार्टअप और रिवॉल्विंग फंड से आसान ऋण प्राप्त कर सकती हैं। इससे बैंक शाखाओं के जरिए सीधे वित्तीय सहायता हासिल कर बिना किसी साहूकार के छोटे उद्योग और कृषि कार्य शुरू किए जा सकते हैं। • चंदौली में: मवई कला और नियमताबाद ब्लॉक की महिलाएं समूह सखी की मदद से विभिन्न आजीविका गतिविधियों से जुड़कर नियमित आय प्राप्त कर सकती हैं। वहीं मुगलसराय मंडी में ताजी सब्जियों की नियमित आपूर्ति से स्थानीय व्यापारियों और उपभोक्ताओं को ताजी उपज मिल रही है। • बटाईदार किसानों के लिए: जमीन किराये पर लेकर खेती करने वाले किसानों को बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा आने पर फसल मुआवजे का सीधा लाभ नहीं मिलता क्योंकि सहायता राशि जमीन मालिक के नाम जाती है। इससे किराए पर खेती करने वाले परिवारों को अपनी लागत डूबने पर दोबारा बुवाई के लिए अतिरिक्त वित्तीय जोखिम उठाना पड़ता है। • ग्रामीण स्वरोजगार पर: समूह से जुड़ने के बाद महिलाएं केवल खेती ही नहीं बल्कि ब्यूटी पार्लर, बकरी पालन और परचून की दुकान जैसे वैकल्पिक कार्यों से भी परिवार की आर्थिक स्थिति सुधार सकती हैं। यह मॉडल ग्रामीण परिवारों को गरीबी और पुराने कर्जों से बाहर निकालने में व्यावहारिक भूमिका निभा रहा है। ऐसा क्यों हुआ मवई कला में महिलाओं का आर्थिक उत्थान संस्थागत मार्गदर्शन और जमीनी स्तर पर उपलब्ध कराए गए वित्तीय तंत्र की वजह से संभव हुआ, जबकि बाढ़ का संकट कछारी भूगोल से जुड़ा है। • सीआरपी दीदियों का आगमन: वर्ष 2019 में गांव में आई सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों ने महिलाओं को वित्तीय अनुशासन, नियमित बचत और बैंक खाते के फायदे समझाए। इस प्राथमिक जागरूकता ने गरीब ग्रामीण महिलाओं को एक मंच पर संगठित होने के लिए प्रेरित किया। • संस्थागत वित्तीय सहायता: राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत मिलने वाले स्टार्टअप फंड, रिवॉल्विंग फंड और सामुदायिक निवेश निधि ने महिलाओं को बिना साहूकारों के कर्ज के प्रारंभिक पूंजी उपलब्ध कराई। इसी पूंजी से महिलाओं ने खेती और छोटे व्यवसाय शुरू किए। • पारिवारिक सहयोग और लगन: गीता देवी और उनके पति दिनेश मौर्या ने अपनी खराब आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए बटाई पर 4 बीघे जमीन लेकर पूरे साल सघन सब्जी उत्पादन का मॉडल अपनाया। दोनों की निरंतर मेहनत ने इस प्रयास को सफल आजीविका में बदला। • गंगा की बाढ़ और नीतिगत सीमा: खेतों का गंगा के नजदीकी कछार क्षेत्र में स्थित होना बाढ़ के दौरान फसलों के जलमग्न होने का मुख्य कारण बनता है। इसके साथ ही मौजूदा मुआवजा नियमों में पंजीकृत जमीन मालिकों को ही राहत दिए जाने के प्रावधान के कारण बटाईदार किसान सहायता से वंचित रह जाते हैं। सवाल-जवाब 1. गीता देवी कौन हैं और वह किस गांव से ताल्लुक रखती हैं? गीता देवी चंदौली जिले के मुगलसराय विधानसभा क्षेत्र स्थित नियमताबाद ब्लॉक के मवई कला गांव की निवासी हैं और साल 2019 से समूह सखी के रूप में कार्यरत हैं। 2. गीता देवी के जीवन में बदलाव की शुरुआत कब और कैसे हुई? साल 2019 में गांव में सीआरपी दीदियों के आने के बाद महिलाओं को बचत, बैंक खाते और सरकारी फंड की जानकारी मिली, जिसके बाद गीता देवी ने समूह बनाकर काम शुरू किया। 3. गीता देवी अब तक कितने स्वयं सहायता समूह बना चुकी हैं और आगे क्या लक्ष्य है? वह अब तक 15 स्वयं सहायता समूहों का गठन कर चुकी हैं और आने वाले समय में 10 और नए समूह बनाने का लक्ष्य रखती हैं। 4. गीता देवी जमीन किराये पर लेकर किस दर पर खेती करती हैं? वह करीब एक हजार रुपये प्रति बिस्वा सालाना किराया देकर जमीन पर खेती करती हैं। 5. 4 बीघे में सब्जी की खेती करने में कितनी लागत और बिक्री होती है? लगभग 4 बीघे में 50 हजार रुपये तक की लागत आती है और अनुकूल मौसम व भाव रहने पर सब्जियों की बिक्री से करीब एक लाख रुपये तक की आमदनी होती है। 6. वे खेतों में कौन-कौन सी मुख्य फसलें और सब्जियां उगाती हैं? वे खीरा, करेला, भिंडी, नेनुआ, लौकी, गोभी, पालक, धनिया, शिमला मिर्च, तरबूज और खरबूजा जैसी मौसमी फसलें उगाती हैं। 7. तैयार सब्जियों को कहां बेचा जाता है? खेतों से तैयार सब्जियों को मुगलसराय की स्थानीय सब्जी मंडी में ले जाकर बेचा जाता है। 8. खेती में गीता देवी और उनके पति के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है? गंगा नदी की बाढ़ से खेतों में पानी भरने के कारण फसलें और बीज नष्ट हो जाते हैं, जिससे दोबारा खेती शुरू करने के लिए कर्ज लेना पड़ता है। 9. बटाईदार किसानों को सरकारी मुआवजे से क्या शिकायत है? दिनेश मौर्या के अनुसार आपदा आने पर मुआवजा जमीन मालिक को मिलता है, जबकि किराए पर लागत लगाकर खेती करने वाले वास्तविक किसान खाली हाथ रह जाते हैं। प्रेरणा और सबक मवई कला की गीता देवी का संघर्ष यह सिद्ध करता है कि सीमित संसाधनों और गरीबी के बावजूद सही मार्गदर्शन और लगन से अपनी तकदीर बदली जा सकती है। • सामूहिक शक्ति पर भरोसा: स्वयं सहायता समूह से जुड़कर और दूसरों को जोड़कर एक अकेला व्यक्ति भी पूरे समुदाय की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव ला सकता है। • संसाधनों की कमी को बहाना न बनाना: अपनी जमीन न होने के बावजूद गीता देवी ने बटाई पर जमीन लेकर पूरे साल सब्जियां उगाईं और परिवार की आमदनी को बढ़ाया। • विविधता और निरंतरता: साल भर फसल चक्र अपनाकर खेतों को खाली न रखना और मौसम के अनुसार तरह-तरह की सब्जियां उगाना कृषि में जोखिम को कम करता है। • दूसरों को आगे बढ़ाने की सोच: केवल खुद का विकास करने के बजाय गीता देवी ने 15 समूह बनाए और 10 और समूह बनाकर अन्य महिलाओं को स्वावलंबी बनाने का बीड़ा उठाया। https://trendkia.com/success-stories/chandauli-ke-mawai-kala-men-shg-se-snvari-gramina-mahilaon-ki-takadira-geeta-devi-ne-batai-para-kheti-kara-pesha-ki-atmanirbharata-47720 TrendKia — Har trend, sabse pehle.