छपरा के किसान ने निकाला कम लागत का फॉर्मूला, खुले बाड़े में देशी मुर्गी पालन से बना रहे मुनाफा बिहार के छपरा जिले के मोहम्मद इशाक अंसारी ने पारंपरिक शेड के बजाय खुले खेत में देशी मुर्गी पालन का अनोखा मॉडल अपनाया है। इस तरीके से दाने का खर्च घटने के साथ बीमारियों का खतरा कम हुआ है और बिक्री से बेहतर कमाई हो रही है। बिहार के छपरा जिले में स्थित मांझी प्रखंड के कलान गांव के रहने वाले मोहम्मद इशाक अंसारी ने पशुपालन के क्षेत्र में एक नया उदाहरण पेश किया है। वह बेहद कम लागत में देशी मुर्गी पालन करके घर बैठे ही शानदार मुनाफा कमा रहे हैं। उनका यह पूरा सेटअप पारंपरिक बंद फार्मों से काफी अलग है, जिसे उन्होंने खुले वातावरण और न्यूनतम खर्च को ध्यान में रखकर तैयार किया है। खुले खेत और बाउंड्री वॉल का खास सेटअप मोहम्मद इशाक अंसारी ने अपने खुले खेत के भीतर ही एक छोटा सा फार्म तैयार किया है। इस फार्म के चारों तरफ एक मजबूत बाउंड्री वॉल का घेरा बनाया गया है। दिन के समय मुर्गियां इस घेरे के अंदर खुले में घूमती-फिरती हैं। खेत की मिट्टी में गिरे हुए कीड़े-मकोड़े और बिखरे दाने खाकर वे आसानी से अपना पेट भर लेती हैं। इस प्राकृतिक आहार व्यवस्था की वजह से बाजार से खरीदे जाने वाले दाने पर होने वाला खर्च काफी हद तक घट जाता है। सैर करने से बेहतर सेहत और तेजी से बढ़ता वजन खुली जगह में मुर्गियों के लगातार टहलने और प्राकृतिक वातावरण में रहने से उनकी सेहत पर सकारात्मक असर पड़ता है। लगातार शारीरिक गतिविधि के कारण मुर्गियों में बीमारियों का प्रकोप बहुत कम देखने को मिलता है। इसके साथ ही, इस प्राकृतिक जीवनशैली की वजह से मुर्गियों का वजन भी तेजी से बढ़ता है, जिससे बिक्री के समय बेहतर मूल्य प्राप्त होता है। सफेद मुर्गियों के नुकसान के बाद देशी नस्ल का चयन अपने शुरुआती दौर को याद करते हुए इशाक अंसारी बताते हैं कि पहले वह फार्म वाली सफेद मुर्गियों का पालन किया करते थे। हालांकि, सफेद मुर्गियां बहुत जल्दी-जल्दी बीमार पड़ती थीं, जिसके इलाज और रखरखाव में काफी पैसा बर्बाद होता था और उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ता था। इस घाटे से सबक लेते हुए उन्होंने सफेद मुर्गियों की जगह देशी मुर्गियों को पालना शुरू किया। देशी मुर्गियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है और वे खुले माहौल में प्राकृतिक रूप से स्वस्थ रहती हैं। स्वयं तैयार करते हैं चूजे, चार तरीकों से होती है कमाई इशाक अंसारी का यह व्यवसाय सिर्फ मुर्गियां पालने तक ही सीमित नहीं है। वह अपने फार्म में मुर्गियों के बच्चे खुद ही तैयार करते हैं। उनकी कमाई के चार प्रमुख स्रोत हैं, जिनमें अंडे, छोटे चूजे, तैयार मुर्गे और मुर्गियों की बिक्री शामिल है। इस बहुआयामी बिक्री मॉडल के कारण उन्हें साल भर नियमित आय मिलती रहती है। उनका मानना है कि ग्रामीण क्षेत्र के किसान कम पूंजी लगाकर इस तरीके से देशी मुर्गी पालन शुरू कर सकते हैं और अपने घर पर रहकर ही एक टिकाऊ व लाभदायक रोजगार स्थापित कर सकते हैं। इसका आप पर असर • भारत में: कम लागत वाले फ्री-रेंज देशी मुर्गी पालन मॉडल को अपनाकर देश भर के छोटे और सीमांत किसान महंगे कमर्शियल फीड पर निर्भरता कम करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अपनी आय बढ़ा सकते हैं। • बिहार (छपरा) में: छपरा और आसपास के जिलों के किसान स्थानीय जलवायु के अनुकूल देशी मुर्गियों के संरक्षण के साथ बिना किसी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के अपने घर या खेत से ही टिकाऊ स्वरोजगार शुरू कर सकते हैं। सवाल-जवाब 1. मोहम्मद इशाक अंसारी देशी मुर्गी पालन कहां करते हैं? वह बिहार के छपरा जिले में मांझी प्रखंड स्थित कलान गांव में अपने घर और खेत में देशी मुर्गी पालन करते हैं। 2. खुले खेत में मुर्गी पालन करने से दाने का खर्च कैसे कम होता है? मुर्गियां बाउंड्री के अंदर खुले खेत में घूमकर मिट्टी में गिरे कीड़े-मकोड़े और बिखरे दाने प्राकृतिक रूप से खाती हैं, जिससे कमर्शियल दाने की खपत घट जाती है। 3. इशाक अंसारी ने सफेद मुर्गियों का पालन क्यों बंद कर दिया? फार्म वाली सफेद मुर्गियां बार-बार बीमार पड़ती थीं, जिससे इलाज में काफी खर्च होता था और उन्हें भारी नुकसान का सामना करना पड़ता था। 4. इशाक अंसारी के मुर्गी फार्म की कमाई के मुख्य स्रोत कौन-कौन से हैं? वह खुद चूजे तैयार करते हैं और अंडे, चूजे, मुर्गे तथा मुर्गियों की बिक्री करके चार अलग-अलग जरियों से कमाई करते हैं। 5. टहलने से मुर्गियों की सेहत और वजन पर क्या प्रभाव पड़ता है? खुले वातावरण में लगातार टहलने से मुर्गियों में बीमारियां कम होती हैं और उनका शारीरिक वजन तेजी से बढ़ता है। प्रेरणा और सबक • गलतियों से सीखकर बदलाव लाना: सफेद मुर्गियों से हुए नुकसान के बाद हताश होने के बजाय इशाक अंसारी ने देशी नस्ल की ओर रुख किया, जो अधिक टिकाऊ साबित हुआ। • लागत कम करने के अभिनव तरीके: खुले खेत में बाउंड्री बनाकर मुर्गियों को प्राकृतिक कीट और दाने चरने की छूट दी, जिससे सबसे बड़े खर्च यानी कमर्शियल दाने पर भारी बचत हुई। • आत्मनिर्भरता पर जोर: बाहरी सप्लायर्स पर निर्भर रहने के बजाय उन्होंने खुद चूजे तैयार करने का कौशल सीखा, जिससे लाभ मार्जिन में बढ़ोतरी हुई। • आय का विविधीकरण: केवल एक उत्पाद बेचने के बजाय अंडे, चूजे, मुर्गे और मुर्गियां चारों की बिक्री कर आय के बहुआयामी स्रोत बनाए। https://trendkia.com/success-stories/chapra-ke-kisana-ne-nikala-kama-lagata-ka-phormula-khule-bare-men-deshi-murgi-palana-se-bana-rahe-munapha-19368 TrendKia — Har trend, sabse pehle.