छपरा के गांवों में सिक्की घास की पारंपरिक कारीगरी बनी महिलाओं की कमाई का बड़ा जरिया सारण जिले के बरेजा गांव की महिलाएं सिक्की घास से आकर्षक हस्तशिल्प तैयार कर मेलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए अच्छी आमदनी हासिल कर रही हैं। बिहार के सारण जिले में ग्रामीण महिलाओं की पारंपरिक दस्तकारी अब केवल घरेलू साज-सज्जा तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनके लिए नियमित आमदनी और आत्मनिर्भरता का मजबूत साधन बन चुकी है। मांझी प्रखंड अंतर्गत बरेजा गांव की दर्जनों महिलाएं स्थानीय जंगलों से मिलने वाली सिक्की घास से मनमोहक सजावटी वस्तुएं और आभूषण तैयार कर रही हैं। सरकारी स्तर पर जीविका योजना के सहयोग से इन कारीगरों को व्यापक बाजार और वित्तीय सहायता मिल रही है, जिससे कभी घर की चारदीवारी तक सीमित रहने वाली ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिल रहा है। जंगल की घास से तैयार होते हैं खूबसूरत उत्पाद सिक्की शिल्प की पूरी प्रक्रिया पारंपरिक और प्राकृतिक तरीकों पर आधारित है। कारीगर महिलाएं सबसे पहले जंगलों से सिक्की घास काटकर लाती हैं। इसके बाद इस घास को धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है ताकि उसमें टिकाऊपन आ सके। घास सूखने के बाद उस पर विभिन्न आकर्षक रंग चढ़ाए जाते हैं। रंगाई पूरी होने के पश्चात महिलाएं अपने हाथों से कसीदाकारी और बुनाई कर तरह-तरह के सामान गढ़ती हैं। इनमें मुख्य रूप से कानों की बालियां, चूड़ियां, हेयर बैंड, फूल डालिया, दौड़ी और कई पारंपरिक घरेलू उपयोग की चीजें शामिल हैं। यह पूरा काम हाथों की महीन कारीगरी से संपन्न होता है, जो इन उत्पादों को विशिष्ट पहचान देता है। पारंपरिक मेलों से लेकर ऑनलाइन बाजार तक पहुंच तैयार किए गए हस्तशिल्प को बेचने के लिए महिलाओं को बड़े आयोजनों में मंच उपलब्ध कराया जा रहा है। पटना के गांधी मैदान में आयोजित होने वाले सरस मेला, विश्वप्रसिद्ध सोनपुर मेला और अन्य प्रमुख व्यापारिक प्रदर्शनियों में सरकार द्वारा इन महिला कारीगरों को विशेष स्टॉल दिए जाते हैं। इन प्रदर्शनियों में खरीदार उनके हस्तनिर्मित उत्पादों की अच्छी कीमत चुका रहे हैं। ऑफलाइन मेलों के अलावा इन हस्तशिल्पों की मांग डिजिटल माध्यमों पर भी तेजी से बढ़ रही है। कारीगरों के मुताबिक उन्हें इंटरनेट के जरिए भी कई बड़े ऑर्डर मिल रहे हैं, जिससे पूरे साल काम का प्रवाह बना रहता है। घरेलू इस्तेमाल से बाजार तक का व्यावसायिक सफर बरेजा पंचायत की एस जे वाई सदस्य पुष्पा देवी के अनुसार, पहले वे पूरी तरह बेरोजगार थीं और घर पर ही समय बिताती थीं। हालांकि वे और गांव की अन्य महिलाएं यह कला पहले से जानती थीं, लेकिन उस समय तैयार सामान का उपयोग केवल अपने घरों में ही किया जाता था। उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि अपने हुनर से कमाई भी की जा सकती है। जीविका से जुड़ने और सिक्की पीजी का हिस्सा बनने के बाद उन्हें उत्पादन को व्यावसायिक स्वरूप देने का रास्ता मिला। समूह से जुड़ी महिलाओं को काम शुरू करने और कच्चा माल जुटाने के लिए ऋण सहायता भी मुहैया कराई गई, जिससे उत्पादन की क्षमता में तेजी से विस्तार हुआ। मेले में 45 हजार रुपये की बिक्री से सुधरे हालात व्यावसायिक प्रशिक्षण और बाजार मिलने का सीधा असर महिलाओं की घरेलू माली हालत पर पड़ा है। पुष्पा देवी ने बताया कि हाल ही में आयोजित सरस मेले के दौरान उनके समूह ने 45 हजार रुपये मूल्य के सामान की बिक्री दर्ज की। इस कमाई के जरिए वे अपने घर-परिवार के दैनिक खर्चों को बेहतर तरीके से संभाल पा रही हैं। मांझी प्रखंड के बरेजा गांव की दो दर्जन से अधिक महिलाएं सामूहिक प्रयास के जरिए अपने इस काम को और ऊंचे स्तर पर ले जाने में जुटी हैं, जिससे ग्रामीण अंचल में महिला सशक्तिकरण की एक मजबूत मिसाल तैयार हो रही है। इसका आप पर असर सारण जिले के ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक सिक्की घास शिल्प से महिलाओं को घर पर ही स्थायी आजीविका और वित्तीय स्वतंत्रता मिल रही है। • भारत में: ग्रामीण हस्तशिल्प को मुख्यधारा के मेलों और ई-कॉमर्स चैनलों से जोड़कर पारंपरिक कलाओं के संरक्षण और कुटीर उद्योगों को व्यापक बाजार मिल रहा है। इससे शहरों में रहने वाले खरीदारों को सीधे कारीगरों द्वारा तैयार किए गए प्रामाणिक इको-फ्रेंडली उत्पाद उचित दामों पर उपलब्ध हो रहे हैं। • छपरा और सारण में: मांझी प्रखंड के बरेजा गांव की बेरोजगार महिलाओं को घर बैठे नियमित काम और आमदनी का साधन प्राप्त हुआ है। स्थानीय कारीगरों ने अकेले एक मेले में 45 हजार रुपये तक का कारोबार कर अपने परिवारों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया है। • कारीगरों के लिए वित्तीय सहायता: जीविका के माध्यम से महिलाओं को समूह आधारित ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है ताकि वे कच्चा माल जुटा सकें। इस वित्तीय मदद की बदौलत उत्पादन क्षमता बढ़ी है और बिचौलियों पर निर्भरता समाप्त हुई है। • बाजार विस्तार: स्थानीय हस्तशिल्पियों को गांधी मैदान और सोनपुर जैसे बड़े मेलों में सरकारी स्टॉल के साथ डिजिटल ऑर्डर भी मिल रहे हैं। इससे कारीगरों को साल भर निरंतर व्यावसायिक मांग और काम मिलता रहता है। ऐसा क्यों हुआ ग्रामीण महिलाओं के पास पीढ़ियों से सिक्की घास बुनने का पारंपरिक हुनर मौजूद था, लेकिन व्यावसायिक समझ और बाजार की कमी के कारण यह कला केवल घरेलू उपयोग तक सिमटी हुई थी। • संस्थागत मंच और सहायता: बिहार सरकार की जीविका परियोजना ने इन ग्रामीण महिलाओं के कौशल को चिन्हित कर उन्हें स्वयं सहायता समूहों और सिक्की उत्पादक समूहों (पीजी) से जोड़ा। इसके साथ ही काम शुरू करने के लिए आसान ऋण उपलब्ध कराया गया। • कच्चे माल की स्थानीय उपलब्धता: नजदीकी जंगलों से प्राकृतिक सिक्की घास आसानी से मिल जाती है, जिसे काटकर, सुखाकर और रंगकर कम लागत में टिकाऊ वस्तुएं बनाई जा सकती हैं। स्थानीय संसाधन होने से उत्पादन लागत न्यूनतम रहती है। • प्रदर्शनी स्टॉल और डिजिटल पहुंच: सरस मेला, सोनपुर मेला और गांधी मैदान जैसे बड़े आयोजनों में सरकार द्वारा स्टॉल उपलब्ध कराए जाने और ऑनलाइन ऑर्डर मिलने से उत्पादों को बड़ा खरीदार वर्ग मिला, जिससे घरेलू हुनर लाभदायक व्यवसाय में बदल गया। सवाल-जवाब 1. सिक्की घास से बने उत्पाद किन-किन प्रमुख स्थानों पर बेचे जा रहे हैं? ये उत्पाद पटना के गांधी मैदान में आयोजित सरस मेला, सोनपुर मेला और विभिन्न सरकारी प्रदर्शनियों के स्टॉल पर बेचे जाते हैं, साथ ही इन्हें ऑनलाइन माध्यमों से भी बेचा जा रहा है। 2. बरेजा गांव की महिलाएं सिक्की घास से कौन-कौन से सामान तैयार करती हैं? महिलाएं सिक्की घास से कानों की बालियां, चूड़ियां, हेयर बैंड, फूल डालिया, दौड़ी और कई पारंपरिक सजावटी वस्तुएं तैयार करती हैं। 3. सिक्की घास से उत्पाद बनाने की प्रारंभिक प्रक्रिया क्या है? कारीगर पहले जंगल से सिक्की घास काटकर लाते हैं, फिर उसे अच्छी तरह सुखाते हैं और सूखने के बाद उस पर रंग चढ़ाकर हाथों से उत्पाद तैयार करते हैं। 4. हाल ही के सरस मेले में महिला समूह ने कितनी बिक्री दर्ज की? हाल ही के सरस मेले के दौरान महिला समूह ने अपने सिक्की उत्पादों से 45 हजार रुपये की कुल बिक्री हासिल की। 5. ग्रामीण महिलाओं को इस काम के लिए किस सरकारी संस्था से सहयोग मिला? महिलाओं को जीविका योजना और एस जे वाई समूह के माध्यम से संगठित किया गया और काम शुरू करने के लिए ऋण सहायता उपलब्ध कराई गई। प्रेरणा और सबक बरेजा गांव की महिलाओं ने साबित किया है कि घरेलू पारंपरिक कला और सामूहिक सहयोग के दम पर अभावों को आत्मनिर्भरता में बदला जा सकता है। • पारंपरिक ज्ञान का मुद्रीकरण: अपने पुस्तैनी हुनर को केवल घर के कामकाज तक सीमित रखने के बजाय उसे व्यावसायिक अवसर में बदलना आर्थिक प्रगति का पहला कदम है। • समूह शक्ति और संगठन: अकेले काम करने के बजाय स्वयं सहायता समूह और जीविका जैसी संस्थाओं से जुड़कर काम करने से वित्तीय ऋण और बड़े बाजार तक पहुंच आसान हो जाती है। • परिवर्तन और नए रास्ते अपनाना: पारंपरिक मेलों में स्टॉल लगाने के साथ-साथ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ऑर्डर स्वीकार करना यह सिखाता है कि समय के साथ डिजिटल साधनों को अपनाना व्यवसाय को निरंतरता देता है। https://trendkia.com/success-stories/chhapara-ke-ganvon-men-sikki-ghasa-ki-parnparika-karigari-bani-mahilaon-ki-kamai-ka-bara-jariya-46044 TrendKia — Har trend, sabse pehle.