छतरपुर के गोरा बसोर का पोल्ट्री फार्म मॉडल, गांव लौटकर मुर्गी पालन से हर महीने कमा रहे एक लाख रुपये मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के गोरा बसोर ने शहरों की मजदूरी छोड़कर गांव में 15 हजार वर्ग फीट का पोल्ट्री फार्म शुरू किया है। 30 दिन के उत्पादन चक्र और बेहतर प्रबंधन से वे हर महीने एक लाख रुपये की कमाई कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के निवासी गोरा बसोर की कहानी ग्रामीण भारत में स्वरोजगार और आर्थिक स्वावलंबन का एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करती है। कभी रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे राज्यों के शहरों में मजदूरी करने वाले गोरा के लिए अपने परिवार का पालन-पोषण करना एक कठिन संघर्ष था। शहरों की अनिश्चित और श्रमसाध्य जिंदगी से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने अपने गांव वापस लौटने का निर्णय लिया। गांव में उपलब्ध भूमि का उपयोग करते हुए उन्होंने व्यवसायिक स्तर पर मुर्गी पालन की शुरुआत की। आज इस व्यवसाय के माध्यम से वे सभी खर्च और लागत निकालने के बाद हर महीने लगभग एक लाख रुपये का शुद्ध लाभ कमा रहे हैं और ग्रामीण युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। शहर की मजदूरी से गांव के स्वरोजगार तक का बदलाव शहरों में मजदूरी करते समय गोरा बसोर को हर महीने मात्र 15 से 20 हजार रुपये की आय प्राप्त होती थी। इस सीमित कमाई में परिवार की दैनिक आवश्यकताओं, राशन और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा करना बेहद मुश्किल हो जाता था। आर्थिक तंगी से परेशान गोरा किसी ऐसे विकल्प की तलाश में थे जिससे गांव में रहकर ही बेहतर आय अर्जित की जा सके। इसी दौरान शहर में रह रहे उनके एक मित्र ने उन्हें पोल्ट्री फार्मिंग यानी मुर्गी पालन का व्यवसाय शुरू करने का सुझाव दिया और उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। गोरा बसोर के परिवार में पहले पारंपरिक रूप से सुअर पालन का काम किया जाता था, लेकिन मुर्गी पालन के क्षेत्र में उनका कोई पूर्व अनुभव नहीं था। इसके अतिरिक्त, व्यवसाय शुरू करने के लिए उनके पास पर्याप्त पूंजी का अभाव था। इस समस्या का समाधान निकालने के लिए उन्होंने अपने मित्र के साथ साझेदारी (पार्टनरशिप) में व्यापार शुरू करने की योजना बनाई। व्यापार में कदम रखने से पहले गोरा ने मुर्गी पालन से जुड़ा बाकायदा प्रशिक्षण प्राप्त किया, ताकि तकनीकी जानकारी के अभाव में नुकसान न उठाना पड़े। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्होंने गांव की खाली पड़ी जमीन पर लगभग 15 हजार वर्ग फीट का विशाल शेड तैयार करवाया। वर्तमान में उनके इस शेड में एक साथ लगभग 10 हजार मुर्गे तैयार करने की क्षमता है। चूजों की देखभाल, खुराक और मौसमी सावधानियां मुर्गी पालन के सुचारू संचालन के लिए गोरा बाहर से मुर्गियों के छोटे बच्चों (चूजों) की खरीद करते हैं। एक छोटे चूजे की शुरुआती खरीद कीमत 50 रुपये होती है। अपनी हालिया गतिविधियों की जानकारी देते हुए वे बताते हैं कि पांच दिन पहले ही उन्होंने 5 हजार नए बच्चे खरीदे हैं। इससे पहले के 5 हजार तैयार मुर्गों की पूरी खेप वे बाजार में सफलतापूर्वक सप्लाई कर चुके हैं। पहली खेप बिकने के बाद खाली हुए दूसरे टीनशेड की वे अच्छी तरह सफाई कर रहे हैं ताकि नए बैच को वहां स्थानांतरित किया जा सके। छोटे चूजों के बेहतर विकास और स्वास्थ्य के लिए उनके खान-पान तथा पर्यावरण पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। शेड में चूजों को भोजन के तौर पर मक्के का दाना खिलाया जाता है। इसके साथ ही चूजों के लिए स्वच्छ और ताजा पानी उपलब्ध कराने की उत्तम व्यवस्था बनाई गई है। गोरा के अनुसार वर्तमान समय में नमी वाली बारिश और उमस भरी गर्मी का मौसम चल रहा है, ऐसे में पानी और शेड के तापमान पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक हो जाता है क्योंकि ये बच्चे अभी कुछ ही दिनों के बेहद छोटे और संवेदनशील हैं। वे सलाह देते हैं कि मुर्गी पालन हमेशा मौसम के अनुसार ही करना चाहिए, क्योंकि अत्यधिक गर्मी या अत्यधिक ठंड की स्थिति में चूजों के बीमार पड़ने और मरने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे भारी वित्तीय नुकसान हो सकता है। 30 दिनों का उत्पादन चक्र, लागत और शुद्ध मुनाफे का गणित गोरा बसोर बताते हैं कि मुर्गी पालन व्यवसाय की सबसे बड़ी खासियत इसका त्वरित उत्पादन चक्र है। शेड में चूजों को लाने के बाद केवल 30 दिनों की नियमित देखभाल और मेहनत की आवश्यकता होती है, जिसके बाद वे बाजार में बिक्री के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते हैं। चूजों को 30 दिन से अधिक समय तक शेड में रखना आर्थिक रूप से नुकसानदेह होता है क्योंकि एक महीने के बाद उनके दाने और रखरखाव पर लागत काफी बढ़ जाती है। इसी कारण 30 दिन पूरे होते ही उन्हें तुरंत बाजार में सप्लाई कर दिया जाता है। 30 दिन में तैयार एक चूजा औसतन 100 रुपये की कीमत पर बिकता है, हालांकि अंतिम मूल्य चूजे के शारीरिक वजन पर निर्भर करता है। व्यवसाय में लागत और मुनाफे के समीकरण को स्पष्ट करते हुए गोरा बताते हैं कि चूजे की खरीद, मक्के की खुराक और अन्य सभी रखरखाव खर्चों को निकालने के बाद प्रति चूजा लगभग 20 रुपये का शुद्ध मुनाफा बचता है। यदि 10 हजार चूजों के पूरे बैच में कोई चूजा मरता नहीं है और सभी सुरक्षित तैयार हो जाते हैं, तो एक बार में आसानी से लगभग 2 लाख रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित हो जाता है। इस अर्जित मुनाफे को गोरा और उनके पार्टनर आपस में बराबर बांट लेते हैं। इसके अलावा, चूजों के बिक जाने के बाद शेड में जमा होने वाले वेस्ट मटेरियल (मुर्गियों की बीट) की सफाई की जाती है। इस वेस्ट मटेरियल को फेंकने के बजाय आसपास के खेतों में जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे जमीन की उर्वरता बढ़ती है और कृषि कार्य में मदद मिलती है। इसका आप पर असर • भारत में: यह मामला दर्शाता है कि उचित प्रशिक्षण और साझेदारी मॉडल अपनाकर ग्रामीण युवा शहरों की कम वेतन वाली मजदूरी छोड़कर अपने गांव में ही सफल स्वरोजगार शुरू कर सकते हैं। • मध्य प्रदेश (छतरपुर) में: छतरपुर जिले के ग्रामीण युवा और किसान अपनी खाली जमीन पर पोल्ट्री शेड तैयार कर 30 दिनों के उत्पादन चक्र के जरिए बेहतर नियमित आय अर्जित कर सकते हैं। सवाल-जवाब 1. गोरा बसोर पहले क्या काम करते थे और उनकी मासिक आय कितनी थी? गोरा बसोर पहले दूसरे राज्यों के शहरों में मजदूरी करते थे, जहां वे हर महीने 15 से 20 हजार रुपये कमाते थे। 2. छतरपुर में उन्होंने कितना बड़ा पोल्ट्री शेड तैयार किया है? उन्होंने गांव की खाली जमीन पर लगभग 15 हजार वर्ग फीट का शेड बनाया है, जिसमें 10 हजार मुर्गे तैयार करने की क्षमता है। 3. एक चूजे को तैयार होने में कितना समय लगता है और वह कितने में बिकता है? चूजा 30 दिनों में बिकने के लिए तैयार हो जाता है और 30 दिन का तैयार चूजा औसतन 100 रुपये में बिकता है। 4. पोल्ट्री फार्मिंग में प्रति चूजा कितना शुद्ध लाभ होता है? खरीद, दाना और रखरखाव का सारा खर्च निकालने के बाद प्रति चूजा लगभग 20 रुपये का शुद्ध मुनाफा बचता है। 5. मुर्गियों के बच्चों की खुराक और देखभाल में किन बातों का ध्यान रखा जाता है? चूजों को मुख्य रूप से मक्के का दाना खिलाया जाता है, और अत्यधिक गर्मी या बरसात की उमस से बचाने के लिए पानी और शेड के तापमान का विशेष ध्यान रखा जाता है। प्रेरणा और सबक • प्रशिक्षण को प्राथमिकता देना: अनजान व्यवसाय में कदम रखने से पहले उसकी तकनीकी और व्यावहारिक बारीकियों का बाकायदा प्रशिक्षण लेना नुकसान की संभावना को समाप्त करता है। • साझेदारी (पार्टनरशिप) का सही उपयोग: सीमित पूंजी होने पर किसी भरोसेमंद सहयोगी के साथ पार्टनरशिप करके संसाधन और क्षमता बढ़ाना। • सटीक चक्र और लागत नियंत्रण: 30 दिनों के सटीक बाजार चक्र का पालन करना ताकि अतिरिक्त दाने और रखरखाव की लागत न बढ़े। • अपशिष्ट का पुनर्चक्रण (वेस्ट रीसाइक्लिंग): पोल्ट्री वेस्ट को खेतों में जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल करके कृषि उत्पादकता बढ़ाना। https://trendkia.com/success-stories/chhatarpur-ke-gora-basor-ka-poltri-pharma-modala-ganva-lautakara-murgi-palana-se-hara-mahine-kama-rahe-eka-lakha-rupaye-17065 TrendKia — Har trend, sabse pehle.