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  "type": "article",
  "title": "छतरपुर के संजय खरे पिछले 30 वर्षों से वकालत के साथ कर रहे दिव्यांग बच्चों की सेवा",
  "summary": "मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में रहने वाले 53 वर्षीय वकील संजय खरे पिछले तीन दशकों से अधिक समय से दिव्यांग बच्चों के जीवन को संवारने में जुटे हैं। वह प्रगतिशील दिव्यांग संस्था का संचालन कर रहे हैं, जहां बच्चों के रहने, खाने और पढ़ाई की पूरी व्यवस्था की जाती है।",
  "content": "मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में समाज सेवा की एक अनूठी मिसाल देखने को मिलती है, जहां पेशे से वकील 53 वर्षीय संजय खरे अपना पूरा जीवन दिव्यांग बच्चों की सेवा के लिए समर्पित कर चुके हैं। वह वर्तमान में प्रगतिशील दिव्यांग संस्था का संचालन कर रहे हैं, जिसके माध्यम से अब तक सैकड़ों दिव्यांग बच्चों का भविष्य संवारा जा चुका है। इस संस्था में छतरपुर के दूरदराज गांवों से बच्चे आते हैं और यहां उन्हें शिक्षा के साथ-साथ आवास और भोजन की भी सुविधा मिलती है।\n\nप्रगतिशील दिव्यांग संस्था की शुरुआत और सफर\nसंजय खरे बताते हैं कि वह महज 20 वर्ष की उम्र से ही दिव्यांग कल्याण से जुड़े कार्यों में सक्रिय हो गए थे। कॉलेज के दिनों में उनकी मुलाकात वकील निहाल अहमद सिद्दीकी से हुई थी, जो दुर्भाग्यवश दिव्यांग थे और उन्होंने ही इस संस्था की नींव रखी थी। उम्र में बड़े होने के बावजूद दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी और उन्होंने मिलकर साल 1986 में इस दिव्यांग संस्था की शुरुआत की थी। इस संस्था से जुड़े हुए उन्हें 30 साल से अधिक का समय हो चुका है। शुरुआत के दिनों में यह संस्था एक टीन शेड और कच्ची कुटिया से चलाई जाती थी।\n\nपत्रकारिता और वकालत के बीच समाज सेवा\nसंस्था के शुरुआती दिनों के संघर्ष को याद करते हुए संजय बताते हैं कि निहाल अहमद सिद्दीकी एक साहित्यिक व्यक्ति थे जो कविताएं लिखते थे और बाद में पत्रकारिता से भी जुड़ गए थे। इसी दौरान संजय ने अपनी एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। समय के साथ जब कविताओं का दौर पीछे छूटा, तो उन्होंने वकालत को अपना पेशा बना लिया। अपनी व्यस्त दिनचर्या के बावजूद वह रोज सुबह और शाम दिव्यांग संस्था में समय बिताते थे और वहां की व्यवस्थाओं की देखरेख करते थे। हालांकि कुछ समय बाद निहाल अहमद सिद्दीकी का निधन हो गया, लेकिन इस नेक काम का सिलसिला थमता नहीं देखा गया।\n\nआकाशवाणी और वकालत के साथ संस्था का संचालन\nआज भी संजय खरे वकालत के अपने पेशे और आकाशवाणी में अनाउंसर की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ इस संस्था को पूरी निष्ठा से चला रहे हैं। पिछले तीन दशकों से लगातार वह दिव्यांग बच्चों के लिए भोजन, रहने के स्थान और पढ़ाई-लिखाई का पूरा इंतजाम करते आ रहे हैं। उनका यह सफर इस बात का प्रमाण है कि मजबूत इरादों के साथ हर कठिनाई को पार किया जा सकता है।\n\nजनसहयोग से खड़े किए गए संसाधन\nइस संस्था को इस मुकाम तक पहुंचाने के बारे में संजय बताते हैं कि शुरुआती दौर में इसे चलाने के लिए शहर के हर छोटे-बड़े व्यक्ति से संपर्क किया गया था। उस समय किसी तरह की सरकारी सहायता नहीं मिलती थी, इसलिए स्थानीय अधिकारियों, नेताओं और आम नागरिकों से मदद मांगनी पड़ी थी। शहरभर में घूम-घूमकर सहयोग जुटाया गया और उसी के सहारे इस संस्था को आगे बढ़ाया गया।\n\nपरिवार की तरह रखते हैं बच्चों का ख्याल\nसंजय खुद को कोई बहुत बड़ा समाजसेवी नहीं मानते हैं। उनका मानना है कि यहां रहने वाले बच्चे कोई पराए नहीं हैं, बल्कि वे उन्हें अपने ही घर के बच्चों की तरह मानते हैं। वह अपना खाली समय और दिनचर्या ठीक उसी तरह इन बच्चों के साथ बिताते हैं जैसे कोई पिता अपने बच्चों के साथ गुजारता है।\n\nसरकारी सहायता और आगे की राह\nवर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी देते हुए वह बताते हैं कि निरीक्षण के दौरान मिलने वाले बच्चों की संख्या के आधार पर सरकार प्रति बच्चे एक हजार रुपये देती है, जबकि बाकी का खर्च संस्था खुद उठाती है। फिलहाल इस संस्था में 32 बच्चे रह रहे हैं। हालांकि शुरुआती दौर में उन्हें सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिली थी, लेकिन संजय का यह संकल्प है कि वह भविष्य में भी इसी लगन के साथ दिव्यांग बच्चों के जीवन को बेहतर बनाते रहेंगे।\n\nइसका आप पर असर\nयह खबर समाज सेवा और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में व्यक्तिगत प्रयासों के महत्व को दर्शाती है।\n\n• घर के नजदीक सहायता: छतरपुर में: स्थानीय स्तर पर दिव्यांग बच्चों के परिवारों को आवास, भोजन और शिक्षा की एक मजबूत व्यवस्था मिलती है, जिससे माता-पिता का आर्थिक बोझ कम होता है।\n• सामानुकूल बदलाव: भारत में: यह पहल देश के अन्य हिस्सों में व्यक्तिगत या संस्थागत स्तर पर जरूरतमंद बच्चों के कल्याण के लिए काम करने वाले लोगों को प्रेरित करती है।\n• सरकारी योजनाएं: वित्तीय पहलू: इस प्रकार के संस्थानों को मिलने वाली सरकारी सहायता और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बारे में स्थानीय नागरिकों को जानकारी मिलती है।\n• सामजिक सहभागिता: दैनिक जीवन: आम नागरिकों के सहयोग से कैसे बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं, यह इस बात का एक सटीक उदाहरण है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह संस्था दशकों के निरंतर प्रयासों और स्थानीय जनसहयोग के आधार पर आज इस मुकाम पर पहुंची है।\n\n• शुरुआती परिस्थितियां: संसाधनों की कमी: शुरुआत में कोई सरकारी मदद न मिलने के कारण इस संस्था को पूरी तरह से शहर के लोगों, अधिकारियों और नेताओं के आपसी सहयोग से खड़ा किया गया था।\n• संस्थापकों का दृष्टिकोण: व्यक्तिगत जुड़ाव: निहाल अहमद सिद्दीकी और संजय खरे के बीच की गहरी मित्रता और समाज सेवा के प्रति उनके समर्पण ने इस कार्य को पिछले तीन दशकों से अधिक समय तक जीवित रखा।\n• सरकारी सहायता का दायरा: वित्तीय मॉडल: निरीक्षण के आधार पर मिलने वाली प्रति बच्चे एक हजार रुपये की सरकारी राशि और संस्था का अपना योगदान मिलकर बच्चों के खर्चों को संभालता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. संजय खरे किस जिले से संबंधित हैं और उनका पेशा क्या है?\nसंजय खरे मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से हैं और पेशे से एक वकील हैं।\n\n2. वह किस संस्था का संचालन करते हैं?\nवह प्रगतिशील दिव्यांग संस्था का संचालन करते हैं।\n\n3. इस दिव्यांग संस्था की शुरुआत कब हुई थी?\nइस संस्था की शुरुआत वर्ष 1986 में हुई थी।\n\n4. संजय खरे इस संस्था से कितने वर्षों से जुड़े हैं?\nवह पिछले 30 वर्षों से अधिक समय से इस संस्था से जुड़े हुए हैं।\n\n5. संस्था की शुरुआत में इसे कैसे चलाया गया था?\nशुरुआत में सरकारी मदद न मिलने के कारण शहर के लोगों, अधिकारियों और नेताओं से मदद मांगकर इसे आगे बढ़ाया गया था।\n\n6. वर्तमान में संस्था में कितने बच्चे रह रहे हैं?\nवर्तमान में इस संस्था में 32 बच्चे रह रहे हैं।\n\n7. सरकार की तरफ से बच्चों के लिए कितनी राशि दी जाती है?\nनिरीक्षण के दौरान मिलने वाले बच्चों के मुताबिक सरकार प्रति बच्चे एक हजार रुपये देती है।\n\nप्रेरणा और सबक\nसंजय खरे का यह जीवन सफर उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो समाज में बदलाव लाना चाहते हैं।\n\n• दीर्घकालिक प्रतिबद्धता: निरंतरता: किसी भी बड़े सामाजिक कार्य को सफल बनाने के लिए वर्षों तक बिना थके लगातार प्रयास करते रहना जरूरी है।\n• व्यक्तिगत अपनत्व: संवेदना: जरूरतमंदों की सेवा केवल जिम्मेदारी मानकर नहीं, बल्कि उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानकर करनी चाहिए।\n• शून्य से शुरुआत: संसाधन जुटाना: शुरुआती दौर में संसाधनों की कमी होने पर भी जनसहयोग और दृढ़ इच्छाशक्ति से बड़े लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।\n• पेशे के साथ संतुलन: समय प्रबंधन: अपने मुख्य पेशे या करियर को संभालते हुए भी समाज कल्याण के लिए समय निकाला जा सकता है।",
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  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-10-28",
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