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  "type": "article",
  "title": "चित्रकूट के सेवानिवृत्त शिक्षक नथूराम ने जैविक खेती से बदली अपनी किस्मत, 18 बीघे में विविध फसलें उगाकर हर साल कमा रहे चार लाख रुपये",
  "summary": "चित्रकूट के बैहार गांव में एक सेवानिवृत्त शिक्षक ने रासायनिक खाद छोड़कर जैविक खेती अपनाई है और वे साल में 4 लाख रुपये तक की कमाई कर रहे हैं।",
  "content": "बुंदेलखंड क्षेत्र का चित्रकूट जिला लंबे समय से पानी की भारी किल्लत और सिंचाई के पर्याप्त साधनों की कमी के कारण कृषि के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ माना जाता रहा है। इस पथरीली और पथरीले मिजाज वाली भूमि पर खेती करना किसी भी किसान के लिए एक बड़ी चुनौती से कम नहीं है। लेकिन इसी कठिन परिस्थिति के बीच बैहार गांव के निवासी नथूराम ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से एक बिल्कुल अलग राह चुनी है। उन्होंने पारंपरिक रासायनिक खेती के नुकसान को समझते हुए उसे पूरी तरह त्याग दिया और जैविक खेती को अपना आधार बनाया। आज वे अपने 18 बीघे के विशाल खेत में नींबू की बागवानी के साथ-साथ कई प्रकार की अन्य फसलों को सफलतापूर्वक उगाकर क्षेत्र के किसानों के लिए एक मार्गदर्शक बन चुके हैं।\n\n \n\nसेवानिवृत्ति के बाद शुरू किया मिट्टी से जुड़ा नया सफर\n\nनथूराम पहले एक सरकारी शिक्षक के रूप में शिक्षा क्षेत्र में अपना योगदान दे रहे थे। सेवानिवृत्ति की आयु पूरी होने के बाद उन्होंने खाली बैठने के बजाय मिट्टी की सेवा करने का मन बनाया और खेती को ही अपना पूर्णकालिक कार्य चुन लिया। साल 2022 में उन्होंने अपनी करीब 18 बीघे कृषि भूमि पर जैविक तरीके से खेती करने की शुरुआत की। वर्तमान समय में उनके खेत में नींबू के 150 से अधिक पेड़ लहलहा रहे हैं। इस सफर की शुरुआत के बारे में बात करते हुए वे बताते हैं कि उन्होंने इन नींबू के पौधों को महज 5 रुपये प्रति पौधे की बेहद किफायती दर पर खरीदा था। नींबू की इस शानदार बागवानी के अतिरिक्त उन्होंने खेत के बाकी हिस्सों में मौसम के अनुकूल कई अन्य फसलें भी लगा रखी हैं।\n\n \n\nविशेष प्रशिक्षण से मिला जैविक खेती का व्यावहारिक ज्ञान\n\nनथूराम के अनुसार, रासायनिक खादों को छोड़कर पूरी तरह प्राकृतिक तरीकों को अपनाने की प्रेरणा उन्हें झांसी के चिरगांव स्थित राजकीय कृषि विद्यालय में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम से मिली थी। वहां उन्होंने तीन दिनों के एक गहन कृषि प्रशिक्षण शिविर में भाग लिया था। इस प्रशिक्षण के दौरान कृषि विशेषज्ञों ने उन्हें जैविक खाद बनाने की प्रामाणिक विधियां सिखाईं, फसलों में प्राकृतिक खादों के उपयोग की तकनीक बताई और पर्यावरण के अनुकूल खेती करने के व्यावहारिक पहलुओं से परिचित कराया। इस शिक्षा से प्रभावित होकर उन्होंने अपने खेतों में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का छिड़काव धीरे-धीरे कम करते हुए अंततः इसे पूरी तरह बंद कर दिया।\n\n \n\nखेत पर ही प्राकृतिक जीवामृत का निर्माण\n\nअपने खेतों को उपजाऊ बनाए रखने के लिए नथूराम को बाजार से महंगी खादें खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वे अपनी जरूरत की पूरी जैविक खाद खुद अपने खेत पर ही तैयार करते हैं। इसके लिए वे देशी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और खेत की मिट्टी जैसी प्राकृतिक सामग्रियों का संतुलित मिश्रण बनाकर 'जीवामृत' तैयार करते हैं। इस तैयार जीवामृत का छिड़काव वे अपनी फसलों और नींबू के पौधों में नियमित रूप से करते हैं। उनका अनुभव है कि जैविक खेती के शुरुआती दौर में किसान को थोड़ी अतिरिक्त शारीरिक मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, मिट्टी की आंतरिक गुणवत्ता और बनावट में अद्भुत सुधार होता है। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ती है और अंततः फसलों का उत्पादन भी तेजी से सुधरता है।\n\n \n\nविविध फसलों और बागवानी से सालभर सुनिश्चित आय\n\nनथूराम ने अपने 18 बीघे के खेत को किसी एक फसल के भरोसे नहीं छोड़ा है। वे सालभर मौसम के बदलाव के अनुसार विभिन्न प्रकार की फसलें उगाते हैं। रबी के सीजन में वे अपने खेतों में गेहूं, सरसों और चना की अच्छी पैदावार ले चुके हैं। वहीं, खरीफ के सीजन के दौरान वे मक्का, ज्वार, बाजरा, अरहर और तिल की खेती करते हैं। मुख्य फसलों के अलावा उनके खेत में नींबू के पेड़ों के साथ-साथ आम, मुसंबी और सेब जैसे कई अन्य फलदार पौधे भी लगाए गए हैं, जो अब धीरे-धीरे बड़े हो रहे हैं। इन सभी बहुआयामी फसलों और बागवानी के मिश्रण से उन्हें सालाना लगभग 4 लाख रुपये की शानदार आमदनी प्राप्त हो रही है।\n\n \n\nसमाज को जहर मुक्त भोजन देने का संकल्प\n\nनथूराम का कहना है कि जैविक विधि से तैयार किए गए फलों और अनाजों की बाजार में अत्यधिक मांग रहती है और लोग इनके लिए अच्छे दाम देने को भी तैयार रहते हैं। अपनी इस सफलता के बाद वे केवल खुद तक ही सीमित नहीं रहे हैं। वे आसपास के गांवों के अन्य किसानों को भी जैविक खेती की ओर मोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। वे किसानों को मुफ्त में जैविक खाद बनाने की विधि सिखाते हैं और उन्हें प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उनका मानना है कि रसायन मुक्त शुद्ध अनाज और फलों का सेवन करने से मानव शरीर को कई गंभीर बीमारियों से बचाया जा सकता है, इसलिए वे समाज के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के उद्देश्य से इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।\n\nइसका आप पर असर\nजैविक खेती के इस सफल मॉडल से किसानों को कम लागत में अधिक मुनाफा कमाने और उपभोक्ताओं को रसायन मुक्त स्वस्थ भोजन प्राप्त करने का मार्ग मिलता है।\n\n• बुंदेलखंड क्षेत्र में: यहाँ के किसान सिंचाई और पानी की कमी जैसी विषम परिस्थितियों में भी इस कम लागत वाले टिकाऊ मॉडल को अपनाकर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं। वे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से जीवामृत तैयार कर रासायनिक खादों पर होने वाले बड़े खर्च को बचा सकते हैं।\n\n• देशभर के किसानों के लिए: यह मॉडल साबित करता है कि पारंपरिक रासायनिक खेती को छोड़कर मिश्रित जैविक बागवानी अपनाना दीर्घकालिक रूप से अत्यधिक फायदेमंद है। विविध फसलों के चुनाव से बाजार के उतार-चढ़ाव और फसल खराब होने के जोखिम को बहुत हद तक कम किया जा सकता है।\n\n• आम उपभोक्ताओं के लिए: रसायन मुक्त और जैविक रूप से उगाए गए फल और अनाज बाजार में आसानी से मिलने से लोगों को गंभीर बीमारियों से बचने में मदद मिलेगी। शुद्ध प्राकृतिक खाद्य पदार्थों के सेवन से लोगों का स्वास्थ्य बेहतर होगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nनथूराम द्वारा जैविक खेती अपनाने और इसमें सफलता हासिल करने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण और सहायक परिस्थितियां रही हैं।\n\n• शिक्षण कार्य से सेवानिवृत्ति: सरकारी शिक्षक के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद नथूराम खेती को एक नए नजरिए से देखना चाहते थे। खाली समय का सदुपयोग करने और समाज के लिए कुछ उपयोगी करने की इच्छा ने उन्हें इस क्षेत्र में सक्रिय किया।\n\n• विशेषज्ञ मार्गदर्शन और प्रशिक्षण: उन्हें झांसी के चिरगांव स्थित राजकीय कृषि विद्यालय में तीन दिवसीय प्रशिक्षण मिला। इस प्रशिक्षण सत्र ने उन्हें जैविक खाद बनाने की प्रामाणिक विधि सिखाई और उनका आत्मविश्वास बढ़ाया।\n\n• मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने की आवश्यकता: रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की घटती उपजाऊ क्षमता को रोकने के लिए उन्होंने जैविक खेती का विकल्प चुना। जीवामृत का उपयोग करके मिट्टी को प्राकृतिक रूप से समृद्ध करना ही उनकी सफलता का मुख्य कारण बना।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. नथूराम ने जैविक खेती की शुरुआत कब की और वे पहले क्या काम करते थे?\nनथूराम ने साल 2022 में जैविक खेती की शुरुआत की थी। वे पहले एक सरकारी शिक्षक के रूप में कार्यरत थे और सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने खेती को अपना मुख्य व्यवसाय बनाया।\n\n2. वे अपने खेत में कौन-कौन सी फसलें उगाते हैं?\nवे रबी सीजन में गेहूं, सरसों और चना उगाते हैं, जबकि खरीफ सीजन में मक्का, ज्वार, बाजरा, अरहर और तिल की खेती करते हैं। इसके अलावा वे नींबू, आम, मुसंबी और सेब के पेड़ भी लगाते हैं।\n\n3. नथूराम जैविक खेती के लिए खाद कहाँ से लाते हैं?\nवे बाहर से महंगी रासायनिक खाद खरीदने के बजाय अपने खेत पर ही गोबर, गुड़ और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग करके 'जीवामृत' नाम से जैविक खाद तैयार करते हैं।\n\n4. जैविक खेती से उनकी सालाना आमदनी कितनी हो जाती है?\nअपनी विविध फसलों और नींबू की बागवानी के जरिए नथूराम को सालाना लगभग 4 लाख रुपये की आमदनी प्राप्त होती है।\n\n5. उन्हें जैविक खेती करने की प्रेरणा कहाँ से मिली थी?\nउन्हें झांसी के चिरगांव में स्थित राजकीय कृषि विद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर से जैविक खेती करने की प्रेरणा और आवश्यक तकनीक की जानकारी मिली थी।\n\nप्रेरणा और सबक\nनथूराम का यह सफर साबित करता है कि लगन और सही तकनीक के सहारे जीवन के किसी भी पड़ाव पर सफलता की नई कहानी लिखी जा सकती है।\n\n• उम्र केवल एक संख्या है: सेवानिवृत्ति के बाद नई शुरुआत करना यह दिखाता है कि सीखने और काम करने की कोई उम्र नहीं होती। एक पूर्व शिक्षक ने अपनी दूसरी पारी में कृषि उद्यमी बनकर मिसाल कायम की।\n\n• कम निवेश में बड़ा मुनाफा: केवल 5 रुपये की मामूली दर पर नींबू के पौधे खरीदकर और घर पर ही खाद बनाकर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि भारी-भरकम पूंजी के बिना भी सफल बिजनेस खड़ा किया जा सकता है।\n\n• फसलों का विविधीकरण: एक ही फसल पर निर्भर न रहकर रबी और खरीफ की कई फसलों के साथ-साथ फलों की बागवानी करना आय की निरंतरता सुनिश्चित करता है।\n\n• ज्ञान का प्रसार करना: अपनी सफलता को केवल खुद तक सीमित न रखकर दूसरे किसानों को प्रशिक्षित करना ही एक सच्चे मार्गदर्शक की पहचान है।",
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  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-09-18",
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    "जैविक खेती",
    "चित्रकूट",
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