दरभंगा के मेले में स्कूल के बाद कचरी बेचकर मां और दादी का हाथ बंटा रही नन्हीं कल्पना कुमारी दरभंगा के ग्रामीण मेले में नन्हीं कल्पना कुमारी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपनी मां और दादी की कचरी की दुकान संभालकर दिव्यांग पिता के परिवार का सहारा बन रही है। गांवों में लगने वाले पारंपरिक मेले केवल चकाचौंध, विशाल झूले और खिलौनों की खरीदारी तक सीमित नहीं होते, बल्कि इनकी रौनक के पीछे कई ऐसे परिवारों की कड़ी मेहनत छुपी होती है जिनका पूरा साल इन्हीं आयोजनों की कमाई पर निर्भर करता है। दरभंगा के ऐसे ही एक ग्रामीण मेले में जहां चारों ओर कचरी, मूढ़ी, झिल्ली, पकौड़े और बड़ी की खुशबू फैली है, वहां एक छोटी सी दुकान पर बैठी नन्हीं कल्पना कुमारी आने-जाने वाले हर शख्स की नजरों को अपनी ओर खींच रही है। बहुत छोटी उम्र में ही यह बच्ची अपनी पढ़ाई के साथ-साथ परिवार की आजीविका में कंधे से कंधा मिलाकर साथ दे रही है। दिव्यांग पिता और परिवार की जिम्मेदारी कल्पना भले ही उम्र में अभी काफी छोटी है, लेकिन अपने घर की आर्थिक परिस्थितियों और जिम्मेदारियों को उसने बखूबी समझ लिया है। उसके पिता दिव्यांग हैं और इस वजह से घर को चलाने का पूरा भार उसकी मां और दादी के कंधों पर आ टिका है। परिवार की जीविका चलाने के लिए दोनों महिलाएं गांव के वार्षिक मेलों में कचरी और झिल्ली तलने का स्टॉल लगाती हैं। जैसे ही मेले का आयोजन शुरू होता है, कल्पना भी अपनी शिक्षा से समझौता किए बिना अपनी मां और दादी की मदद के लिए दुकान पर हाजिर हो जाती है। स्कूल के घंटों के बाद दुकान पर मोर्चा कल्पना की रोजमर्रा की दिनचर्या आम बच्चों के खेलकूद और मौज-मस्ती से बिल्कुल जुदा है। वह दिन के समय नियमित रूप से अपने स्कूल जाती है और पढ़ाई पूरी करके लौटते ही सीधे मेले में पहुंच जाती है। दुकान पर ग्राहकों को गरमा-गरम कचरी परोसनी हो, सामान पैक करना हो या फिर दुकान के रोजमर्रा के छोटे-मोटे इंतजाम करने हों, वह हर काम पूरी निष्ठा और तत्परता के साथ करती है। मेले में चारों तरफ बड़े-बड़े झूले और खिलौनों की सजी दुकानें लोगों को लुभाती हैं, मगर इसके बावजूद कल्पना की छोटी सी दुकान पर भी ग्राहकों की भारी भीड़ जमा रहती है। दुकान पर मिलने वाली पारंपरिक कचरी और खास आलू बम का अनोखा स्वाद मेले में आने वाले लोगों को बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। मेहनत में खुशी और ग्राहकों की सराहना अपनी इस दोहरी भूमिका पर कल्पना का कहना है कि उसे अपनी मां और दादी का हाथ बंटाने में बेहद खुशी मिलती है। वह मानती है कि पढ़ाई के साथ जब भी वक्त मिले, अपने परिवार के काम में सहयोग करना उसका कर्तव्य है। इतनी छोटी सी उम्र में काम के प्रति उसका ऐसा समर्पण और संजीदगी देखकर मेले में आने वाले खरीदार भी उसकी दिल से तारीफ करते नहीं थकते। कठिन घरेलू हालातों के बीच बिना किसी शिकायत के स्कूल की किताबों और दुकान के बीच संतुलन साधने का उसका यह जज्बा हर किसी को प्रभावित कर रहा है। छोटे कामगारों की सालभर की उम्मीद बनते हैं ग्रामीण मेले मेले में टहलने और वक्त बिताने आने वाले आम लोगों के लिए यह आयोजन कुछ घंटों के आमोद-प्रमोद का जरिया हो सकता है, परंतु छोटे विक्रेताओं और उनके परिजनों के लिए यह जीवनयापन की रीढ़ होता है। कचरी, झिल्ली, मूढ़ी और पकौड़े बनाकर बेचने वाले अनगिनत ग्रामीण परिवार पूरे बारह महीने इन मौकों की राह देखते हैं ताकि वे अपने परिवार के लिए जरूरी बचत जुटा सकें। मेले की चमक-दमक के पीछे इन्हीं परिवारों का पसीना और उज्ज्वल भविष्य की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। इसका आप पर असर यह समाचार दर्शाता है कि ग्रामीण मेलों में स्थानीय छोटे दुकानदारों से खरीदारी करने से सीधे तौर पर जरूरतमंद परिवारों की आजीविका को संबल मिलता है। • दरभंगा में: स्थानीय मेले में आने वाले आगंतुक ऐसी छोटी दुकानों से पारंपरिक खानपान खरीदकर दिव्यांग और संघर्षशील परिवारों को सीधे आर्थिक सहयोग दे सकते हैं। खरीदारों की छोटी सी भागीदारी भी इन मेहनती बच्चों की पढ़ाई और उनके परिवार के भरण-पोषण में बड़ा सहारा बनती है। • भारत में: देश भर के नागरिकों को यह संदेश मिलता है कि संगठित मॉल और बड़े आयोजनों के मुकाबले पारंपरिक मेलों के छोटे रेहड़ी-पटरी वालों से खरीदारी जमीनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करती है। इससे समाज के सबसे कमजोर तबके तक सीधे वित्तीय लाभ पहुंचता है और बच्चों की शिक्षा जारी रहने में मदद मिलती है। ऐसा क्यों हुआ यह स्थिति एक ग्रामीण परिवार में मुख्य कमाने वाले सदस्य के दिव्यांग होने और सीमित आजीविका के साधनों के कारण उत्पन्न हुई है। • घरेलू संकट: घर के मुखिया यानी पिता के दिव्यांग होने के कारण परिवार के सामने भरण-पोषण और नियमित आय का गहरा संकट खड़ा हो गया। इस मजबूरी ने घर की महिलाओं को आजीविका की पूरी कमान अपने हाथों में लेने के लिए विवश किया। • मौसमी अवसरों की तलाश: स्थायी रोजगार या नियमित व्यवसाय के अभाव में परिवार ने ग्रामीण मेलों में पारंपरिक खाद्य पदार्थों की अस्थायी दुकानें लगाने को ही कमाई का सबसे सुलभ विकल्प चुना। साल में लगने वाले ये मेले ही उनके लिए नकदी कमाने का मुख्य जरिया बनते हैं। • पारिवारिक सहयोग की जरूरत: मेले के दौरान ग्राहकों की भारी भीड़ और लगातार काम के दबाव के कारण मां और दादी को अतिरिक्त मदद की आवश्यकता थी, जिसे पूरा करने के लिए नन्हीं कल्पना ने स्कूल के बाद दुकान पर मोर्चा संभालना शुरू किया। सवाल-जवाब 1. कल्पना कुमारी कौन हैं और वह मेले में क्या करती हैं? कल्पना कुमारी दरभंगा की एक छोटी स्कूली छात्रा हैं, जो मेले में अपनी मां और दादी की कचरी और झिल्ली की दुकान संभालने में मदद करती हैं। 2. कल्पना को कम उम्र में दुकान पर क्यों बैठना पड़ता है? उनके पिता दिव्यांग हैं, जिसके कारण परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उनकी मां और दादी पर है, और कल्पना उनका हाथ बंटाती हैं। 3. कल्पना अपनी पढ़ाई और दुकान के काम का संतुलन कैसे बनाती हैं? वह दिन में नियमित रूप से स्कूल जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करती हैं और स्कूल के बाद शाम को मेले में दुकान के कामकाज में जुट जाती हैं। 4. मेले में कल्पना की दुकान पर कौन-से पकवान मिलते हैं? उनकी दुकान पर कचरी, झिल्ली, आलू बम और अन्य पारंपरिक तले हुए पकवान बेचे जाते हैं, जिन्हें ग्राहक खूब पसंद करते हैं। 5. छोटे दुकानदारों के लिए गांव के मेले क्यों महत्वपूर्ण होते हैं? गांव के मेले इन छोटे दुकानदारों के लिए साल भर की कमाई और आजीविका जुटाने का सबसे प्रमुख साधन होते हैं। प्रेरणा और सबक नन्हीं कल्पना का जीवन यह साबित करता है कि कठिन पारिवारिक हालात भी सच्ची लगन और कर्तव्यों के प्रति निष्ठा को डिगा नहीं सकते। • पढ़ाई और जिम्मेदारी में संतुलन: कल्पना ने कठिन परिस्थितियों का बहाना बनाए बिना अपनी स्कूली शिक्षा जारी रखी और साथ ही पारिवारिक दायित्व भी निभाए। इससे सीख मिलती है कि समय प्रबंधन से विषम परिस्थितियों में भी अपने सपनों और कर्तव्यों दोनों को निभाया जा सकता है। • श्रम के प्रति सम्मान: कम उम्र में दुकान पर काम करने में संकोच करने के बजाय उसने इसे खुशी और गर्व के साथ अपनाया। काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि परिवार की मदद करने की भावना ही व्यक्ति को सच्चा सम्मान दिलाती है। • सहानुभूति और पारिवारिक एकजुटता: पिता की दिव्यांगता और बड़ों के संघर्ष को देखकर अपनी जिम्मेदारियों को खुद आगे बढ़कर स्वीकार करना परिवार के प्रति सच्ची निष्ठा को दर्शाता है। आपसी सहयोग से ही परिवार बड़े से बड़े संकट को पार कर सकते हैं। https://trendkia.com/success-stories/darbhanga-ke-mele-men-skula-ke-bada-kachari-bechakara-man-aura-dadi-ka-hatha-bnta-rahi-nanhin-kalpana-kumari-40306 TrendKia — Har trend, sabse pehle.