# दीनदयाल उपाध्याय यूनिवर्सिटी के गेट पर चाय बेचकर तीन बहनें कर रहीं सिविल सेवा की तैयारी

> पिता के पक्षाघात के बाद गोरखपुर में चाय का स्टॉल संभालते हुए महराजगंज की तीन सगी बहनें यूपीएससी परीक्षा में सफल होने का सपना संजो रही हैं।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-10-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/deen-dayal-upadhyaya-university-ke-geta-para-chaya-bechakara-tina-bahanen-kara-rahin-sivila-seva-ki-taiyari-42199 · **Language:** Hindi
**Tags:** यूपीएससी तैयारी, गोरखपुर, दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, महराजगंज, प्रेरक कहानी, बिलीवर बिस्ट्रो, सिविल सेवा

उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले की तीन सगी बहनों ने घरेलू संकट और गंभीर आर्थिक तंगी के सामने झुकने के बजाय अपने दम पर हालात बदलने की राह चुनी है। वर्तिका, वंदिता और अवंतिका नाम की ये तीन बहनें गोरखपुर में दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के सामने चाय का स्टॉल चला रही हैं। दुकान संभालते हुए परिवार के खर्चों का बोझ उठाने के साथ ही तीनों बहनें देश की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा यानी यूपीएससी की तैयारी में पूरे समर्पण से जुटी हुई हैं। दिन के समय चाय की केतली संभालना और रात को किताबों के बीच घंटों बिताना अब इनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।

## पिता की बीमारी के बाद परिवार पर टूटा मुश्किलों का पहाड़
इन बहनों के परिवार की माली हालत पहले काफी स्थिर थी। उनके पिता रामसकल उपाध्याय महराजगंज की एक निजी कंपनी में बतौर ब्रांच मैनेजर कार्यरत थे, जिससे परिवार का जीवन सुचारु रूप से चल रहा था। हालात में यह बड़ा मोड़ वर्ष 2017 में आया, जब पिता को अचानक पैरालिसिस का दौरा पड़ा। इस गंभीर बीमारी की वजह से पिता की नौकरी चली गई और उनके लंबे इलाज में परिवार की सारी जमापूंजी खत्म हो गई। स्थिति इतनी विकट हो गई कि गांव की जमीन और खेत तक बेचने की नौबत आ गई थी। पिता के नियमित उपचार के लिए हर महीने 5 से 6 हजार रुपये की दवाइयों का इंतजाम करना और घर का रोजमर्रा का खर्च चलाना एक बड़ी चुनौती बन गया था। इसी आर्थिक संकट के कारण बड़े भाई शिवम को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और घर को सहारा देने के लिए टेलीकॉलर की नौकरी शुरू करनी पड़ी।

## आठ हजार रुपये की पूंजी से खड़ा किया चाय का स्टॉल
परिवार की बिगड़ती हालत को संभालने के लिए मंझली बहन वंदिता ने शुरुआत में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और कुछ अन्य छोटी-मोटी नौकरियां भी कीं, लेकिन इससे दवाइयों और घर के खर्चों की पूरी भरपाई नहीं हो पा रही थी। इसके बाद बहनों ने मिलकर एक टी स्टॉल खोलने का निर्णय लिया। शुरुआत में मां माधुरी इस विचार के पक्ष में नहीं थीं, क्योंकि उन्हें सामाजिक संकोच और लोगों की बातों का डर था। जब आर्थिक परेशानियां कम नहीं हुईं, तो तीनों बहनों ने मिलकर महज 8000 रुपये की बचत जुटाई और गोरखपुर विश्वविद्यालय के द्वार पर बिलीवर बिस्ट्रो नाम से चाय की दुकान की शुरुआत कर दी। आज विश्वविद्यालय आने-जाने वाले छात्र और स्थानीय लोग उनकी चाय व मैगी के स्वाद के साथ-साथ उनके कड़े संघर्ष की भी काफी सराहना करते हैं।

## कड़े अनुशासन से बंधी है बहनों की दिनचर्या
इन तीनों बहनों की दिनचर्या बेहद व्यस्त और अनुशासित है। सबसे बड़ी बहन 22 वर्षीय वर्तिका अपनी बीएससी की डिग्री पूरी कर चुकी हैं। वर्तिका सुबह 4 बजे उठकर घर के कामकाज संभालने के साथ-साथ शांत माहौल में करीब 5 से 6 घंटे तक अपनी पढ़ाई करती हैं। वहीं 21 साल की वंदिता और सबसे छोटी बहन 19 साल की अवंतिका दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय से ही बीए प्रथम वर्ष की पढ़ाई कर रही हैं। ये दोनों बहनें सुबह 7 बजे से लेकर शाम 7 बजे तक लगातार 12 घंटे यूनिवर्सिटी गेट पर स्टॉल की जिम्मेदारियां संभालती हैं ताकि परिवार को जरूरी आमदनी मिलती रहे।

## देर रात तक ऑनलाइन पढ़ाई और बड़े पदों पर पहुंचने का लक्ष्य
शाम को दुकान बंद करके लौटने और घर के बाकी काम पूरे करने के बाद तीनों बहनें पढ़ाई की मेज पर जुट जाती हैं। रात 12 बजे से लेकर देर रात 2 से 3 बजे तक ये बहनें यूट्यूब और विभिन्न ऑनलाइन माध्यमों के जरिए सिविल सेवा परीक्षा के पाठ्यक्रम की तैयारी करती हैं। परिवार की बड़ी बहन वर्तिका और सबसे छोटी बहन अवंतिका आईएएस अधिकारी बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही हैं, जबकि वंदिता का सपना भारतीय पुलिस सेवा में जाकर आईपीएस अधिकारी बनने का है। वर्तिका चर्चित प्रशासनिक अधिकारी सृष्टि देशमुख को अपना आदर्श मानती हैं। मुश्किल दौर में बेटियों के इस अदम्य साहस और एकजुटता पर माता-पिता को बेहद गर्व है।

## इसका आप पर असर
यह घटना दर्शाती है कि सीमित संसाधनों और पारिवारिक विपत्तियों के बावजूद युवा स्वरोजगार के जरिए अपनी उच्च शिक्षा और प्रतिस्पर्धी लक्ष्यों को जीवित रख सकते हैं।

- **उत्तर प्रदेश में:** गोरखपुर और महराजगंज क्षेत्र के विद्यार्थियों के लिए यह कहानी साबित करती है कि छोटे शहरों में भी स्थानीय स्तर पर काम करते हुए राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं की तैयारी संभव है। युवा सामाजिक संकोच को छोड़कर स्वावलंबन अपना रहे हैं।
- **आर्थिक स्वावलंबन:** गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवारों के लिए यह अनुभव दिखाता है कि कम पूंजी में शुरू किया गया छोटा व्यवसाय तात्कालिक खर्चों और चिकित्सा बिलों का सहारा बन सकता है। इससे युवाओं को उच्च शिक्षा छोड़ने के बजाय आजीविका और अध्ययन में संतुलन बनाने का रास्ता मिलता है।
- **डिजिटल शिक्षा का लाभ:** महंगे कोचिंग संस्थानों के अभाव में ऑनलाइन माध्यमों और यूट्यूब के जरिए दूरदराज के अभ्यर्थी भी सिविल सेवा जैसी कठिन परीक्षाओं का अध्ययन कर सकते हैं। यह मॉडल ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों के उन छात्रों के लिए बेहद उपयोगी है जो बड़े शहरों में जाने का खर्च नहीं उठा सकते।
- **सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव:** बेटियों द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर स्टॉल संभालना पारंपरिक सामाजिक झिझक को तोड़ने में मदद करता है। यह परिवारों को अपनी संतानों के आत्मनिर्भर फैसलों पर भरोसा करने के लिए प्रेरित करता है।

## ऐसा क्यों हुआ
वर्ष 2017 में पिता को आए गंभीर पैरालिसिस अटैक के बाद परिवार के एकमात्र आय स्रोत के अचानक बंद हो जाने से यह संकट उत्पन्न हुआ। लगातार इलाज के खर्च और घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए बहनों को चाय का स्टॉल शुरू करने का व्यावहारिक कदम उठाना पड़ा।

- **पिता की अचानक बीमारी:** परिवार के मुख्य कमाऊ सदस्य के पक्षाघात से पीड़ित होने के कारण उनकी नौकरी छूट गई। इसके चलते घर की नियमित आय पूरी तरह समाप्त हो गई।
- **गंभीर चिकित्सा और आर्थिक संकट:** पिता के उपचार और दवाओं पर हर महीने 5 से 6 हजार रुपये का निरंतर खर्च आ रहा था, जिसने परिवार की बचत खत्म कर दी और खेतों को बेचने पर मजबूर कर दिया। बड़े भाई की नौकरी और ट्यूशन से मिलने वाली राशि घर चलाने के लिए नाकाफी साबित हुई।
- **सपनों को जिंदा रखने की जिद:** सिविल सेवा परीक्षा की अपनी महत्वाकांक्षा को छोड़ने के बजाय बहनों ने स्वरोजगार चुनकर पढ़ाई के लिए समय और संसाधन दोनों जुटाने का रास्ता निकाला।

## सवाल-जवाब

### 1. तीनों बहनें गोरखपुर में कहां पर चाय का स्टॉल चलाती हैं?
तीनों बहनें गोरखपुर में दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के मुख्य गेट के सामने बिलीवर बिस्ट्रो नाम से चाय का स्टॉल चलाती हैं।

### 2. बहनों के परिवार पर आर्थिक संकट किस वजह से आया था?
वर्ष 2017 में पिता को पैरालिसिस का दौरा पड़ने से उनकी नौकरी छूट गई और उनके इलाज में बचत व खेत बिक जाने से परिवार पर आर्थिक संकट आ गया।

### 3. दुकान शुरू करने के लिए बहनों ने कितनी पूंजी लगाई थी?
बहनों ने अपनी बचत से महज 8000 रुपये जोड़कर इस चाय के स्टॉल की शुरुआत की थी।

### 4. तीनों बहनें किस परीक्षा की तैयारी कर रही हैं और उनके लक्ष्य क्या हैं?
तीनों बहनें यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रही हैं, जिसमें वर्तिका और अवंतिका आईएएस तथा वंदिता आईपीएस अधिकारी बनना चाहती हैं।

### 5. स्टॉल संभालने के साथ बहनें पढ़ाई के लिए समय कैसे निकालती हैं?
बड़ी बहन वर्तिका सुबह 4 बजे उठकर 5-6 घंटे पढ़ती हैं, जबकि दोनों छोटी बहनें दिन में दुकान संभालने के बाद रात 12 बजे से 3 बजे तक ऑनलाइन पढ़ाई करती हैं।

## प्रेरणा और सबक
कठिन परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने के बजाय अपनी मेहनत से रास्ते बनाने का यह सफर हर संघर्षशील युवा के लिए अनुकरणीय सीख देता है।

- **शर्म और सामाजिक डर से ऊपर उठना:** मां के विरोध और सामाजिक संकोच के बावजूद बहनों ने आजीविका के लिए चाय की दुकान खोली, जिससे साबित होता है कि काम कोई भी छोटा नहीं होता।
- **कड़ी समय-प्रबंधन क्षमता:** बारह घंटे स्टॉल पर बिताने के बाद भी देर रात 12 से 3 बजे तक पढ़ाई जारी रखना यह सिखाता है कि इच्छाशक्ति हो तो व्यस्त दिनचर्या में भी समय निकाला जा सकता है।
- **सीमित पूंजी में शुरुआत:** महज 8000 रुपये की छोटी बचत से उद्यम शुरू करके परिवार को सहारा देना यह दिखाता है कि बड़े कदमों के लिए भारी निवेश नहीं, बल्कि ठोस पहल की जरूरत होती है।
- **सपनों के प्रति अटूट निष्ठा:** गंभीर आर्थिक संकट के बीच भी आईएएस और आईपीएस बनने के बड़े लक्ष्य को न छोड़ना विपरीत समय में हौसला बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

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