धान छोड़ तिल बोया तो महज 1200 रुपये में लहलहाई फसल, बहराइच के किसान ने दिखाई मुनाफे की राह बहराइच के मिर्जापुर गांव निवासी बृजेश कुमार ने धान के सीजन में तिल बोकर खेती की लागत में भारी कटौती की है। कृषि विज्ञान केंद्र के परामर्श और हरी खाद के दम पर एक एकड़ से 5 क्विंटल पैदावार की उम्मीद बंधी है। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में आम तौर पर किसान धान, गेहूं और मक्का जैसी पारंपरिक फसलों के तय दायरे में बंधकर खेती करते हैं। ऐसे माहौल में मिर्जापुर गांव के रहने वाले किसान बृजेश कुमार ने एक नई सोच के साथ लीक से हटकर कदम उठाया है। उन्होंने मुख्य मानसूनी सीजन में धान की पारंपरिक रोपाई करने के बजाय तिल की बुवाई करने का फैसला किया। इस बदलाव ने न सिर्फ खेती में लगने वाली भारी पूंजीगत लागत को लगभग शून्य के करीब ला दिया, बल्कि कम से कम खर्च में कहीं अधिक शुद्ध मुनाफा कमाने का ठोस रास्ता भी खोल दिया है। हरी खाद और कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह से मिली नई दिशा इस अभिनव प्रयोग की शुरुआत बहराइच स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के तकनीकी मार्गदर्शन से हुई। केंद्र के कृषि वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने बृजेश कुमार को पारंपरिक फसल चक्र तोड़ने के लिए प्रेरित किया और तिल की उन्नत किस्म का बीज भी बिना किसी शुल्क के उपलब्ध कराया। वैज्ञानिकों ने उन्हें सबसे पहले खेत में ढैंचा बोकर हरी खाद तैयार करने का सुझाव दिया था। विशेषज्ञों की इस सलाह पर काम करते हुए किसान ने खेत में ढैंचा उगाया और फिर सही समय पर उसे मिट्टी में पलटवाकर जुतवा दिया। इसके तुरंत बाद उसी खेत में तिल के बीजों का छिड़काव कर दिया गया। खेती के कुल बजट पर बात करते हुए बृजेश कुमार ने स्पष्ट किया कि उन्हें बीज के लिए अपनी जेब से एक भी पैसा खर्च नहीं करना पड़ा, क्योंकि यह उन्हें कृषि विज्ञान केंद्र से निशुल्क हासिल हुआ था। उनका वास्तविक खर्च केवल दो बार खेत की गहरी जुताई कराने में लगा, जो कुल मिलाकर लगभग ₹1000 से ₹1200 के बीच रहा। सबसे खास बात यह रही कि पूरी फसल अवधि के दौरान किसी भी तरह की रासायनिक खाद या कृत्रिम कीटनाशक दवाओं का छिड़काव नहीं किया गया। रासायनिक उर्वरकों से पूरी तरह दूर रहने के चलते यह पूरी उपज स्वाभाविक रूप से शत-प्रतिशत ऑर्गेनिक यानी जैविक उत्पाद के रूप में तैयार हुई है। एक एकड़ में पांच क्विंटल उत्पादन और मजबूत बाजार की आस फिलहाल बृजेश कुमार के एक एकड़ खेत में तिल की फसल बेहद घनी, हरी-भरी और लहलहाती हुई नजर आ रही है। स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने मौके पर पहुंचकर खेत का मुआयना किया और पौधे के स्वस्थ विकास तथा फसल प्रबंधन की खुली तारीफ की। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह अनुमान लगाया गया है कि इस एक एकड़ के रकबे से लगभग 5 क्विंटल तिल की पैदावार आसानी से प्राप्त होगी। बाजार के समीकरणों को देखें तो तिल की मांग साल भर स्थिर बनी रहती है। विभिन्न खाद्य उत्पादों, पूजा सामग्री और तेल उद्योग में तिल की निरंतर जरूरत रहने से इसके दाम मजबूत बने रहते हैं। बृजेश की यह उपज पूरी तरह जैविक होने के कारण स्थानीय और बड़े बाजारों में सामान्य फसलों की तुलना में कहीं अधिक प्रीमियम भाव दिलाने की क्षमता रखती है, जिससे भारी मुनाफा मिलना तय माना जा रहा है। फसल विविधीकरण अपनाने की सलाह पारंपरिक खेती में बढ़ती लागत और घटते लाभ से परेशान रहने वाले अपने साथी किसानों को बृजेश कुमार ने फसल चक्र में बदलाव लाने की खुली सलाह दी है। उनका कहना है कि बहराइच के किसानों को साल दर साल केवल धान, गेहूं या मक्के के पुराने ढर्रे पर टिके रहने की विवशता छोड़नी चाहिए। इसके स्थान पर उन्हें तिल, सरसों और मसूर जैसी दलहनी तथा तिलहनी फसलों को अपने खेतों में प्राथमिकता देनी चाहिए। इन फसलों में पानी, खाद और कीटनाशकों का खर्च बेहद कम आता है, जबकि बाजार में इनकी स्थिर मांग की वजह से किसानों को कम जोखिम में शानदार मुनाफा हासिल होता है। इसका आप पर असर बहराइच के किसान का यह प्रयोग साबित करता है कि पारंपरिक फसल चक्र छोड़कर दलहन-तिलहन अपनाने से लागत में भारी कटौती और मुनाफे में बढ़ोतरी संभव है। • भारत में: धान-गेहूं के चक्र से बाहर निकलकर तिलहनी फसलों पर ध्यान देने से किसानों की खाद-पानी पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे उत्पादन लागत घटती है और देश में खाद्य तेलों की घरेलू आपूर्ति को मजबूती मिलती है। • बहराइच में: जिले के किसान भारी खर्च वाले धान के स्थान पर महज ₹1000-₹1200 में तिल जैसी नकदी फसल उगा सकते हैं। स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से निशुल्क बीज और वैज्ञानिक सलाह लेकर वे एक एकड़ से लगभग 5 क्विंटल तक पैदावार ले सकते हैं। • जैविक उत्पादकों के लिए: बिना कीटनाशक और रासायनिक उर्वरक तैयार की गई फसल बाजार में सामान्य से अधिक मूल्य दिलाती है। किसान सीधे स्थानीय मंडियों या जैविक खरीदारों से संपर्क कर अपनी उपज का बेहतर भाव तय कर सकते हैं। • खेत की सेहत पर: ढैंचा जैसी हरी खाद का उपयोग करने से मिट्टी में प्राकृतिक पोषक तत्व वापस लौटते हैं। रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता खत्म होने से भूमि की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। ऐसा क्यों हुआ धान की खेती में आने वाले भारी खर्च, सिंचाई की लगातार जरूरत और घटते मुनाफे को देखते हुए मिर्जापुर के किसान ने फसल चक्र में बदलाव किया। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने उन्हें कम पानी और बिना रसायन वाली तिल की फसल लेने की व्यावहारिक सलाह दी। • बढ़ती लागत और घटता लाभ: धान उगाने में जुताई, रोपाई, रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर बहुत ज्यादा पैसा खर्च होता है। इस आर्थिक दबाव से बचने के लिए किसान ने कम लागत वाला सुरक्षित विकल्प चुना। • कृषि वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन: बहराइच कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने पारंपरिक ढर्रे से हटकर ढैंचा की हरी खाद और तिल के बीजों की बुवाई का मॉडल सुझाया। उन्होंने किसान को निशुल्क बीज उपलब्ध कराकर प्रयोग को व्यावहारिक बनाया। • जैविक पद्धति का चयन: मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए ढैंचा जुतवाकर खेत तैयार किया गया और रसायनों का पूरी तरह त्याग किया गया। इससे फसल शत-प्रतिशत प्राकृतिक रही और उत्पादन लागत ₹1200 के भीतर सिमट गई। सवाल-जवाब 1. बहराइच के किसान बृजेश कुमार ने धान के स्थान पर कौन सी फसल उगाई? बृजेश कुमार ने मानसूनी सीजन में पारंपरिक धान की रोपाई के स्थान पर तिल की बुवाई की है। 2. तिल की खेती में किसान को कुल कितना खर्च उठाना पड़ा? फसल के बीज कृषि विज्ञान केंद्र से निशुल्क मिले थे, इसलिए किसान का कुल खर्च दो बार जुताई कराने में सिर्फ ₹1000 से ₹1200 आया। 3. इस खेत से कितने उत्पादन की संभावना जताई गई है? एक एकड़ के खेत से लगभग 5 क्विंटल तिल की पैदावार होने का अनुमान लगाया गया है। 4. तिल की बुवाई से पहले खेत में क्या उपाय किया गया था? वैज्ञानिकों के परामर्श पर किसान ने खेत में ढैंचा बोकर हरी खाद बनाई और उसे मिट्टी में पलटवाकर जुतवाया था। 5. क्या फसल में रासायनिक खाद या कीटनाशकों का प्रयोग हुआ है? नहीं, फसल में किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद या कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं हुआ है और यह पूरी तरह ऑर्गेनिक है। 6. बृजेश कुमार ने अन्य किसानों को क्या सलाह दी है? उन्होंने किसानों को धान-गेहूं के ढर्रे से निकलकर तिल, सरसों और मसूर जैसी कम लागत वाली तिलहनी व दलहनी फसलें अपनाने की सलाह दी है। प्रेरणा और सबक बृजेश कुमार की सफलता दर्शाती है कि सीमित संसाधनों और न्यूनतम लागत के बावजूद वैज्ञानिक सलाह पर चलकर खेती को फायदे का सौदा बनाया जा सकता है। • परंपरागत सोच से बाहर निकलें: सिर्फ धान और गेहूं के चक्र में फंसे रहने के बजाय बाजार की मांग वाली नकदी फसलों को अपनाएं। फसल विविधीकरण से आर्थिक जोखिम कम होता है। • वैज्ञानिक मार्गदर्शन का लाभ उठाएं: स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र और विशेषज्ञों की सलाह लेकर खेती करने से नई तकनीक और निशुल्क संसाधन आसानी से मिल जाते हैं। सही जानकारी लागत घटाने में मदद करती है। • कम लागत वाली जैविक विधियां अपनाएं: ढैंचा जैसी हरी खाद का उपयोग करके रासायनिक उर्वरकों का भारी खर्च पूरी तरह बचाया जा सकता है। प्राकृतिक तरीके से उगाई गई उपज बाजार में प्रीमियम भाव दिलाती है। • दलहन और तिलहन पर जोर दें: तिल, सरसों और मसूर जैसी फसलों में पानी और मेहनत कम लगती है जबकि मुनाफा स्थिर रहता है। कम खर्च में अधिक आय का यह सबसे व्यावहारिक मॉडल है। https://trendkia.com/success-stories/dhana-chhora-tila-boya-to-mahaja-1200-rupaye-men-lahalahai-phasala-bahraich-ke-kisana-ne-dikhai-munaphe-ki-raha-37659 TrendKia — Har trend, sabse pehle.