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  "title": "दो बैग से शुरू की खेती, सहारनपुर की दसवीं पास पूजा सैनी अब मशरूम से कमा रही हैं 20 लाख सालाना",
  "summary": "सहारनपुर की दसवीं पास पूजा सैनी ने केवल दो बैग से मशरूम की खेती शुरू की थी। आज वह हर साल 15 से 20 लाख रुपये की बचत कर रही हैं और अन्य महिलाओं के लिए मिसाल बनी हैं।",
  "content": "उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले की रहने वाली पूजा सैनी ने अपनी लगन और मेहनत से घरेलू कृषि व्यवसाय का एक नया मानक स्थापित किया है। केवल दसवीं कक्षा तक पढ़ाई करने के बावजूद उन्होंने साबित कर दिया है कि वित्तीय सफलता पाने के लिए बड़ी डिग्रियों से ज्यादा सही मार्गदर्शन, दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत की आवश्यकता होती है। शादी के बाद घर चलाने के लिए अपने पति के साथ मिलकर शुरू की गई मशरूम की खेती आज एक सफल कारोबारी मॉडल बन चुकी है। आज वह अपने घर से ही मशरूम का बड़े पैमाने पर उत्पादन करके हर साल 15 से 20 लाख रुपये की शुद्ध बचत कर रही हैं। उनकी यह उपलब्धि न केवल स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है, बल्कि उन अनगिनत महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है जो शादी के बाद गृहणी बनकर अपनी प्रतिभा को सीमित मान लेती हैं।\n\nकृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण और व्यावसायिक शुरुआत\nपूजा सैनी की इस व्यावसायिक यात्रा का शुभारंभ वर्ष 2018 में हुआ था। शादी होने के महज तीन महीने बाद उन्होंने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से अपने पति के साथ विचार-विमर्श किया। दोनों ने मिलकर घर पर ही मशरूम उत्पादन करने का निर्णय लिया। इस कार्य को वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से सीखने के लिए उन्होंने सहारनपुर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र का रुख किया और वहां से मशरूम उत्पादन की बारीकियों का प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्होंने प्रायोगिक तौर पर केवल दो बैग से मशरूम लगाने की शुरुआत की थी। उस समय उन्होंने यह कभी नहीं सोचा था कि यह छोटा सा प्रयास एक दिन विशाल व्यवसाय का रूप ले लेगा। समय के साथ उनकी लगन और मशरूम की गुणवत्ता के कारण मांग बढ़ती गई, जिससे आज उनके पास 5,000 से 6,000 मशरूम बैग का विशाल सेटअप मौजूद है।\n\nउत्पाद की तकनीक, विभिन्न किस्मों की खेती और लागत\nमशरूम उत्पादन की तकनीकी प्रक्रिया के बारे में बताते हुए पूजा सैनी ने स्पष्ट किया कि बैग तैयार करने के लिए मुख्य रूप से गेहूं के भूसे का उपयोग किया जाता है। भूसे का उचित उपचार करने के बाद उसमें मशरूम के बीजों की बिजाई की जाती है। एक मशरूम बैग को तैयार करने में लगभग 60 रुपये से लेकर 120 रुपये तक का कुल खर्च आता है। सही रखरखाव और उचित तापमान मिलने पर एक बैग से औसतन 3 किलो से 5 किलो तक ताजी मशरूम की पैदावार प्राप्त होती है। पूजा सैनी केवल पारंपरिक मशरूम तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वह बाजार की मांग को देखते हुए कई प्रकार की मशरूम किस्मों की खेती कर रही हैं। इनमें मुख्य रूप से बटन मशरूम, ओयस्टर मशरूम, मिल्की मशरूम, धींगरी मशरूम, पोर्टबेलो मशरूम और औषधीय गुणों से भरपूर कीड़ा जड़ी (कॉर्डिसेप्स) मशरूम शामिल हैं। विविध किस्मों के उत्पादन से उन्हें बाजार में बेहतर मूल्य हासिल करने में मदद मिलती है।\n\nफसल चक्र, बिक्री और बाजार में मांग\nमशरूम की खेती में फसल चक्र काफी त्वरित और लाभदायक होता है। बैग तैयार कर कमरे में रखने के महज 15 से 20 दिनों के भीतर मशरूम की पहली फसल निकलनी शुरू हो जाती है। इसके बाद एक बैग से लगभग तीन से चार महीने तक निरंतर मशरूम की तुड़ाई की जा सकती है। पूजा सैनी अपने उत्पादित मशरूम को 200 रुपये प्रति किलोग्राम के थोक एवं खुदरा भाव पर बेचती हैं। उनके द्वारा उगाए गए मशरूम की गुणवत्ता इतनी उत्तम है कि इसकी मांग केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है। सहारनपुर से यह मशरूम दिल्ली और देहरादून जैसे बड़े महानगरीय बाजारों में नियमित रूप से सप्लाई की जाती है। इन बड़े शहरों में ताजी और जैविक मशरूम की मांग इतनी अधिक रहती है कि वर्तमान उत्पादन क्षमता के बावजूद वे पूरी मांग को अकेले पूरा नहीं कर पाती हैं।\n\nसहारनपुर: उत्तर प्रदेश का नंबर वन मशरूम हब\nसहारनपुर जिले को पूरे उत्तर प्रदेश में मशरूम उत्पादन का प्रमुख केंद्र माना जाता है। उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में मशरूम उत्पादन के मामले में सहारनपुर पहला स्थान रखता है। इसका मुख्य कारण यहां की जलवायु और तापमान है, जो विभिन्न प्रकार की मशरूम प्रजातियों के विकास के लिए अत्यंत अनुकूल माना जाता है। इस प्राकृतिक अनुकूलता का लाभ उठाकर सहारनपुर के युवा और महिलाएं अपने घरों में रहकर ही मशरूम उत्पादन का व्यवसाय अपना रहे हैं। पूजा सैनी जैसी महिला उद्यमियों ने यह साबित कर दिया है कि बिना किसी बड़ी सरकारी नौकरी या महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर के भी घर के कमरों से लाखों रुपये की सालाना आय अर्जित की जा सकती है। उनका यह कदम ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो रहा है।\n\nइसका आप पर असर\nयह सफलता की कहानी घरेलू स्तर पर कृषि व्यवसाय और स्वरोजगार के व्यावहारिक अवसरों को उजागर करती है।\n\n• भारत भर में स्वरोजगार: कम पूंजी में मशरूम उत्पादन शुरू करके महिलाएं और युवा आत्मनिर्भर बन सकते हैं। मात्र 60 से 120 रुपये प्रति बैग की लागत लगाकर हर बैग से 3 से 5 किलो उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।\n• सहारनपुर और उत्तर प्रदेश में: स्थानीय मौसम और जलवायु मशरूम की विभिन्न किस्मों के लिए बेहद अनुकूल है। यहां के किसान कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लेकर अपनी आय में बड़ा इजाफा कर सकते हैं।\n• बाजार की संभावनाएं: उत्पादित मशरूम को 200 रुपये प्रति किलो के हिसाब से दिल्ली और देहरादून के बड़े बाजारों में आसानी से बेचा जा सकता है। इन शहरों में मांग हमेशा उत्पादन से अधिक बनी रहती है।\n• घरेलू स्तर पर शुरुआत: इस व्यवसाय को शुरू करने के लिए किसी अलग जमीन या बड़ी जगह की आवश्यकता नहीं होती। घर के एक कमरे से शुरुआत करके 15 से 20 दिनों में पहली फसल प्राप्त की जा सकती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. पूजा सैनी मशरूम की खेती से हर साल कितनी बचत कर रही हैं?\nपूजा सैनी मशरूम की खेती से हर साल 15 से 20 लाख रुपये की शुद्ध बचत कर रही हैं।\n\n2. उन्होंने मशरूम की खेती की शुरुआत कब और कितने बैग से की थी?\nउन्होंने वर्ष 2018 में अपनी शादी के 3 महीने बाद सहारनपुर कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लेकर केवल 2 बैग से शुरुआत की थी।\n\n3. एक मशरूम बैग तैयार करने में कितना खर्च आता है और उससे कितना उत्पादन होता है?\nएक बैग तैयार करने में 60 रुपये से 120 रुपये तक की लागत आती है, जिससे औसतन 3 से 5 किलोग्राम मशरूम प्राप्त होता है।\n\n4. पूजा सैनी मशरूम की कौन-कौन सी किस्मों की खेती करती हैं और उन्हें कहां बेचती हैं?\nवह बटन, ओयस्टर, मिल्की, धींगरी, पोर्टबेलो और कीड़ा जड़ी मशरूम उगाती हैं, जिसे 200 रुपये प्रति किलो की दर से दिल्ली और देहरादून में बेचा जाता है।\n\n5. उत्तर प्रदेश में मशरूम उत्पादन के मामले में सहारनपुर का क्या स्थान है?\nउत्तर प्रदेश के सभी जिलों में मशरूम उत्पादन के मामले में सहारनपुर पहला स्थान रखता है।\n\nप्रेरणा और सबक\nकम संसाधनों और सामान्य पृष्ठभूमि के बावजूद व्यावसायिक सफलता हासिल करने के प्रमुख सूत्र।\n\n• कम शिक्षा बाधा नहीं: पूजा सैनी केवल दसवीं पास हैं, लेकिन उन्होंने अपनी सीमित शिक्षा को कभी बाधा नहीं बनने दिया। सही हुनर और व्यावसायिक दृष्टि किसी भी औपचारिक डिग्री से अधिक प्रभावी साबित होती है।\n• छोटे स्तर से शुरुआत: भारी बजट का इंतजार करने के बजाय उन्होंने केवल 2 बैग से प्रयोग शुरू किया। शुरुआती जोखिम को कम रखकर काम सीखना ही सफलता का आधार बना।\n• पारिवारिक सहयोग और साझा प्रयास: शादी के बाद अपने पति के साथ विचार-विमर्श करके ट्रेनिंग ली। परस्पर सहयोग से काम की जिम्मेदारी बांटकर उन्होंने बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव बनाया।\n• घरेलू परिवेश में आत्मनिर्भरता: बाहर जाने के बजाय उन्होंने घर के भीतर से व्यवसाय संचालित किया। इससे न केवल 15 से 20 लाख रुपये की वार्षिक बचत हासिल हुई, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी रोजगार का मार्ग प्रशस्त हुआ।",
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  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-09-02",
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