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  "type": "article",
  "title": "गोंडा के 8वीं के छात्र दिवांशु ने संभाली किसानी, पढ़ाई के साथ मक्के की खेती से कमा रहे मुनाफा",
  "summary": "गोंडा जिले के तरबगंज ब्लॉक के रहने वाले आठवीं के छात्र दिवांशु मौर्य पढ़ाई के साथ मक्के की खेती कर रहे हैं। कम लागत में तैयार होने वाली उनकी इस फसल की बाजार में काफी मांग है और वे अच्छी कमाई कर रहे हैं।",
  "content": "उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में एक किशोर छात्र ने अपनी पढ़ाई के साथ खेती की दुनिया में अनूठी मिसाल पेश की है। जिले के तरबगंज ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले इलाके में रहने वाले आठवीं कक्षा के छात्र दिवांशु मौर्य ने अपनी स्कूली शिक्षा के साथ-साथ मक्के की खेती करने का जिम्मा उठाया है। उनकी फसल की शानदार बढ़वार को देखकर उन्हें इस बार बंपर पैदावार और मजबूत मुनाफे की पूरी उम्मीद है।\n\nदिवांशु मौर्य ने बातचीत के दौरान बताया कि वह आठवीं कक्षा के छात्र हैं और किताबी पढ़ाई के अलावा कृषि कार्यों में उनकी गहरी रुचि है। उनके परिवार में खेती-किसानी का पुराना माहौल रहा है, जिसमें उनके दादा और पिता भी मक्के की खेती करते आए हैं। परिवार की इसी पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने खुद भी खेतों में उतरने का फैसला किया और मक्के की फसल की बुआई की।\n\nहालांकि, इस युवा सफर में उन्हें कई तरह की प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ रहा है। दिवांशु ने साझा किया कि स्कूल में पढ़ने वाले कुछ सहपाठी खेती करने पर उनका मजाक उड़ाते हैं और उन्हें सिर्फ पढ़ाई पर फोकस करने की सलाह देते हैं। इसके विपरीत, कई लोग उनकी इस मेहनत और लगन की जमकर सराहना करते हैं। ऐसे शुभचिंतकों का मानना है कि पढ़ाई के साथ व्यावहारिक किसानी करना एक सकारात्मक कदम है, जिससे उन्हें कम उम्र में ही कृषि का बहुमूल्य अनुभव मिल रहा है।\n\nफिलहाल दिवांशु मौर्य करीब 2 से 3 बीघे के क्षेत्रफल में मक्के की खेती कर रहे हैं और आने वाले समय में अपने इस कृषि क्षेत्र का दायरा और ज्यादा फैलाने का इरादा रखते हैं। उन्होंने लागत का हिसाब देते हुए बताया कि 3 बीघे में मक्के की फसल उगाने के लिए उन्हें लगभग 5 से 7 हजार रुपये का खर्च उठाना पड़ा है।\n\n \n\nपैदावार और मुनाफे का गणित\n\nमक्के की उपज और बाजार भाव को लेकर दिवांशु ने स्पष्ट किया कि उनके खेतों में एक बीघे के अंदर लगभग 3 से 4 क्विंटल मक्के का उत्पादन हो जाता है। यदि मक्के को हरे रूप में बाजार में बेचा जाए तो उन्हें 10 से 15 रुपये प्रति किलो तक का दाम मिल जाता है। वहीं दूसरी तरफ, यदि मक्के को अच्छी तरह सुखाकर उसके दाने निकालकर बेचे जाएं तो लगभग 2200 से 2300 रुपये प्रति क्विंटल तक का भाव प्राप्त होता है।\n\nअपनी फसल की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखने के लिए वह खेती में रासायनिक खादों का इस्तेमाल बहुत कम करते हैं और इसके बजाय जैविक खाद का उपयोग ज्यादा करते हैं। उनका कहना है कि जैविक तरीकों से खेती करने के कारण उनके मक्के की गुणवत्ता बेहतरीन रहती है, जिसकी वजह से बाजार में इसकी काफी मांग बनी रहती है। आलम यह है कि कई बार तो फसल को बाजार ले जाने की जरूरत भी नहीं पड़ती और मक्का खेत से ही हाथों-हाथ बिक जाता है।\n\n \n\nक्षेत्र में कृषि का परिदृश्य और भविष्य की योजनाएं\n\nगोंडा जिले में बड़ी संख्या में किसान प्रत्यक्ष रूप से खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं। इस इलाके में पारंपरिक तौर पर धान और गेहूं के अलावा अन्य कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं, जिनमें मक्के की खेती का भी अहम स्थान है। दिवांशु मौर्य जैसे युवा छात्र जब शिक्षा के साथ-साथ कृषि कार्यों में रुचि दिखाते हैं, तो यह ग्रामीण इलाकों में एक नया सकारात्मक संदेश देता है। उनका मुख्य लक्ष्य भविष्य में मक्के की खेती के रकबे को काफी हद तक बढ़ाना और इससे अपने लिए एक मजबूत आर्थिक आमदनी का जरिया तैयार करना है।\n\nइसका आप पर असर\nयह खबर दिखाती है कि किस तरह युवा कम संसाधन और पढ़ाई के साथ कृषि को आजीविका का जरिया बना सकते हैं।\n\n• उत्तर प्रदेश में: ग्रामीण इलाकों के छात्रों और युवाओं को पढ़ाई के साथ कृषि आधारित स्टार्टअप या पारंपरिक खेती से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है।\n• गोंडा में: तरबगंज और आसपास के स्थानीय किसानों को जैविक खाद के प्रयोग और कम लागत में मक्का जैसी फसल से बेहतर मुनाफा कमाने का व्यावहारिक उदाहरण मिलता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nकम लागत और पारिवारिक परंपरा के कारण यह खेती फलीभूत हो रही है।\n\n• पारिवारिक पृष्ठभूमि: दादा और पिता द्वारा पहले से मक्के की खेती किए जाने के कारण दिवांशु को कृषि का पारंपरिक ज्ञान और अनुभव विरासत में मिला।\n• जैविक खाद का प्रयोग: रासायनिक खादों के बजाय जैविक खाद के उपयोग से मक्के की गुणवत्ता सुधरी, जिससे बाजार में इसकी मांग बढ़ी और फसल खेत से ही बिक गई।\n• कम लागत: मात्र 5 से 7 हजार रुपये के खर्च में 3 बीघे की फसल तैयार हो जाने से मुनाफा मार्जिन बेहतर रहा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. दिवांशु मौर्य कौन हैं और वह कहां के रहने वाले हैं?\nदिवांशु मौर्य गोंडा जिले के तरबगंज ब्लॉक के रहने वाले आठवीं कक्षा के एक छात्र हैं।\n\n2. दिवांशु वर्तमान में कितने क्षेत्र में मक्के की खेती कर रहे हैं?\nवह इस समय करीब 2 से 3 बीघे की जमीन पर मक्के की खेती कर रहे हैं।\n\n3. 3 बीघे मक्के की खेती में कुल कितना खर्च आया है?\n3 बीघे में मक्का उगाने के लिए उन्हें लगभग 5 से 7 हजार रुपये का खर्च आया है।\n\n4. मक्के की पैदावार कितनी होती है और उसका क्या भाव मिलता है?\nएक बीघे में लगभग 3 से 4 क्विंटल मक्का पैदा होता है। हरा मक्का 10 से 15 रुपये प्रति किलो और सूखा दाना 2200 से 2300 रुपये प्रति क्विंटल बिकता है।\n\n5. दिवांशु मक्के की फसल में किस प्रकार की खाद का इस्तेमाल करते हैं?\nवह रासायनिक खादों का कम उपयोग करते हैं और जैविक खाद का अधिक प्रयोग करते हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nदिवांशु मौर्य की यह कहानी मेहनत और लगन का बेहतरीन उदाहरण पेश करती है।\n\n• समय का प्रबंधन: पढ़ाई के साथ-साथ कृषि कार्यों में हाथ बंटाकर किशोर उम्र में ही आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है।\n• पारंपरिक ज्ञान का उपयोग: खानदानी हुनर और खेती की पुरानी परंपराओं को आधुनिक सोच के साथ आगे बढ़ाकर सफलता हासिल की जा सकती है।\n• जैविक तरीकों पर जोर: रासायनिक खादों से बचकर जैविक खाद अपनाने से पैदावार की गुणवत्ता बढ़ती है और बिना बिचौलियों के सीधा मुनाफा मिलता है।\n• दूसरों की परवाह न करना: लोगों के नकारात्मक तानों से हतोत्साहित हुए बिना अपने लक्ष्य पर अडिग रहकर काम करना चाहिए।",
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  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-09-18",
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