आईआईटी बॉम्बे के गोल्ड मेडलिस्ट ने ठुकराया 1.6 करोड़ का विदेशी ऑफर, मां-बाप के लिए चुनी किराना दुकान आईआईटी बॉम्बे के गोल्ड मेडलिस्ट विवेक शर्मा ने सैन फ्रांसिस्को की कंपनी का 1.6 करोड़ रुपये का जॉब ऑफर सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि उनके माता-पिता गंभीर रूप से बीमार थे और उन्हें कानपुर में उनकी देखभाल करनी थी। मेरा नाम विवेक शर्मा है और मेरी उम्र 32 साल है। जब लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं क्या करता हूं, तो मेरा जवाब होता है कि मैं एक किराना दुकान चलाता हूं। लोग अक्सर इस बात पर हंस देते हैं क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता है कि मैं आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस में गोल्ड मेडलिस्ट रह चुका हूं। आज भी मेरी अलमारी में सैन फ्रांसिस्को की एक बड़ी कंपनी का वह ऑफर लेटर सुरक्षित रखा है जिस पर 2,40,000 डॉलर सालाना की सैलरी का जिक्र है। मैंने उस खत को कभी फाड़ा तो नहीं, लेकिन कभी उसका इस्तेमाल भी नहीं किया। कानपुर के संघर्ष भरे शुरुआती दिन इस कहानी की शुरुआत साल 1998 में कानपुर के किदवई नगर से होती है। हमारे पास दो कमरों का एक छोटा सा घर था जिसकी छत पर टीन पड़ी हुई थी। मेरे पापा रेलवे में एक साधारण क्लर्क के रूप में काम करते थे और मां बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया करती थीं। मैं उनका इकलौता बेटा था। उस समय पापा की मासिक सैलरी 8,000 रुपये हुआ करती थी और मां की ट्यूशन से 2,000 रुपये आ जाते थे। हम मध्यम वर्ग में भी नहीं गिने जाते थे, बल्कि हमारी गिनती लोअर मिडिल क्लास में होती थी। इसके बावजूद पापा का सपना बहुत बड़ा था कि उनका बेटा समाज में एक बड़ा आदमी बने। उन्होंने कभी मुझ पर डॉक्टर या इंजीनियर बनने का कोई दबाव नहीं डाला। वह हमेशा मुझसे यही कहते थे कि बेटा, तुम्हें जितनी पढ़ाई करनी है करो, पैसों के बारे में बिल्कुल मत सोचो। आईआईटी तक पहुंचने का कठिन सफर मैं लगातार मेहनत से पढ़ता गया। दसवीं की बोर्ड परीक्षा में मैंने 95 प्रतिशत अंक हासिल किए और बारहवीं में 97 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। उस दौरान कोचिंग की फीस 1 लाख रुपये हुआ करती थी। इसके लिए पापा ने अपने पीएफ से पैसे निकाले और मां ने अपनी चूड़ियां तक बेच दीं। इसके बाद मैं कोटा चला गया। वहां मैंने दो साल तक एक साधारण कमरे में पंखे के नीचे पढ़ाई की और मच्छरों के बीच वक्त बिताया। साल 2012 में जब परीक्षा का रिजल्ट आया, तो मेरी AIR 147 आई। मेरा चयन आईआईटी बॉम्बे में कंप्यूटर साइंस ब्रांच में हो गया। जिस दिन यह चयन पत्र घर पहुंचा, पापा खुशी से मिठाई का डिब्बा लेकर पूरे मोहल्ले में बांट आए। मां की आंखों से आंसू छलक आए और उन्होंने कहा कि अब उनका बेटा अमेरिका जाएगा। अमेरिका से करोड़ों के पैकेज का बुलावा आईआईटी के दिनों में मैंने कोडिंग, हैकाथॉन और कई इंटर्नशिप में हिस्सा लिया। अपने तीसरे साल में मुझे गूगल समर इंटर्नशिप मिल गई जिसका स्टाइपेंड 1 लाख रुपये था। मैंने अपनी पहली कमाई से पापा के लिए एक फोन खरीदा और मां के लिए वॉशिंग मशीन लाई। फोन पर बात करते हुए पापा ने कहा था कि बेटा, अब तो मैं अपने रिटायरमेंट के बाद आराम से रहूंगा। फाइनल ईयर के दौरान प्लेसमेंट का दौर आया जिसके लिए मैं दिन-रात तैयारी में जुटा रहा। दिसंबर 2015 में सैन फ्रांसिस्को की एक जानी-मानी पेमेंट स्टार्टअप कंपनी स्ट्राइप से मेरा इंटरव्यू हुआ। कुल चार दौर चले और आखिरी में कंपनी के सीटीओ ने साफ कह दिया कि वे मुझे अपनी टीम में चाहते हैं। इसके बाद मेरे पास 240k डॉलर का ऑफर आया जिसमें एच1बी वीजा और रीलोकेशन की सुविधा शामिल थी। जब बीमारी ने बदली जिंदगी की दिशा मैंने हॉस्टल के कमरे में चिल्लाकर अपने दोस्तों को इस सफलता की खबर दी। उस रात मैंने अपने पापा को फोन करके सारी बात बताई। पापा कुछ देर तक शांत रहे और फिर बोले कि यह बहुत बड़ी बात है। मां ने तुरंत मेरा पासपोर्ट बनवाने की बात कही। मैंने अगस्त 2016 में जॉइनिंग के हिसाब से फ्लाइट के टिकट देखना शुरू कर दिए। लेकिन मार्च 2016 में जब मैं होली पर अपने घर लौटा, तो मैंने देखा कि पापा काफी कमजोर नजर आ रहे थे और उन्हें लगातार खासी आ रही थी। जब मैंने उनसे डॉक्टर के पास जाने को कहा, तो वह टाल गए और बोले कि कुछ नहीं हुआ है, बस थोड़ी ठंड लग गई है। मां भी काफी थकी-थकी सी लग रही थीं, जिसे मैंने उनकी उम्र का असर समझ लिया। अस्पताल के चक्कर और गहराता संकट अप्रैल के महीने में मां का फोन आया कि पापा अचानक चक्कर खाकर गिर गए हैं और उन्हें अस्पताल ले जाया गया है। मैं तुरंत भागकर घर पहुंचा। डॉक्टर ने बताया कि उनके फेफड़ों में गंभीर संक्रमण है और साथ ही दिल की भी समस्या है। उनकी तुरंत एंजियोप्लास्टी करनी होगी जिसका खर्च 3 लाख रुपये आएगा। हालांकि पापा के पास मेडिकल बीमा था, लेकिन वह आधे खर्च पर ही लागू होता था। ऐसे में मैंने अपनी इंटर्नशिप के बचाए हुए 2 लाख रुपये निकालकर दे दिए। ऑपरेशन सफल रहा और पापा की जान बच गई। इसके बाद मैं अपने फाइनल प्रोजेक्ट के सिलसिले में वापस बॉम्बे लौट आया। लेकिन मई में फिर से फोन आया कि मां को चक्कर आ गए हैं। जब उनकी जांच कराई गई, तो पता चला कि उन्हें स्टेज 2 का ब्रेस्ट कैंसर है। डॉक्टर ने तुरंत कीमोथेरेपी शुरू करने को कहा जिसके कुल 6 साइकल होने थे और हर साइकल का खर्च 80 हजार रुपये था। इस तरह कुल खर्च 5 लाख रुपये और उसके बाद सर्जरी का खर्च अलग से आना था। एक तरफ करियर और दूसरी तरफ माता-पिता यह सब सुनकर मैं पूरी तरह सुन्न पड़ गया। पापा पहले ही रिटायर हो चुके थे और उनकी पेंशन मात्र 12 हजार रुपये थी। घर की सारी जमापूंजी खत्म हो चुकी थी। मैंने अपने दोस्तों से उधार मांगना शुरू किया, जिससे बमुश्किल 1 लाख रुपये मिल पाए, बाकी का इंतजाम कहां से हो, यह समझ नहीं आ रहा था। जून का महीना आ चुका था और मेरा ऑफर लेटर मेरे हाथों में था। मेरा वीजा इंटरव्यू 15 जुलाई को तय था और फ्लाइट 10 अगस्त की थी। मां की पहली कीमोथेरेपी 20 जून को होनी थी। जब मैंने पापा से कहा कि मैं बैंक से लोन ले लेता हूं, तो उन्होंने पूछा कि कौन लोन देगा, इसके लिए तो हमारा घर गिरवी रखना पड़ेगा। मैंने कहा कि रख देंगे, लेकिन पापा ने साफ मना कर दिया और कहा कि यह घर तुम्हारी मां की आखिरी निशानी है। अहम फैसला और वीजा इंटरव्यू रद्द करना उस रात मैं काफी देर तक घर की छत पर बैठा रहा। आसमान से एक हवाई जहाज गुजर रहा था और मैंने सोचा कि यही विमान मुझे उस पार ले जाने वाला था। लेकिन दूसरी तरफ नीचे मेरी मां दर्द से तड़प रही थीं। मैंने अपने मेंटर को मेल लिखकर पूछा कि क्या मेरी जॉइनिंग को 6 महीने के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है। उधर से जवाब आया कि सॉरी विवेक, कंपनी को अभी तुरंत लोगों की जरूरत है और अगर मैं चाहूं तो अगले साल फिर से आवेदन कर सकता हूँ। मैंने दोबारा मेल करके पूछा कि क्या रिमोट से काम करना संभव है। यह 14 जुलाई की रात थी। अगले दिन मेरा वीजा इंटरव्यू था और उसके अगले दिन मां की दूसरी कीमोथेरेपी होनी थी। उस वक्त जब पापा दवा लेने गए और लौटते वक्त उनकी पर्ची जमीन पर गिर गई और वह झुककर उसे उठा नहीं पाए, तो मैंने खुद वह पर्ची उठाई। उसी पल मुझे पूरी तरह समझ आ गया कि अगर मैं विदेश चला गया, तो इन दोनों का क्या होगा। किराना दुकान से नई शुरुआत पापा रिटायर्ड और बीमार थे, मां कीमोथेरेपी पर थीं, हमारा कोई भाई-बहन नहीं था और रिश्तेदार भी मदद के लिए आगे नहीं आते थे। ऐसे में कौन इन्हें अस्पताल ले जाता, कौन दवाइयां लाता और कौन रात को एक गिलास पानी पूछता। मैंने अगली सुबह अपना वीजा इंटरव्यू रद्द कर दिया। मैंने कंपनी को मेल लिखा कि फैमिली मेडिकल इमरजेंसी की वजह से मैं यह ऑफर स्वीकार करने में असमर्थ हूं। मेरे दोस्तों ने मुझे फोन करके पागल करार दिया कि मैं 1.6 करोड़ की नौकरी छोड़ रहा हूं। मैंने बस इतना कहा कि हां मैं पागल हूं। मैंने यह बात अपनी मां को नहीं बताई, सिर्फ पापा को बताई। वह कुछ देर चुप रहे और फिर बोले कि बेटा तुम्हारा करियर दांव पर लग गया। मैंने जवाब दिया कि करियर दोबारा बन सकता है, लेकिन आप दोनों दोबारा नहीं मिल सकते। मुश्किल दौर और संघर्ष का सफर इसके बाद मैंने कानपुर में ही नौकरी की तलाश शुरू कर दी। मुझे एक स्थानीय सॉफ्टवेयर कंपनी में 35 हजार रुपये महीने की नौकरी मिल गई जिसे मैंने ज्वाइन कर लिया। मेरा रोज का रूटीन बन गया कि सुबह 9 से शाम 6 बजे तक ऑफिस में काम करता और शाम को अस्पताल पहुंच जाता। कीमोथेरेपी की वजह से जब मां के बाल झड़ने लगे और वह रोती थीं, तो मैं उनके लिए बाजार से विग ले आता था। साथ ही पापा की दवाइयों का भी पूरा ध्यान रखता था। साल 2016 से 2018 के बीच के ये दो साल इसी तरह संघर्ष में निकले। आखिरकार मां की सर्जरी हुई, धीरे-धीरे उनकी रिकवरी हुई और कैंसर पूरी तरह से रिमिशन में आ गया। पापा की तबीयत भी अब स्थिर हो चुकी थी। दुकान की शुरुआत और लोगों का साथ हालांकि इन सब के बीच हमारे पास पैसे बिल्कुल खत्म हो चुके थे। मुझे मजबूरन 7 लाख रुपये का लोन लेना पड़ा। साल 2018 में वह लोकल कंपनी भी बंद हो गई और मैं एक बार फिर बेरोजगार हो गया। मैंने कुछ इंटरव्यू दिए और बेंगलुरु से 18 लाख का ऑफर भी आया, लेकिन मैंने उसे ठुकरा दिया। जब पापा ने मुझसे पूछा कि क्यों ठुकराया, तो मैंने कहा कि अब मैं इन्हें छोड़कर नहीं जा सकता क्योंकि मां का हर तीन महीने पर चेकअप होता है और पापा को डायबिटीज है, उनका ध्यान कौन रखेगा। मेरे दोस्तों ने कहा कि मैं जानबूझकर अपना करियर बर्बाद कर रहा हूं। मैंने साफ कहा कि करियर मेरा अपना है और माता-पिता भी मेरे ही हैं। शर्मा जनरल स्टोर की स्थापना मैंने अपने घर के नीचे ही एक छोटी सी दुकान खोल ली जिसका नाम पापा के नाम पर शर्मा जनरल स्टोर रखा। कंप्यूटर की कोडिंग छोड़कर मैं दाल और चावल बेचने लगा। पहले दिन जब मैं दुकान पर बैठा तो मुझे बहुत शर्म आई कि आईआईटी का लड़का अब परचून की दुकान चला रहा है। लेकिन तभी एक आंटी वहां आईं और उन्होंने मुझसे कहा कि बेटा तुम्हारी मां ने मुझे पढ़ाया है, तुम दुकान खोलो, हम सामान यहीं से खरीदेंगे। धीरे-धीरे हमारी दुकान चलने लगी। मैं सुबह 6 बजे होलसेल मंडी जाता, सामान खरीदकर लाता, दिन भर दुकान संभालता और रात के वक्त फ्रीलांस कोडिंग करके 500 डॉलर की एक वेबसाइट बना लेता था। जिंदगी की पटरी पर वापसी साल 2019 तक आते-आते मेरी मां पूरी तरह से स्वस्थ हो चुकी थीं। डॉक्टर ने कह दिया था कि वह अब बिल्कुल ठीक हैं। उस दिन मैंने अपनी दुकान बंद की और सीधे मंदिर जाकर भगवान को प्रसाद चढ़ाया। जब मैं घर वापस लौटा तो पापा ने मुझसे कहा कि बेटा, तुमने हमारे लिए अपनी पूरी जिंदगी छोड़ दी। मैंने उनसे कहा कि मैंने कुछ छोड़ा नहीं है, बल्कि अपनी जिंदगी को एक नया और सही रास्ता दिया है। साल 2020 में जब लॉकडाउन लगा, तो हमारी किराना दुकान एसेंशियल सेवाओं के तहत खुली रही और हमने लोगों तक राशन पहुंचाया। इसका आप पर असर भारत में: यह कहानी उन युवाओं के लिए एक बड़ा संदेश है जो अपने करियर और परिवार की प्राथमिकताओं के बीच संतुलन तलाशते हैं। कानपुर में: स्थानीय पाठकों और युवाओं को यह सीख मिलती है कि मुश्किल समय में अपनों का साथ देना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। सवाल-जवाब 1. विवेक शर्मा ने कौन सी कंपनी का जॉब ऑफर ठुकराया था? विवेक शर्मा ने सैन फ्रांसिस्को स्थित पेमेंट स्टार्टअप स्ट्राइप का 2,40,000 डॉलर सालाना (लगभग 1.6 करोड़ रुपये) का जॉब ऑफर ठुकरा दिया था। 2. विवेक ने विदेशी नौकरी क्यों छोड़ी? विवेक ने अपने माता-पिता की गंभीर बीमारियों और स्वास्थ्य संकट के कारण कानपुर में उनकी देखभाल करने के लिए विदेशी नौकरी छोड़ दी। 3. विवेक ने अपनी पढ़ाई कहां से पूरी की थी? विवेक ने आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस में गोल्ड मेडल हासिल किया था। 4. विवेक ने कानपुर वापस आकर क्या काम शुरू किया? कानपुर लौटने के बाद विवेक ने एक स्थानीय सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करने के बाद अपने घर के नीचे 'शर्मा जनरल स्टोर' नाम से किराना दुकान शुरू की। प्रेरणा और सबक परिवार सबसे पहले: करियर और पैसा दोबारा कमाए जा सकते हैं, लेकिन माता-पिता का साथ अमूल्य होता है। मुश्किलों में लचीलापन: बड़ी सफलताएं मिलने के बाद भी विपरीत परिस्थितियों में हार न मानकर स्थानीय स्तर पर नई शुरुआत की जा सकती है। कड़ी मेहनत और समर्पण: सीमित संसाधनों से निकलकर आईआईटी तक पहुंचने की जिद यह सिखाती है कि सच्ची लगन से हर बाधा पार की जा सकती है। https://trendkia.com/success-stories/iit-bombay-gold-medalist-rejects-rs-1-6-crore-foreign-job-offer-to-care-for-ailing-parents-13333 TrendKia — Har trend, sabse pehle.