इंदौर में सास की 1985 की छोटी सी शुरुआत, रिटायरमेंट के बाद बेटे और बहू ने 'अंजलि मसाले' को बनाया देशभर की पसंद इंदौर के प्रमोद और अंजली बाकोरे ने अपनी मां की चार दशक पुरानी मसाला परंपरा को नया रूप देकर घर से ही एक सफल उद्यम खड़ा किया है। मध्य प्रदेश की खानपान राजधानी इंदौर के एक परिवार ने अपनी घरेलू विरासत को एक कामयाब कारोबारी पहचान में बदल दिया है। घर की रसोई से शुरू हुआ यह छोटा सा काम आज 'अंजलि मसाले' के नाम से जाना जाता है और इसके स्वाद की पहुंच देश के कई राज्यों तक हो चुकी है। इस उद्यम की बागडोर संभाल रहे दंपती प्रमोद बाकोरे और उनकी पत्नी अंजली बाकोरे ने पारंपरिक तरीकों और शुद्धता के दम पर ग्राहकों का भरोसा जीता है। 1985 की नींव और रिटायरमेंट के बाद का नया संकल्प इस घरेलू मसाले के सफर की शुरुआत साल 1985 में प्रमोद बाकोरे की मां ने की थी। उन्होंने अपने घर पर ही शुद्ध मसाले तैयार करने का छोटा सा काम शुरू किया था, जिसे परिवार ने हमेशा संजो कर रखा। प्रमोद बाकोरे जब दसवीं कक्षा में पढ़ाई कर रहे थे, तभी से वे अपनी मां के साथ खड़े मसाले चुनने, उन्हें तैयार करने और बेचने के काम में हाथ बंटाते थे। बचपन के इसी अनुभव ने उन्हें मसालों की गुणवत्ता, सही अनुपात और पारंपरिक स्वाद की गहरी समझ दी। सालों तक नौकरी करने के बाद जब प्रमोद बाकोरे सेवानिवृत्त हुए, तो उन्होंने आराम करने के बजाय अपनी पारिवारिक विरासत को विस्तार देने की सोची। इस फैसले में उनकी पत्नी अंजली बाकोरे पूरी मजबूती से उनके साथ खड़ी हुईं। दोनों ने मिलकर तय किया कि मां द्वारा शुरू किए गए इस काम को एक सुनियोजित गृह उद्योग का रूप दिया जाएगा। इसके बाद उन्होंने घर पर ही पूरी शुद्धता के साथ मसाले तैयार करने का सिलसिला नए सिरे से शुरू कर दिया। खड़े मसालों के चयन से लेकर पैकिंग तक का सफर इस उद्यम की सफलता का सबसे बड़ा आधार शुद्धता और पारंपरिक तैयारी है। अंजलि मसाले बनाने की पूरी प्रक्रिया को बेहद बारीकी से अंजाम दिया जाता है। काम की शुरुआत बेहतरीन गुणवत्ता वाले खड़े मसालों के चयन से होती है। इसके बाद इन मसालों को धीमी आंच पर सही तापमान में सेका जाता है, जिससे उनकी नमी खत्म होती है और प्राकृतिक सुगंध बरकरार रहती है। सिकाई का काम पूरा होने के बाद ही मसालों को पीसा जाता है। पिसाई के बाद तैयार मसालों को अलग-अलग वजन और नाप वाले पैकेटों में सुरक्षित तरीके से पैक किया जाता है, जिसके बाद उन्हें बाजार और ग्राहकों तक भेजा जाता है। चार प्रमुख उत्पाद और देश भर में पहुंच मौजूदा समय में इस ब्रांड के तहत मुख्य रूप से चार विशेष प्रकार के मसाले तैयार किए जाते हैं। इनमें रोजमर्रा के खाने में इस्तेमाल होने वाला गरम मसाला, स्ट्रीट फूड का स्वाद बढ़ाने वाला पाव भाजी मसाला, तीखा-चटपटा चाट मसाला और खास सुगंध वाला चाय मसाला शामिल हैं। स्वाद और शुद्धता के कारण इन चारों उत्पादों को लोगों से खूब सराहना मिल रही है। प्रमोद बाकोरे बताते हैं कि शुद्धता और स्वाद की वजह से ग्राहकों से उन्हें लगातार दोहराए जाने वाले ऑर्डर मिल रहे हैं। आज उनके बनाए मसाले देश के अलग-अलग हिस्सों में ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं। इस पूरे काम में परिवार के सभी सदस्य अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं, जिसकी बदौलत यह पारिवारिक कारोबार हर दिन नई ऊंचाइयां छू रहा है। इसका आप पर असर यह कहानी छोटे स्तर पर अपना गृह उद्योग शुरू करने के इच्छुक लोगों के लिए प्रेरणा और व्यावहारिक सीख देती है। • भारत में: यह मॉडल साबित करता है कि स्थानीय और पारंपरिक खाद्य उत्पादों की मांग पूरे देश में तेजी से बढ़ रही है। उपभोक्ता अब पैकेज्ड मिलावटी सामान के बजाय घर पर बने शुद्ध और विश्वसनीय उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं। • इंदौर में: शहर के गृह उद्यमियों और छोटे कारीगरों के लिए यह साबित करता है कि स्थानीय व्यंजनों के दम पर राष्ट्रीय स्तर का बाजार तैयार किया जा सकता है। इंदौर के स्वाद की साख का सही इस्तेमाल कर घर से भी बड़ा ब्रांड खड़ा किया जा सकता है। • रिटायरमेंट प्लानिंग: नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद खाली बैठने के बजाय पुरानी पारिवारिक कला को आर्थिक साधन बनाया जा सकता है। सही योजना से वरिष्ठ नागरिक अपने अनुभव को एक आत्मनिर्भर कारोबार में बदल सकते हैं। • घरेलू उद्योग: बड़े कारखाने या भारी निवेश के बिना भी केवल गुणवत्ता और शुद्धता के दम पर उत्पाद बेचे जा सकते हैं। पारंपरिक सिकाई और पिसाई जैसे सरल तरीकों से सीधे ग्राहकों का भरोसा जीता जा सकता है। ऐसा क्यों हुआ यह कारोबार इसलिए पनप सका क्योंकि परिवार ने 1985 से चली आ रही शुद्धता की परंपरा को आधुनिक उपभोक्ता की जरूरतों के साथ जोड़ दिया। • शुरुआती अनुभव की नींव: प्रमोद बाकोरे ने दसवीं कक्षा से ही अपनी मां के साथ मसालों का काम किया था, जिससे उन्हें कच्ची सामग्री की पहचान और सही सिकाई का व्यावहारिक अनुभव पहले से था। इस तकनीकी समझ ने उन्हें शुरुआत में होने वाली गलतियों से बचा लिया। • रिटायरमेंट के बाद समय और लगन: नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद उनके पास पर्याप्त समय उपलब्ध था, जिसे उन्होंने गृह उद्योग को व्यवस्थित रूप देने में लगाया। अंजली बाकोरे के निरंतर साथ ने इस योजना को तुरंत क्रियान्वित करने में मदद की। • मिलावट मुक्त शुद्धता: आज के समय में डिब्बाबंद मसालों में मिलावट की आशंका के बीच घर पर बने शुद्ध मसालों की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है। पारंपरिक सिकाई और पिसाई की पद्धति ने ग्राहकों को वह स्वाद दिया जो आम तौर पर बड़े ब्रांडों में नहीं मिलता। सवाल-जवाब 1. 'अंजलि मसाले' कारोबार की शुरुआत सबसे पहले किसने और कब की थी? इस कारोबार की नींव साल 1985 में प्रमोद बाकोरे की मां ने रखी थी, जिसे अब उनके बेटे और बहू आगे बढ़ा रहे हैं। 2. प्रमोद बाकोरे को मसालों के काम का अनुभव कैसे हुआ? वे जब दसवीं कक्षा में पढ़ाई कर रहे थे, तभी से अपनी मां के साथ खड़े मसाले बनाने और बेचने का काम करते थे। 3. अंजलि मसाले बनाने की मुख्य प्रक्रिया क्या है? सबसे पहले खड़े मसालों को ध्यान से चुना जाता है, फिर उनकी सिकाई होती है, उसके बाद पिसाई करके अलग-अलग पैकिंग तैयार की जाती है। 4. इस ब्रांड के तहत कौन-कौन से प्रमुख मसाले तैयार किए जाते हैं? वर्तमान में मुख्य रूप से चार मसाले तैयार किए जाते हैं, जिनमें गरम मसाला, पाव भाजी मसाला, चाट मसाला और चाय मसाला शामिल हैं। 5. यह कारोबार किस शहर से संचालित हो रहा है और उत्पाद कहां तक पहुंचते हैं? यह कारोबार इंदौर से संचालित होता है और इसके बनाए मसाले देश के विभिन्न हिस्सों में ग्राहकों तक पहुंचाए जाते हैं। प्रेरणा और सबक अंजलि मसाले का यह सफर दिखाता है कि पारिवारिक हुनर और धैर्य से किसी भी उम्र में एक सफल मुकाम हासिल किया जा सकता है। • उम्र की कोई सीमा नहीं: करियर से रिटायरमेंट जीवन का ठहराव नहीं बल्कि एक नई पारी की शुरुआत बन सकता है। अपने पुराने शौक या पारिवारिक हुनर को समय देकर नई पहचान बनाई जा सकती है। • पारंपरिक ज्ञान की अहमियत: बुजुर्गों से सीखे गए छोटे-छोटे काम और नुस्खे भविष्य में बड़ी पूंजी साबित हो सकते हैं। मां की छोटी सी शुरुआत आज पूरे परिवार के कारोबार की रीढ़ बन गई। • गुणवत्ता ही सबसे बड़ा प्रचार: बिना किसी बड़े विज्ञापन अभियान के सिर्फ स्वाद और शुद्धता के दम पर देश भर में ग्राहक बनाए जा सकते हैं। बेहतर उत्पाद अपने आप नए ऑर्डर लेकर आता है। • पारिवारिक एकजुटता की ताकत: जब पति-पत्नी और पूरा परिवार मिलकर काम करता है, तो सीमित संसाधनों में भी काम लगातार आगे बढ़ता है। आपसी सहयोग व्यापार की सबसे मजबूत कड़ी होता है। https://trendkia.com/success-stories/indore-men-sasa-ki-1985-ki-chhoti-si-shuruata-ritayaramenta-ke-bada-bete-aura-bahu-ne-anjali-masale-ko-banaya-deshabhara-ki-pasnda-55099 TrendKia — Har trend, sabse pehle.