# जहानाबाद के युवा किसान अभिषेक कुमार ने शेड नेट से बदली खेती की तस्वीर, 40 दिन की मूली फसल से ₹2,000 लगाकर ₹20,000 कमाई का लक्ष्य

> बिहार के जहानाबाद जिले में 32 वर्षीय किसान अभिषेक कुमार ने धान और गेहूं की पारंपरिक खेती के साथ शेड नेट में बरसाती मूली उगाकर महज 40 दिनों में 10 गुना मुनाफा कमाने का आधुनिक मॉडल तैयार किया है।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-08-08 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/jehanabad-ke-yuva-kisana-abhishek-kumar-ne-sheda-neta-se-badali-kheti-ki-tasvira-40-dina-ki-muli-phasala-se-2-000-lagakara-20-000--15029 · **Language:** Hindi
**Tags:** जहानाबाद खेती, बरसाती मूली, शेड नेट खेती, अभिषेक कुमार किसान, बिहार कृषि विकास, फसल विविधीकरण

बिहार के कृषि परिदृश्य में जहां अधिकतर किसान खरीफ सीजन के दौरान पारंपरिक धान और गेहूं की खेती पर निर्भर रहते हैं, वहीं जहानाबाद जिले के एक युवा किसान ने त्वरित आमदनी का नया रास्ता तलाशा है। घोसी प्रखंड के सोनवां गांव निवासी 32 वर्षीय किसान अभिषेक कुमार ने पारंपरिक फसलों के लंबे इंतजार के बजाय कम समय में तैयार होने वाली बरसाती मूली की खेती का विकल्प चुना है। आधुनिक शेड नेट तकनीक का सहारा लेकर उन्होंने मात्र 10 कट्ठा जमीन पर मूली की बुआई की है, जो महज 40 दिनों में पूरी तरह तैयार होकर बाजार में बिकने के लिए उपलब्ध हो जाएगी। इस फसल चक्र से उन्हें अपनी सीमित लागत पर 10 गुना तक शुद्ध मुनाफा मिलने की पूरी उम्मीद है। उनका मानना है कि पारंपरिक फसलों से एक साल में होने वाली कमाई को मूली की यह 40 दिन की फसल आसानी से कवर कर सकती है।

## पारंपरिक खेती के साथ शेड नेट और फसल विविधीकरण का मॉडल
अभिषेक कुमार आधुनिक दौर की कृषि तकनीकों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में विश्वास रखते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि बदलते जमाने और बाजार की मांग के हिसाब से खेती करने पर ही किसानों को सही लाभ मिल सकता है। इसी सोच के कारण वे पारंपरिक धान और गेहूं की खेती तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि शेड नेट संरचना का उपयोग करके विविध प्रकार की फसलें उगाते हैं। अपने कृषि फार्म में वे नियमित रूप से शिमला मिर्च, खीरा और मूंगफली की खेती करते हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने खेतों में विभिन्न प्रजातियों के फलदार पौधे भी लगा रखे हैं, जिनसे वर्ष भर मौसमी फल प्राप्त होते रहते हैं और परिवार को निरंतर नकदी प्रवाह मिलता रहता है।

## जुलाई के अंत में बुआई और सावन में मूली की उच्च बाजार मांग
इस बार अभिषेक ने जुलाई महीने के अंतिम सप्ताह में अपने शेड नेट परिसर के अंदर 10 कट्ठा जमीन पर मूली की बुआई संपन्न की है। उन्होंने खेत में उचित बेड बनाकर 2 पैकेट बीजों का रोपण किया था, जिनसे पौधे अब सफलतापूर्वक अंकुरित होने लगे हैं। मूली की यह बरसाती किस्म बमुश्किल 40 दिनों के भीतर पूरी तरह से तैयार हो जाती है। मानसून के इस मौसम में मूली की बाजार मांग अत्यधिक बढ़ जाती है। इसका मुख्य कारण यह है कि इस अवधि में सनातनी समुदाय के लोग अपने खान-पान में प्याज और लहसुन के सेवन से परहेज करते हैं। इसके परिणामस्वरूप सब्जियों के बाजार में मूली की मांग में जबरदस्त उछाल आता है। चूंकि बरसात के दिनों में मंडी में ताजी मूली की आवक सीमित रहती है, इसलिए किसानों को इसके बेहतर दाम मिलते हैं। इसके अलावा मूली की भंडारण क्षमता भी अच्छी होती है, जिससे यह जल्दी खराब नहीं होती।

## ₹2,000 की न्यूनतम लागत और ₹20,000 की संभावित आमदनी का गणित
खेती के वित्तीय प्रबंधन और लागत का पूरा हिसाब साझा करते हुए अभिषेक बताते हैं कि शेड नेट के भीतर मूली उगाने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि फसलों पर कीड़ों और कीटों का प्रकोप काफी कम रहता है। इसके चलते अलग से महंगी रासायनिक कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस खेती में मुख्य खर्च केवल गुणवत्तापूर्ण बीजों और शारीरिक मेहनत का होता है। यदि किसान स्वयं खेतों में श्रम करता है, तो मात्र ₹2,000 की कुल लागत में आसानी से ₹20,000 तक की कमाई की जा सकती है। हालांकि, अगर बुआई और रखरखाव के लिए बाहर से कृषि श्रमिकों को किराए पर बुलाया जाता है, तो मजदूरी का खर्च ₹2,000 से बढ़कर ₹4,000 तक पहुंच सकता है। अभिषेक का कहना है कि स्वयं मेहनत करके कोई भी किसान ₹2,000 की सीधी बचत कर सकता है और 40 दिनों की छोटी अवधि में ही 10 गुना तक शानदार रिटर्न हासिल कर सकता है।

## इसका आप पर असर
- **भारत में:** खरीफ सीजन के दौरान शेड नेट और कम अवधि की सब्जियों की खेती किसानों को पारंपरिक फसलों पर निर्भरता घटाकर 40 दिनों में त्वरित नकदी प्रवाह की सुविधा देती है।
- **जहानाबाद (बिहार) में:** जहानाबाद जिले के स्थानीय किसान धान-गेहूं के लंबे इंतजार के बजाय शेड नेट में मूली और शिमला मिर्च जैसी फसलों से कम लागत पर 10 गुना तक ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. अभिषेक कुमार कहां के रहने वाले हैं और उनकी उम्र क्या है?
अभिषेक कुमार बिहार के जहानाबाद जिले के घोसी प्रखंड स्थित सोनवां गांव के 32 वर्षीय युवा किसान हैं।

### 2. बरसाती मूली की फसल कितने दिनों में तैयार हो जाती है?
बरसाती मूली की खेती की अवधि बेहद कम होती है और यह फसल बुआई के महज 40 दिनों में बिक्री के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है।

### 3. बरसात के मौसम में मूली की मांग और कीमत क्यों बढ़ जाती है?
बरसात और सावन के महीने में सनातनी समुदाय के लोग प्याज और लहसुन खाने से बचते हैं, जिससे बाजार में मूली की मांग काफी बढ़ जाती है और आपूर्ति सीमित होने से अच्छी कीमत मिलती है।

### 4. 10 कट्ठा जमीन में मूली उगाने पर कितनी लागत और कमाई होती है?
खुद मेहनत करने पर 2 पैकेट बीज और कुल ₹2,000 की लागत आती है, जिससे लगभग ₹20,000 तक की कमाई (10 गुना रिटर्न) की जा सकती है।

### 5. बाहरी मजदूरों से काम कराने पर लागत पर क्या असर पड़ता है?
यदि बाहर से श्रमिकों को बुलाकर काम कराया जाए तो लागत ₹2,000 से बढ़कर ₹4,000 तक पहुंच जाती है, जिससे मुनाफा ₹2,000 कम हो जाता है।

### 6. मूली के अलावा अभिषेक कुमार अपने खेतों में कौन-कौन सी फसलें उगाते हैं?
वे धान और गेहूं के अलावा शेड नेट में शिमला मिर्च, खीरा, मूंगफली और विभिन्न प्रकार के मौसमी फलदार पौधे उगाते हैं।

## प्रेरणा और सबक
**सफलता के प्रमुख पाठ:**

- **समय के साथ बदलाव:** केवल पारंपरिक धान और गेहूं पर निर्भर रहने के बजाय आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाना।
- **शेड नेट तकनीक का उपयोग:** कीटों के प्रकोप को प्राकृतिक रूप से रोककर कीटनाशकों पर होने वाले खर्च को शून्य करना।
- **बाजार की मांग का सही आकलन:** सावन और बरसात के दौरान खान-पान में होने वाले बदलावों का लाभ उठाकर मूली जैसी उच्च मांग वाली फसल लगाना।
- **श्रम लागत पर नियंत्रण:** स्वयं मेहनत करके मजदूरी खर्च में ₹2,000 की बचत करना और 40 दिनों में 10 गुना मुनाफा हासिल करना।

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