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  "title": "खेत ही बना मुनाफे की फैक्ट्री: छपरा के किसान छेदी यादव की कमाई से 4 घंटे में जो हो, वो परदेस की 8 घंटे की मजदूरी पर भारी",
  "summary": "छपरा के संठा गांव के किसान छेदी प्रसाद यादव महज 10 कट्ठा खेत में मचान विधि से लौकी और कुंदरी उगाकर एक सीजन में ₹1.5 लाख तक की शुद्ध कमाई कर रहे हैं और पलायन की जगह घर पर रहकर खेती को रोजगार का बेहतर रास्ता साबित कर रहे हैं।",
  "content": "परदेस की किसी फैक्ट्री में दिनभर खटने के बजाय अगर अपने ही खेत में चार घंटे की समझदारी भरी मेहनत डाली जाए, तो कमाई भी मोटी होती है और परिवार का साथ भी नहीं छूटता। बिहार के छपरा (सारण) जिले के एक किसान ने इस सोच को अपनी जिंदगी में उतारकर दिखा दिया है कि सही तकनीक के साथ खेती अब घाटे का नहीं, बल्कि दोगुने-तिगुने मुनाफे का सौदा बन सकती है।\n\nसंठा गांव का वह किसान जिसने खेती की परिभाषा बदल दी\nहम बात कर रहे हैं छपरा जिले के गरखा प्रखंड के संठा गांव में रहने वाले छेदी प्रसाद यादव की। पारंपरिक खेती के ढर्रे को पीछे छोड़कर वे अब एक ही खेत में कई फसलें एक साथ उगाने यानी मल्टी-क्रॉपिंग पर भरोसा करते हैं। खास बात यह है कि उनकी पूरी खेती जैविक (ऑर्गेनिक) विधि से होती है, यानी रासायनिक खाद-दवा से दूरी।\n\nउन्होंने अपने महज 10 कट्ठा के खेत में मचान विधि अपनाई है, जिसे मल्टी-लेयर फार्मिंग भी कहते हैं। इसी एक टुकड़े में वे ऊपर लौकी और नीचे कुंदरी की शानदार पैदावार ले रहे हैं। नतीजा यह कि इस छोटे-से खेत से ही एक सीजन में उन्हें ₹1.5 लाख तक की शुद्ध कमाई हो जाती है।\n\nतीन दशक का अनुभव, गांव की मिसाल\nछेदी यादव कोई नौसिखिए किसान नहीं हैं। बचपन से ही वे हरी सब्जियों की खेती करते आ रहे हैं और इस काम में उन्हें 30 साल से ज्यादा का तजुर्बा है। खेती को लेकर उनके अनोखे आइडिया और तकनीक आसपास के किसानों को भी खूब भा रहे हैं। पारंपरिक फसलों के साथ-साथ वे सीजनल नकदी फसलें यानी सब्जियां लगाकर अच्छी आमदनी कमाते हैं।\n\nउनकी देखादेखी और मार्गदर्शन में इलाके के कई दूसरे किसान भी बड़े पैमाने पर सब्जी की खेती की ओर मुड़े हैं। इससे वे आत्मनिर्भर बन रहे हैं और अपने परिवार का भरण-पोषण बेहतर ढंग से कर पा रहे हैं।\n\n'घर पर 4 घंटे, परदेस की 8 घंटे की मजदूरी पर भारी'\nछेदी यादव साफ कहते हैं कि उन्होंने कभी बाहर जाकर किसी फैक्ट्री में 8 घंटे बंधुआ मजदूरी करने के बारे में नहीं सोचा। उनका मानना है कि परदेस में 8 घंटे खटने और दूसरों की डांट सुनने से कहीं बेहतर है कि घर पर रहकर खेत में 4 घंटे मेहनत कर ली जाए। इससे परिवार और सगे-संबंधियों का साथ भी बना रहता है और कमाई भी शानदार होती है। यही वजह है कि वे अपनी जिंदगी से बेहद संतुष्ट और खुश हैं।\n\nTrendKia से बातचीत में छेदी प्रसाद यादव ने बताया कि कमाने की चाह में वे कभी दिल्ली या पंजाब नहीं गए। बीते 25-30 वर्षों से वे अपने गांव में ही रहकर खेती कर रहे हैं और एक खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं।\n\nकुंदरी और लौकी की दोहरी पैदावार\nअपनी खेती का गणित समझाते हुए वे बताते हैं कि एक बार में वे करीब 50 किलो तक कुंदरी तोड़ लेते हैं। कुंदरी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि एक बार लगाने के बाद इससे लगभग 2 से 3 साल तक लगातार पैदावार मिलती रहती है। इसी मचान के नीचे से वे रोजाना 70 से 80 पीस लौकी भी तोड़ते हैं। इन सब्जियों को हर हफ्ते छपरा बाजार समिति (मंडी) में ले जाकर बेच दिया जाता है, जिससे नियमित नकदी आती रहती है।\n\nखुद की पढ़ाई छूटी, पर बच्चों को दिला रहे उच्च शिक्षा\nबातचीत के दौरान छेदी यादव भावुक हो उठते हैं। वे बताते हैं कि पारिवारिक गरीबी के चलते वे खुद बिहार बोर्ड (मैट्रिक) से आगे की पढ़ाई नहीं कर सके। लेकिन आज इसी खेती की बदौलत वे अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला रहे हैं। उनके बेटे पढ़ाई के साथ-साथ खेती-किसानी में भी उनका हाथ बंटाते हैं।\n\nछेदी यादव का दो टूक कहना है कि अगर सही तकनीक और सूझबूझ के साथ खेती की जाए, तो युवाओं को रोजगार की तलाश में अपना घर-गांव छोड़कर पलायन करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।",
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  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-06-14",
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    "छेदी प्रसाद यादव",
    "छपरा किसान",
    "मचान विधि खेती",
    "जैविक खेती",
    "मल्टी-क्रॉपिंग",
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    "बिहार किसान सफलता",
    "पलायन रोजगार"
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  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
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