खेतों में मजदूरी कर भाई-बहनों को पढ़ाया, अब नोएडा में जरूरतमंद महिलाओं और अनाथ बच्चों का सहारा बनीं रानी कानपुर के गांव में माता-पिता को खोने के बाद रानी ने खेतों में काम करके भाई-बहनों की पढ़ाई पूरी कराई। आज वह नोएडा में कॉर्पोरेट नौकरी के साथ असहाय महिलाओं और बच्चों की निस्वार्थ सेवा कर रही हैं। जीवन की सबसे कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद का दामन थामे रखना और अपने संघर्ष को दूसरों के कल्याण का जरिया बना लेना एक असाधारण मिसाल पेश करता है। कानपुर के एक ग्रामीण अंचल से निकलकर औद्योगिक शहर नोएडा तक का सफर तय करने वाली रानी का जीवन इसी अदम्य साहस और मानवीय संवेदना का जीता-जागता उदाहरण है। बहुत कम उम्र में सिर से माता-पिता का साया उठ जाने के बाद रानी के सामने केवल अपनी आजीविका का संकट नहीं था, बल्कि उन पर अपने छोटे भाई-बहनों के पालन-पोषण का विशाल दायित्व भी आ गया था। उस नाजुक मोड़ पर जब रिश्तेदारों, समाज और परिचितों में से कोई भी सहारा देने आगे नहीं आया, तब उन्होंने घुटने टेकने के बजाय हालातों से सीधे मुकाबला करने का फैसला किया। अपनों के अभाव और अकेलेपन की इसी गहरी पीड़ा ने उनके भीतर समाज के कमजोर तबकों, खासकर बेसहारा महिलाओं, बच्चियों और अनाथों के आंसू पोंछने का दृढ़ संकल्प जगाया। पढ़ाई के लिए खेतों में की मजदूरी और भाई-बहनों के लिए छोड़ा कॉलेज रानी के जीवन में कठिनाइयों का दौर तब शुरू हुआ जब वह हाई स्कूल की छात्रा थीं और उनके पिता का अचानक देहांत हो गया। घर की माली हालत इतनी जर्जर हो चुकी थी कि सामान्य स्कूली शिक्षा का खर्च उठाना भी असंभव लगने लगा था। अपनी पढ़ाई बीच में न छूटे, इसके लिए उन्होंने दूसरों के खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करना शुरू कर दिया। दिन भर खेतों में कठोर शारीरिक श्रम करने के बाद मिलने वाले पैसों से वह अपनी स्कूल फीस भरती थीं। इस अथक संघर्ष के बल पर उन्होंने अपनी बारहवीं कक्षा की पढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी की। इसके उपरांत उन्होंने उच्च शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाते हुए बीए प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया। हालांकि, कॉलेज में दाखिले के कुछ ही समय बाद उन्हें यह अहसास हुआ कि कॉलेज की महंगी फीस भरने से घर का बजट बिगड़ जाएगा और छोटे भाई-बहनों की बुनियादी शिक्षा व परवरिश अधूरी रह जाएगी। परिवार के भविष्य को संवारने की खातिर उन्होंने अपनी व्यक्तिगत पढ़ाई का त्याग करने का बड़ा निर्णय लिया। अपनी कॉलेज शिक्षा छोड़ने के बाद रानी ने आजीविका और शिक्षा के प्रसार को अपना जरिया बनाया। उन्होंने एक छोटे स्थानीय स्कूल में शिक्षण कार्य शुरू किया और साथ ही शाम के समय बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना आरंभ किया। लगभग पांच वर्षों तक लगातार बच्चों को पढ़ाकर उन्होंने न केवल घर के दैनिक खर्चों का प्रबंध किया, बल्कि अपने छोटे भाई-बहनों की सभी शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी की। इस दौरान उन्होंने यह भी सुनिश्चित करने का भरसक प्रयास किया कि उनके भाई-बहनों को स्कूल में मुफ्त दाखिला मिल सके ताकि उनकी पढ़ाई में किसी तरह की रुकावट न आए। अपनी कमाई बचाकर जरूरतमंदों की मदद और घरेलू हिंसा के मामलों में काउंसलिंग जैसे-जैसे परिवार की स्थिति कुछ संभली, रानी ने औपचारिक रोजगार की दिशा में कदम बढ़ाया। नौकरी शुरू करने के बाद भी उनका ध्यान केवल अपने व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहा। वह अपनी नियमित मासिक आय में से एक तय हिस्सा बचाकर उन गरीब परिवारों की सहायता में लगाने लगीं, जिनके पास भोजन और कपड़ों जैसी मूलभूत सुविधाएं भी नहीं थीं। अपनी स्वयं की आवश्यकताओं में कटौती करके किसी असहाय व्यक्ति की थाली में रोटी पहुंचाना उनके लिए आत्मिक शांति का सबसे बड़ा स्रोत बन गया। धीरे-धीरे उनके सेवा कार्य का दायरा और विस्तृत हुआ। उन्होंने पारिवारिक विवादों और घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं के समर्थन में खड़े होना शुरू किया। ऐसे संवेदनशील मामलों में रानी दोनों पक्षों की बात धैर्यपूर्वक सुनती हैं, पारिवारिक परिस्थितियों की गहराई से पड़ताल करती हैं और जरूरत पड़ने पर व्यक्तिगत काउंसलिंग के जरिए विवाद सुलझाने का प्रयास करती हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि गहरे संकट और मानसिक संत्रास से गुजर रहे व्यक्ति के पास खड़े होना और उसे यह अहसास कराना कि वह अकेला नहीं है, अपने आप में सहायता का अत्यंत महत्वपूर्ण रूप होता है। महिला उन्नति संस्था से जुड़ाव और अनाथालयों में सेवा कार्य सामाजिक सेवा के इस व्यक्तिगत अभियान को संस्थागत मजबूती तब मिली, जब करीब एक वर्ष पूर्व रानी सोशल मीडिया के माध्यम से महिला उन्नति संस्था के संपर्क में आईं। यह संगठन महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू हिंसा निवारण, महिला अधिकारों और महिला रोजगार के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय भूमिका निभा रहा है। यह वही संस्था है जिसने देश को पहली महिला जेसीबी पायलट देकर महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल कायम की थी। संगठन के साथ जुड़ने के पश्चात रानी ने अपनी पूरी क्षमता के साथ पीड़ित महिलाओं, निर्धन बच्चों और अनाथालयों में रहने वाले बच्चों के लिए नियमित सहायता कार्य आरंभ किए। वह विशेष रूप से मदर्स डे जैसे पारिवारिक अवसरों पर जरूरतमंद माताओं की सेवा और सहायता में आगे रहती हैं। उनका कहना है कि कम उम्र में अपनी मां को खो देने के कारण वह अपनी मां के लिए वे तमाम खुशियां नहीं जुटा सकीं जो वह चाहती थीं, इसलिए किसी अन्य असहाय मां की मदद करने से उन्हें अपनी दिवंगत मां की सेवा करने जैसा असीम संतोष प्राप्त होता है। कॉर्पोरेट नौकरी में एडमिन की जिम्मेदारी और भविष्य का संकल्प वर्तमान समय में रानी नोएडा में रियल एस्टेट क्षेत्र की कंपनियों में एडमिनिस्ट्रेटिव पद पर अपनी सेवाएं दे रही हैं। कोरोना महामारी के कठिन दौर के बाद से उन्होंने विभिन्न कॉर्पोरेट संस्थानों में प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभाली हैं। दफ्तर के व्यस्त कामकाज और पेशेवर दायित्वों के बावजूद वह समाज सेवा के अपने मिशन के लिए निरंतर समय निकालती हैं। उनका सपना है कि वह भविष्य में आर्थिक और सामाजिक रूप से इतनी अधिक सक्षम बनें कि माता-पिता का साया खो चुके बच्चों, बेसहारा महिलाओं और गंभीर संकटों से जूझ रहे निर्धन परिवारों को बड़े पैमाने पर स्थाई राहत पहुंचा सकें। इसका आप पर असर रानी का जीवन संघर्ष यह दिखाता है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद व्यक्तिगत प्रयासों और सामुदायिक एकजुटता से अपने परिवार के साथ-साथ समाज के कमजोर तबकों की जिंदगी बदली जा सकती है। • पारिवारिक प्रेरणा: विपरीत आर्थिक परिस्थितियों में भी शिक्षा और परिवार की प्राथमिकताओं को संतुलित करने का यह सशक्त उदाहरण है। सीमित आय वाले परिवार इससे प्रेरणा लेकर बच्चों की निरंतर शिक्षा के वैकल्पिक रास्ते तलाश सकते हैं। • नोएडा में: घरेलू कलह या आर्थिक तंगी से जूझ रही स्थानीय महिलाओं को सामाजिक संस्थाओं और काउंसलिंग के जरिए सहायता का सहारा मिलता है। औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत कामकाजी लोग अपने वेतन के छोटे हिस्से से स्थानीय अनाथालयों और जरूरतमंदों की मदद में योगदान दे सकते हैं। • कानपुर में: ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवाओं के लिए यह कहानी साबित करती है कि संसाधनों की कमी के बावजूद मेहनत से आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है। गांव के जरूरतमंद बच्चे प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के लिए स्थानीय स्तर पर ट्यूशन और शिक्षण सहायता की राह चुन सकते हैं। • सामुदायिक भागीदारी: सामाजिक संगठनों और सोशल मीडिया का सदुपयोग करके कोई भी आम नागरिक अपने शहर में असहाय लोगों की मदद कर सकता है। घरेलू हिंसा और संकट में फंसी महिलाओं को समय पर मध्यस्थता और भावनात्मक संबल मिलना सुनिश्चित होता है। ऐसा क्यों हुआ माता-पिता के असामयिक निधन और रिश्तेदारों व समाज से किसी तरह की आर्थिक या सामाजिक मदद न मिलने के कारण रानी को कम उम्र में ही आजीविका और परिवार संभालने की जिम्मेदारी उठानी पड़ी। जीवन के इस व्यक्तिगत संकट और अभाव के सीधे अनुभव ने उन्हें असहाय लोगों की पीड़ा समझने और सामाजिक सेवा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। • अभिभावकों का निधन: हाई स्कूल की पढ़ाई के दौरान पिता के निधन और माता का साया छिन जाने से परिवार पर अचानक आर्थिक संकट आ गया था। किसी भी रिश्तेदार या परिचित से मदद न मिलने के कारण रानी को स्वयं मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करना पड़ा। • शिक्षा का त्याग: बीए प्रथम वर्ष में फीस की कमी और भाई-बहनों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी नियमित कॉलेज की पढ़ाई छोड़ने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने ट्यूशन और स्कूल में पढ़ाकर परिवार को आर्थिक रूप से संभाला। • अभाव से उपजी संवेदना: भोजन, वस्त्र और सहारे की कमी को खुद झेलने के कारण रानी ने नौकरी मिलते ही अपनी आय का एक हिस्सा गरीबों, अनाथ बच्चों और घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की काउंसलिंग में लगाना शुरू किया। • संस्था से जुड़ाव: सोशल मीडिया के जरिए महिला उन्नति संस्था के महिला सुरक्षा और रोजगार कार्यों की जानकारी मिलने के बाद रानी औपचारिक रूप से संस्था से जुड़ीं और अपने सेवा कार्य को संगठित रूप दिया। सवाल-जवाब 1. रानी मूल रूप से कहां की रहने वाली हैं और वर्तमान में कहां काम कर रही हैं? रानी मूल रूप से कानपुर के एक गांव की रहने वाली हैं और वर्तमान में नोएडा में रियल एस्टेट क्षेत्र की कंपनियों में एडमिनिस्ट्रेटिव पद पर कार्यरत हैं। 2. रानी ने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के लिए क्या काम किया था? हाई स्कूल में पिता के निधन के बाद परिवार में पैसों की कमी के चलते रानी ने स्कूल फीस भरने के लिए दूसरों के खेतों में मजदूरी की और बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी की। 3. रानी ने कॉलेज में अपनी पढ़ाई क्यों छोड़ दी थी? बीए प्रथम वर्ष में दाखिले के बाद उन्हें लगा कि पढ़ाई पर खर्च करने के बजाय उन पैसों से छोटे भाई-बहनों की शिक्षा और बुनियादी जरूरतें पूरी की जानी चाहिए, इसलिए उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया। 4. कॉलेज छोड़ने के बाद रानी ने परिवार का खर्च चलाने के लिए क्या किया? उन्होंने एक छोटे स्थानीय स्कूल में पढ़ाना और बच्चों को ट्यूशन देना शुरू किया। लगभग पांच वर्षों तक बच्चों को पढ़ाकर उन्होंने अपने भाई-बहनों की जरूरतों को पूरा किया। 5. घरेलू हिंसा से जूझ रही महिलाओं की मदद रानी किस तरह करती हैं? रानी दोनों पक्षों की बात सुनकर पारिवारिक स्थिति को समझने का प्रयास करती हैं और आपसी बातचीत व काउंसलिंग के माध्यम से महिलाओं की समस्याओं को सुलझाने में सहायता करती हैं। 6. रानी किस सामाजिक संस्था से जुड़ी हैं और उस संस्था की क्या विशेषता है? रानी महिला उन्नति संस्था से जुड़ी हैं, जो महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू हिंसा निवारण और रोजगार के क्षेत्र में काम करती है और जिसने देश को पहली महिला जेसीबी पायलट दी थी। 7. रानी मदर्स डे के अवसर पर विशेष रूप से क्या करती हैं? मदर्स डे के अवसर पर रानी जरूरतमंद माताओं की सहायता करती हैं, क्योंकि कम उम्र में अपनी मां को खो देने के कारण वह अपनी मां की सेवा नहीं कर पाई थीं। 8. रानी का भविष्य को लेकर क्या सपना है? रानी का सपना है कि वह आर्थिक और सामाजिक रूप से इतनी सक्षम बनें कि अनाथ बच्चों, बेसहारा महिलाओं और जरूरतमंद परिवारों की बड़े स्तर पर मदद कर सकें। प्रेरणा और सबक रानी का जीवन यह संदेश देता है कि जब परिस्थितियां सबसे कठिन हों, तब दूसरों का सहारा बनने का संकल्प ही व्यक्ति को सबसे बड़ी आंतरिक शक्ति देता है। • जिम्मेदारी से कभी पीछे न हटें: गंभीर अभाव और अपनों का सहारा न होने पर भी रानी ने घुटने टेकने के बजाय खेतों में मजदूरी कर परिवार को संभाला। विषम परिस्थितियों में जिम्मेदारी स्वीकार करना ही आत्मनिर्भरता की पहली सीढ़ी है। • अपनों के लिए त्याग की भावना: भाई-बहनों के भविष्य की खातिर अपनी कॉलेज शिक्षा छोड़कर ट्यूशन पढ़ाने का फैसला उनके समर्पण को दर्शाता है। परिवार की भलाई के लिए सही समय पर लिया गया निस्वार्थ निर्णय दीर्घकालिक संबल बनता है। • सीमित साधनों में भी परोपकार: समाज सेवा के लिए किसी बड़े धन या पद की प्रतीक्षा करने के बजाय उन्होंने अपनी सामान्य नौकरी की कमाई से ही जरूरतमंदों की मदद शुरू की। अपनी जरूरतों में थोड़ी कटौती करके भी किसी भूखे या लाचार व्यक्ति का जीवन संवारा जा सकता है। • दूसरों के दुख में साथ खड़े रहना: घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं की काउंसलिंग और अनाथ बच्चों का संबल बनकर उन्होंने साबित किया कि किसी का दुख बांटना और उसे यह अहसास कराना कि वह अकेला नहीं है, सबसे बड़ा मानवीय धर्म है। https://trendkia.com/success-stories/kheton-men-majaduri-kara-bhai-bahanon-ko-parhaya-aba-noida-men-jaruratamnda-mahilaon-aura-anatha-bachchon-ka-sahara-banin-rani-45741 TrendKia — Har trend, sabse pehle.