{
  "type": "article",
  "title": "कॉलेज अभियान से शुरू हुआ वीवॉइस लैब, कचरा प्रबंधन से तैयार किया 250 करोड़ रुपये का उद्यम",
  "summary": "जयपुर के अभिषेक गुप्ता और अभिनव शेखर वशिष्ठ ने आधुनिक तकनीक से कचरा प्रबंधन करते हुए 250 करोड़ रुपये का स्टार्टअप खड़ा किया है, जो देश के 25 शहरों में सक्रिय है।",
  "content": "शहरी इलाकों में कचरा प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, लेकिन सही दृष्टिकोण और तकनीक के इस्तेमाल से इसे एक विशाल औद्योगिक समाधान में बदला जा सकता है। जयपुर के दो युवा उद्यमियों, अभिषेक गुप्ता और अभिनव शेखर वशिष्ठ ने इसी समस्या को एक सशक्त उद्यम में परिवर्तित कर दिखाया है। उनके स्थापित क्लीन-टेक उद्यम ‘वीवॉइस लैब’ ने कचरा प्रबंधन के पूरे ढांचे को बदलकर रख दिया है। वर्तमान में इस कंपनी का सालाना कारोबार 250 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच चुका है। राजस्थान से लेकर देश के 25 प्रमुख शहरों में यह स्टार्टअप अपनी सेवाएं प्रदान कर रहा है, जहां तकनीक की सहायता से प्रतिदिन निकलने वाले कचरे का निस्तारण वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है।\n\nकॉलेज परिसर से जन्मा विचार और स्थापना का सफर\nइस पूरे उद्यम की नींव आज से लगभग 9 साल पहले रखी गई थी। साल 2016 में जयपुर में पढ़ाई के दौरान अभिषेक गुप्ता और अभिनव शेखर वशिष्ठ ने कॉलेज परिसर में एक सफाई अभियान और कचरा जागरूकता कार्यक्रम चलाया था। आम तौर पर ऐसे अभियान केवल कॉलेज की गतिविधियों तक सीमित रह जाते हैं, लेकिन इन दोनों युवाओं ने इसे एक गंभीर सामाजिक आवश्यकता के रूप में देखा। उन्होंने महसूस किया कि शहरों में कचरे का निस्तारण केवल रस्मी तौर पर नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और स्थायी समाधान के जरिए ही संभव है। दो वर्षों के गंभीर अध्ययन और योजना के बाद, साल 2018 में आधिकारिक तौर पर ‘वीवॉइस लैब’ की शुरुआत हुई। उनका यह प्रयास शहरी क्षेत्रों को साफ-सुथरा और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए बेहद कारगर सिद्ध हुआ है।\n\nफोर्ब्स की सूची में दर्ज हुई उपलब्धि और तकनीक का विस्तार\nकचरा प्रबंधन के क्षेत्र में इस अभिनव मॉडल को वैश्विक स्तर पर भी पहचान मिली है। संस्थापकों की इस दूरदर्शिता और जमीनी प्रभाव के चलते ‘वीवॉइस लैब’ को फोर्ब्स की प्रतिष्ठित ‘अंडर-30’ सूची में स्थान प्राप्त हुआ। यह उद्यम पूरी तरह से अपशिष्ट प्रबंधन पर केंद्रित है, जिसमें कचरा संग्रहण, उसकी सटीक ट्रैकिंग, वैज्ञानिक पृथक्करण और पुनर्चक्रण की पूरी प्रक्रिया को आधुनिक तकनीक के माध्यम से सुधारा गया है। कंपनी केवल सामान्य कचरे तक सीमित नहीं है, बल्कि कपड़ा अपशिष्ट यानी टेक्सटाइल वेस्ट को भी उपयोगी उत्पादों में तब्दील कर चक्रीय अर्थव्यवस्था यानी सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूती प्रदान कर रही है।\n\nकचरा संकट का मुकाबला और लाखों टन का वैज्ञानिक निस्तारण\nभारत में अपशिष्ट प्रबंधन की स्थिति बेहद विकट रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश भर में प्रतिवर्ष 62 मिलियन टन कचरा पैदा होता है। इस भारी मात्रा का एक बड़ा हिस्सा या तो खुले मैदानों और लैंडफिल में यूं ही फेंक दिया जाता है या फिर उसे असुरक्षित तरीके से जला दिया जाता है, जिससे गंभीर वायु और भूमि प्रदूषण फैलता है। इस गंभीर समस्या के बीच ‘वीवॉइस लैब’ हर साल 6 से 7 लाख टन से अधिक अपशिष्ट को प्रोसेस कर रहा है। तकनीक और बेहतर लॉजिस्टिक्स की बदौलत यह उद्यम लाखों टन कचरे को सीधे लैंडफिल में जाने से रोककर उसे रीसाइक्लिंग चक्र में शामिल करता है।\n\nइंटरनेट ऑफ थिंग्स और आरएफआईडी तकनीक से निगरानी\n‘वीवॉइस लैब’ की कार्यप्रणाली की सबसे बड़ी ताकत इसका डिजिटल ढांचा है। यह स्टार्टअप पूरी तरह से इंटरनेट ऑफ थिंग्स तकनीक पर आधारित व्यवस्था संचालित करता है। सेवा से जुड़े प्रत्येक आवासीय घर, होटल और अस्पताल को विशेष ‘रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन’ यानी आरएफआईडी टैग प्रदान किया जाता है। जैसे ही कचरा संग्रहण दल मौके पर पहुंचता है, टैग स्कैन होते ही तुरंत रियल टाइम डेटा दर्ज हो जाता है। इस प्रणाली से यह स्पष्ट पता चलता है कि कचरा किस समय उठाया गया, किस कर्मचारी ने उठाया और उसका कुल वजन कितना था। इसके साथ ही, कर्मचारियों की उपस्थिति, उनके कार्य निष्पादन और कचरा निस्तारण प्रक्रिया पर भी कड़ी डिजिटल निगरानी रखी जाती है। कंपनी ने एक विशेष मोबाइल ऐप तैयार किया है जिसमें अलर्ट प्रबंधन प्रणाली दी गई है, जो कचरा पिकअप के निर्धारित समय से पहले ही संबंधित उपयोगकर्ताओं को अलर्ट भेज देती है।\n\nगीले और सूखे कचरे का वर्गीकरण और ‘रीसूत्र’ यूनिट\nएकत्रित किए गए कचरे को उसकी प्रकृति के अनुसार अलग-अलग वर्गों में बांटा जाता है। गीले कचरे को खाद बनाने वाली इकाइयों में भेजा जाता है, जिससे जैविक खाद तैयार होती है। दूसरी ओर, सूखे कचरे को कागज, प्लास्टिक, धातु, कांच और कपड़ों जैसी विभिन्न सामग्रियों के आधार पर अलग किया जाता है। कपड़ा अपशिष्ट के लिए कंपनी ने ‘रीसूत्र’ नाम से एक अत्याधुनिक यूनिट स्थापित की है। इस यूनिट में आधुनिक मशीनों और तकनीकों के जरिए पुराने और बेकार कपड़ों को ट्रैक और प्रोसेस किया जाता है, जिसके बाद उन्हें दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले उत्पादों में बदल दिया जाता है। इस तरह के वैज्ञानिक प्रबंधन से स्थानीय नगर निकायों को लैंडफिल स्थलों पर कचरे के विशाल पहाड़ों को बढ़ने से रोकने में सीधी मदद मिल रही है।\n\nस्मार्ट रूट प्रबंधन और स्थानीय रोजगार का सृजन\nपर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ यह उद्यम जमीनी स्तर पर रोजगार के बड़े अवसर भी पैदा कर रहा है। कचरा संग्रहण प्रक्रिया को समयबद्ध और सुगम बनाने के लिए कंपनी रूट मैनेजर सॉफ्टवेयर का उपयोग करती है। इस सॉफ्टवेयर के जरिए कचरा गाड़ियों और कर्मचारियों के लिए प्रतिदिन के सबसे प्रभावी रूट तय किए जाते हैं, जिससे ईंधन की बचत होती है और कर्मचारी समय पर घरों तक पहुंच पाते हैं। ‘वीवॉइस लैब’ ने यह साबित किया है कि तकनीक का सटीक समन्वय पारंपरिक सफाई व्यवस्था को न केवल एक सम्मानजनक और संगठित रोजगार क्षेत्र बना सकता है, बल्कि पर्यावरण संतुलन को भी नई दिशा दे सकता है।\n\nइसका आप पर असर\nइस तकनीक-आधारित कचरा प्रबंधन मॉडल से शहरों में रहने वाले नागरिकों को स्वच्छ वातावरण और बेहतर नागरिक सुविधाएं मिलती हैं।\n\n• नागरिकों के लिए: घर-घर आरएफआईडी टैगिंग और ऐप अलर्ट की मदद से कचरा उठने का समय तय रहता है। इससे सड़कों और रिहायशी कॉलोनियों में कचरे के ढेर लगने की समस्या से राहत मिलती है।\n• सफाई कर्मियों के लिए: तकनीक आधारित निगरानी और रूट प्रबंधन से काम का माहौल संगठित और गरिमापूर्ण बनता है। इससे स्थानीय युवाओं और सफाई से जुड़े लोगों को नियमित रोजगार के अवसर मिलते हैं।\n• नगर निकायों के लिए: 6 से 7 लाख टन कचरा रीसाइकिल होने से लैंडफिल स्थलों पर कचरे का बोझ काफी कम होता है। नगर निगमों को शहर की सफाई व्यवस्था का सटीक और पारदर्शी रियल-टाइम डेटा मिलता है।\n• पर्यावरण सुरक्षा के लिए: गीले कचरे की खाद बनने और टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग से प्रदूषण में भारी कमी आती है। देश भर में हर साल निकलने वाले 62 मिलियन टन कचरे के दुष्प्रभाव को घटाने में यह मॉडल मदद करता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह स्टार्टअप शहरी कचरे के अवैज्ञानिक निस्तारण, लैंडफिल संकट और कॉलेज के दौरान सामने आई जमीनी सफाई की चुनौतियों के समाधान के उद्देश्य से शुरू हुआ।\n\n• शुरुआती कारण: साल 2016 में कॉलेज परिसर में चलाए गए सफाई अभियान के दौरान संस्थापकों ने देखा कि कचरे की समस्या अस्थायी सफाई से हल नहीं हो सकती। इसके लिए एक स्थायी और संस्थागत तकनीकी समाधान तैयार करने का निर्णय लिया गया।\n• देशव्यापी संकट: भारत में हर साल 62 मिलियन टन कचरा पैदा होता है, जिसका बड़ा हिस्सा बिना प्रोसेसिंग के खुले में जलाया या फेंका जाता है। इस भारी अपशिष्ट को रीसाइक्लिंग चेन में जोड़ने के लिए मजबूत लॉजिस्टिक्स की सख्त जरूरत थी।\n• तकनीक का अभाव: पारंपरिक कचरा प्रबंधन में पिकअप का कोई तय समय या जवाबदेही नहीं थी। इसी कमी को दूर करने के लिए इंटरनेट ऑफ थिंग्स, आरएफआईडी टैग और रूट मैनेजर सॉफ्टवेयर आधारित समाधान विकसित किया गया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. ‘वीवॉइस लैब’ स्टार्टअप की स्थापना किसने और कब की?\nइसकी स्थापना जयपुर के अभिषेक गुप्ता और अभिनव शेखर वशिष्ठ ने 2018 में की थी, जिसकी शुरुआत 2016 के कॉलेज अभियान से हुई थी।\n\n2. वर्तमान में वीवॉइस लैब का टर्नओवर कितना है और यह कितने शहरों में सक्रिय है?\nकंपनी का सालाना टर्नओवर 250 करोड़ रुपये है और यह राजस्थान सहित देश के 25 शहरों में अपनी सेवाएं संचालित कर रही है।\n\n3. वीवॉइस लैब प्रतिवर्ष कितना कचरा प्रोसेस करती है?\nकंपनी हर साल 6 से 7 लाख टन से अधिक अपशिष्ट का वैज्ञानिक निस्तारण और रीसाइक्लिंग करती है।\n\n4. कचरा उठाने की ट्रैकिंग के लिए कौन सी तकनीक इस्तेमाल की जाती है?\nइसमें इंटरनेट ऑफ थिंग्स और आरएफआईडी टैग का उपयोग होता है, जिससे कचरा उठाने के समय, मात्रा और कर्मचारी का रियल-टाइम डेटा मिलता है।\n\n5. वीवॉइस लैब की ‘रीसूत्र’ यूनिट का क्या काम है?\n‘रीसूत्र’ यूनिट में कपड़ा अपशिष्ट को आधुनिक तकनीक से ट्रैक और प्रोसेस करके दोबारा उपयोगी उत्पादों में बदला जाता है।\n\n6. कचरा संग्रहण के लिए रूट का निर्धारण कैसे किया जाता है?\nकंपनी खास रूट मैनेजर सॉफ्टवेयर की मदद से रूट तय करती है ताकि कर्मचारी समय पर घरों तक पहुंच सकें।\n\nप्रेरणा और सबक\nजयपुर के दो छात्रों द्वारा कॉलेज प्रोजेक्ट को 250 करोड़ रुपये के सफल उद्यम में बदलना यह सिखाता है कि सामाजिक समस्याओं के स्थायी समाधान से बड़ा व्यापार खड़ा किया जा सकता है।\n\n• समस्या को अवसर बनाना: जिस कचरे को लोग अनुपयोगी मानकर फेंक देते हैं, संस्थापकों ने उसे 250 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाले उद्यम में बदल दिया। अपनी पढ़ाई के दौरान सामने आई समस्या को उन्होंने एक बड़े व्यावसायिक विचार में ढाला।\n• तकनीक से पारंपरिक काम में बदलाव: साधारण कचरा उठाने के काम में इंटरनेट ऑफ थिंग्स और आरएफआईडी तकनीक जोड़कर उन्होंने पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया। किसी भी पारंपरिक क्षेत्र को आधुनिक तकनीक से क्रांतिकारी बनाया जा सकता है।\n• सर्कुलर इकोनॉमी की सोच: केवल कचरा फेंकने की बजाय ‘रीसूत्र’ जैसी यूनिट के जरिए पुराने कपड़ों को दोबारा उपयोगी बनाना सतत विकास का बड़ा उदाहरण है। पर्यावरण की रक्षा और व्यवसाय एक साथ आगे बढ़ सकते हैं।",
  "url": "https://trendkia.com/success-stories/koleja-abhiyana-se-shuru-hua-wevois-labs-kachara-prabndhana-se-taiyara-kiya-250-karora-rupaye-ka-udyama-54325",
  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-11-01",
  "tags": [
    "वीवॉइस लैब",
    "कचरा प्रबंधन",
    "अभिषेक गुप्ता",
    "अभिनव शेखर वशिष्ठ",
    "स्टार्टअप",
    "जयपुर",
    "क्लीन-टेक",
    "सर्कुलर इकोनॉमी"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia",
  "whatItMeansForYou": "इस तकनीक-आधारित कचरा प्रबंधन मॉडल से शहरों में रहने वाले नागरिकों को स्वच्छ वातावरण और बेहतर नागरिक सुविधाएं मिलती हैं।\n\n• नागरिकों के लिए: घर-घर आरएफआईडी टैगिंग और ऐप अलर्ट की मदद से कचरा उठने का समय तय रहता है। इससे सड़कों और रिहायशी कॉलोनियों में कचरे के ढेर लगने की समस्या से राहत मिलती है।\n• सफाई कर्मियों के लिए: तकनीक आधारित निगरानी और रूट प्रबंधन से काम का माहौल संगठित और गरिमापूर्ण बनता है। इससे स्थानीय युवाओं और सफाई से जुड़े लोगों को नियमित रोजगार के अवसर मिलते हैं।\n• नगर निकायों के लिए: 6 से 7 लाख टन कचरा रीसाइकिल होने से लैंडफिल स्थलों पर कचरे का बोझ काफी कम होता है। नगर निगमों को शहर की सफाई व्यवस्था का सटीक और पारदर्शी रियल-टाइम डेटा मिलता है।\n• पर्यावरण सुरक्षा के लिए: गीले कचरे की खाद बनने और टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग से प्रदूषण में भारी कमी आती है। देश भर में हर साल निकलने वाले 62 मिलियन टन कचरे के दुष्प्रभाव को घटाने में यह मॉडल मदद करता है।",
  "whyItHappened": "यह स्टार्टअप शहरी कचरे के अवैज्ञानिक निस्तारण, लैंडफिल संकट और कॉलेज के दौरान सामने आई जमीनी सफाई की चुनौतियों के समाधान के उद्देश्य से शुरू हुआ।\n\n• शुरुआती कारण: साल 2016 में कॉलेज परिसर में चलाए गए सफाई अभियान के दौरान संस्थापकों ने देखा कि कचरे की समस्या अस्थायी सफाई से हल नहीं हो सकती। इसके लिए एक स्थायी और संस्थागत तकनीकी समाधान तैयार करने का निर्णय लिया गया।\n• देशव्यापी संकट: भारत में हर साल 62 मिलियन टन कचरा पैदा होता है, जिसका बड़ा हिस्सा बिना प्रोसेसिंग के खुले में जलाया या फेंका जाता है। इस भारी अपशिष्ट को रीसाइक्लिंग चेन में जोड़ने के लिए मजबूत लॉजिस्टिक्स की सख्त जरूरत थी।\n• तकनीक का अभाव: पारंपरिक कचरा प्रबंधन में पिकअप का कोई तय समय या जवाबदेही नहीं थी। इसी कमी को दूर करने के लिए इंटरनेट ऑफ थिंग्स, आरएफआईडी टैग और रूट मैनेजर सॉफ्टवेयर आधारित समाधान विकसित किया गया।",
  "questionsAndAnswers": [
    {
      "question": "‘वीवॉइस लैब’ स्टार्टअप की स्थापना किसने और कब की?",
      "answer": "इसकी स्थापना जयपुर के अभिषेक गुप्ता और अभिनव शेखर वशिष्ठ ने 2018 में की थी, जिसकी शुरुआत 2016 के कॉलेज अभियान से हुई थी।"
    },
    {
      "question": "वर्तमान में वीवॉइस लैब का टर्नओवर कितना है और यह कितने शहरों में सक्रिय है?",
      "answer": "कंपनी का सालाना टर्नओवर 250 करोड़ रुपये है और यह राजस्थान सहित देश के 25 शहरों में अपनी सेवाएं संचालित कर रही है।"
    },
    {
      "question": "वीवॉइस लैब प्रतिवर्ष कितना कचरा प्रोसेस करती है?",
      "answer": "कंपनी हर साल 6 से 7 लाख टन से अधिक अपशिष्ट का वैज्ञानिक निस्तारण और रीसाइक्लिंग करती है।"
    },
    {
      "question": "कचरा उठाने की ट्रैकिंग के लिए कौन सी तकनीक इस्तेमाल की जाती है?",
      "answer": "इसमें इंटरनेट ऑफ थिंग्स और आरएफआईडी टैग का उपयोग होता है, जिससे कचरा उठाने के समय, मात्रा और कर्मचारी का रियल-टाइम डेटा मिलता है।"
    },
    {
      "question": "वीवॉइस लैब की ‘रीसूत्र’ यूनिट का क्या काम है?",
      "answer": "‘रीसूत्र’ यूनिट में कपड़ा अपशिष्ट को आधुनिक तकनीक से ट्रैक और प्रोसेस करके दोबारा उपयोगी उत्पादों में बदला जाता है।"
    },
    {
      "question": "कचरा संग्रहण के लिए रूट का निर्धारण कैसे किया जाता है?",
      "answer": "कंपनी खास रूट मैनेजर सॉफ्टवेयर की मदद से रूट तय करती है ताकि कर्मचारी समय पर घरों तक पहुंच सकें।"
    }
  ],
  "inspiration": "जयपुर के दो छात्रों द्वारा कॉलेज प्रोजेक्ट को 250 करोड़ रुपये के सफल उद्यम में बदलना यह सिखाता है कि सामाजिक समस्याओं के स्थायी समाधान से बड़ा व्यापार खड़ा किया जा सकता है।\n\n• समस्या को अवसर बनाना: जिस कचरे को लोग अनुपयोगी मानकर फेंक देते हैं, संस्थापकों ने उसे 250 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाले उद्यम में बदल दिया। अपनी पढ़ाई के दौरान सामने आई समस्या को उन्होंने एक बड़े व्यावसायिक विचार में ढाला।\n• तकनीक से पारंपरिक काम में बदलाव: साधारण कचरा उठाने के काम में इंटरनेट ऑफ थिंग्स और आरएफआईडी तकनीक जोड़कर उन्होंने पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया। किसी भी पारंपरिक क्षेत्र को आधुनिक तकनीक से क्रांतिकारी बनाया जा सकता है।\n• सर्कुलर इकोनॉमी की सोच: केवल कचरा फेंकने की बजाय ‘रीसूत्र’ जैसी यूनिट के जरिए पुराने कपड़ों को दोबारा उपयोगी बनाना सतत विकास का बड़ा उदाहरण है। पर्यावरण की रक्षा और व्यवसाय एक साथ आगे बढ़ सकते हैं।"
}