कॉलेज की पढ़ाई और शाम को टी स्टॉल, मऊ के छात्र आशीष राणा का यूपी पुलिस में भर्ती होने का संकल्प मऊ के करहा निवासी आशीष राणा दिन में ग्रेजुएशन और कोचिंग की पढ़ाई करते हैं, जबकि शाम को टी स्टॉल चलाकर परिवार का खर्च उठाते हैं। उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में करहा क्षेत्र के रहने वाले युवा आशीष राणा अपनी लगन और मेहनत के बल पर सरकारी नौकरी पाने के सपने को पूरा करने में जुटे हैं। वह दिन के समय अपनी स्नातक की पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग पूरी करते हैं, फिर शाम होते ही अपनी आजीविका चलाने के लिए चाय की दुकान संभालते हैं। आर्थिक तंगहाली के बावजूद अपने माता-पिता पर बोझ बनने के बजाय उन्होंने खुद का खर्च उठाने का रास्ता चुना है। ग्रेजुएशन के साथ पुलिस भर्ती की मजबूत तैयारी आशीष राणा इस समय भाटिकला स्थित दीप निकेतन डिग्री कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे हैं, जहां वह द्वितीय वर्ष के छात्र हैं। पहले उनकी इच्छा संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास करके प्रशासनिक अधिकारी बनने की थी। हालांकि, पारिवारिक स्थिति और संसाधनों की सीमा को देखते हुए उन्होंने व्यावहारिक रुख अपनाया। अब उनका पूरा ध्यान उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती परीक्षा में सफलता पाने पर केंद्रित है। वह इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए समय सारिणी बनाकर अभ्यास कर रहे हैं। पिता के मना करने पर भी संभाली जिम्मेदारी आशीष का मानना है कि युवा होने के नाते परिवार की जरूरतों को पूरा करना उनका पहला कर्तव्य है। उनके पिता ने शुरुआत में काम करने से साफ मना किया था और कहा था कि उन्हें केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। इसके बावजूद आशीष ने पिता के कंधों से आर्थिक दबाव कम करने का निर्णय लिया। जब वह कामकाज के योग्य हुए, तो उन्होंने किसी और पर निर्भर रहने या उधार मांगने के बजाय एक छोटा टी स्टॉल खोलने की योजना बनाई। आज इसी दुकान से होने वाली आय के सहारे वह अपनी किताबों, कॉलेज और कोचिंग की फीस भरते हैं, साथ ही घर के रोजमर्रा के खर्चों में भी पूरा योगदान देते हैं। सहपाठियों के तानों के बावजूद नहीं डगमगाया हौसला जब आशीष ने पहली बार चाय का स्टॉल लगाना शुरू किया, तो उनके सामने सामाजिक हिचक और लोगों की टिप्पणियां एक बड़ी चुनौती बनकर उभरीं। उनके साथ कॉलेज में पढ़ने वाले कई छात्र इस काम को देखकर तरह-तरह की बातें बनाते थे और फब्तियां कसते थे। आशीष ने इन सभी नकारात्मक बातों को नजरअंदाज किया और अपने लक्ष्य पर टिके रहे। धीरे-धीरे उन्होंने लोगों की बातों को सुनना बंद कर दिया और अपने काम को सम्मान की नजर से देखना शुरू किया। उनका कहना है कि ईमानदारी से की गई मेहनत में कोई शर्म नहीं होनी चाहिए। कड़ी दिनचर्या और दो साल के भीतर नौकरी का लक्ष्य दुकान चलाने और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को एक साथ संतुलित करना काफी कठिन काम है। इसके लिए आशीष राणा बेहद सख्त दिनचर्या का पालन करते हैं। वह रोज सुबह तड़के उठकर पढ़ाई में जुट जाते हैं, जिसके बाद वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग संस्थान जाते हैं। कोचिंग से लौटने के बाद वह दीप निकेतन डिग्री कॉलेज में कक्षाएं अटेंड करते हैं। कॉलेज से घर वापस आकर वह थोड़ा समय निकाल लेते हैं और फिर शाम की दुकान की सामग्री तैयार करते हैं। शाम ढलते ही वह अपनी चाय की दुकान पर पहुंच जाते हैं और देर रात तक ग्राहकों को गर्म चाय परोसते हैं। दुकान बंद करने के बाद भी वह अपने अध्ययन के लिए करीब तीन घंटे का समय निकालते हैं। आशीष इससे पहले भी दो अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल हो चुके हैं। उनका स्पष्ट लक्ष्य है कि वह अगले एक से दो साल के भीतर हर हाल में सरकारी नौकरी हासिल कर लें। यह सिर्फ उनका व्यक्तिगत सपना नहीं है, बल्कि उनके पूरे परिवार की उम्मीदें इस संकल्प से जुड़ी हुई हैं। इसका आप पर असर यह कहानी उन लाखों युवाओं के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करती है जो सीमित संसाधनों के बीच प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। • उत्तर प्रदेश में: प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए यह आत्मनिर्भर बनने और पारिवारिक जिम्मेदारियों को साथ लेकर चलने की राह दिखाता है। युवा अंशकालिक स्वरोजगार अपनाकर कोचिंग और अध्ययन सामग्री का खर्च खुद उठा सकते हैं। • आर्थिक प्रबंधन: यह अनुभव सिखाता है कि दैनिक व्यापार से होने वाली छोटी आय से भी शिक्षा और परिवार का जरूरी खर्च निकाला जा सकता है। इससे माता-पिता पर अचानक पड़ने वाले आर्थिक दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। • समय प्रबंधन: दिन को स्पष्ट हिस्सों में बांटकर पढ़ाई, कॉलेज और काम तीनों को एक साथ संभाला जा सकता है। सुबह के शुरुआती घंटों और रात के समय को पढ़ाई के लिए सुरक्षित रखकर समय का बेहतर उपयोग संभव है। • सामाजिक दृष्टिकोण: छोटे काम या स्वरोजगार को लेकर समाज और साथियों के तानों की परवाह किए बिना काम करने का हौसला मिलता है। यह युवाओं को बिना झिझक ईमानदारी से आजीविका कमाने की प्रेरणा देता है। ऐसा क्यों हुआ पारिवारिक आर्थिक तंगी और खुद के पैरों पर खड़े होने की दृढ़ इच्छा ने आशीष राणा को पढ़ाई के साथ टी स्टॉल शुरू करने के लिए प्रेरित किया। • पारिवारिक जरूरतों का दबाव: घर के खर्चों को पूरा करने और पिता पर सारा बोझ न डालने की सोच के चलते उन्होंने यह कदम उठाया। वह अपनी पढ़ाई के लिए किसी अन्य व्यक्ति से कर्ज या मदद नहीं मांगना चाहते थे। • लक्ष्य में व्यावहारिक बदलाव: शुरुआत में सिविल सेवाओं का लक्ष्य रखने के बाद उन्होंने अपनी परिस्थितियों के अनुसार उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती को व्यावहारिक और हासिल करने योग्य लक्ष्य माना। इसके लिए नियमित कोचिंग और अध्ययन सामग्री की जरूरत थी, जिसकी पूर्ति स्टॉल की कमाई से संभव हुई। • सरकारी सेवा की सुरक्षा: ग्रामीण और मध्यमवर्गीय परिवारों में सरकारी नौकरी को आर्थिक स्थिरता का सबसे मजबूत जरिया माना जाता है। इसी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा को पाने के लिए आशीष दिन-रात कड़ी मेहनत में जुटे हैं। सवाल-जवाब 1. आशीष राणा कौन हैं और वह कहां के रहने वाले हैं? आशीष राणा उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के करहा क्षेत्र के रहने वाले एक छात्र हैं, जो पढ़ाई के साथ शाम को चाय की दुकान चलाते हैं। 2. आशीष किस कॉलेज से और किस कक्षा में पढ़ाई कर रहे हैं? वह भाटिकला स्थित दीप निकेतन डिग्री कॉलेज से ग्रेजुएशन द्वितीय वर्ष की पढ़ाई कर रहे हैं। 3. आशीष राणा का मुख्य करियर लक्ष्य क्या है? उनका मुख्य लक्ष्य अगले एक से दो वर्षों के भीतर उत्तर प्रदेश पुलिस में भर्ती होकर सरकारी नौकरी हासिल करना है। 4. आशीष ने चाय की दुकान क्यों शुरू की? उन्होंने अपनी पढ़ाई और परिवार के खर्चों को पूरा करने तथा पिता पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए यह दुकान शुरू की। 5. शुरुआत में चाय का स्टॉल लगाने पर आशीष को किस चुनौती का सामना करना पड़ा? स्टॉल शुरू करने पर कॉलेज के सहपाठी उन पर तरह-तरह के कमेंट करते थे, लेकिन उन्होंने इन बातों को नजरअंदाज कर दिया। 6. दुकान चलाने के साथ आशीष पढ़ाई के लिए कितना समय निकालते हैं? वह सुबह तड़के उठकर पढ़ाई करते हैं, कोचिंग जाते हैं, और रात में दुकान बंद करने के बाद भी घर पर करीब तीन घंटे पढ़ाई करते हैं। प्रेरणा और सबक आशीष राणा का जीवन संघर्ष यह साबित करता है कि इच्छाशक्ति और कड़ी मेहनत के सामने अभाव और सामाजिक ताने कभी रुकावट नहीं बन सकते। • स्वावलंबन का महत्व: किसी के आगे हाथ फैलाने से बेहतर है कि छोटे स्तर पर ही सही, खुद का काम शुरू किया जाए। ईमानदारी से किया गया कोई भी काम इंसान को आत्मनिर्भर बनाता है। • आलोचनाओं की अनदेखी: सहपाठियों और समाज के तानों को दिल पर लेने के बजाय अपने अंतिम लक्ष्य पर ध्यान टिकाए रखना चाहिए। परिणाम आने पर लोगों की बातें अपने आप बंद हो जाती हैं। • अनुशासन और समय प्रबंधन: यदि संकल्प पक्का हो, तो कॉलेज, कोचिंग और दुकान के व्यस्त दिनक्रम के बीच भी तीन घंटे का स्वाध्याय निकाला जा सकता है। समय का सदुपयोग ही सफलता की कुंजी है। • व्यावहारिक निर्णय: जीवन में परिस्थितियों के अनुसार अपने लक्ष्यों को समय रहते बदलना और उन पर पूरी ताकत झोंक देना समझदारी का परिचायक है। https://trendkia.com/success-stories/koleja-ki-parhai-aura-shama-ko-ti-stola-mau-ke-chhatra-ashish-rana-ka-up-police-men-bharti-hone-ka-snkalpa-39741 TrendKia — Har trend, 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