कॉपी के पन्नों पर रेखाएं खींचने वाले दीपू कुमार ने टिकुली कला को दिलाई राष्ट्रीय चमक पिता के साये के बिना ट्यूशन पढ़ाकर पढ़ाई पूरी करने वाले पटना के दीपू कुमार को टिकुली कला और लोक कला में योगदान के लिए राष्ट्रीय युवा कला रत्न सम्मान से नवाजा गया है। कक्षा में जब शिक्षक गणित के सवाल हल करवा रहे होते थे, तब एक बालक अपनी कॉपी के आखिरी पन्नों पर चुपचाप आकृतियां उकेरने में मग्न रहता था। कई मर्तबा इस आदत के चलते अध्यापकों की डांट और मार भी खानी पड़ी, मगर रंगों और रेखाओं के प्रति आकर्षण कभी कम नहीं हुआ। घर में आर्थिक तंगहाली का पहरा था और सिर पर पिता का साया भी नहीं था। अकेली मां पर पूरे परिवार और भाई-बहनों की परवरिश की जिम्मेदारी थी। इन प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद बालक ने अपने सपनों का सौदा नहीं किया और अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए बच्चों को होम ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। यह संघर्षभरी गाथा पटना के रहने वाले कलाकार दीपू कुमार की है, जिन्होंने अभावों से लड़ते हुए टिकुली कला को एक नई पहचान दी है। सीनियर के मार्गदर्शन से कला महाविद्यालय में मिला प्रवेश स्कूल के दिनों में दीपू कुमार की मुलाकात एक सीनियर छात्र से हुई, जिनके कला के प्रति समर्पण ने उनके भीतर भी इसी राह पर चलने का पक्का इरादा जगा दिया। उसी सीनियर के माध्यम से उन्हें पता चला कि पटना में कला एवं शिल्प महाविद्यालय स्थित है, जो उस समय बिहार और झारखंड के सम्मिलित क्षेत्र का एकमात्र ऐसा प्रतिष्ठित संस्थान था। बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद दीपू ने इस संस्थान की प्रवेश परीक्षा में अपनी किस्मत आजमाई। कठिन परिश्रम के बल पर उन्होंने प्रवेश परीक्षा में 20वीं रैंक हासिल की और महाविद्यालय में उनका दाखिला तय हो गया। हालांकि दाखिला मिलने के बाद भी आर्थिक संकट टला नहीं था, इसलिए उन्होंने अपनी पढ़ाई और दैनिक जरूरतों का खर्च वहन करने के लिए होम ट्यूशन पढ़ाने का सिलसिला लगातार जारी रखा। पांच साल का शैक्षणिक सफर और शुरुआती राजकीय सम्मान कला महाविद्यालय में बिताए पांच वर्षों के दौरान दीपू कुमार ने अपनी कलात्मक क्षमताओं को निखारने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस अवधि में उन्होंने पारंपरिक और समकालीन कला विधाओं की बारीकियों को गहराई से सीखा। कॉलेज की चारदीवारी से निकलकर उनका काम राज्य स्तर पर सराहा जाने लगा। उनकी अनूठी लगन और कला साधना को मान्यता देते हुए बिहार सरकार ने उन्हें राजकीय कला सम्मान प्रदान किया। इसके अलावा, उनकी बनाई गई उत्कृष्ट चित्रकला को प्रतिष्ठित बिहार म्यूजियम में भी प्रदर्शित होने का गौरव प्राप्त हुआ। इन सफलताओं ने उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया और कला जगत में उनके नाम की चर्चा होने लगी। वर्ष 2016 में जहानाबाद के स्कूल में कला शिक्षक के रूप में नियुक्ति जीवन में वर्षों से चली आ रही आर्थिक अस्थिरता को वर्ष 2016 में उस वक्त बड़ा सहारा मिला, जब दीपू कुमार का चयन जहानाबाद स्थित मांदिल प्लस 2 स्कूल में कला शिक्षक के पद पर हुआ। इस सरकारी सेवा से जुड़ने के बाद परिवार की माली हालत संभलने लगी और जीवन में सुकून का संचार हुआ। सरकारी नौकरी मिलने के बाद भी उन्होंने अपनी निजी कला साधना को कभी रुकने नहीं दिया। वे विद्यालय में छात्र-छात्राओं को चित्रकला के गुर सिखाने के साथ-साथ खुद भी नई कलाकृतियां गढ़ने में जुटे रहे। विद्यालय के बच्चों के प्रति उनका समर्पण और साथी शिक्षकों के सहयोग ने उनके कलात्मक सफर को लगातार आगे बढ़ाया। पारंपरिक टिकुली कला का पुनरुद्धार और राष्ट्रीय सम्मान दीपू कुमार ने बिहार की ऐतिहासिक और लुप्तप्राय लोक कला टिकुली कला के संरक्षण और प्रचार-प्रसार को अपने जीवन का मुख्य ध्येय बनाया। अपने इस सफर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले जाने में उन्होंने पद्मश्री अशोक कुमार विश्वास से महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्राप्त किया। उनकी इसी निरंतर निष्ठा और लोक कला में विशिष्ट योगदान को रेखांकित करते हुए आयोजन समिति ने उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रीय युवा कला रत्न सम्मान से सम्मानित किया है। इस उपलब्धि पर दीपू कुमार का कहना है कि इस सम्मान ने न केवल उन्हें नई ऊर्जा प्रदान की है, बल्कि पूरे राज्य का गौरव भी बढ़ाया है। उन्होंने युवा पीढ़ी को संदेश दिया कि विद्यार्थी जिस भी क्षेत्र का चुनाव करें, उसमें गंभीरता और गहराई से अध्ययन करें, क्योंकि वास्तविक सफलता समर्पण से ही संभव है। इसका आप पर असर यह उपलब्धि बिहार की पारंपरिक लोक कलाओं के पुनरुद्धार और कला क्षेत्र में करियर तलाश रहे विद्यार्थियों के लिए व्यावहारिक अवसर खोलती है। • भारत में: लुप्तप्राय पारंपरिक शिल्पों को राष्ट्रीय पहचान मिलने से ग्रामीण और लोक कलाकारों के लिए बाजार में मांग बढ़ती है। इससे देश के अन्य युवाओं को भी अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ी कलाओं को पेशेवर स्तर पर अपनाने की प्रेरणा मिलती है। • बिहार में: पटना और जहानाबाद जैसे क्षेत्रों में कला की पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए नए अवसर और संस्थागत सहयोग का रास्ता साफ होता है। इसके साथ ही बिहार म्यूजियम और पर्यटन केंद्रों पर राज्य के स्थानीय कलाकारों की कृतियों को बेहतर मंच प्राप्त होता है। • विद्यार्थियों के लिए: यह साबित होता है कि आर्थिक कठिनाइयों के बीच भी कौशल विकास और अकादमिक अनुशासन से सरकारी व स्वतंत्र मुकाम पाए जा सकते हैं। इच्छुक छात्र कला एवं शिल्प महाविद्यालय जैसे संस्थानों की प्रवेश प्रक्रियाओं की तैयारी समय रहते शुरू कर सकते हैं। • लोक कला प्रेमियों के लिए: टिकुली कला जैसी पारंपरिक शैलियों के संरक्षण से प्रामाणिक हस्तशिल्प उत्पादों की उपलब्धता बढ़ती है। कला पारखी अब सीधे तौर पर स्थानीय कारीगरों और नए मान्यता प्राप्त कलाकारों से जुड़ सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ दीपू कुमार को राष्ट्रीय युवा कला रत्न सम्मान मिलने की मुख्य वजह बिहार की लुप्त होती पारंपरिक टिकुली कला के संरक्षण में उनका निरंतर योगदान और अकादमिक समर्पण है। स्कूल के दिनों से शुरू हुआ उनका व्यक्तिगत संघर्ष विभिन्न संस्थागत उपलब्धियों से गुजरते हुए इस मुकाम तक पहुंचा। • पारंपरिक कला का संरक्षण: उन्होंने आधुनिक दौर में उपेक्षित हो रही ऐतिहासिक टिकुली कला को अपनी साधना का केंद्र बनाया। इस विधा को संरक्षित करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले जाने के प्रयासों ने चयन समिति का ध्यान आकर्षित किया। • वरिष्ठ गुरु का मार्गदर्शन: इस कला यात्रा को उच्च स्तर तक ले जाने में पद्मश्री अशोक कुमार विश्वास से मिली विधिवत तालीम और मार्गदर्शन ने निर्णायक भूमिका निभाई। वरिष्ठ मार्गदर्शन से उनकी कलात्मक शैली को राष्ट्रीय स्तर की परिपक्वता मिली। • निरंतर शैक्षणिक व रचनात्मक प्रदर्शन: पटना कला एवं शिल्प महाविद्यालय से पांच वर्षीय डिग्री के दौरान राज्य स्तरीय कला सम्मान और बिहार म्यूजियम में कृतियों का प्रदर्शन उनकी योग्यता का पुख्ता आधार बना। • शिक्षक के रूप में योगदान: वर्ष 2016 से जहानाबाद के मांदिल प्लस 2 स्कूल में कला शिक्षक के तौर पर नई पीढ़ी को लोक कला की शिक्षा देने का उनका कार्य इस चयन का प्रमुख आधार रहा। सवाल-जवाब 1. दीपू कुमार को कौन सा राष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया गया है? दीपू कुमार को पारंपरिक टिकुली कला और लोक कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए राष्ट्रीय युवा कला रत्न सम्मान से पुरस्कृत किया गया है। 2. दीपू कुमार मूल रूप से कहां के निवासी हैं और वर्तमान में क्या करते हैं? दीपू कुमार मूल रूप से पटना के रहने वाले हैं और वर्तमान में जहानाबाद के मांदिल प्लस 2 स्कूल में कला शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं। 3. दीपू कुमार ने अपनी कला की उच्च शिक्षा कहां से पूरी की? उन्होंने पटना स्थित कला एवं शिल्प महाविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में 20वीं रैंक प्राप्त कर पांच वर्षीय डिग्री पाठ्यक्रम पूरा किया। 4. छात्र जीवन में पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए दीपू ने क्या किया? आर्थिक तंगी और पिता का साया न होने के कारण उन्होंने अपनी स्कूली और कॉलेज की पढ़ाई का खर्च चलाने के लिए होम ट्यूशन पढ़ाया। 5. दीपू कुमार को टिकुली कला की बारीकियां सीखने में किसका मार्गदर्शन मिला? उन्हें अपने कला सफर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में पद्मश्री अशोक कुमार विश्वास से मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। 6. दीपू कुमार को पहले कौन से प्रमुख सम्मान और मंच मिल चुके हैं? उन्हें बिहार सरकार से राजकीय कला सम्मान मिल चुका है और उनकी बनाई चित्रकला को प्रतिष्ठित बिहार म्यूजियम में भी प्रदर्शित किया गया है। प्रेरणा और सबक अत्यंत अभावों और पिता के बिना पले-बढ़े दीपू कुमार की सफलता साबित करती है कि अनुशासन और अटूट लगन से किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है। • अभावों को बहाना न बनाएं: परिवार की कमजोर माली हालत और पिता का साया न होने के बावजूद दीपू ने ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई जारी रखी। आर्थिक तंगी को अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया। • अपनी रुचि को प्राथमिकता दें: स्कूल में डांट और मार सहने के बाद भी उन्होंने चित्रकला का अभ्यास नहीं छोड़ा। जिस विषय में गहरा लगाव हो, उसमें निरंतरता ही दक्षता लाती है। • सही मार्गदर्शन की तलाश करें: सीनियर की सलाह से कॉलेज की राह चुनी और पद्मश्री अशोक कुमार विश्वास से कला की बारीकियां सीखीं। आगे बढ़ने के लिए सक्षम गुरुओं से सीखना आवश्यक है। • सफलता के बाद भी जड़ें न छोड़ें: सरकारी नौकरी मिलने के बाद भी उन्होंने अपनी कला साधना बंद नहीं की, बल्कि छात्रों को सिखाते हुए अपनी विधा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। https://trendkia.com/success-stories/kopi-ke-pannon-para-rekhaen-khinchane-vale-dipu-kumar-ne-tikuli-kala-ko-dilai-rashtriya-chamaka-41835 TrendKia — Har trend, sabse pehle.