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  "type": "article",
  "title": "कॉर्पोरेट की ऊंची कमाई छोड़ गाजीपुर लौटे माधव कृष्ण, अब बच्चों को दे रहे तनावमुक्त और संस्कारी शिक्षा",
  "summary": "महानगरों की चकाचौंध और बड़े पैकेज को अलविदा कहकर माधव कृष्ण ने 2017 में गाजीपुर में स्कूल खोला, जहां बच्चों को बिना मानसिक दबाव के मातृभाषा, योग और पारंपरिक खेलों के जरिए पढ़ाया जा रहा है।",
  "content": "महानगरों की भागदौड़ भरी जिंदगी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारी-भरकम वेतन पैकेज को छोड़कर अपने गांव या जिले की ओर लौटना आसान फैसला नहीं होता। अधिकांश युवा जहां बड़े शहरों की सुख-सुविधाओं और ऊंचे ओहदों की तरफ भाग रहे हैं, वहीं गाजीपुर के माधव कृष्ण ने बिल्कुल उल्टी राह चुनी। प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों से उच्च शिक्षा हासिल करने और कॉर्पोरेट जगत में एक लंबा और कामयाब सफर तय करने के बाद उन्होंने अपनी मिट्टी का कर्ज चुकाने की ठानी। आज वे अपने गृह जनपद गाजीपुर में ‘द प्रेसिडियम इंटरनेशनल स्कूल’ के निदेशक के रूप में नई पीढ़ी को आधुनिक ज्ञान के साथ भारतीय संस्कृति, स्वास्थ्य और मानवीय मूल्यों से जोड़ने के मिशन में लगे हुए हैं।\n\nसिंगापुर में बेटे के साथ हुए अनुभव ने बदली सोच\nशिक्षा के क्षेत्र में कदम रखने का विचार माधव कृष्ण के मन में अचानक नहीं आया, बल्कि इसके पीछे उनके परिवार का एक बेहद निजी अनुभव रहा। कुछ वर्ष पहले उनका बेटा लगभग दो साल तक सिंगापुर में रहा था। उस दौरान उसका मन पढ़ाई में रत्ती भर भी नहीं लगता था और वह किताबों को एक भारी बोझ की तरह देखता था। आम भारतीय अभिभावकों की तरह माधव कृष्ण भी शुरू में बेटे पर गुस्सा होते थे और उसे डांटते-फटकारते थे, यहां तक कि कभी-कभार हाथ भी उठा देते थे।\n\nकुछ समय बाद उन्होंने महसूस किया कि सख्ती से बच्चे सुधरने की बजाय सहम जाते हैं। इसके बाद उन्होंने बेटे पर दबाव बनाना पूरी तरह बंद कर दिया। उन्होंने बच्चे को उसकी पसंद की गतिविधियों की पूरी आजादी दी, जिसमें कॉमिक्स पढ़ना और तैराकी करना शामिल था। इसका परिणाम बेहद सकारात्मक रहा और कुछ ही दिनों में बच्चे की रुचि स्वतः ही पढ़ाई में जागने लगी। इस घटना ने माधव कृष्ण को भीतर तक झकझोर दिया। उन्हें समझ आया कि किसी भी इंसान की नींव तैयार करने में प्राथमिक शिक्षा का कितना गहरा योगदान होता है और डर के माहौल में सीखने की क्षमता खत्म हो जाती है।\n\nमातृभाषा का सम्मान और रटने की परंपरा से मुक्ति\nहमारे देश में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बढ़ती बाढ़ के बीच भाषा को लेकर एक अजीब विडंबना देखने को मिलती है। माधव कृष्ण का स्पष्ट मानना है कि अधिकांश कॉन्वेंट या अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में सारा जोर केवल अंग्रेजी भाषा सिखाने पर लगा दिया जाता है। एक बच्चा स्कूल में छह घंटे पूरी तरह अंग्रेजी के माहौल में रहता है, लेकिन घर आते ही अपने माता-पिता और परिजनों के साथ हिंदी अथवा अपनी क्षेत्रीय बोली भोजपुरी में बातचीत करता है। ऐसे दोहरे भाषाई दबाव के कारण बच्चा किसी विषय की मूल अवधारणा को गहराई से नहीं समझ पाता।\n\nमाधव कृष्ण के अनुसार, ज्ञान हासिल करने की प्रक्रिया में भाषा को कभी भी रुकावट नहीं बनना चाहिए। बच्चों को पहले उनकी अपनी मातृभाषा और स्थानीय परिवेश से जोड़कर किसी भी विषय का सार समझाया जाना चाहिए। अगर कोई बच्चा किसी सिद्धांत को केवल अंग्रेजी में रटकर परीक्षा पास कर रहा है, तो आगे चलकर उच्च शिक्षा और व्यावहारिक जीवन में उसे गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी वैचारिक दर्शन को धरातल पर क्रियान्वित करने के उद्देश्य से उन्होंने साल 2017 में ‘द प्रेसिडियम इंटरनेशनल स्कूल’ की नींव रखी।\n\nस्कूल का अनूठा माहौल: नाम से पुकारने की परंपरा\nगाजीपुर में इस विद्यालय को शुरू करने के पीछे माधव कृष्ण का प्रमुख मकसद बच्चों के सिर से परीक्षा और पढ़ाई के मानसिक खौफ को पूरी तरह खत्म करना था। उन्होंने स्कूल परिसर के भीतर एक बहुत ही आत्मीय और अलग नियम लागू किया। विद्यालय के शिक्षक, प्रधानाचार्य और स्वयं निदेशक बच्चों को उपनाम या रोल नंबर के बजाय हमेशा उनके वास्तविक नाम से पुकारते हैं। इस छोटी सी पहल से हर बच्चे को यह एहसास होता है कि उसकी अपनी एक खास पहचान है, जिससे उसका आत्मसम्मान और आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा, वे विद्यार्थियों के माता-पिता के साथ भी निरंतर खुला और सीधा संवाद बनाए रखने को अनिवार्य मानते हैं।\n\nशारीरिक तंदुरुस्ती और पारंपरिक भारतीय खेल\nशिक्षा का मतलब केवल किताबों के पन्नों को पलटना नहीं है। माधव कृष्ण का यह दृढ़ विश्वास है कि एक अस्वस्थ या कमजोर शरीर कभी भी एक तेज और उर्वर दिमाग को विकसित नहीं कर सकता। अगर शरीर सुस्त रहेगा तो उसका सीधा नकारात्मक असर मानसिक एकाग्रता पर पड़ेगा। इसी कारण उनके स्कूल में विद्यार्थियों को केवल चारदीवारी और किताबों तक सीमित नहीं रखा जाता।\n\nस्कूल में बच्चों को मिट्टी और मैदान से जोड़ने के लिए कबड्डी तथा खो-खो जैसे पारंपरिक भारतीय मैदानी खेलों का नियमित प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके अलावा, स्कूल के दैनिक रूटीन की शुरुआत ही सामूहिक रूप से 12 सूर्य नमस्कार के अभ्यास के साथ होती है। इस दैनिक योगाभ्यास का प्राथमिक लक्ष्य विद्यार्थियों के शारीरिक सौष्ठव और मानसिक संतुलन को एक साथ मजबूत बनाना है।\n\nबीमारी से जूझने के दौरान योग और दर्शन से जुड़ाव\nअपनी जीवन यात्रा को याद करते हुए माधव कृष्ण अपने छात्र जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू भी साझा करते हैं। बचपन के दिनों में खेलकूद के दौरान उनकी नाक पर गंभीर चोट लग गई थी। इस पुरानी चोट के कारण आगे चलकर उन्हें साइनोसाइटिस की गंभीर बीमारी ने घेर लिया। जब वे एनआईटी राउरकेला से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे, तब उनकी सेहत लगातार नासाज रहती थी। वे नियमित रूप से जिम जाकर व्यायाम करते थे, लेकिन इसके बावजूद उनके शरीर में अत्यधिक थकान बनी रहती थी और वे चाहकर भी पढ़ाई में पूरा ध्यान नहीं लगा पाते थे।\n\nशारीरिक और मानसिक रूप से परेशान होने के इसी दौर में उनका परिचय श्री श्री रवि शंकर के ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ संस्थान से हुआ। वहां उन्होंने योग, प्राणायाम और सुदर्शन क्रिया की बारीकियों को समझा और अपने दैनिक जीवन में उतारा। योग के नियमित अभ्यास से उनका स्वास्थ्य धीरे-धीरे पूरी तरह ठीक हो गया। शारीरिक कायाकल्प के बाद उनकी रुचि भारत के गहरे आध्यात्मिक चिंतन की तरफ मुड़ी और वे रामकृष्ण परमहंस के दार्शनिक विचारों के सान्निध्य में आए। इसके बाद उन्होंने प्राचीन वेदों, उपनिषदों, अद्वैत वेदांत, श्रीमद्भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र का गहन और व्यवस्थित अध्ययन किया।\n\nस्वामी विवेकानंद की प्रेरणा और गाजीपुर वापसी\nप्राचीन भारतीय वांग्मय के अध्ययन के दौरान माधव कृष्ण स्वामी विवेकानंद के ओजस्वी विचारों से गहरे रूप से प्रभावित हुए। उनका मानना है कि स्वामी विवेकानंद ने लगभग 150 वर्ष पूर्व जिस आधुनिक, वैज्ञानिक और खुले विचारों वाली शिक्षा प्रणाली की बात कही थी, उसकी प्रासंगिकता आज इक्कीसवीं सदी में और भी ज्यादा बढ़ गई है। अपने भीतर आए इस गहरे आध्यात्मिक और बौद्धिक परिवर्तन के उपरांत उन्होंने गाजीपुर के सुप्रसिद्ध बाबा गंगाराम दास आश्रम से विधिवत दीक्षा ग्रहण की।\n\nआज माधव कृष्ण आधुनिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लुभावने ऑफर्स और सुख-सुविधाओं से दूर होकर अपने गृह जनपद गाजीपुर के बच्चों का भविष्य संवारने में तल्लीन हैं। वे एक ऐसा शैक्षिक मॉडल खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं जिसमें आधुनिक विज्ञान और सूचना तकनीक के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, नैतिक संस्कार और उत्कृष्ट शारीरिक स्वास्थ्य का बेहतरीन संगम हो।\n\nइसका आप पर असर\nयह पहल दर्शाती है कि बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा में तनाव और रटने की पद्धति को हटाकर खेल, योग और मातृभाषा को जोड़ने से उनका मानसिक विकास तेजी से हो सकता है।\n\n• अभिभावकों के लिए: बच्चों पर अत्यधिक अंक लाने का दबाव बनाने या गलती पर डांटने-मारने के बजाय उनकी व्यक्तिगत रुचियों को बढ़ावा दें। जब बच्चे बिना डर के सीखते हैं, तो उनका पढ़ाई में स्वाभाविक रूप से मन लगने लगता है।\n• भाषा और पढ़ाई की समझ: अंग्रेजी सीखने की होड़ में मातृभाषा और स्थानीय भाषा की उपेक्षा न करें। किसी भी कठिन विषय की मूल बातें पहले घर की भाषा में समझाई जाएं तो बच्चे का बौद्धिक आधार बेहद मजबूत होता है।\n• गाजीपुर और पूर्वांचल में: ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों के बच्चों को अपने ही जिले में उच्च स्तरीय आधुनिक शिक्षा के साथ पारंपरिक मूल्यों और खेलों का लाभ मिल रहा है। स्थानीय परिवारों को अपने बच्चों की बेहतर बुनियादी शिक्षा के लिए महानगरों की ओर पलायन करने की आवश्यकता नहीं होगी।\n• शारीरिक स्वास्थ्य और दिनचर्या: दिन की शुरुआत सूर्य नमस्कार और मैदानी खेलों से करने से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। नियमित योगाभ्यास से पढ़ाई के दौरान होने वाली मानसिक थकान और तनाव से राहत मिलती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nमाधव कृष्ण द्वारा कॉर्पोरेट करियर छोड़कर गाजीपुर में स्कूल खोलने का फैसला उनके अपने बेटे की शैक्षिक कठिनाइयों और उनके स्वयं के स्वास्थ्य संघर्षों के गहरे अनुभवों से उपजा है।\n\n• बेटे का सिंगापुर में अनुभव: सिंगापुर प्रवास के दौरान उनके बेटे का पढ़ाई में मन नहीं लगता था और वह दबाव महसूस करता था। जब उन्होंने डांटना-मारना बंद कर उसे कॉमिक्स और तैराकी की छूट दी, तो बच्चे का पढ़ाई में स्वाभाविक मन लगा, जिससे उन्हें प्राथमिक शिक्षा की संवेदनशीलता समझ आई।\n• अंग्रेजी बनाम मातृभाषा का द्वंद्व: उन्होंने देखा कि अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में बच्चे केवल भाषा के बोझ तले दबकर विषयों को रट रहे हैं, जबकि घर पर वे हिंदी या भोजपुरी बोलते हैं। भाषा की इस बाधा को खत्म करने के लिए उन्होंने ऐसा संस्थान बनाने का निर्णय लिया जहां मातृभाषा में कॉन्सेप्ट समझाए जाएं।\n• निजी स्वास्थ्य और आध्यात्मिक बदलाव: छात्र जीवन में साइनोसाइटिस और थकान से जूझने के बाद योग, प्राणायाम, वेदों के अध्ययन और स्वामी विवेकानंद के दर्शन ने उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी। इसी आंतरिक परिवर्तन ने उन्हें 2017 में गाजीपुर में ‘द प्रेसिडियम इंटरनेशनल स्कूल’ स्थापित करने के लिए प्रेरित किया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. माधव कृष्ण कौन हैं और वे वर्तमान में क्या कर रहे हैं?\nमाधव कृष्ण उच्च शिक्षण संस्थानों से शिक्षित और पूर्व कॉर्पोरेट पेशेवर हैं, जो वर्तमान में गाजीपुर में ‘द प्रेसिडियम इंटरनेशनल स्कूल’ के निदेशक के रूप में बच्चों को आधुनिक और संस्कारी शिक्षा दे रहे हैं।\n\n2. माधव कृष्ण ने शिक्षा के क्षेत्र में आने का फैसला क्यों किया?\nसिंगापुर में अपने बेटे की पढ़ाई में अरुचि और बाद में बिना दबाव के उसकी सीखने की क्षमता लौटने की घटना ने उन्हें प्राथमिक शिक्षा के महत्व को समझाते हुए स्कूल खोलने के लिए प्रेरित किया।\n\n3. ‘द प्रेसिडियम इंटरनेशनल स्कूल’ की स्थापना कब हुई थी?\nमाधव कृष्ण ने बच्चों पर से पढ़ाई का मानसिक दबाव कम करने के उद्देश्य से साल 2017 में इस विद्यालय की स्थापना की थी।\n\n4. माधव कृष्ण के स्कूल में बच्चों को पुकारने का क्या नियम है?\nस्कूल में शिक्षक, प्रिंसिपल और डायरेक्टर बच्चों को रोल नंबर के बजाय उनके वास्तविक नाम से पुकारते हैं ताकि उनका आत्मविश्वास और व्यक्तिगत पहचान मजबूत हो।\n\n5. स्कूल की दैनिक शुरुआत किस अभ्यास से होती है?\nस्कूल में बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए सुबह की शुरुआत 12 सूर्य नमस्कार के अभ्यास से की जाती है।\n\n6. माधव कृष्ण ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई किस संस्थान से पूरी की थी?\nउन्होंने एनआईटी राउरकेला से अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की थी, जहां वे साइनोसाइटिस की समस्या से जूझ रहे थे।\n\n7. माधव कृष्ण ने किस संस्था और आश्रम से मार्गदर्शन और दीक्षा प्राप्त की?\nउन्होंने श्री श्री रवि शंकर के ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ से योग सीखा और बाद में गाजीपुर के बाबा गंगाराम दास आश्रम से औपचारिक दीक्षा ली।\n\nप्रेरणा और सबक\nमाधव कृष्ण की जीवन यात्रा साबित करती है कि भौतिक सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर अपनी जड़ों के लिए किया गया कार्य समाज में स्थायी और सकारात्मक बदलाव ला सकता है।\n\n• सहानुभूतिपूर्ण परवरिश: बच्चों को अनुशासन सिखाने के लिए डांट-फटकार या भय का सहारा लेने के बजाय उनकी पसंद का सम्मान करें और उन्हें खुलकर सीखने का अवसर दें।\n• अपनी जड़ों की ओर वापसी: करियर में उच्चतम मुकाम हासिल करने के बाद अपने गृह जिले और समाज के पिछड़े तबकों के उत्थान के लिए काम करना जीवन को वास्तविक सार्थकता देता है।\n• स्वास्थ्य ही असली पूंजी: कठिन बीमारियों और शारीरिक थकावट से निपटने के लिए योग और प्राणायाम जैसे पारंपरिक भारतीय अभ्यासों को दैनिक दिनचर्या का अभिन्न अंग बनाएं।\n• व्यावहारिक ज्ञान का महत्व: परीक्षा में केवल रटकर अंक लाने के बजाय किसी विषय की वास्तविक समझ, नैतिक संस्कार और खेलकूद को शिक्षा का आधार बनाना चाहिए।",
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  "publishedAt": "2026-09-19",
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