कोटा की एक नन्ही दुकान ने कैसे तीन पीढ़ियों तक बुनी कामयाबी की दास्तान राजस्थान के कोटा में सिर्फ ₹3,000 से शुरू हुई कपड़ों की अल्टरेशन की दुकान आज चार दुकानों और 15 परिवारों का सहारा बन चुकी है, जहां अब परिवार की तीसरी पीढ़ी भी कैंची और फीता थाम चुकी है। कभी एक चद्दर के नीचे लगने वाली छोटी सी दुकान आज कोटा शहर की एक बड़ी पहचान बन चुकी है। राजस्थान के इस कोचिंग हब में जहां हर रोज नए-नए ब्रांड बाजार में उतरते हैं, वहीं गुमानपुरा में एक ऐसा ठिकाना भी है जो कपड़ों को परफेक्ट फिटिंग देने के हुनर के दम पर पूरे शहर का भरोसा जीत चुका है। इस दुकान का नाम है जनता अल्टरेशन, और इसकी कहानी सूई-धागे के जरिए बुनी गई मेहनत और भरोसे की एक अनोखी मिसाल है। आज इसी दुकान पर परिवार की तीसरी पीढ़ी भी कैंची और फीता संभाल चुकी है। दुकान से जुड़े साबिर हुसैन बताते हैं कि इस सफर की नींव करीब 45 साल पहले उनके वालिद ने रखी थी। उस दौर में कोटा के ज्यादातर लोग अल्टरेशन शब्द से ठीक से वाकिफ भी नहीं थे। तब लोगों के लिए अल्टरेशन का मतलब बस पैंट की लंबाई घटाना या ढीली सिलाई को दुरुस्त कर देना भर था। कपड़ों के सही नाप और फैशन की बारीकियां इसी दुकान ने पूरे शहर को समझाईं। परिवार के बुजुर्गों ने इससे पहले कई तरह के कारोबार आजमाए थे, लेकिन असली बरकत उन्हें इसी टेलरिंग की लाइन में मिली। शुरुआत बेहद मुश्किल थी। एक छोटी सी दुकान किराए पर ली गई और उस जमाने में महज ₹3,000 की पगड़ी देकर इस काम की बुनियाद डाली गई। वही छोटी सी रकम आज एक बड़ी मिसाल बन चुकी है। चार भाइयों की मेहनत और नई पीढ़ी की एंट्री वक्त बदला, कोटा शहर देश के सबसे बड़े कोचिंग हब के रूप में उभरा, लेकिन जनता अल्टरेशन पर लोगों का भरोसा कभी नहीं डगमगाया। परिवार में सबसे बड़े भाई शाकिर हुसैन हैं और उनसे छोटे इकबाल हुसैन। दोनों ने दिन-रात एक करके इस काम को खड़ा किया। अब साबिर हुसैन और उनके छोटे भाई इसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। कहानी का सबसे खूबसूरत मोड़ यह है कि अब इस दुकान में तीसरी पीढ़ी की भी शानदार एंट्री हो चुकी है। साबिर हुसैन का भतीजा भी अब इस पुश्तैनी काम को और आधुनिक व बड़ा बनाने में पूरी शिद्दत से जुट गया है। तीन कारीगरों से 15 परिवारों तक का सफर साबिर हुसैन कहते हैं, "आज से 45 साल पहले जब काम शुरू हुआ था, तब हमारे पास सिर्फ 3 कारीगर हुआ करते थे। लेकिन आज हमारे पास 10 से ज्यादा पक्के कारीगर काम कर रहे हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो पिछले 15 से 20 सालों से हमारे साथ एक परिवार की तरह जुड़े हुए हैं।" शुरुआत भले एक दुकान से हुई हो, लेकिन आज इनके पास 4 दुकानें हैं, जिनमें से तीन किराए की हैं। मेहनत की बदौलत आज इस काम से सिर्फ एक परिवार का ही नहीं, बल्कि दुकान में काम करने वाले 14 से 15 अन्य कारीगरों के परिवारों का भी पेट पल रहा है। रोजाना 100 ग्राहक और संतुष्टि की सबसे बड़ी ताकत इस दुकान पर हर दिन औसतन 100 से ज्यादा ग्राहक अपने कपड़ों की फिटिंग दुरुस्त कराने पहुंचते हैं। पुरानी यादें ताजा करते हुए साबिर हुसैन बताते हैं कि पहले के जमाने में भी इस काम से इतनी अच्छी कमाई हो जाती थी कि घर का खर्च आराम से चल जाए, और आज भी मेहनत का पूरा फल मिल रहा है। उनके मुताबिक ग्राहकों का अटूट विश्वास और उनके चेहरे की खुशी ही उनकी सबसे बड़ी यूएसपी है। 45 साल पहले बोया गया वह नन्हा सा बीज आज एक ऐसा बरगद बन चुका है, जिसके सूई-धागे के मजबूत रिश्ते ने पूरे कोटा शहर को अपना मुरीद बना रखा है। इसका आप पर असर • भारत में: यह कहानी दिखाती है कि बहुत छोटी पूंजी और एक हुनर के दम पर भी सालों की मेहनत से टिकाऊ कारोबार और कई परिवारों की आजीविका खड़ी की जा सकती है। • कोटा में: गुमानपुरा में मौजूद इस दुकान से स्थानीय लोगों को भरोसेमंद अल्टरेशन सेवा मिलती है और 14 से 15 कारीगर परिवारों को रोजगार भी। सवाल-जवाब 1. जनता अल्टरेशन दुकान कहां स्थित है? यह दुकान राजस्थान के कोटा शहर के गुमानपुरा इलाके में स्थित है। 2. यह कारोबार कब और कितनी रकम से शुरू हुआ था? इसकी शुरुआत करीब 45 साल पहले हुई थी, जब एक छोटी दुकान किराए पर लेकर ₹3,000 की पगड़ी देकर काम की बुनियाद रखी गई। 3. इस दुकान को किसने शुरू किया था? इसे साबिर हुसैन के वालिद ने शुरू किया था, और आज परिवार की तीसरी पीढ़ी भी इससे जुड़ चुकी है। 4. परिवार के कौन-कौन भाई इस काम से जुड़े हैं? सबसे बड़े भाई शाकिर हुसैन, उनसे छोटे इकबाल हुसैन, और फिर साबिर हुसैन व उनके छोटे भाई इस काम को संभाल रहे हैं। 5. अब दुकान में कितने कारीगर और कितनी दुकानें हैं? शुरुआत में सिर्फ 3 कारीगर थे, जबकि आज 10 से ज्यादा पक्के कारीगर हैं और परिवार के पास कुल 4 दुकानें हैं, जिनमें तीन किराए की हैं। 6. इस दुकान पर रोजाना कितने ग्राहक आते हैं? यहां हर दिन औसतन 100 से ज्यादा ग्राहक अपने कपड़ों की फिटिंग ठीक कराने आते हैं। 7. यह कारोबार कितने परिवारों का सहारा बना है? इस काम से न सिर्फ यह एक परिवार, बल्कि दुकान में काम करने वाले 14 से 15 अन्य कारीगरों के परिवारों की भी आजीविका चलती है। प्रेरणा और सबक इस परिवार के सफर से कुछ सीधी-सादी लेकिन असरदार सीख मिलती हैं: • एक ही काम पर टिके रहना: बुजुर्गों ने कई कारोबार आजमाने के बाद टेलरिंग को चुना और फिर उसी में गहराई से जुटे रहे, जिससे भरोसा और महारत दोनों बनी। • छोटी शुरुआत से न घबराना: महज ₹3,000 की पगड़ी और तीन कारीगरों से शुरू हुआ काम आज चार दुकानों तक पहुंचा। • ग्राहक की संतुष्टि को केंद्र में रखना: कमाई से पहले ग्राहक के चेहरे की खुशी को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानना ही उनकी पहचान बना। • कारीगरों को परिवार मानना: 15 से 20 साल से जुड़े कारीगरों के साथ अपनेपन के रिश्ते ने कारोबार को स्थिरता दी। • पीढ़ी दर पीढ़ी हुनर सौंपना: अगली पीढ़ी को काम में जोड़कर विरासत को और आधुनिक व बड़ा बनाने का रास्ता खुला रखा। https://trendkia.com/success-stories/kota-ki-eka-nanhi-dukana-ne-kaise-tina-pirhiyon-taka-buni-kamayabi-ki-dastana-4512 TrendKia — Har trend, sabse pehle.