लगातार छह असफलताओं के बाद भी शशांक गौरव ने नहीं मानी हार, अचूक रणनीति से बीपीएससी में हासिल किया दूसरा स्थान राष्ट्रीय स्तर की प्रशासनिक परीक्षाओं में बार-बार मिली निराशा और एक अहम फिजिकल टेस्ट में बाहर होने के बाद, छपरा के एक युवा ने अपनी पढ़ाई के तरीके में बड़ा बदलाव किया। उनकी यह जिद और नई रणनीति आखिरकार रंग लाई और उन्होंने राज्य की प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा में दूसरा स्थान हासिल कर एक मिसाल कायम की। भारत में प्रशासनिक सेवा का हिस्सा बनने की राह बेहद कठिन मानी जाती है, जहां कई वर्षों के कठोर अनुशासन और भयानक निराशाओं का सामना करने की हिम्मत चाहिए होती है। हर साल लाखों युवा अपने निजी जीवन को पीछे छोड़कर खुद को इस अंतहीन तैयारी में झोंक देते हैं, लेकिन ज्यादातर को चयन प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में केवल असफलता ही हाथ लगती है। बिहार के सारण जिले से ताल्लुक रखने वाले एक ऐसे ही होनहार छात्र के लिए यह सफर लगातार झटकों और निराशाओं के एक लंबे दौर से होकर गुजरा। हालांकि, तमाम मुश्किलों को पार करते हुए शशांक गौरव ने बीपीएससी (बिहार लोक सेवा आयोग) की बहुचर्चित परीक्षा में दूसरा स्थान हासिल किया है। उन्होंने अपनी हार को जिस तरह से जीत में बदला है, वह मानसिक मजबूती और सही रणनीति का एक बड़ा उदाहरण बन गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के माहौल ने बदला नजरिया प्रशासनिक ढांचे में शामिल होने का सपना इस युवा के मन में बचपन से नहीं था। छपरा के बनियापुर प्रखंड के अंतर्गत आने वाले पंचमहला सहजीतपुर पंचायत के मूल निवासी शशांक ने अपनी शुरुआती पढ़ाई के बाद एक बिल्कुल अलग रास्ता चुना था। उन्होंने देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में से एक, दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में दाखिला लिया और वहां जूलॉजी (प्राणी विज्ञान) में बीएससी (ऑनर्स) की पढ़ाई शुरू की। यह विश्वविद्यालय का वह जीवंत माहौल था जिसने अनजाने में उनके भविष्य की दिशा बदल दी। ग्रेजुएशन के उन वर्षों के दौरान, कॉलेज में कई ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते थे जिनमें सेवारत आईएएस और आईपीएस अधिकारी छात्रों से संवाद करने आते थे। जमीन पर काम करने वाले इन अधिकारियों के अनुभव सुनने और उनसे सीधे बातचीत करने के बाद उन्हें एक बहुत बड़ी बात समझ में आई। उन्हें एहसास हुआ कि एक प्रशासनिक अधिकारी के पास समाज के निचले तबके तक बदलाव लाने और शासन व्यवस्था को बेहतर बनाने की कितनी बड़ी ताकत होती है। इसी प्रभाव ने उनका ध्यान विज्ञान से हटाकर लोक सेवा की ओर मोड़ दिया और उन्होंने इस कठिन परीक्षा की तैयारी के गहरे समंदर में उतरने का कड़ा फैसला लिया। राष्ट्रीय स्तर पर बार-बार मिली निराशा पूरी तरह से तैयारी में जुटने के बाद, उन्होंने सबसे पहले देश की सबसे बड़ी प्रशासनिक परीक्षा को अपना लक्ष्य बनाया। लेकिन इस प्रतियोगिता की असली चुनौती जल्द ही उनके सामने आ गई। लगातार चार वर्षों तक उन्होंने यूपीएससी परीक्षा में अपनी किस्मत आजमाई और इसके विशाल सिलेबस को समझने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी। हालांकि उनकी अकादमिक क्षमता इतनी मजबूत थी कि उन्होंने कुछ प्रयासों में प्रारंभिक चरण पार कर मुख्य परीक्षा तक का सफर तय किया, लेकिन अंतिम चयन सूची में उनका नाम कभी जगह नहीं बना सका। उनकी इस शुरुआती यात्रा का सबसे दर्दनाक पल एक दूसरी परीक्षा के दौरान आया। देश की सेवा करने के एक अन्य विकल्प के रूप में, उन्होंने सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (सीएपीएफ) में असिस्टेंट कमांडेंट पद के लिए परीक्षा दी। उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने पूरे भारत में 57वीं रैंक हासिल कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। लेकिन यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिक सकी। अनिवार्य शारीरिक दक्षता परीक्षा (फिजिकल टेस्ट) के दौरान वे जरूरी मानकों को पूरा करने में चूक गए। इस अप्रत्याशित हार का मतलब था कि इतनी शानदार रैंक हासिल करने के बावजूद यह सुनहरा मौका उनके हाथ से फिसल गया और उन्हें एक और टूटे हुए सपने का सामना करना पड़ा। राज्य आयोग के लिए बदली अपनी दिशा राष्ट्रीय स्तर पर लगातार मिली इन नाकामियों से हार मानने के बजाय, उन्होंने अपना पूरा ध्यान राज्य स्तर की प्रशासनिक सेवाओं की ओर लगा दिया। हालांकि, यह बदलाव भी इतना आसान नहीं था। राज्य आयोग की परीक्षा में उनका पहला प्रयास पूरी तरह से एक प्रयोग था। उन्होंने इसे केवल परीक्षा के पैटर्न और माहौल को समझने के अवसर के तौर पर देखा और बिना किसी खास तैयारी के इसमें हिस्सा लिया। दूसरी तरफ, उनके दूसरे प्रयास में पूरी शिद्दत और कड़ी मेहनत शामिल थी। उन्होंने सिलेबस को खंगाल डाला और एक सकारात्मक नतीजे की उम्मीद की। लेकिन यहां उन्हें एक अलग तरह की निराशा का सामना करना पड़ा, जब वे प्रारंभिक परीक्षा (प्रीलिम्स) का कटऑफ पार करने से महज कुछ अंकों से चूक गए। इतने करीब आकर हारना किसी का भी मनोबल तोड़ सकता था। लेकिन अलग-अलग मोर्चों पर लगातार मिल रही हार से हताश होने के बजाय, उन्होंने इस छोटी सी चूक को एक सीख के तौर पर लिया। उन्होंने अपनी कमियों को पहचानने का एक कठोर दौर शुरू किया, अपनी गलतियों का गहराई से विश्लेषण किया और अगली परीक्षा के लिए अपनी पूरी रणनीति को सिरे से बदल डाला। रणनीतिक तैयारी और छोटे सत्रों का महत्व जब वे अपने तीसरे प्रयास के मैदान में उतरे, तो उनकी नई कार्यप्रणाली और उनकी अटूट मेहनत का सही तालमेल बैठ चुका था। उन्होंने बेहद कठिन मानी जाने वाली प्रारंभिक परीक्षा को पार किया, थका देने वाली मुख्य परीक्षा में शानदार प्रदर्शन किया और अंततः साक्षात्कार के चरण में भी सफलता के झंडे गाड़ दिए। पूरे राज्य में दूसरा सबसे बड़ा स्कोर हासिल करके, उन्होंने अपने सालों के संघर्ष को सार्थक साबित कर दिया। उनकी इस खास तैयारी ने सितंबर 2023 के बाद रफ्तार पकड़ी थी, जिसके बाद 2024 और 2025 के दौरान उन्होंने खुद को बाहरी दुनिया से पूरी तरह अलग कर लिया और अपना सौ प्रतिशत ध्यान केवल किताबों पर केंद्रित रखा। उनकी इस शानदार जीत का एक बड़ा कारण यह था कि वे छंटनी की इस प्रक्रिया को अच्छी तरह समझ चुके थे। वे जानते थे कि प्रारंभिक परीक्षा आंकड़ों के हिसाब से सबसे खतरनाक चरण है, जिसे मुख्य रूप से ज्यादातर उम्मीदवारों को बाहर करने के लिए ही तैयार किया जाता है। इससे निपटने के लिए, उन्होंने प्रीलिम्स के सिलेबस को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया। परीक्षा के दबाव में तथ्यों की सटीकता बनाए रखने के लिए उन्होंने बार-बार रिवीजन करने पर जोर दिया। उनकी दिनचर्या रट्टा मारने के बजाय एक संतुलित उत्पादकता का जीता-जागता उदाहरण थी। सुबह नौ बजे अपनी पढ़ाई शुरू करने वाले शशांक जानबूझकर लगातार लंबे समय तक बैठकर पढ़ने से बचते थे। इसके बजाय, उन्होंने अपने दिन को तीन या चार अत्यधिक केंद्रित अध्ययन सत्रों में बांट लिया था। दिमागी थकान से बचने के लिए, उन्होंने अपनी दिनचर्या में शाम की सैर को अनिवार्य रूप से शामिल किया, ताकि रात के अध्ययन सत्र में बैठने से पहले उनका दिमाग पूरी तरह से तरोताजा हो सके। काम को बांटने के इस व्यवस्थित तरीके ने उनकी मानसिक स्पष्टता को बनाए रखा और उन्हें उस शारीरिक थकान से बचाया जो अक्सर लंबे समय तक तैयारी करने वाले छात्रों को अपना शिकार बना लेती है। परिवार का मजबूत सहारा और मानसिक संघर्ष इन सलीके से बने टाइमटेबल और सटीक रणनीतियों के पीछे एक गहरा मानसिक और भावनात्मक संघर्ष भी छिपा था। राष्ट्रीय स्तर पर चार हार, एक असफल फिजिकल टेस्ट और फिर राज्य स्तर पर बहुत कम अंकों से चूक जाने के बाद, उनके मन में खुद को लेकर भारी संदेह पैदा होने लगा था। हताशा के उन काले दिनों में, वे अक्सर अपनी ही क्षमताओं पर सवाल उठाने लगते थे और सोचते थे कि क्या वे सच में उस कठिन रास्ते के लिए बने भी हैं जिसे उन्होंने चुना है। कमजोरी के इन पलों में, उनका अपना परिवार एक मजबूत ढाल बनकर उनके साथ खड़ा रहा। उनके पिता और बड़े भाई ने लगातार उनके लिए प्रेरणा का काम किया और उनके मन में उठ रहे हर शक को दूर किया। जब भी किसी नई असफलता का बोझ उनके इरादों को तोड़ने की कोशिश करता, उनका परिवार उन्हें वह मानसिक सहारा देता जिसकी मदद से वे वापस अपनी किताबों की तरफ लौट पाते। वे खुद इस बात को खुले तौर पर स्वीकार करते हैं कि बिना इस बेजोड़ भावनात्मक समर्थन के, इतनी लंबी और दर्दनाक लड़ाई लड़ना उनके लिए लगभग असंभव था। संघर्ष करने वाले युवाओं के लिए एक मिसाल आज, छपरा का यह होनहार युवा उस व्यवस्थित लगन की ताकत का जीता-जागता प्रमाण है। उनका यह सफर इस मिथक को तोड़ता है कि सफलता एक सीधी रेखा में चलती है या रातोंरात मिल जाती है। एक असफल प्रयास को अपना अंतिम परिणाम मानने से इनकार करके, और हर हार को अपने अगले प्रदर्शन को सुधारने के एक अवसर के रूप में देखकर, उन्होंने सचमुच अपनी सफलता की कहानी खुद लिखी है। उनका यह सफर उन हजारों निराश छात्रों के लिए एक ठोस सबक है जो अपनी लगातार हो रही हार के कारण अपने सपनों को छोड़ने का विचार कर रहे हैं। इंसान केवल तभी हारता है जब वह पूरी तरह से कोशिश करना छोड़ देता है। इसका आप पर असर • प्रतियोगी छात्रों के लिए: यह कहानी उन लाखों छात्रों को अपनी रणनीति में बदलाव करने की अहमियत सिखाती है जो लगातार असफलताओं के बाद निराश होकर पढ़ाई छोड़ने का मन बना लेते हैं। सवाल-जवाब 1. शशांक गौरव ने बीपीएससी परीक्षा में कौन सी रैंक हासिल की? शशांक गौरव ने बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) की परीक्षा में अपने तीसरे प्रयास में पूरे राज्य में दूसरी रैंक हासिल की। 2. बीपीएससी से पहले शशांक ने किस परीक्षा की तैयारी की थी? बीपीएससी से पहले उन्होंने लगातार चार बार यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा दी थी और सीएपीएफ में भी 57वीं रैंक हासिल की थी, लेकिन वे फिजिकल टेस्ट में बाहर हो गए थे। 3. शशांक गौरव मूल रूप से कहां के रहने वाले हैं? वे बिहार के सारण (छपरा) जिले के बनियापुर प्रखंड स्थित पंचमहला सहजीतपुर पंचायत के रहने वाले हैं। 4. शशांक की दिनचर्या में पढ़ाई का क्या पैटर्न था? वे सुबह 9 बजे पढ़ाई शुरू करते थे और लगातार पढ़ने के बजाय अपने दिन को तीन-चार छोटे और केंद्रित अध्ययन सत्रों में बांटते थे, जिसके बीच में वे टहलने का समय भी निकालते थे। 5. सिविल सेवा में जाने की प्रेरणा उन्हें कहां से मिली? दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात कई आईएएस और आईपीएस अधिकारियों से हुई, जिनसे प्रेरित होकर उन्होंने समाज में बदलाव लाने के लिए यह रास्ता चुना। प्रेरणा और सबक • कमियों का सटीक मूल्यांकन: लगातार हारने के बाद शशांक ने केवल मेहनत नहीं बढ़ाई, बल्कि अपनी गलतियों की गहराई से पहचान कर रणनीति को पूरी तरह बदला। • स्मार्ट स्टडी बनाम रट्टा: लंबे समय तक एक साथ पढ़ने के बजाय छोटे और केंद्रित अध्ययन सत्र अपनाकर उन्होंने अपनी दिमागी थकान को कम किया। • प्राथमिकता तय करना: परीक्षा के सबसे कठिन चरण (प्रीलिम्स) को पहचान कर, उस पर सबसे ज्यादा समय और फोकस लगाया। • मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान: पढ़ाई के बीच शाम की सैर को अनिवार्य बनाकर उन्होंने खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से तरोताजा रखा। https://trendkia.com/success-stories/lagatara-chhaha-asaphalataon-ke-bada-bhi-shashank-gaurav-ne-nahin-mani-hara-achuka-rananiti-se-bpsc-men-hasila-kiya-dusara-sthana-9435 TrendKia — Har trend, sabse pehle.