# लखीमपुर के बुजुर्ग पशुपालक ने पांच भेड़ों से खड़ा किया बड़ा कुनबा, डेढ़ सौ मवेशी और जैविक खाद से बदली माली हालत

> लखीमपुर खीरी के पड़रिया तुला गांव निवासी 65 वर्षीय साहेब लाल ने महज पांच भेड़ों से पशुपालन का काम शुरू किया था, जो आज बढ़कर डेढ़ सौ भेड़ों का बड़ा झुंड बन चुका है। भेड़ों की बिक्री के साथ-साथ उनके बाड़े से मिलने वाली जैविक खाद से भी ग्रामीण परिवारों को दोहरा मुनाफा मिल रहा है।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-10-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/lakhimpur-ke-bujurga-pashupalaka-ne-pancha-bheron-se-khara-kiya-bara-kunaba-derha-sau-maveshi-aura-jaivika-khada-se-badali-mali-ha-41663 · **Language:** Hindi
**Tags:** भेड़ पालन, लखीमपुर खीरी, पशुपालन, जैविक खाद, ग्रामीण रोजगार, साहेब लाल

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने वाले किसान अब अपनी वित्तीय स्थिति मजबूत करने के लिए सहायक व्यवसायों का रुख कर रहे हैं। ग्रामीण अंचलों में आम तौर पर गाय, भैंस और बकरियां पालने का चलन रहा है, लेकिन अब भेड़ पालन भी कमाई के एक मजबूत और टिकाऊ माध्यम के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। खासतौर पर पाल समुदाय से ताल्लुक रखने वाले ग्रामीण परिवार इस काम को पीढ़ियों से संजोए हुए हैं। बेहद कम लागत से शुरू हो सकने वाला यह उद्यम सीमित संसाधनों वाले किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का भरोसेमंद जरिया साबित हो रहा है।

## पड़रिया तुला के साहेब लाल की प्रेरणादायक मेहनत
जिले के पड़रिया तुला गांव में रहने वाले 65 वर्षीय साहेब लाल ग्रामीण आत्मनिर्भरता की जीवंत मिसाल बन चुके हैं। जीवन के इस पड़ाव पर पहुंचने के बावजूद उनके उत्साह और परिश्रम में कोई कमी नहीं आई है। वह अपने पूरे रेवड़ की देखभाल खुद अपने हाथों से करते हैं। साहेब लाल अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि उन्होंने इस सफर की नींव केवल पांच भेड़ों के साथ रखी थी। शुरुआत में संख्या बहुत सीमित थी, लेकिन उन्होंने धैर्यपूर्वक देखभाल की और धीरे-धीरे अपने झुंड का विस्तार करते गए। आज उनके पास लगभग 150 भेड़ें मौजूद हैं।

साहेब लाल का कहना है कि पशुपालन के इस काम में निरंतर शारीरिक परिश्रम और नियमित निगरानी की जरूरत पड़ती है, मगर इससे मिलने वाला आर्थिक संबल पूरे परिवार के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहा है। भेड़ों के आहार प्रबंधन के लिए उन्हें गांव के आसपास मौजूद खाली मैदानों और खेतों में चराया जाता है। मौसम के बदलाव और चारे की स्थानीय उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए उनके खान-पान की दैनिक व्यवस्था की जाती है, जिससे चारे की लागत लगभग नगण्य रहती है और घर की अर्थव्यवस्था को सीधा सहारा मिलता है।

## वजन और शारीरिक बनावट के आधार पर तय होती है कीमत
पशु बाजार में भेड़ों की बिक्री का एक व्यवस्थित और सीधा नियम चलता है। साहेब लाल के मुताबिक, भेड़ों का मूल्य मुख्य रूप से उनके कुल वजन और शारीरिक कद-काठी के आधार पर तय किया जाता है। स्थानीय व्यापारियों को जब मवेशी खरीदने होते हैं, तो वे सीधे गांव में पशुपालकों के घर तक पहुंच जाते हैं, जिससे किसानों को ढुलाई या मंडी ले जाने का अतिरिक्त खर्च नहीं उठाना पड़ता। एक स्वस्थ और अच्छे वजन वाली भेड़ के लिए व्यापारी आसानी से 5,000 रुपये से लेकर 7,000 रुपये तक का भाव दे देते हैं।

## जैविक खाद से खेती की लागत में कमी और अतिरिक्त मुनाफा
भेड़ पालन केवल मवेशियों की सीधी बिक्री तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे मिलने वाला उप-उत्पाद यानी जैविक खाद भी किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। भेड़ों के बाड़े और विश्राम स्थल से भारी मात्रा में प्राकृतिक खाद एकत्रित होती है। किसान इस खाद को अपने खेतों में डालते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता सुधरती है और बाजार से खरीदी जाने वाली महंगी रासायनिक खाद पर होने वाला खर्च काफी हद तक घट जाता है। वहीं कुछ पशुपालक अपने पास जरूरत से ज्यादा बची खाद को आसपास के जरूरतमंद किसानों को बेचकर सीधा नकद मुनाफा कमाते हैं। इस तरह भेड़ पालन से एक ओर पशु बिक्री का पैसा मिलता है, तो दूसरी ओर खेतों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद भी मुफ्त में हासिल हो जाती है।

## पाल समाज का पारंपरिक आधार और आधुनिक संभावनाएं
लखीमपुर खीरी के ग्रामीण इलाकों में पाल समाज के कई परिवार पीढ़ियों से इस व्यवसाय को अपनी आजीविका का मुख्य आधार बनाते रहे हैं। यह उनके पारंपरिक काम का अभिन्न हिस्सा रहा है, हालांकि आधुनिक दौर में पशुओं के प्रबंधन और रख-रखाव के तौर-तरीकों में सकारात्मक बदलाव जरूर आए हैं। साहेब लाल अपनी यात्रा के आधार पर बताते हैं कि उन्होंने भी बहुत छोटे स्तर से शुरुआत की थी। पांच भेड़ों से आरंभ हुआ यह छोटा प्रयास वक्त के साथ करीब डेढ़ सौ पशुओं के बड़े रेवड़ में तब्दील हो गया। उनके दशकों के तजुर्बे से यह बात साफ होती है कि यदि पशुओं के स्वास्थ्य की उचित देखभाल की जाए और उन्हें बाजार में सही दाम पर बेचा जाए, तो भेड़ पालन ग्रामीण परिवारों को आर्थिक तंगी से उबारने का एक मजबूत साधन बन सकता है।

## इसका आप पर असर
कम लागत में शुरू होने वाला भेड़ पालन ग्रामीण किसानों के लिए कम खर्च में अतिरिक्त आमदनी और रासायनिक खाद के विकल्प का ठोस साधन बन सकता है।

- **भारत में:** पशुपालक कम पूंजी लगाकर अपनी आय के अतिरिक्त स्रोत तैयार कर सकते हैं। इससे रासायनिक खादों पर निर्भरता घटाने और जैविक कृषि को बढ़ावा देने में सीधी मदद मिलती है।
- **लखीमपुर खीरी में:** जिले के छोटे किसान स्थानीय स्तर पर पशु व्यापारियों को सीधे 5,000 से 7,000 रुपये प्रति भेड़ बेच सकते हैं। इसके साथ ही बाड़े से मिलने वाली खाद से वे अपने खेतों की उर्वरता बढ़ाकर खेती की लागत कम कर सकते हैं।
- **लागत और निवेश:** शुरुआत केवल 4 से 5 मवेशियों के छोटे समूह से की जा सकती है। चराई के लिए स्थानीय खाली मैदानों का उपयोग होने से आहार का नियमित खर्च काफी कम रहता है।
- **दोहरी कमाई का मौका:** तैयार भेड़ों को उनके वजन के आधार पर बेचने से एकमुश्त रकम मिलती है। इसके अलावा बाड़े से निकलने वाली खाद को बेचकर किसान नियमित अतिरिक्त नकद भी कमा सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
लखीमपुर खीरी के ग्रामीण इलाकों में भेड़ पालन को अतिरिक्त आय और पारंपरिक आजीविका के रूप में प्रमुखता से अपनाया जा रहा है। सीमित खर्च और मवेशियों की बढ़ती मांग के चलते यह व्यवसाय तेजी से फैल रहा है।

- **न्यूनतम लागत और आसान चराई:** भेड़ों के खान-पान के लिए महंगे विशेष चारे की आवश्यकता नहीं पड़ती है। वे गांव के पास उपलब्ध खाली खेतों और प्राकृतिक घास के मैदानों में आसानी से चर लेती हैं।
- **पारंपरिक अनुभव और कौशल:** क्षेत्र के पाल समुदाय के परिवार पीढ़ियों से इस काम को करते आ रहे हैं। यह पारिवारिक ज्ञान नए पशुपालकों को मवेशी प्रबंधन में स्वाभाविक दक्षता देता है।
- **गांव तक व्यापारियों की पहुंच:** मवेशियों के वजन के आधार पर व्यापारी सीधे ग्रामीण बस्तियों में आकर खरीद करते हैं। इससे किसानों को दूर-दराज की मंडियों में जाने और परिवहन खर्च उठाने की जरूरत नहीं पड़ती।
- **खाद का दोहरा लाभ:** फसलों की लागत बढ़ने के कारण किसान रासायनिक उर्वरक के प्राकृतिक विकल्प तलाश रहे हैं। बाड़े से मिलने वाली जैविक खाद खेती का खर्च घटाने और अलग से बिक्री करने में मददगार बनती है।

## सवाल-जवाब

### 1. साहेब लाल ने कितने पशुओं से भेड़ पालन की शुरुआत की थी?
साहेब लाल ने अपने पशुपालन के सफर की शुरुआत लगभग पांच भेड़ों के साथ की थी।

### 2. वर्तमान में साहेब लाल के पास कितनी भेड़ें हैं?
लगातार देखभाल और झुंड का विस्तार करने के बाद आज उनके पास करीब डेढ़ सौ भेड़ें हैं।

### 3. व्यापारी एक अच्छी भेड़ की क्या कीमत देते हैं?
व्यापारी वजन और कद-काठी के आधार पर एक अच्छी भेड़ के लिए करीब 5,000 से 7,000 रुपये तक दे देते हैं।

### 4. भेड़ों के चारे की व्यवस्था किस प्रकार की जाती है?
भेड़ों को चराने के लिए गांव के आसपास मौजूद खेतों और खाली स्थानों का मौसम के अनुसार इस्तेमाल किया जाता है।

### 5. भेड़ पालन से खेती में क्या लाभ मिलता है?
भेड़ों के बाड़े से निकलने वाली खाद खेतों में डालने से रासायनिक खाद का खर्च घटता है और अतिरिक्त खाद बेचकर मुनाफा भी कमाया जा सकता है।

### 6. साहेब लाल किस जिले और गांव के निवासी हैं?
वह लखीमपुर खीरी जिले के पड़रिया तुला गांव के निवासी हैं।

## प्रेरणा और सबक
साहेब लाल की कहानी साबित करती है कि उम्र की सीमा के पार जाकर धैर्य और लगन से छोटे स्तर पर शुरू किया गया काम भी बड़ा रूप ले सकता है।

- **छोटे स्तर से शुरुआत:** बड़े संसाधनों का इंतजार करने के बजाय केवल पांच भेड़ों से काम शुरू किया गया। नियमित देखभाल से वही छोटा समूह 150 भेड़ों के विशाल रेवड़ में बदल गया।
- **उम्र की कोई बाधा नहीं:** 65 वर्ष की आयु में भी साहेब लाल खुद पूरे उत्साह से अपने मवेशियों की देखभाल करते हैं। सच्ची लगन और सक्रिय दिनचर्या आर्थिक आत्मनिर्भरता बनाए रखती है।
- **संसाधनों का संपूर्ण उपयोग:** उन्होंने केवल मवेशी बेचने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया, बल्कि मिलने वाली खाद का भी उपयोग किया। किसी भी व्यवसाय के उप-उत्पादों को आमदनी में बदलना सीख का अहम हिस्सा है।
- **धैर्य और निरंतरता:** पशुपालन में रातोंरात सफलता नहीं मिलती बल्कि समय और मेहनत लगती है। लगातार परिश्रम और मवेशियों के उचित रख-रखाव से ही स्थायी मुनाफा संभव होता है।

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