लखीमपुर खीरी में गन्ने की जगह केले की बागवानी से मुनाफा कमा रहे किसान, जी9 गोल्ड किस्म बनी मददगार लखीमपुर खीरी के तराई क्षेत्र में किसान गन्ने की पारंपरिक खेती के साथ केले की खेती अपना रहे हैं, जहां जी9 गोल्ड किस्म और उद्यान विभाग की 40 प्रतिशत सब्सिडी से उनकी आय बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में खेती के तौर तरीकों में बदलाव देखने को मिल रहा है। यहां के तराई क्षेत्र में पारंपरिक तौर पर गन्ने की खेती पर निर्भर रहने वाले काश्तकार अब बागवानी फसलों की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। खासकर फूलबेहड़ इलाके के ग्रामीण क्षेत्रों में केले की बड़े पैमाने पर रोपाई की जा रही है। स्थानीय मंडियों और बाजारों में फलों की लगातार बनी रहने वाली मांग को देखते हुए किसान इसे अपनी आमदनी बढ़ाने का एक मजबूत और व्यावहारिक विकल्प मान रहे हैं। फूलबेहड़ के किसान ने 20 बीघे में शुरू किया उत्पादन फूलबेहड़ इलाके के किसान श्याम मिश्रा ने गन्ने के स्थान पर बड़े रकबे में बागवानी का फैसला किया। श्याम मिश्रा ने बताया कि उन्होंने लगभग 20 बीघा खेत में केले के पौधे रोपे हैं। उनके अनुसार यदि फसल का समुचित विकास हो, उत्पादन बेहतर मिले और मंडियों में अनुकूल दाम उपलब्ध हों तो यह फसल बढ़िया मुनाफा देती है। इसके साथ ही उन्होंने मौसम की मार को लेकर भी सचेत किया। तेज हवाओं का चलना, बेमौसम भारी बरसात और विपरीत मौसमी परिस्थितियां पौधों को गिरा सकती हैं, जिससे किसानों को बड़े नुकसान का जोखिम भी झेलना पड़ता है। जी9 गोल्ड किस्म की खासियत और समय चक्र श्याम मिश्रा के अनुसार उन्होंने अपने खेतों में जी9 गोल्ड किस्म के पौधे लगाए हैं, जिसकी लोकप्रियता क्षेत्र के किसानों में लगातार बढ़ रही है। केले की रोपाई करने के बाद पूरी फसल कटाई के लिए तैयार होने में करीब 14 से 15 महीने का वक्त लेती है। वर्तमान समय में थोक मंडियों में केले की बिक्री 800 रुपये से लेकर 1000 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर दर्ज की जा रही है। ऐसे भाव मिलने पर किसानों को अपनी लागत के मुकाबले काफी संतोषजनक रिटर्न हासिल होता है। प्रति बीघा पौधों की संख्या और जरूरी सावधानियां केले की व्यावसायिक खेती शुरू करने के लिए खेतों में पौधों की सघनता का सही प्रबंधन बेहद जरूरी है। आमतौर पर एक बीघा जमीन में लगभग 380 पौधे लगाए जा सकते हैं। विशेषज्ञों और अनुभवी काश्तकारों का मानना है कि खेत तैयार करने से पहले मिट्टी की जांच, सिंचाई की नियमित व्यवस्था, अतिरिक्त पानी की निकासी का प्रबंध, कतारों और पौधों के बीच की सटीक दूरी तथा नजदीकी बाजार की पहुंच का आकलन पहले ही कर लेना चाहिए ताकि फसल कटाई के समय कोई परेशानी न आए। उद्यान विभाग दे रहा 40 प्रतिशत तक अनुदान बागवानी को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी स्तर पर वित्तीय मदद भी दी जा रही है। लखीमपुर के जिला उद्यान अधिकारी मृत्युंजय सिंह ने बताया कि जो भी किसान केले की खेती शुरू करना चाहते हैं, उन्हें विभाग की योजनाओं के तहत ऑनलाइन आवेदन जमा करना होता है। लाभार्थियों का चुनाव पहले आओ, पहले पाओ के नियम के तहत किया जाता है। योजना के अंतर्गत चयनित किसानों को 40 प्रतिशत तक का अनुदान प्रदान किया जाता है, जिससे शुरुआती पौध और प्रबंधन का आर्थिक बोझ कम हो सके और किसान बेहतर लाभ अर्जित कर सकें। इसका आप पर असर यह समाचार किसानों को पारंपरिक नकदी फसलों के अतिरिक्त बागवानी से आय बढ़ाने और सरकारी सहायता प्राप्त करने का सीधा रास्ता दिखाता है। • भारत में: देश भर के किसान पारंपरिक एकल फसलों से हटकर उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों की ओर रुख कर सकते हैं। इससे उन्हें बाजार में मौसमी बदलावों के जोखिम से निपटने और अपनी आय में विविधता लाने का अवसर मिलता है। • लखीमपुर खीरी में: गन्ने के भुगतान और सीमित आमदनी पर निर्भर स्थानीय किसान 20 बीघे जैसी बड़े पैमाने की खेती से प्रेरणा ले सकते हैं। जिला उद्यान विभाग के माध्यम से किसान 40 प्रतिशत तक की सरकारी सब्सिडी के लिए सीधे ऑनलाइन पंजीकरण करा सकते हैं। • फसल योजना के संदर्भ में: प्रति बीघा 380 पौधों का रोपण और 14 से 15 महीने का फसल चक्र समझकर किसान अपने बजट की योजना बना सकते हैं। 800 से 1000 रुपये प्रति क्विंटल के मौजूदा भाव का आकलन करके लागत और संभावित मुनाफे का सही अनुमान लगाया जा सकता है। • मौसम और जोखिम प्रबंधन: तेज हवा और जलभराव से होने वाले नुकसान से बचने के लिए किसानों को जल निकासी और बांधने की समुचित तैयारी रखनी होगी। प्रारंभिक स्तर पर तैयारी रखने से प्रतिकूल मौसम में होने वाले आर्थिक नुकसान से बचाव संभव होगा। ऐसा क्यों हुआ लखीमपुर खीरी के तराई इलाके में किसानों का केले की खेती की ओर बढ़ता रुझान बेहतर बाजार मांग और सरकारी प्रोत्साहन के समन्वय का परिणाम है। • पारंपरिक फसल से विविधीकरण: लंबे समय से किसान केवल गन्ने की खेती पर निर्भर थे, जिसमें अक्सर भुगतान और सीमित रिटर्न की चुनौतियां रहती हैं। स्थानीय बाजारों में नियमित मांग को देखते हुए किसानों ने अतिरिक्त आय के लिए केले की व्यावसायिक खेती को चुना। • उन्नत किस्म की उपलब्धता: जी9 गोल्ड जैसी उच्च उपज देने वाली किस्मों के प्रचार ने किसानों में नया विश्वास पैदा किया। यह किस्म गुणवत्ता और उत्पादन के मामले में बेहतर परिणाम देती है, जिससे किसान इसकी ओर आकर्षित हुए। • सरकारी वित्तीय सहायता: उद्यान विभाग द्वारा 40 प्रतिशत की आर्थिक सब्सिडी दिए जाने से किसानों पर शुरुआती पूंजीगत व्यय का भार कम हुआ। ऑनलाइन व्यवस्था और पारदर्शी प्रक्रिया के चलते किसान बेहिचक इस नई खेती में निवेश करने के लिए आगे आ रहे हैं। सवाल-जवाब 1. लखीमपुर खीरी में किसान किस पारंपरिक फसल के साथ केले की खेती अपना रहे हैं? लखीमपुर खीरी के किसान पारंपरिक गन्ने की खेती के साथ अब अतिरिक्त आय के लिए केले की खेती को तेजी से अपना रहे हैं। 2. किसान श्याम मिश्रा ने कितने रकबे में केले की फसल लगाई है? फूलबेहड़ क्षेत्र के किसान श्याम मिश्रा ने करीब 20 बीघा जमीन में केले की बागवानी शुरू की है। 3. खेतों में केले की कौन सी किस्म लगाई गई है? खेतों में जी9 गोल्ड वैरायटी के केले लगाए गए हैं, जो स्थानीय किसानों के बीच काफी पसंद की जा रही है। 4. केले की फसल तैयार होने में कितना समय लगता है? केले के पौधों की रोपाई के बाद फसल को पूरी तरह तैयार होने में लगभग 14 से 15 महीने का समय लगता है। 5. बाजार में केले का मौजूदा थोक भाव क्या चल रहा है? बाजारों में इस समय केला 800 रुपये से लेकर 1000 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से बिक रहा है। 6. एक बीघा खेत में सामान्य तौर पर केले के कितने पौधे लगाए जा सकते हैं? सामान्य तौर पर एक बीघा जमीन में करीब 380 केले के पौधे लगाए जा सकते हैं। 7. उद्यान विभाग केले की खेती पर कितने प्रतिशत अनुदान दे रहा है? उद्यान विभाग की योजनाओं के तहत केले की खेती करने वाले किसानों को 40 प्रतिशत का अनुदान दिया जा रहा है। 8. केले की खेती के लिए अनुदान पाने हेतु आवेदन की प्रक्रिया क्या है? जिला उद्यान अधिकारी मृत्युंजय सिंह के अनुसार किसानों को इसके लिए ऑनलाइन आवेदन करना होता है और चयन पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर किया जाता है। प्रेरणा और सबक पारंपरिक खेती की सीमाओं को तोड़कर आधुनिक बागवानी अपनाने वाले काश्तकारों से कई उपयोगी व्यावहारिक सीख ली जा सकती हैं। • नवाचार का साहस: केवल पारंपरिक गन्ने की खेती तक सीमित रहने के बजाय 20 बीघे जैसे बड़े रकबे में केले की खेती शुरू करना जोखिम उठाने और नया सीखने की मानसिकता को दर्शाता है। • वैज्ञानिक किस्मों का चयन: जी9 गोल्ड जैसी प्रमाणित और मांग वाली किस्म चुनकर काम शुरू करने से उत्पादन की गुणवत्ता और बाजार में सही मूल्य मिलने की संभावना बढ़ जाती है। • योजनाबद्ध प्रबंधन: प्रति बीघा 380 पौधों का सटीक अनुपात, दूरी और जल निकासी जैसी तकनीकी बारीकियों को समझकर खेती करने से नुकसान न्यूनतम रहता है। • सरकारी योजनाओं का लाभ: विभाग की 40 प्रतिशत सब्सिडी जैसी सहायता के लिए समय पर ऑनलाइन आवेदन करके अपनी उत्पादन लागत को काफी हद तक कम किया जा सकता है। https://trendkia.com/success-stories/lakhimpur-kheri-men-ganne-ki-jagaha-kele-ki-bagavani-se-munapha-kama-rahe-kisana-g9-gold-kisma-bani-madadagara-38212 TrendKia — Har trend, sabse pehle.