मध्य प्रदेश के कनासिया गांव में 800 से अधिक युवा दे चुके हैं सेना में सेवा, 1963 से चली आ रही देशभक्ति की अटूट परंपरा उज्जैन जिले की तराना तहसील स्थित कनासिया गांव से अब तक 800 से अधिक युवा भारतीय सेना में शामिल होकर देशसेवा कर चुके हैं, जहां पूर्व सैनिक नई पीढ़ी को निःशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं। उज्जैन जिले की तराना तहसील में स्थित कनासिया गांव भारतीय सेना में अपने अभूतपूर्व योगदान के लिए जाना जाता है। लगभग 5,000 की आबादी वाले इस छोटे से गांव ने देश की रक्षा के लिए 800 से अधिक वीर जवान दिए हैं। यहां देशभक्ति का जज्बा किसी एक पीढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि कई परिवारों के दो से तीन सदस्य एक साथ सेना में कार्यरत रहे हैं या वर्तमान में सेवा दे रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों के अवसर पर यह गांव पूरे क्षेत्र में प्रेरणा के केंद्र के रूप में याद किया जाता है। 1963 में शालाग्राम ने रखी थी सैन्य सेवा की नींव कनासिया गांव में सैन्य सेवा में जाने की गौरवशाली परंपरा की शुरुआत वर्ष 1963 में हुई थी, जब गांव के युवा शालाग्राम 18 वर्ष की आयु में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। उस समय उन्हें प्रतिमाह 60 रुपये वेतन मिलता था। शालाग्राम के सेना में शामिल होने के बाद उनके दो भाइयों, सोहन देथलिया और रणछोड़लाल ने भी देशसेवा का मार्ग चुना। इन तीनों भाइयों ने 1965 और 1971 के ऐतिहासिक युद्धों में अग्रिम मोर्चे पर अपनी बहादुरी का प्रदर्शन किया। लगभग 15 वर्षों की सेवा के उपरांत वर्ष 1978 में शालाग्राम 300 रुपये मासिक वेतन पर सेवानिवृत्त हुए थे। दुर्गम पर्वतीय इलाकों में खच्चरों से हथियार पहुंचाने की पुरानी यादें अपने सेवाकाल के अनुभवों को साझा करते हुए शालाग्राम बताते हैं कि उस दौर में कठिन पर्वतीय क्षेत्रों में सैन्य सामग्री और हथियार पहुंचाने के लिए विशेष परिवहन व्यवस्था अपनाई जाती थी। सेना द्वारा ऑस्ट्रेलिया से लाए गए खच्चरों का उपयोग दुर्गम पहाड़ियों तक हथियार ढोने के लिए किया जाता था। एक खच्चर की पीठ पर लगभग 12 बंदूकें लादकर ऊंचे पहाड़ों तक पहुंचाई जाती थीं, जो उस समय सेना का मुख्य लॉजिस्टिक और ट्रांसपोर्ट सिस्टम हुआ करता था। सेवानिवृत्त जवानों का मार्गदर्शन और नई पीढ़ी का अभ्यास सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद शालाग्राम और उनके भाइयों ने गांव लौटकर युवाओं को सेना भर्ती परीक्षा की तैयारी कराने का बीड़ा उठाया। यह परंपरा आज भी पूरे समर्पण के साथ जारी है। वर्ष 2003 में सेना में भर्ती हुए रिटायर्ड हवलदार अविनाश पटेल, जिन्होंने 2025 में अपनी सेवा पूरी की, कोर ऑफ सिग्नल्स और राष्ट्रीय राइफल्स के माध्यम से आतंकवाद विरोधी अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई थी। वर्तमान में अविनाश पटेल गांव में खेती-किसानी के साथ-साथ प्रतिदिन करीब 100 स्थानीय युवाओं को सैन्य भर्ती के लिए शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण दे रहे हैं। सुविधाओं के अभाव के बावजूद युवाओं का अटूट संकल्प कनासिया गांव उज्जैन से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। गांव में बुनियादी खेल और प्रशिक्षण सुविधाओं की कमी होने के बावजूद युवाओं के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। रिटायर्ड हवलदार विनोद पटेल के अनुसार, गांव के युवा किसी सरकारी मदद का इंतजार किए बिना खुद ही मैदान तैयार करते हैं और रोज सुबह-शाम कठिन शारीरिक अभ्यास में जुट जाते हैं। यदि स्थानीय प्रशासन और सरकार की ओर से गांव में खेल मैदान, रनिंग ट्रैक और आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, तो कनासिया गांव पूरे देश के लिए सैन्य भर्ती का एक आदर्श केंद्र बन सकता है। इसका आप पर असर • भारत में: यह कहानी देश भर के ग्रामीण युवाओं को बिना किसी बड़े संसाधन के अनुशासित तैयारी और सेना में शामिल होने की प्रेरणा देती है। • उज्जैन में: स्थानीय प्रशासन से गांव में आधुनिक खेल मैदान और ट्रेनिंग ट्रैक बनाने की मांग जोर पकड़ सकती है, जिससे क्षेत्र के युवाओं को बेहतर अवसर मिलें। सवाल-जवाब 1. कनासिया गांव किस जिले और तहसील में स्थित है? कनासिया गांव मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले की तराना तहसील में स्थित है, जो उज्जैन शहर से लगभग 55 किलोमीटर दूर है। 2. कनासिया गांव को सेना की फैक्ट्री क्यों कहा जाता है? लगभग 5,000 की आबादी वाले इस गांव से अब तक 800 से अधिक युवा भारतीय सेना में शामिल होकर देश की सेवा कर चुके हैं। 3. गांव के सबसे पहले सैनिक कौन थे? वर्ष 1963 में 18 वर्ष की उम्र में सेना में भर्ती होने वाले शालाग्राम कनासिया गांव के पहले सैनिक थे, जिन्होंने 60 रुपये वेतन पर शुरुआत की थी। 4. पूर्व सैनिक गांव के युवाओं की तैयारी कैसे करा रहे हैं? सेवानिवृत्त हवलदार अविनाश पटेल जैसे पूर्व सैनिक खेती के साथ-साथ रोज करीब 100 युवाओं को सैन्य भर्ती के लिए शारीरिक व मानसिक अभ्यास कराते हैं। प्रेरणा और सबक • सामुदायिक मेंटरशिप: पूर्व सैनिकों द्वारा सेवानिवृत्ति के बाद अपनी अगली पीढ़ी को प्रशिक्षित करने का प्रयास सफलता की ठोस बुनियाद बनाता है। • संसाधनों से परे संकल्प: सुविधाओं की कमी की शिकायत करने के बजाय खुद मेहनत करके मैदान तैयार करना आत्मनिर्भरता का संदेश देता है। • परंपरा की निरंतरता: परिवार और समाज में देशभक्ति व अनुशासन के मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनाए रखना बड़ी उपलब्धियों का कारण बनता है। https://trendkia.com/success-stories/madhya-pradesh-ke-kanasiya-ganva-men-800-se-adhika-yuva-de-chuke-hain-sena-men-seva-1963-se-chali-a-rahi-deshabhakti-ki-atuta-parn-16569 TrendKia — Har trend, sabse pehle.