मजदूरी छोड़ बकरी पालन से बदली किस्मत, बिहार की चंपा देवी ने खड़ा किया खुद का कारोबार छपरा के गरखा प्रखंड की चंपा देवी ने जीविका योजना से मिलीं 10 बकरियों के जरिए आत्मनिर्भरता की राह पकड़ी और अपनी आमदनी से भैंस खरीदने के साथ पक्का कमरा भी तैयार कर लिया। बिहार के सारण जिले में ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन की एक प्रेरक तस्वीर सामने आई है। छपरा स्थित गरखा प्रखंड के जानकीनगर हसनपुर पंचायत की रहने वाली चंपा देवी कभी आजीविका के लिए दैनिक मजदूरी पर निर्भर थीं। परिवार का भरण-पोषण करने और बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें लगातार काम की तलाश में भटकना पड़ता था। लगातार बनी रहने वाली आर्थिक तंगी के चलते वह हमेशा परेशान रहा करती थीं, लेकिन सरकारी पहल ने उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी। जीविका परियोजना से मिली आत्मनिर्भरता की नई राह चंपा देवी के जीवन में वास्तविक बदलाव तब शुरू हुआ, जब वह ग्रामीण विकास की पहल जीविका योजना के संपर्क में आईं। इस योजना के अंतर्गत उन्हें चांदनी स्वयं सहायता समूह से संबद्ध किया गया। समूह से जुड़ने के उपरांत उन्हें आजीविका संवर्धन के तहत 10 बकरियां उपलब्ध कराई गईं। इन बकरियों को आधार बनाकर उन्होंने पशुपालन को एक नियमित स्वरोजगार के रूप में अपनाने का दृढ़ संकल्प लिया। उनकी निरंतर देखभाल और मेहनत का परिणाम यह हुआ कि बकरियों का कुनबा धीरे-धीरे बढ़ता चला गया और वर्तमान में उनके पास बकरियों की कुल संख्या 18 तक पहुंच चुकी है। कमाई से भैंस की खरीदारी और पक्के कमरे का निर्माण बकरी पालन का दायरा बढ़ने के बाद चंपा देवी ने समय-समय पर बकरियों और उनके बच्चों को स्थानीय बाजार में बेचना शुरू किया। इस बिक्री से प्राप्त होने वाले मुनाफे को उन्होंने समझदारी से संचित किया। इसी बचत के बल पर उन्होंने 50 हजार रुपये से अधिक की लागत से एक दुधारू भैंस खरीदी, जिससे परिवार के लिए अतिरिक्त आमदनी का जरिया तैयार हो गया। इतना ही नहीं, उन्होंने इसी पशुपालन व्यवसाय की कमाई से अपने रहने के लिए एक कमरे का आवास भी तैयार करवाया है। मजदूरी से मुक्ति और बच्चों की बेहतर शिक्षा चंपा देवी बताती हैं कि पहले की तरह अब उन्हें मजदूरी मांगने के लिए दूसरों की चौखट पर नहीं जाना पड़ता है। पशुपालन से होने वाले नियमित मुनाफे से वह न केवल घर के दैनिक राशन और अन्य बुनियादी खर्चों को सुचारू रूप से संभाल रही हैं, बल्कि अपने बच्चों के स्कूल की फीस भी समय पर जमा कर पा रही हैं। उन्होंने जीविका से जोड़ने में सहयोग देने वाली विनीता दीदी का आभार प्रकट करते हुए कहा कि समूह से मिले निरंतर मार्गदर्शन से उनकी बेरोजगारी दूर हुई है। वह भविष्य में मिलने वाले सहयोग के आधार पर अपने इस बकरी पालन के कारोबार को और बड़े स्तर पर विस्तार देने की योजना बना रही हैं। इसका आप पर असर यह समाचार दर्शाता है कि सरकारी स्वयं सहायता समूह और आजीविका सहायता से ग्रामीण परिवारों की वित्तीय स्थिति कैसे बुनियादी रूप से बदल सकती है। • भारत में: केंद्र और राज्य सरकारों के ग्रामीण आजीविका मिशन महिलाओं को छोटे अनुदान और मवेशी देकर प्रत्यक्ष स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध करा रहे हैं। ग्रामीण महिलाएं स्थानीय स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर स्वरोजगार शुरू करने के लिए संसाधन जुटा सकती हैं। • बिहार में: जीविका परियोजना राज्य के सुदूर गांवों में महिलाओं को मजदूरी पर निर्भरता खत्म कर खुद का कारोबार स्थापित करने की सुविधा दे रही है। छपरा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से संपर्क कर पशुपालन और छोटे उद्यमों के लिए सहायता प्राप्त कर सकती हैं। • पशुपालकों के लिए: छोटे पशु जैसे बकरियां पालना कम लागत में तेजी से पूंजी तैयार करने का एक व्यावहारिक जरिया साबित हो रहा है। नियमित बिक्री से होने वाली बचत को बड़े दुधारू पशुओं में निवेश कर डेयरी आधारित आय भी शुरू की जा सकती है। • दैनिक मजदूरों के लिए: अनिश्चित दिहाड़ी मजदूरी के मुकाबले छोटा पशुपालन व्यवसाय भी आय का एक निरंतर स्रोत बना सकता है। इससे घरेलू बजट स्थिर होता है और बच्चों की स्कूली शिक्षा के खर्च बिना रुकावट पूरे किए जा सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ यह आर्थिक परिवर्तन ग्रामीण विकास योजनाओं और व्यवस्थित स्वयं सहायता समूहों के जरिए महिलाओं को मिली लक्षित आजीविका सहायता के कारण संभव हुआ। • सीधा कारण: चंपा देवी को जीविका परियोजना के तहत चांदनी स्वयं सहायता समूह से 10 बकरियां आर्थिक सहायता के रूप में प्रदान की गई थीं। इस बुनियादी परिसंपत्ति ने उन्हें बिना किसी प्रारंभिक व्यक्तिगत कर्ज के पशुपालन का काम शुरू करने का मौका दिया। • आर्थिक परिस्थितियां: दैनिक मजदूरी की कमी और निरंतर आर्थिक असुरक्षा ने उन्हें किसी स्थायी आजीविका विकल्प की तलाश करने के लिए प्रेरित किया। नियमित आमदनी के अभाव में परिवार चलाना और बच्चों को पढ़ाना कठिन हो रहा था। • संस्थागत मार्गदर्शन: स्वयं सहायता समूह की विनीता दीदी से मिले सहयोग और मार्गदर्शन ने उन्हें इस योजना से औपचारिक रूप से जुड़ने में मदद की। इस निरंतर सामाजिक और वित्तीय सहयोग से वह बकरियों की संख्या 18 तक बढ़ाने और मुनाफे को पुनर्निवेश करने में सफल रहीं। सवाल-जवाब 1. चंपा देवी कौन हैं और वह कहां की रहने वाली हैं? चंपा देवी बिहार के छपरा जिले के गरखा प्रखंड स्थित जानकीनगर हसनपुर पंचायत की रहने वाली एक ग्रामीण महिला हैं, जिन्होंने मजदूरी छोड़कर पशुपालन का कारोबार शुरू किया है। 2. उन्हें जीविका योजना के तहत क्या सहायता मिली थी? उन्हें जीविका के चांदनी स्वयं सहायता समूह से जोड़ा गया था और आजीविका शुरू करने के लिए 10 बकरियां दी गई थीं। 3. वर्तमान में उनके पास कितनी बकरियां हैं? उनकी कड़ी मेहनत और उचित देखभाल के चलते बकरियों की संख्या बढ़कर अब 18 हो चुकी है। 4. बकरी पालन की कमाई से उन्होंने क्या-क्या खरीदा और बनाया? बकरियां बेचकर हुई कमाई से उन्होंने 50 हजार रुपये से अधिक की लागत से एक भैंस खरीदी और अपने लिए एक कमरे का घर बनवाया। 5. चंपा देवी ने योजना से जुड़ने के लिए किसका आभार जताया? उन्होंने जीविका योजना से जुड़ने और लगातार मार्गदर्शन पाने के लिए विनीता दीदी का विशेष आभार व्यक्त किया। 6. भविष्य को लेकर चंपा देवी की क्या योजना है? चंपा देवी ने कहा है कि यदि उन्हें आगे भी सहयोग मिलता रहा, तो वह अपने बकरी पालन के व्यवसाय को और अधिक विस्तार देना चाहेंगी। प्रेरणा और सबक चंपा देवी का सफर यह सिखाता है कि सीमित संसाधनों और सरकारी योजनाओं के सही उपयोग से बड़े आर्थिक लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। • संसाधनों का सही विस्तार: जो भी प्रारंभिक साधन मिलें, उनकी निरंतर देखभाल कर उन्हें बढ़ाना चाहिए। चंपा देवी ने 10 बकरियों से शुरुआत कर कड़ी मेहनत से अपने झुंड को 18 तक पहुंचाया। • मुनाफे का बुद्धिमानी से पुनर्निवेश: कमाई को केवल दैनिक खर्चों में उड़ाने के बजाय उत्पादक संपत्तियों में लगाना चाहिए। उन्होंने बकरी बिक्री के मुनाफे से 50 हजार रुपये से अधिक की भैंस खरीदी और पक्का कमरा बनवाया। • शिक्षा और भविष्य को प्राथमिकता: आय बढ़ते ही सबसे पहले बच्चों के भविष्य और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी है। उन्होंने मजदूरी से मुक्ति पाकर बच्चों की स्कूल फीस को प्राथमिकता दी। • सामूहिक सहयोग का लाभ उठाना: सरकारी योजनाओं और स्थानीय स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर आत्मनिर्भरता का रास्ता सुगम हो जाता है। समुदाय की मदद लेकर कोई भी महिला अपनी आर्थिक स्थिति बदल सकती है। https://trendkia.com/success-stories/majaduri-chhora-bakari-palana-se-badali-kismata-bihar-ki-champa-devi-ne-khara-kiya-khuda-ka-karobara-37706 TrendKia — Har trend, sabse pehle.