# मां की मौत, भाई की मजदूरी और तंगहाली के बीच सांजटा के पोलाराम ने नीट-यूजी में रचा इतिहास

> बाड़मेर के सांजटा गांव के पोलाराम ने मां को खोने और भाई की मजदूरी के सहारे पढ़ाई करने के बावजूद नीट-यूजी में 657 अंक हासिल कर ऑल इंडिया 1041वीं रैंक हासिल की।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-07-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/man-ki-mauta-bhai-ki-majaduri-aura-tngahali-ke-bicha-sanjata-ke-poloram-ne-neet-ug-men-racha-itihasa-9341 · **Language:** Hindi
**Tags:** पोलाराम, नीट यूजी, बाड़मेर, फिफ्टी विलेजर्स, राजस्थान, मेडिकल प्रवेश परीक्षा

बाड़मेर जिले के एक छोटे से सीमावर्ती गांव सांजटा में रहने वाले पोलाराम ने वह कर दिखाया है, जिसकी उम्मीद कभी उनके परिवार ने भी नहीं की थी। मां की असमय मौत, बूढ़े पिता की बेबसी और घर की तंगहाली के बीच पोलाराम ने देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी में 657 अंक हासिल किए हैं। इस प्रदर्शन के दम पर उन्हें ऑल इंडिया स्तर पर 1041वीं रैंक और कैटेगरी में 321वीं रैंक मिली है।

## मां के जाने के बाद टूटा परिवार, भाई ने संभाला मोर्चा
पोलाराम के लिए यह सफर शुरुआत से ही आसान नहीं था। साल 2021 में उनकी मां का अचानक निधन हो गया, जिसने पूरे परिवार को झकझोर दिया। पिता रामाराम की उम्र ढल चुकी थी और वे शरीर से इतने कमजोर हो गए थे कि मजदूरी करना उनके लिए संभव नहीं रहा। ऐसे में घर की जिम्मेदारी पोलाराम के बड़े भाई के कंधों पर आ गई। उन्होंने खुद मजदूरी करके न सिर्फ घर चलाया, बल्कि छोटे भाई की पढ़ाई भी जारी रखवाई, ताकि पोलाराम का सपना अधूरा न रह जाए।

## किताबों तक का खर्च नहीं था, विज्ञान छोड़ने की नौबत आई
हालात इतने बिगड़ गए थे कि एक समय पोलाराम विज्ञान वर्ग छोड़कर कला वर्ग में दाखिला लेने पर विचार करने लगे थे। वजह साफ थी, मेडिकल की तैयारी और विज्ञान की महंगी किताबों का खर्च उनके परिवार की पहुंच से बाहर हो चुका था। घर में कमाने वाला सिर्फ एक भाई था और वह भी मजदूरी के भरोसे परिवार चला रहा था, इसलिए पढ़ाई का खर्च जुटाना किसी चुनौती से कम नहीं था।

## फिफ्टी विलेजर्स संस्थान ने बढ़ाया मदद का हाथ
इसी मुश्किल घड़ी में बाड़मेर की चर्चित संस्था फिफ्टी विलेजर्स सेवा संस्थान पोलाराम के लिए संबल बनकर सामने आई। संस्थान ने उनकी काबिलियत को पहचाना और रहने, खाने से लेकर पढ़ाई तक की पूरी व्यवस्था अपने हाथों में ले ली। साथ ही उन्हें सही मार्गदर्शन और अनुशासित माहौल भी मुहैया कराया गया। संस्थान के संस्थापक डॉ. भरत सारण और वहां के शिक्षकों की निगरानी में पोलाराम ने दिन-रात मेहनत की और अपनी तैयारी को नई धार दी।

## गांव में इलाज की सुविधा नहीं, इसीलिए चुना डॉक्टरी का रास्ता
पोलाराम बताते हैं कि उनके गांव सांजटा समेत आसपास के सीमावर्ती इलाकों में आज भी अच्छी स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधाओं का भारी अभाव है। मामूली बीमारी होने पर भी ग्रामीणों को इलाज के लिए दूर के बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। इसी तकलीफ को करीब से देखकर उन्होंने डॉक्टर बनने की ठान ली थी, ताकि पढ़ाई पूरी करने के बाद वे अपने ही इलाके में लौटकर गरीब और जरूरतमंद लोगों का मुफ्त इलाज कर सकें।

## सफलता का श्रेय परिवार और गुरुजनों को
अपनी इस बड़ी कामयाबी पर पोलाराम ने पूरा श्रेय अपने स्वर्गीय माता-पिता, मजदूरी कर पढ़ाई का खर्च उठाने वाले भाई, अपने गुरुजनों, डॉ. भरत सारण और फिफ्टी विलेजर्स संस्थान की पूरी टीम को दिया है। पोलाराम की इस उपलब्धि से न सिर्फ उनका गांव सांजटा, बल्कि पूरा बाड़मेर जिला गर्व से भर गया है।

## इसका आप पर असर
- **भारत में:** पोलाराम की कहानी बताती है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के नीट अभ्यर्थियों के लिए फिफ्टी विलेजर्स जैसी संस्थाएं रहने, खाने और पढ़ाई का सहारा बन सकती हैं।
- **बाड़मेर में:** सांजटा जैसे सीमावर्ती गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी अब भी बनी हुई है, पोलाराम जैसे डॉक्टर बनने पर आने वाले समय में स्थानीय ग्रामीणों को इलाज के लिए बड़े शहर जाने की मजबूरी से कुछ राहत मिल सकती है।

## सवाल-जवाब

### 1. पोलाराम कौन हैं और वे कहां से हैं?
पोलाराम राजस्थान के बाड़मेर जिले के सांजटा गांव के रहने वाले हैं, जिन्होंने नीट-यूजी परीक्षा पास की है।

### 2. पोलाराम को नीट-यूजी में कितने अंक और रैंक मिली?
उन्हें 657 अंक के साथ ऑल इंडिया 1041वीं रैंक और कैटेगरी में 321वीं रैंक मिली है।

### 3. पोलाराम के परिवार में आर्थिक संकट क्यों आया?
साल 2021 में उनकी मां का निधन हो गया और बुजुर्ग पिता रामाराम मजदूरी करने में असमर्थ हो गए, जिससे परिवार आर्थिक तंगी में आ गया।

### 4. पोलाराम की पढ़ाई का खर्च किसने उठाया?
उनके बड़े भाई ने मजदूरी करके परिवार और पोलाराम की पढ़ाई का खर्च उठाया, साथ ही फिफ्टी विलेजर्स सेवा संस्थान ने रहने, खाने और पढ़ाई की व्यवस्था की।

### 5. फिफ्टी विलेजर्स सेवा संस्थान ने पोलाराम की कैसे मदद की?
संस्थान ने उनकी प्रतिभा पहचानकर रहने, खाने और पढ़ाई की पूरी व्यवस्था के साथ मार्गदर्शन और अनुशासित माहौल दिया, संस्थापक डॉ. भरत सारण और शिक्षकों की देखरेख में उन्होंने तैयारी की।

### 6. पोलाराम डॉक्टर क्यों बनना चाहते हैं?
उनके गांव सांजटा और आसपास के सीमावर्ती इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है, इसी वजह से वे डॉक्टर बनकर अपने क्षेत्र के गरीब लोगों की सेवा करना चाहते हैं।

## प्रेरणा और सबक
- हालात कितने भी विपरीत हों, हार मानने के बजाय रास्ता तलाशना जरूरी है, पोलाराम ने मां की मौत और आर्थिक तंगी के बावजूद पढ़ाई नहीं छोड़ी।
- परिवार का साथ सबसे बड़ी ताकत होता है, भाई ने खुद मजदूरी करके छोटे भाई की पढ़ाई का खर्च उठाया।
- सही मार्गदर्शन और अनुशासित माहौल मिलने पर सीमित संसाधनों में भी बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है, जैसा फिफ्टी विलेजर्स संस्थान की मदद से हुआ।
- अपने लक्ष्य से एक बड़ा मकसद जुड़ जाए तो मेहनत करने का जज्बा और बढ़ जाता है, पोलाराम अपने गांव के लोगों का इलाज करने के सपने से प्रेरित होकर आगे बढ़े।

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