# मरती मधुमक्खियों ने बदली किस्मत, बलिया के किसान की गौशाला से घी बेचकर हर साल 11 लाख की कमाई, मिला राज्यपाल का सम्मान

> बलिया जिले के किसान जयप्रकाश पांडेय ने मधुमक्खियों की मौत के बाद जैविक खेती अपनाई और आज गोपालन, नींबू की बागवानी व घी बनाकर सालाना 10 से 11 लाख रुपये कमा रहे हैं, राज्यपाल ने उन्हें सम्मानित भी किया है.

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-07-14 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/marati-madhumakkhiyon-ne-badali-kismata-ballia-ke-kisana-ki-gaushala-se-ghi-bechakara-hara-sala-11-lakha-ki-kamai-mila-rajyapala-k-7540 · **Language:** Hindi
**Tags:** जैविक खेती, गोपालन, मधुमक्खी पालन, बलिया किसान, देसी घी, गिर नस्ल गाय, नींबू की बागवानी, सफल किसान

बलिया जिले के बांसडीह तहसील स्थित मिरीगिरी गांव में रहने वाले किसान जयप्रकाश पांडेय ने नींबू की बागवानी, मधुमक्खी पालन और गोपालन को आपस में जोड़कर खेती का ऐसा मॉडल खड़ा किया है, जिससे उन्हें सालाना लाखों रुपये की कमाई हो रही है. उनकी शुरुआत नींबू के बाग और मधुमक्खी पालन से हुई थी, लेकिन एक घटना ने उनकी पूरी खेती का तरीका ही बदल दिया.

## मधुमक्खियों की मौत ने बदली दिशा
जब जयप्रकाश पांडेय ने मधुमक्खी पालन शुरू किया, तो उन्हें एहसास हुआ कि खेत में छिड़की जाने वाली रासायनिक दवाएं मधुमक्खियों की जान ले रही हैं. इस अनुभव ने उन्हें गहरे तक झकझोर दिया और उन्होंने रासायनिक खेती को पूरी तरह छोड़कर जैविक खेती अपनाने का फैसला किया. यही फैसला आगे चलकर उनकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन गया.

## पहली गाय लक्ष्मी से शुरू हुआ गोपालन
जैविक खेती के लिए जयप्रकाश को नियमित रूप से गोबर और गोमूत्र की जरूरत पड़ती थी, क्योंकि वे बाजार में मिलने वाली किसी भी खाद का इस्तेमाल नहीं करते. साथ ही घर में भी रोजाना 7 से 8 किलो दूध की जरूरत रहती थी. बेटे की सलाह पर उन्होंने अपनी पहली गाय खरीदी और उसका नाम प्यार से लक्ष्मी रखा. यहीं से उनकी असली कमाई की कहानी शुरू हुई. धीरे धीरे उनका गोपालन बढ़ता गया और राजभवन से उन्हें गिर नस्ल की 2 गायें भी मिलीं. आज उनकी गौशाला में गिर और साहीवाल नस्ल की करीब 14 गायें हैं. उन्होंने अपने यहां बछड़े भी तैयार किए हैं, ताकि आने वाले समय में उन्हें कृत्रिम गर्भाधान पर निर्भर न रहना पड़े.

## 20 गायों के लिए खास नाद, मच्छरदानी से सुरक्षा
जयप्रकाश की गौशाला आधुनिक तकनीक की मिसाल है. यहां एक साथ 20 गायों के चारा खाने के लिए खास नाद बनवाई गई है. गायों के नीचे काउ मैट बिछाई गई है, जो उन्हें आराम देती है और साथ ही गोमूत्र को भी एक जगह इकट्ठा कर देती है. पूरे शेड को मच्छरदानी से ढका गया है, ताकि पशु बीमार न पड़ें. गायों को नहलाने के बाद जो पानी निकलता है, वह बर्बाद नहीं होता बल्कि सीधे नींबू के बाग में पहुंचकर सिंचाई का काम करता है, जिससे पौधों की ग्रोथ बेहतर होती है. मधुमक्खियों से परागण बेहतर होने के चलते नींबू के बाग की पैदावार भी दोगुनी हो चुकी है.

## शहद, घी, मट्ठा और खाद, एक दूसरे को मजबूत बनाता मॉडल
यानी एक ही खेत पर शहद, घी, मट्ठा, जैविक खाद, गोमूत्र और बागवानी, ये सारी चीजें एक दूसरे को मजबूत बना रही हैं. जयप्रकाश पांडेय ने अपनी जमीन का बेहतरीन इस्तेमाल किया है. राज्यपाल ने खुद उन्हें सम्मानित किया है और इसी राज्यपाल ने उनकी गौशाला का उद्घाटन भी किया था. इस पूरे काम से उन्होंने 6 लोगों को रोजगार भी दिया है.

## दूध बेचने के बजाय घी बनाने का फैसला क्यों सही निकला
एक लीटर दूध तैयार करने में करीब 72 से 73 रुपये की लागत आती है, जबकि बाजार में दूध सिर्फ 40 से 50 रुपये प्रति लीटर के भाव बिकता है. इस घाटे को भांपते हुए जयप्रकाश ने दूध सीधे बेचने के बजाय मूल्य संवर्धन का रास्ता चुना. उन्होंने दूध और दही से पारंपरिक बिलौना विधि से मक्खन निकालना शुरू किया और फिर उसी मक्खन से शुद्ध देसी घी तैयार करने लगे. उनका यह घी करीब 3,000 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिकता है.

## सालाना 11 लाख का टर्नओवर, कमाई के कई जरिए
हर महीने करीब 30 किलो घी बिकता है, यानी सिर्फ घी से ही करीब 90 हजार रुपये का मासिक टर्नओवर बन जाता है. साल भर में यह आंकड़ा 10 से 11 लाख रुपये तक पहुंच जाता है. इसके अलावा वे मट्ठा भी 25 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचते हैं, जिससे अलग से मुनाफा होता है. नींबू की बागवानी और मधुमक्खी पालन से होने वाली कमाई भी इससे अलग है. यानी एक ही खेत से जयप्रकाश पांडेय के पास आय के कई जरिए बन गए हैं.

## इसका आप पर असर
- **भारत में:** यह मॉडल दिखाता है कि छोटे किसान भी दूध सीधे बेचने के बजाय घी जैसे मूल्यवर्धित उत्पाद बनाकर घाटे को मुनाफे में बदल सकते हैं.
- **बलिया में:** मिरीगिरी गांव की यह गौशाला स्थानीय किसानों के लिए मिसाल बन सकती है और आसपास जैविक खेती व रोजगार के मौके बढ़ा सकती है.

## सवाल-जवाब

### 1. जयप्रकाश पांडेय कहां के रहने वाले हैं?
वे बलिया जिले की बांसडीह तहसील स्थित मिरीगिरी गांव के रहने वाले हैं.

### 2. उन्होंने जैविक खेती अपनाने का फैसला क्यों किया?
क्योंकि रासायनिक दवाओं के छिड़काव से उनकी मधुमक्खियां मरने लगी थीं, जिसके बाद उन्होंने रासायनिक खेती पूरी तरह छोड़ दी.

### 3. उनकी गौशाला में कितनी गायें हैं और किस नस्ल की?
उनकी गौशाला में गिर और साहीवाल नस्ल की करीब 14 गायें हैं.

### 4. उन्हें गिर नस्ल की गायें कहां से मिलीं?
उन्हें राजभवन से गिर नस्ल की 2 गायें मिलीं थीं.

### 5. उनका देसी घी किस भाव बिकता है और महीने में कितना बिकता है?
उनका घी करीब 3,000 रुपये प्रति किलो के भाव बिकता है और हर महीने लगभग 30 किलो घी बिक जाता है.

### 6. घी से उन्हें सालाना कितनी कमाई होती है?
सिर्फ घी से ही उनका सालाना टर्नओवर करीब 10 से 11 लाख रुपये तक पहुंच जाता है.

### 7. उन्होंने कितने लोगों को रोजगार दिया है?
उन्होंने अपने इस काम से 6 लोगों को रोजगार दिया है.

### 8. राज्यपाल ने उन्हें कैसे सम्मानित किया?
राज्यपाल ने खुद जयप्रकाश पांडेय को सम्मानित किया और उनकी गौशाला का उद्घाटन भी किया.

## प्रेरणा और सबक
- मधुमक्खियों की मौत जैसे एक झटके ने जयप्रकाश पांडेय को तुरंत रासायनिक खेती छोड़कर जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया.
- घाटे को समझते ही उन्होंने रास्ता बदल लिया, दूध सीधे बेचने के बजाय घी जैसे मूल्यवर्धित उत्पाद पर फोकस किया.
- उन्होंने अपने संसाधनों की कोई बर्बादी नहीं होने दी, नहाने का पानी सिंचाई में और गोमूत्र खेती में इस्तेमाल किया.
- भविष्य की सोच रखते हुए उन्होंने खुद अपने यहां बछड़े तैयार किए, ताकि कृत्रिम गर्भाधान पर निर्भरता न रहे.
- उन्होंने शहद, घी, मट्ठा और बागवानी को एक साथ जोड़कर एक ही खेत से आय के कई जरिए बनाए.

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