मुरादाबाद की महिलाओं ने बनाया मसाला उद्यम, पारंपरिक पिसाई से दिल्ली और पुणे तक पहुंचाई खुशबू मुरादाबाद के महिला शक्ति स्वयं सहायता समूह की 10 महिलाओं ने पत्थर की चक्की पर शुद्ध मसाले तैयार कर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। हर महीने करीब एक लाख रुपये की बिक्री के साथ समूह की प्रत्येक सदस्या 10 हजार रुपये से अधिक मुनाफा कमा रही है। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में महिलाओं की एक छोटी सी पहल ने उन्हें आत्मनिर्भरता और आर्थिक सुरक्षा की मजबूत राह दिखाई है। महिला शक्ति स्वयं सहायता समूह से जुड़ी 10 महिलाओं ने मिलकर शुद्ध और मिलावट मुक्त मसालों का सामूहिक व्यवसाय खड़ा किया है। यह समूह हल्दी, मिर्च और अन्य दैनिक उपयोग के मसालों की सफाई से लेकर सुखाने, कूटने, पीसने और पैकेजिंग तक का पूरा काम अपने हाथों से संभाल रहा है। अपने पारंपरिक तौर-तरीकों और बेमिसाल स्वाद के दम पर इन महिलाओं के बनाए मसालों की मांग अब न केवल मुरादाबाद के स्थानीय बाजारों में है, बल्कि दिल्ली और पुणे जैसे बड़े शहरों के ग्राहक भी इन्हें खूब पसंद कर रहे हैं। स्वयं सहायता समूह से जागी स्वरोजगार की उम्मीद महिला शक्ति स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष ज्योति के अनुसार, उनके आस-पास ऐसी कई महिलाएं थीं जो अपने पैरों पर खड़ा होकर काम करना चाहती थीं। जब इन महिलाओं को सही दिशा और प्रोत्साहन मिला, तो वे चारदीवारी से बाहर निकलकर आगे आईं और इस स्वयं सहायता समूह का गठन किया। वर्तमान में 10 महिलाएं पूरी एकजुटता के साथ इस मसाला कारोबार को संचालित कर रही हैं। किसी भी मसाले को तैयार करने से पहले साबुत कच्चे माल को बेहद बारीकी से छांटा और साफ किया जाता है। इसके बाद उन्हें धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है और फिर हल्की आंच पर भूनकर तैयार किया जाता है, जिससे मसालों की स्वाभाविक सुगंध और नमी का संतुलन बना रहे। इमामदस्ते की कुटाई और पत्थर की चक्की पर धीमी पिसाई इस समूह के मसालों की सबसे बड़ी खूबी उनकी पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया है। औद्योगिक स्तर पर चलने वाली तेज गति वाली मशीनों के बजाय यह समूह पत्थर की चक्की का इस्तेमाल करता है। हल्दी जैसे कड़े और सख्त मसालों को सीधे चक्की में नहीं डाला जाता, बल्कि पहले उन्हें पारंपरिक इमामदस्ते में अच्छी तरह कूटा जाता है। इसके बाद उन्हें पत्थर की चक्की पर धीमी गति से पीसा जाता है। समूह से जुड़ी महिलाओं का कहना है कि आधुनिक हाई-स्पीड ग्राइंडर की गर्मी मसालों के प्राकृतिक तेल और स्वाद को नुकसान पहुंचाती है, जबकि धीमी गति वाली पत्थर की चक्की से पिसाई करने पर मसालों का मूल स्वाद, रंग और गुणवत्ता पूरी तरह सुरक्षित रहती है। खेतों से सीधी आवक और सख्त गुणवत्ता जांच मसालों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए कच्चा माल जुटाने पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। समूह साबुत मसालों की खरीदारी मुरादाबाद की मुख्य मंडी से करता है। वहां एक ऐसी दुकान से संपर्क साधा गया है जो सीधे किसानों के खेतों से कच्चा मसाला मंगवाती है। महिलाएं खुद मंडी जाकर मसालों के दाने, रंग और खुशबू की जांच करती हैं। पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही माल खरीदा जाता है और समूह के कार्य केंद्र पर लाया जाता है। महिलाओं का दावा है कि उनके उत्पादों में किसी भी प्रकार का कृत्रिम रंग या मिलावट नहीं होती। ज्योति का कहना है कि उनकी तैयार हल्दी की शुद्धता इतनी अधिक है कि सामान्य भोजन में बहुत कम मात्रा डालने पर भी गहरा रंग और बेहतरीन स्वाद मिल जाता है। हर माह एक लाख का कारोबार और 10 हजार से अधिक का मुनाफा यद्यपि यह मसाला उद्यम अभी नया है, लेकिन बहुत कम समय में इसने उल्लेखनीय व्यावसायिक सफलता दर्ज की है। समूह की सामूहिक मासिक बिक्री लगभग एक लाख रुपये तक पहुंच गई है। सभी खर्च निकालने के बाद समूह में शामिल प्रत्येक महिला हर महीने 10 हजार रुपये से अधिक का शुद्ध मुनाफा कमा रही है। सफाई, पिसाई और पैकेट तैयार करने का काम घर के पास ही होने से इन महिलाओं को अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ सुरक्षित वातावरण में सम्मानजनक आजीविका मिल रही है। महिलाओं का मानना है कि अकेले दम पर इस तरह का व्यवसाय खड़ा करना बेहद कठिन था, लेकिन स्वयं सहायता समूह के मंच ने उन्हें एकजुट कर एक सफल उद्यमी बना दिया है। इसका आप पर असर यह पहल दर्शाती है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में छोटे सामूहिक प्रयासों से नियमित पारिवारिक आमदनी और शुद्ध खाद्य उत्पादों तक सीधी पहुंच कैसे बनाई जा सकती है। • भारत में: यह मॉडल अन्य राज्यों के स्वयं सहायता समूहों को दिखाता है कि पारंपरिक तकनीकों से तैयार उत्पादों का बड़े शहरों में प्रीमियम बाजार मौजूद है। ग्रामीण महिलाएं स्थानीय स्तर पर संसाधन जोड़कर दिल्ली और पुणे जैसे उपभोक्ता केंद्रों से सीधे जुड़ सकती हैं। • मुरादाबाद में: स्थानीय उपभोक्ताओं को मुख्य मंडी से सीधे जुड़े शुद्ध और बिना मिलावट के पत्थर की चक्की पर पिसे मसाले मिल रहे हैं। इसके साथ ही क्षेत्र की महिलाओं को घर के पास सुरक्षित और सम्मानजनक स्वरोजगार के अवसर प्राप्त हो रहे हैं। • घरेलू उपभोक्ताओं के लिए: शुद्ध पिसी हल्दी और मसालों की कम मात्रा से ही बेहतर स्वाद और रंग मिलता है, जिससे रसोई के बजट में बचत होती है। मिलावट मुक्त मसालों के नियमित उपयोग से परिवार के स्वास्थ्य की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है। • स्वरोजगार चाहने वालों के लिए: 10 महिलाओं के समूह ने साबित किया है कि सीमित पूंजी और पारंपरिक कौशल से भी हर महीने 1 लाख रुपये की बिक्री और 10 हजार रुपये प्रति व्यक्ति मुनाफा कमाया जा सकता है। सामूहिक संगठन के जरिए बिना बड़े औद्योगिक संयंत्र के सफल व्यवसाय शुरू किया जा सकता है। ऐसा क्यों हुआ इस उद्यम की शुरुआत महिलाओं द्वारा आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करने और बाजार में मौजूद मिलावटी मसालों के विकल्प के रूप में पारंपरिक शुद्धता को सामने लाने के उद्देश्य से हुई। • स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की आवश्यकता: इलाके की महिलाएं अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना चाहती थीं, जिसे स्वयं सहायता समूह के गठन ने संभव बनाया। संगठित होने से उन्हें काम शुरू करने के लिए साझा संबल और प्रेरणा मिली। • पारंपरिक स्वाद और शुद्धता की मांग: आधुनिक तेज रफ्तार ग्राइंडर की गर्मी से मसालों का स्वाद और तेल नष्ट होने की समस्या को देखते हुए महिलाओं ने पत्थर की चक्की और इमामदस्ते की पारंपरिक विधि चुनी। उपभोक्ता बिना मिलावट के असली स्वाद वाले उत्पादों की तलाश में थे। • मंडी से सीधी खरीद की रणनीति: बिचौलियों को हटाने और खेतों से सीधे माल मंगाने वाली थोक दुकानों से कच्चा माल लेने से लागत कम रही और गुणवत्ता की सीधी जांच संभव हुई। महिलाओं ने खुद मंडी जाकर माल की परख करने का फैसला किया। सवाल-जवाब 1. मुरादाबाद में इस मसाला कारोबार को कौन चला रहा है? इस कारोबार को मुरादाबाद के महिला शक्ति स्वयं सहायता समूह से जुड़ी 10 महिलाएं मिलकर संचालित कर रही हैं, जिसकी अध्यक्ष ज्योति हैं। 2. समूह की महिलाएं मसाले तैयार करने के लिए कौन सी विधि अपनाती हैं? वे मसालों को साफ करके धूप में सुखाती हैं, हल्दी जैसे कड़े मसालों को इमामदस्ते में कूटती हैं और फिर पारंपरिक पत्थर की चक्की पर धीमी गति से पीसती हैं। 3. इन शुद्ध मसालों का कच्चा माल कहां से खरीदा जाता है? समूह मुरादाबाद की मुख्य मंडी की उस दुकान से साबुत मसाले खरीदता है जो सीधे किसानों के खेतों से कच्चा माल मंगाती है, और महिलाएं खुद इसकी गुणवत्ता जांचती हैं। 4. मुरादाबाद के अलावा इन मसालों की मांग और कहां-कहां है? स्थानीय बाजार के अलावा इन महिलाओं द्वारा तैयार शुद्ध मसालों की मांग दिल्ली और पुणे जैसे बड़े शहरों तक पहुंच चुकी है। 5. इस मसाला कारोबार से समूह की हर महीने कितनी कमाई हो रही है? समूह हर महीने लगभग एक लाख रुपये के मसाले बेचता है और इससे जुड़ी प्रत्येक महिला को प्रति माह 10 हजार रुपये से अधिक का शुद्ध मुनाफा मिलता है। प्रेरणा और सबक सीमित संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के भरोसे 10 साधारण महिलाओं ने यह साबित किया कि संगठित होकर काम करने से स्वावलंबन और सम्मान दोनों हासिल किए जा सकते हैं। • सामूहिकता में बड़ी ताकत: जो काम कोई महिला अकेले पूंजी या अनुभव की कमी के कारण नहीं कर पा रही थी, उसे 10 महिलाओं ने समूह बनाकर आसानी से शुरू कर दिया। सामूहिक प्रयास से जोखिम घटता है और हौसला बढ़ता है। • पारंपरिक पद्धतियों को ताकत बनाना: आधुनिक मशीनों की नकल करने के बजाय पारंपरिक पत्थर की चक्की और इमामदस्ते का उपयोग कर महिलाओं ने अपने उत्पाद को बाजार में एक अलग पहचान दी। अपनी पुरानी धरोहर को आधुनिक उद्यम का आधार बनाया जा सकता है। • गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं: खेतों से सीधे आए कच्चे माल की खुद मंडी जाकर जांच करना और बिना मिलावट के उत्पाद तैयार करना ही उनके कारोबार की तेजी से बढ़ती मांग का मुख्य कारण बना। शुद्धता पर अडिग रहना ही सबसे बेहतरीन मार्केटिंग है। • घर के पास आर्थिक आजादी: अपने रहने के स्थान के नजदीक ही काम खड़ा करके महिलाओं ने परिवार की देखभाल के साथ-साथ हर महीने 10 हजार रुपये से अधिक की सम्मानजनक आमदनी हासिल की। आर्थिक आत्मनिर्भरता से समाज में सम्मान और आत्मसम्मान दोनों मिलते हैं। https://trendkia.com/success-stories/moradabad-ki-mahilaon-ne-banaya-masala-udyama-parnparika-pisai-se-delhi-aura-pune-taka-pahunchai-khushabu-56883 TrendKia — Har trend, sabse pehle.