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  "type": "article",
  "title": "मुरादाबाद में अकेले दम पर तालाब लीज पर लेकर मछली पालन कर रहीं प्रियंका, हर महीने कमा रहीं मुनाफा",
  "summary": "उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में प्रियंका ने समूह की महिलाओं के हटने के बाद भी हार नहीं मानी और तीन तालाब पट्टे पर लेकर पांच से छह प्रजातियों की मछलियों का सफल पालन शुरू किया।",
  "content": "उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचल में स्वरोजगार के जरिए अपनी पहचान बनाने की दिशा में महिलाएं तेजी से आगे कदम बढ़ा रही हैं। मुरादाबाद जिले में रहने वाली प्रियंका ने पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकलकर जलीय कृषि यानी मछली पालन को अपनी आजीविका का मुख्य आधार बनाया है। पिछले दो वर्षों से वह इस क्षेत्र में लगातार मेहनत कर रही हैं और अपने परिवार को आर्थिक रूप से सशक्त बना रही हैं। आज वह गांव में तीन अलग-अलग तालाबों का संचालन कर रही हैं, जिनमें विभिन्न किस्मों की मछलियों का संवर्धन किया जा रहा है।\n\nसमूह के टूटने के बाद भी नहीं डिगा हौसला\nमछली पालन के इस सफर की शुरुआत प्रियंका ने राधा रानी समूह की अध्यक्ष के तौर पर की थी। उनका विचार था कि स्वयं सहायता समूह की बाकी महिलाओं के साथ मिलकर सामूहिक स्तर पर काम किया जाए। योजना बनाकर काम तो शुरू हुआ, लेकिन समय बीतने के साथ समूह की अन्य महिलाओं ने एक-एक करके उनका साथ छोड़ दिया। इस मोड़ पर पूरा प्रोजेक्ट बंद होने की कगार पर पहुंच सकता था, परंतु प्रियंका ने पीछे हटने के बजाय अकेले ही इस व्यवसाय को संभालने का फैसला किया।\n\nउन्होंने स्वतंत्र रूप से गांव के जलस्रोतों को व्यवस्थित करने की दिशा में कदम बढ़ाया। इसके लिए उन्होंने स्थानीय स्तर पर पांच वर्ष और दस वर्ष की अवधि के लिए तालाबों को पट्टे पर लिया। कानूनी और प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद सबसे बड़ी चुनौती उन तालाबों को मछली पालन योग्य बनाने की थी।\n\nतालाबों की सफाई और शुरुआती पूंजी निवेश\nपट्टे पर मिले तालाबों की स्थिति शुरुआत में जलीय खेती के अनुकूल नहीं थी। प्रियंका ने मजदूरों और संसाधनों की मदद से तालाबों से पुरानी जमी हुई गाद, सड़ी हुई मिट्टी और कचरे को बाहर निकलवाया। तली की संपूर्ण सफाई कराने के बाद उनमें शुद्ध पानी भरवाया गया। जल भराव की प्रक्रिया पूरी होने पर उन्होंने बाहर से उन्नत नस्ल के मछलियों के छोटे बच्चे लाकर इन तालाबों में छोड़े।\n\nपूरे उद्यम को खड़ा करने में शुरुआती खर्च काफी अधिक रहा। तालाबों का लीज शुल्क चुकाने, उनकी सफाई कराने, उन्नत बीज खरीदने, चारे और दवाओं की व्यवस्था करने में कुल मिलाकर चार से पांच लाख रुपये की लागत आई। शुरुआत में अनुभव की कमी होने की वजह से उन्हें कुछ नुकसान भी उठाना पड़ा। कड़ाके की ठंड के मौसम में कई मछलियां असमय मर गईं, जिससे उन्हें समझ आया कि मौसम और पानी की गुणवत्ता पर लगातार निगरानी रखना कितना जरूरी है।\n\nपानी की गुणवत्ता और रोग प्रबंधन\nमछलियों के स्वास्थ्य और तीव्र विकास के लिए प्रियंका हर दिन समय पर दाना डालने और पानी की स्थिति की जांच करने का काम खुद देखती हैं। गांव के कुछ तालाबों में पानी का संतुलन और गुणवत्ता हमेशा मुफीद नहीं रहती, इसलिए उन्होंने अपनी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए निजी तालाबों का सहारा भी लिया है। जलीय जीवों में बीमारियों की रोकथाम और उपचार के लिए वह स्थानीय बाजारों पर निर्भर रहने के बजाय सीधे नोएडा से आवश्यक दवाइयां मंगवाती हैं।\n\nतालाब पर ही सीधे बिक्री से निश्चित आमदनी\nप्रियंका को अपनी उपज बेचने के लिए किसी थोक मंडी या खुदरा बाजार के चक्कर नहीं लगाने पड़ते। फसल तैयार होने पर वह स्थानीय मछुआरों को सीधे तालाब पर ही बुला लेती हैं। मछुआरे खुद जाल डालकर मछलियां निकालते हैं और उन्हें ले जाते हैं। तालाब के किनारे से ही यह बिक्री अस्सी से सौ रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर हो जाती है।\n\nइस व्यापारिक मॉडल से मध्यस्थों का दखल खत्म हुआ है और समय की भी बचत होती है। इस पूरे व्यवसाय से वार्षिक आधार पर लाखों रुपये का कारोबार होता है। सभी परिचालन खर्च और लागत निकालने के बाद प्रियंका हर महीने दस हजार से पंद्रह हजार रुपये के आसपास शुद्ध बचत आसानी से कर लेती हैं, जिससे उनके परिवार का भरण-पोषण सुगमता से चल रहा है।\n\nतालाबों में पाली जा रही मछलियों की किस्में\nतालाब के पानी और गहराई के हर स्तर का समुचित उपयोग करने के लिए प्रियंका पांच से छह तरह की मछलियों का मिश्रित पालन कर रही हैं। इनमें मुख्य रूप से रोहू, सिल्वर कार्प और चाइनीज कार्प जैसी प्रजातियां शामिल हैं। विभिन्न प्रजातियां तालाब के अलग-अलग हिस्सों में मिलने वाले भोजन का उपभोग करती हैं, जिससे मछलियों का शारीरिक विकास तेज होता है। प्रियंका का अगला लक्ष्य अपने उत्पादन को और अधिक व्यवस्थित करना है, ताकि आने वाले समय में अपने लाभ को और ऊंचा ले जाया जा सके।\n\nइसका आप पर असर\nयह समाचार दर्शाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी या पंचायत स्तर के तालाबों को लीज पर लेकर स्वरोजगार का एक स्थायी जरिया बनाया जा सकता है।\n\n• भारत में: किसान और ग्रामीण युवा बंजर या उपेक्षित जलस्रोतों को लीज पर लेकर मीठे पानी की जलीय खेती शुरू कर सकते हैं। इसके लिए चार से पांच लाख रुपये के आरंभिक पूंजी निवेश और बुनियादी प्रशिक्षण की जरूरत होती है।\n• मुरादाबाद में: स्थानीय जल निकायों का उपयोग कर उत्पादक सीधे मछुआरों को अस्सी से सौ रुपये प्रति किलो में माल बेच सकते हैं। इससे मंडी की ढुलाई का खर्च बचता है और दस से पंद्रह हजार रुपये महीने की शुद्ध बचत संभव होती है।\n• जोखिम प्रबंधन: ठंड के मौसम में तापमान गिरने से मछलियों की मृत्यु दर बढ़ सकती है, इसलिए समय पर दवाओं का प्रबंध आवश्यक है। जल शोधन और नोएडा जैसे बड़े शहरों से गुणवत्तापूर्ण दवाएं मंगाकर नुकसान से बचा जा सकता है।\n• किस्मों का चयन: एक ही तालाब में रोहू, सिल्वर कार्प और चाइनीज कार्प जैसी बहु-प्रजातियों को पालने से भोजन और पानी की गहराई का सर्वोत्तम उपयोग होता है। इससे प्रति एकड़ उत्पादन और मुनाफा दोनों बढ़ते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nप्रियंका द्वारा यह उद्यम स्थापित करने का मुख्य कारण आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करना और स्थानीय जलस्रोतों का व्यावसायिक उपयोग करना था। समूह का साथ छूटने के बाद भी उन्होंने अपने प्रयासों को थामने के बजाय व्यक्तिगत स्तर पर आगे बढ़ाया।\n\n• सामूहिक भागीदारी का टूटना: राधा रानी समूह की अन्य सदस्यों ने शुरुआती दौर में काम से किनारा कर लिया था। इस स्थिति ने प्रियंका को स्वयं जिम्मेदारी संभालने और तालाबों के निजी पट्टे लेने के लिए प्रेरित किया।\n• उपेक्षित तालाबों का पुनरुद्धार: गांव के तालाबों में अत्यधिक गाद और गंदगी जमा थी, जिसके कारण वे मत्स्य पालन के उपयुक्त नहीं थे। संपूर्ण सफाई और पानी भरने के बाद ही मछली के बच्चों को जीवित रखने का वातावरण तैयार हुआ।\n• मौसम और गुणवत्ता की चुनौती: ठंड के मौसम में अनुभव की कमी के कारण मछलियों की मृत्यु हुई और कुछ तालाबों में पानी का संतुलन बिगड़ा। इस अनुभव के बाद उन्होंने निजी तालाब जोड़े और नोएडा से विशेष औषधियां मंगवानी शुरू कीं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. प्रियंका ने मछली पालन के लिए तालाब कितने समय के पट्टे पर लिए हैं?\nउन्होंने मुरादाबाद के गांव में स्थित तालाबों को पांच और दस वर्ष की अवधि के लिए पट्टे पर लिया है।\n\n2. इस व्यवसाय को शुरू करने में कितनी लागत आई थी?\nतालाब की सफाई, पट्टा शुल्क, मछली के बच्चे, चारा और दवाइयों की व्यवस्था करने में कुल चार से पांच लाख रुपये का खर्च आया था।\n\n3. प्रियंका अपने तालाबों में किन प्रजातियों की मछलियां पालती हैं?\nवह रोहू, सिल्वर कार्प, चाइनीज कार्प सहित पांच से छह अलग-अलग प्रजातियों की मछलियों का पालन करती हैं।\n\n4. मछलियों की बिक्री किस भाव पर और कहां की जाती है?\nमछलियां सीधे तालाब पर मछुआरों को अस्सी से सौ रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेची जाती हैं।\n\n5. इस उद्यम से प्रियंका को हर महीने कितना मुनाफा होता है?\nखर्च निकालने के बाद उन्हें हर महीने करीब दस से पंद्रह हजार रुपये की नियमित बचत होती है।\n\nप्रेरणा और सबक\nप्रियंका की यह यात्रा साबित करती है कि जब सहयोगी साथ छोड़ दें, तब भी अटूट संकल्प और सही रणनीति से बड़े उपक्रम चलाए जा सकते हैं।\n\n• अकेले आगे बढ़ने का साहस: समूह के बिखरने के बाद हताश होने के बजाय जिम्मेदारी खुद उठाकर उन्होंने एक मिसाल पेश की है। बाधाएं आने पर दूसरों के भरोसे रहने के बजाय स्वयं निर्णय लेना जरूरी होता है।\n• नुकसान से सीखना: शुरुआती दौर में ठंड से मछलियों के मरने पर उन्होंने काम बंद नहीं किया, बल्कि बेहतर दवाओं और पानी के प्रबंधन से उस कमी को दूर किया। गलतियों से सीखकर ही स्थायी व्यापार बनता है।\n• व्यवस्थित बाजार रणनीति: खुद बाजार में भटकने के बजाय तालाब पर ही खरीदारों को बुलाकर उन्होंने अपनी लागत और समय दोनों की बचत की। अपने काम के हर पहलू को व्यावहारिक बनाना सफलता की कुंजी है।",
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  "publishedAt": "2026-10-21",
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