मोतिहारी में दिहाड़ी मजदूरी से निकलकर अजय कुमार सिंह ने खड़ा किया लाखों का सीमेंट कारोबार पूर्वी चंपारण के अजय कुमार सिंह ने 150 रुपये की दिहाड़ी और सूरत में ठेकेदारी छूटने के झटके के बाद गांव लौटकर 50 हजार रुपये से सीमेंट उत्पादों का बड़ा कारोबार खड़ा किया। बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में तुरकौलिया प्रखंड स्थित सपही गांव के अजय कुमार सिंह ने दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर उद्यमिता की नई मिसाल पेश की है। एक वक्त ऐसा भी था जब वह मोतिहारी की एक बिजली की दुकान में रोजाना केवल 150 रुपये की मजदूरी किया करते थे। सीमित आय की वजह से घर चलाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो चुका था, लेकिन कठिन परिस्थितियों से घबराने के बजाय उन्होंने अपने संघर्ष को सफलता की सीढ़ी बना लिया। आज वही अजय कुमार सिंह सीमेंट से जुड़े दर्जनों उत्पाद बनाकर लाखों रुपये का कारोबार संभाल रहे हैं। सूरत में मिला बड़ा धोखा और बदल गया जीवन अजय कुमार सिंह के सामने जब 150 रुपये की दिहाड़ी से परिवार की बुनियादी जरूरतें पूरी करना नामुमकिन होने लगा, तब उन्होंने बेहतर रोजगार की तलाश में गृह जिले को छोड़कर गुजरात के सूरत का रुख किया। सूरत पहुंचकर उन्होंने साड़ी पर कारीगरी करवाने का ठेकेदारी का काम संभाला और कई कारीगरों को अपने साथ जोड़ा। इस काम से उनकी आमदनी सुधरने लगी थी और परिवार को कुछ राहत मिली। हालांकि त्योहारों और घरेलू जिम्मेदारियों के चलते उन्हें बार-बार अपने पैतृक गांव लौटना पड़ता था। इसी आवाजाही के दौरान उनके साथ एक बड़ा विश्वासघात हुआ। उनके साथ जुड़े मजदूरों ने स्थानीय सेठ से सीधा संपर्क साध लिया और अजय को दरकिनार कर खुद काम करने लगे। इसके चलते अजय का ठेकेदारी का जमा-जमाया काम अचानक बंद हो गया। इस धोखे ने उन्हें आर्थिक और मानसिक रूप से बड़ा झटका दिया, लेकिन उन्होंने हिम्मत हारने के बजाय अपने गांव वापस आकर खुद का स्वतंत्र काम शुरू करने की ठानी। 50 हजार रुपये की पूंजी से की नई शुरुआत गांव लौटने के बाद अजय कुमार सिंह ने काफी विचार-विमर्श किया और महज 50 हजार रुपये की बचत से एक नया उपक्रम शुरू करने का फैसला लिया। उन्होंने स्थानीय बाजार की जरूरतों को भांपते हुए सबसे पहले सीमेंट के खंभे और वेंटिलेटर तैयार करना शुरू किया। शुरुआत छोटी थी, लेकिन उत्पादों की मजबूती और गुणवत्ता के कारण आसपास के इलाकों में उनकी मांग धीरे-धीरे बढ़ने लगी। शुरुआती काम के मुनाफे ने अजय को कारोबार को बड़ा रूप देने का हौसला दिया। उन्होंने समय के साथ अपने उत्पादन का दायरा बढ़ाया और कई अन्य निर्माण सामग्रियां तैयार करनी शुरू कर दीं। आज उनकी यूनिट में सीमेंट की ईंटें, खिड़कियों के जंगले, दरवाजों के चौखट, बैठने के लिए मजबूत बेंच, पौधों के गमले और भवन निर्माण से जुड़ी दूसरी सामग्री भारी मात्रा में तैयार की जाती है। स्थानीय स्तर पर इन सभी सामानों की लगातार बढ़ती मांग ने उनके इस छोटे से काम को एक विशाल ग्रामीण उद्योग में तब्दील कर दिया है। गांव में रहकर रोजगार सृजन की अनूठी मिसाल कभी 150 रुपये की मजदूरी पर निर्भर रहने वाले अजय कुमार सिंह आज अपने इस उद्यम से हर महीने लाखों रुपये कमा रहे हैं। उनका मानना है कि जिंदगी में रुकावटें और असफलताएं हर किसी के सामने आती हैं, लेकिन अगर इंसान लगातार कोशिश करता रहे तो समाधान जरूर निकलता है। अजय का यह सफर उन सभी ग्रामीण युवाओं के लिए एक मजबूत संदेश है जो काम की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन करते हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि सीमित पूंजी से भी अपने ही गांव में लगन के दम पर बड़ा कारोबार खड़ा किया जा सकता है। इसका आप पर असर यह कहानी दर्शाती है कि सीमित पूंजी और स्थानीय बाजार की पहचान के जरिए ग्रामीण स्तर पर भी सफल उद्यम शुरू किया जा सकता है। • स्वरोजगार के अवसर: कम लागत में सीमेंट उत्पाद निर्माण जैसे छोटे उद्यम स्थानीय मांग को पूरा कर सकते हैं। युवा केवल 50 हजार रुपये जैसी मामूली बचत से अपने गांव में काम शुरू करने की प्रेरणा ले सकते हैं। • पलायन पर रोक: महानगरों में मजदूरी करने के बजाय गृह क्षेत्र में ही स्वतंत्र कारोबार खड़ा करना संभव है। इससे स्थानीय कारीगरों को भी अपने जिले में ही काम मिलने का रास्ता खुलता है। • स्थानीय निर्माण सामग्री की उपलब्धता: ग्रामीण क्षेत्रों में ईंट, चौखट, वेंटिलेटर और बेंच जैसे उत्पादों की निरंतर मांग रहती है। ऐसे स्थानीय उद्योगों से निर्माण लागत कम होती है और समय की बचत होती है। • जोखिम प्रबंधन का सबक: किसी भी काम में धोखाधड़ी या मंदी आने पर पूरी तरह हताश होने के बजाय वैकल्पिक योजना तैयार रखना जरूरी है। अनुभव और धैर्य के साथ फिर से शुरुआत कर नुकसान की भरपाई की जा सकती है। ऐसा क्यों हुआ यह घटनाक्रम तब शुरू हुआ जब सूरत में ठेकेदारी के दौरान मजदूरों ने विश्वासघात कर सेठ के साथ सीधा हाथ मिला लिया, जिससे अजय का काम बंद हो गया। • सीमित दिहाड़ी आय: मोतिहारी में बिजली की दुकान पर मिलने वाले 150 रुपये रोजाना से परिवार का भरण-पोषण नहीं हो पा रहा था, जिसके चलते बेहतर आय की तलाश में उन्हें सूरत जाना पड़ा। • सूरत में ठेकेदारी का नुकसान: साड़ी कारीगरी के काम में मजदूरों ने सेठ के साथ सीधा गठजोड़ कर लिया, जिससे अजय की ठेकेदारी अचानक खत्म हो गई। • गांव वापसी और स्थानीय मांग की पहचान: नुकसान झेलने के बाद गांव लौटकर उन्होंने 50 हजार रुपये से खंभे और वेंटिलेटर बनाने का काम चुना, जिनकी निर्माण कार्यों में स्वाभाविक मांग थी। सवाल-जवाब 1. अजय कुमार सिंह कहां के निवासी हैं? अजय कुमार सिंह बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के अंतर्गत तुरकौलिया प्रखंड के सपही गांव के रहने वाले हैं। 2. शुरुआत में अजय कुमार सिंह क्या काम करते थे और उनकी कमाई कितनी थी? वह मोतिहारी की एक बिजली की दुकान पर दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते थे और रोजाना केवल 150 रुपये कमाते थे। 3. सूरत में अजय कुमार सिंह के साथ क्या हुआ था? सूरत में वह साड़ी कारीगरी की ठेकेदारी करते थे, लेकिन उनके मजदूरों ने सेठ के साथ सीधा हाथ मिला लिया जिससे उनका काम बंद हो गया। 4. अजय ने अपना सीमेंट कारोबार कितनी पूंजी से शुरू किया था? गांव लौटने के बाद उन्होंने महज 50 हजार रुपये की पूंजी लगाकर सीमेंट का काम शुरू किया था। 5. शुरुआत में उन्होंने कौन से सीमेंट उत्पाद बनाए थे? उन्होंने शुरुआत में सीमेंट से बने खंभे और वेंटिलेटर बनाने का काम शुरू किया था। 6. आज उनके कारखाने में कौन-कौन से उत्पाद तैयार किए जाते हैं? आज वह सीमेंट की ईंटें, खिड़कियों के जंगले, चौखट, बेंच, गमले और अन्य निर्माण सामग्रियां तैयार करते हैं। प्रेरणा और सबक अजय कुमार सिंह का सफर साबित करता है कि गंभीर झटकों के बावजूद दृढ़ संकल्प और धैर्य से जिंदगी को नई दिशा दी जा सकती है। • धोखे को नई शुरुआत में बदलें: जब सूरत में उनका काम छिन गया, तो उन्होंने हार मानने के बजाय उसे स्वतंत्र कारोबार शुरू करने का अवसर बना लिया। • छोटी पूंजी से बड़ा लक्ष्य बनाएं: उन्होंने महज 50 हजार रुपये की पूंजी से काम शुरू किया और धीरे-धीरे उत्पाद बढ़ाकर लाखों का टर्नओवर हासिल किया। • स्थानीय बाजार की जरूरत समझें: गांव के निर्माण क्षेत्र में सीमेंट खंभों और ईंटों की मांग को पहचानकर उन्होंने ऐसा व्यवसाय चुना जो टिकाऊ था। • कठिन समय में निरंतरता बनाए रखें: 150 रुपये की दिहाड़ी से लेकर आज तक उन्होंने कभी काम से मुंह नहीं मोड़ा और लगातार प्रयास जारी रखा। https://trendkia.com/success-stories/motihari-men-dihari-majaduri-se-nikalakara-ajay-kumar-singh-ne-khara-kiya-lakhon-ka-simenta-karobara-42286 TrendKia — Har trend, sabse pehle.