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  "type": "article",
  "title": "मुजफ्फरपुर के श्मशान घाट में पढ़ने वाले बच्चे अब कूची से बना रहे हैं अपनी पहचान",
  "summary": "बिहार के मुजफ्फरपुर के श्मशान घाट परिसर में चलने वाली अपन पाठशाला के 28 बच्चे पढ़ाई के साथ मिथिला पेंटिंग सीख रहे हैं और अपनी बनाई तस्वीरें बेचकर कमाई भी कर रहे हैं।",
  "content": "बिहार के मुजफ्फरपुर में एक श्मशान घाट परिसर में चलने वाला स्कूल इन दिनों एक अलग वजह से चर्चा में है। यहां चलने वाली अपन पाठशाला में बच्चे सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रंग और कूची से मिथिला पेंटिंग बनाना सीख रहे हैं और अपनी बनाई तस्वीरें बेचकर कमाई भी कर रहे हैं।\n\nश्मशान घाट में शिक्षा के साथ हुनर की क्लास\nअपन पाठशाला मुजफ्फरपुर के श्मशान घाट परिसर में चलती है। इसमें पढ़ने वाले 28 बच्चे रोज की पढ़ाई के साथ मिथिला पेंटिंग की बारीकियां भी सीख रहे हैं। इन बच्चों के बनाए चित्र स्थानीय बाजार में बिक भी रहे हैं, जिससे उन्हें थोड़ी कमाई के साथ अपने काम पर भरोसा भी बढ़ रहा है।\n\nछठ पूजा से लेकर राधा-कृष्ण तक, कैनवास पर उतर रही परंपरा\nइन दिनों बच्चों की कूची से लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा की थीम पर पेंटिंग निकल रही हैं। इसके अलावा राधा-कृष्ण, मछली, मोर, तरह-तरह के पक्षी और धार्मिक स्थलों की तस्वीरें भी पारंपरिक मिथिला शैली में कागज पर उतारी जा रही हैं। चटख रंगों और पुरानी परंपरागत आकृतियों से सजी ये पेंटिंग आसपास के लोगों को खूब भा रही हैं।\n\nमाही बोलीं, कला से जुड़ रही है अपनी जड़ों से पहचान\nअपन पाठशाला में पढ़ने वाली छात्रा माही का कहना है कि मिथिला पेंटिंग बिहार की पुरानी और मशहूर लोक कला है। उनके मुताबिक, पढ़ाई के साथ-साथ इस कला को सीखना उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव है और इसी बहाने उन्हें अपनी संस्कृति को करीब से जानने का मौका भी मिल रहा है।\n\nसुमित कुमार बोले, मकसद सिर्फ किताबी पढ़ाई नहीं\nअपन पाठशाला चलाने वाले सुमित कुमार के मुताबिक, इस संस्था को शुरू करने का इरादा बच्चों को सिर्फ स्कूली शिक्षा देना नहीं था। उनका कहना है कि बच्चों को ऐसा हुनर सिखाना भी जरूरी है, जिसके सहारे वे आगे चलकर अपने पैरों पर खड़े हो सकें। इसी सोच के साथ बच्चों को मिथिला पेंटिंग की ट्रेनिंग दी जा रही है।\n\n100 से 150 रुपये में बिक रही मेहनत, अंगवस्त्र के साथ भी मिल रहा उपहार\nसुमित कुमार बताते हैं कि बच्चों की बनाई हर पेंटिंग की कीमत 100 से 150 रुपये के बीच रखी जाती है। आसपास के लोग ये पेंटिंग खरीदते हैं, तो कुछ लोग किसी को सम्मानित करते वक्त अंगवस्त्र के साथ उपहार के तौर पर भी इन्हें भेंट करते हैं। इस तरह बच्चों को थोड़ी आर्थिक मदद मिल जाती है, जो उनके लिए बड़े प्रोत्साहन का काम करती है।\n\nमेहनत को मिल रहा सम्मान, तो बढ़ रहा है हौसला\nसुमित कुमार के मुताबिक, जब बच्चों को उनकी मेहनत की कद्र मिलती है और उसकी सही कीमत भी मिलती है, तो उनका मनोबल अपने आप बढ़ जाता है। इसी हौसले के दम पर वे पढ़ाई के साथ-साथ अपनी कला को और निखारने में जुट जाते हैं। श्मशान घाट जैसी जगह पर शुरू हुई यह छोटी सी पहल अब कई बच्चों की जिंदगी में नई उम्मीद जगा रही है, जहां पढ़ाई के साथ हुनर और आत्मनिर्भरता का सबक भी दिया जा रहा है।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: यह पहल दिखाती है कि स्कूली शिक्षा के साथ पारंपरिक हुनर सिखाकर बच्चों को कम उम्र से ही आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।\n• मुजफ्फरपुर में: स्थानीय लोग अब सीधे इन बच्चों से 100 से 150 रुपये में मिथिला पेंटिंग खरीदकर उन्हें प्रोत्साहित कर सकते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. अपन पाठशाला कहां चलती है?\nयह बिहार के मुजफ्फरपुर के एक श्मशान घाट परिसर में चलती है।\n\n2. इस पाठशाला में कितने बच्चे पढ़ते हैं?\nयहां 28 बच्चे नियमित पढ़ाई के साथ मिथिला पेंटिंग सीख रहे हैं।\n\n3. बच्चे किन विषयों पर पेंटिंग बना रहे हैं?\nफिलहाल वे छठ पूजा की थीम पर पेंटिंग बना रहे हैं, साथ ही राधा-कृष्ण, मछली, मोर, पक्षियों और धार्मिक स्थलों की तस्वीरें भी बना रहे हैं।\n\n4. बच्चों की पेंटिंग की कीमत क्या रखी गई है?\nहर पेंटिंग की कीमत 100 से 150 रुपये के बीच रखी जाती है।\n\n5. अपन पाठशाला कौन चलाता है?\nइसे सुमित कुमार चलाते हैं, जिनका मकसद बच्चों को शिक्षा के साथ हुनर भी सिखाना है।\n\n6. पेंटिंग बिकने से बच्चों को क्या फायदा हो रहा है?\nइससे बच्चों को थोड़ी आर्थिक मदद मिलती है और उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता है।\n\n7. क्या ये पेंटिंग सिर्फ बेची ही जाती हैं?\nनहीं, कई बार लोग किसी को सम्मानित करते समय अंगवस्त्र के साथ इन्हें उपहार के तौर पर भी देते हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nअपन पाठशाला की कहानी बताती है कि सही सोच और थोड़े से मौके से मुश्किल हालात में भी बच्चों का भविष्य संवारा जा सकता है।\n\n• सिर्फ किताबी पढ़ाई काफी नहीं: सुमित कुमार ने साबित किया कि बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्कूली पढ़ाई के साथ हुनर सिखाना भी जरूरी है।\n• परंपरा से जुड़ाव मददगार है: माही जैसी छात्राओं के लिए मिथिला पेंटिंग सीखना उन्हें अपनी संस्कृति और जड़ों से जोड़ रहा है।\n• मेहनत की कीमत मिलनी चाहिए: बच्चों की पेंटिंग को 100 से 150 रुपये में बेचकर उनकी मेहनत को सम्मान और सही दाम दोनों दिए जा रहे हैं।\n• छोटी शुरुआत भी बड़ा बदलाव ला सकती है: श्मशान घाट जैसी जगह पर शुरू हुई यह पहल अब कई बच्चों के जीवन में उम्मीद और आत्मविश्वास ला रही है।",
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  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-07-05",
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    "मिथिला पेंटिंग",
    "अपन पाठशाला",
    "मुजफ्फरपुर",
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