# नंदुरबार की कलेक्टर मिताली सेठी ने महंगे प्ले स्कूल छोड़ सरकारी आंगनवाड़ी में कराया जुड़वां बेटों का दाखिला

> महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल जिले नंदुरबार की कलेक्टर मिताली सेठी ने अपने 3 साल के जुड़वां बेटों को महंगे निजी प्ले स्कूल के बजाय स्थानीय सरकारी आंगनवाड़ी में भेजकर अनूठी मिसाल कायम की है। डेंटिस्ट से आईएएस बनीं मिताली सेठी का यह फैसला जमीनी संवेदनशीलता और सादगी की मिसाल पेश करता है।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-10-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/nandurbar-ki-kalektara-mittali-sethi-ne-mahnge-ple-skula-chhora-sarakari-anganavari-men-karaya-juravan-beton-ka-dakhila-42682 · **Language:** Hindi
**Tags:** मिताली सेठी, आईएएस अधिकारी, नंदुरबार, आंगनवाड़ी, सरकारी स्कूल, यूपीएससी, महाराष्ट्र

प्रशासनिक सेवाओं के शीर्ष पदों पर आसीन अधिकारियों के रहन-सहन और उनके बच्चों की शिक्षा को लेकर आमतौर पर एक खास तरह की धारणा बनी रहती है। लोगों का मानना होता है कि बड़े अफसरों के परिवार केवल फाइव स्टार सुविधाओं, महंगे इंटरनेशनल स्कूलों और एलीट कॉन्वेंट संस्थानों को ही प्राथमिकता देते हैं। समाज की इस आम सोच को पूरी तरह दरकिनार करते हुए महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले की कलेक्टर मिताली सेठी ने एक असाधारण कदम उठाया है। उन्होंने अपने जुड़वां बेटों को किसी फैंसी प्ले स्कूल में भेजने के बजाय सीधे सरकारी आंगनवाड़ी केंद्र में दाखिल कराया है।

## फैंसी प्ले स्कूल की जगह आंगनवाड़ी केंद्र का चयन
नंदुरबार एक आदिवासी बहुल जिला है, जहां मिताली सेठी प्रशासनिक मुखिया के तौर पर अपनी जिम्मेदारियां निभा रही हैं। जब उनके जुड़वां बेटे 3 साल के हुए, तब उनके सामने बच्चों की शुरुआती शिक्षा और परवरिश को लेकर निर्णय लेने का समय आया। ऐसे वक्त में जहां कई लोग नामी प्राइवेट संस्थानों की ओर रुख करते हैं, वहीं उन्होंने अपने बच्चों के लिए सरकारी आंगनवाड़ी को चुना। परिवार और सगे-संबंधियों के बीच शुरुआत में इस फैसले को लेकर हिचकिचाहट और असमंजस का माहौल बना, लेकिन उन्होंने अपने निर्णय पर अडिग रहने का संकल्प लिया।

## तौलने वाली अनोखी झोली ने जीता कलेक्टर का भरोसा
इस फैसले के पीछे का कारण कोई दिखावा या पब्लिसिटी हासिल करना बिल्कुल नहीं था, बल्कि एक सच्चा जमीनी अनुभव था। बच्चों का एडमिशन कराने से पहले मिताली सेठी खुद आंगनवाड़ी केंद्र के कामकाज और हालात का मुआयना करने पहुंची थीं। निरीक्षण के दौरान उन्होंने देखा कि छोटे बच्चों का शारीरिक वजन नापने के लिए कपड़े की एक पारंपरिक झोली का उपयोग किया जाता था। उस झोली में अक्सर बच्चे असहज महसूस करते थे और रोने लगते थे।

वहां कार्यरत एक आंगनवाड़ी वर्कर ने बच्चों की इस परेशानी को बहुत बारीकी से समझा। उसने किसी सरकारी टेंडर या लंबी कागजी प्रक्रियाओं का इंतजार किए बिना अपनी सूझबूझ से एक स्थानीय दर्जी से ऐसी आरामदायक झोली तैयार करवाई, जिसमें बैठकर बच्चे खेल-खेल में बिना रोए अपना वजन करवा सकें। जब वर्कर ने सादगी से बताया कि बच्चों की सुविधा के लिए उसने यह काम खुद सेवाभाव से कराया है, तो इस समर्पण ने महिला कलेक्टर को भीतर तक प्रभावित कर दिया।

## किताबी ज्ञान से परे मानवीय संवेदनाओं की सीख
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के इस अपनत्व और कर्तव्यनिष्ठा को देखकर मिताली सेठी आश्वस्त हो गईं कि उनके बच्चों को महंगे विज्ञापनों और फैंसी इमारतों से ज्यादा जरूरी मानवीय स्नेह और अपनापन यहीं मिलेगा। नजदीकी लोगों के संशय और शुरुआती हिचकिचाहट के बावजूद उन्होंने बच्चों को आंगनवाड़ी भेजना शुरू किया। अब उनके बेटे 4 साल के हो चुके हैं और वे बड़े गर्व और उत्साह के साथ आंगनवाड़ी जा रहे हैं। उनका मानना है कि इतनी छोटी उम्र में बच्चों पर पढ़ाई का बोझ लादने से बेहतर है कि वे अपने आस-पास के माहौल, सामान्य लोगों और मानवीय संवेदनाओं को करीब से महसूस करें।

## डेंटल सर्जरी से यूपीएससी में 56वीं रैंक तक का सफर
आईएएस अधिकारी मिताली सेठी की व्यक्तिगत जीवन यात्रा भी काफी प्रेरणादायक रही है। पंजाब के जालंधर के एक संभ्रांत परिवार में जन्मीं मिताली पढ़ाई में हमेशा आगे रहीं। उन्होंने अमृतसर से डेंटल सर्जरी में बैचलर डिग्री (BDS) पूरी की। इसके बाद उन्होंने चेन्नई के एक प्रसिद्ध संस्थान से ऑर्थोडॉन्टिक्स में मास्टर डिग्री (MDS) हासिल की और एक सफल डेंटिस्ट के तौर पर करियर शुरू किया। उस दौर में मेडिकल की पढ़ाई में पूरी तरह व्यस्त रहने के कारण उन्हें आईएएस की दुनिया और इसकी प्रक्रियाओं की बुनियादी जानकारी तक नहीं थी।

चिकित्सा क्षेत्र में काम करते हुए उनके मन में समाज और राष्ट्र के लिए बड़े स्तर पर योगदान देने का विचार आया। उन्होंने अपनी मेडिकल प्रैक्टिस छोड़कर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने की ठान ली। शुरुआत के 2 प्रयासों में नाकामी मिलने के बाद भी उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा और निरंतर मेहनत जारी रखी। आखिरकार साल 2017 की यूपीएससी परीक्षा में उन्होंने देश भर में 56वीं रैंक हासिल की। वर्तमान में वह महाराष्ट्र कैडर में अपनी संवेदनशीलता और निष्ठा के साथ सेवाएं दे रही हैं। उनके पति भी प्रशासनिक सेवा में कार्यरत हैं और पूरा परिवार अपनी सादगी व व्यावहारिक जीवनशैली के लिए जाना जाता है।

## इसका आप पर असर
यह कदम सरकारी आंगनवाड़ी केंद्रों और प्राथमिक बाल विकास व्यवस्था के प्रति आम जनता का विश्वास बढ़ाने का काम करता है।

- **भारत में:** प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा सरकारी सुविधाओं को अपनाने से सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता सुधरती है। इससे अन्य अभिभावकों में भी आंगनवाड़ी और सरकारी बाल केंद्रों के प्रति हिचकिचाहट दूर हो सकती है।
- **महाराष्ट्र में:** नंदुरबार जैसे आदिवासी और दूरदराज के क्षेत्रों में जमीनी आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का मनोबल मजबूत होगा। इससे स्थानीय स्तर पर पोषण और प्राथमिक बाल देखभाल के बुनियादी ढांचे को अधिक संजीदगी से देखा जाएगा।
- **अभिभावकों के लिए:** यह फैसला दिखाता है कि शुरुआती उम्र में महंगी फीस की तुलना में मानवीय जुड़ाव और स्नेह ज्यादा जरूरी है। माता-पिता अपने छोटे बच्चों की शुरुआती परवरिश के लिए बिना दिखावे वाले सुरक्षित परिवेश को प्राथमिकता दे सकते हैं।
- **प्रशासनिक व्यवस्था पर:** जब जिले का शीर्ष अधिकारी स्वयं सरकारी व्यवस्था का उपयोग करता है, तो जवाबदेही बढ़ती है। इससे आंगनवाड़ी केंद्रों की सेवाओं, पोषण वितरण और सुविधाओं में सुधार के प्रयासों को गति मिलती है।

## ऐसा क्यों हुआ
कलेक्टर मिताली सेठी ने अपने बच्चों के लिए आंगनवाड़ी केंद्र को इसलिए चुना क्योंकि वहां के समर्पित कर्मचारियों और बच्चों के प्रति संवेदनशीलता ने उन्हें गहराई से आश्वस्त किया।

- **कार्यकर्ता का संवेदनशील रवैया:** वजन नापते समय बच्चों के डर को खत्म करने के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने अपनी पहल पर दर्जी से आरामदायक झोली बनवाई थी। इस निस्वार्थ सेवाभाव ने कलेक्टर को आश्वस्त किया कि उनके बच्चों को वहां सच्चा स्नेह मिलेगा।
- **दिखावे की जगह मानवीय जुड़ाव:** उनका उद्देश्य विज्ञापनों और फैंसी सुविधाओं से इतर बच्चों को सामान्य परिवेश में सामाजिक और मानवीय मूल्य सिखाना था। उन्होंने महसूस किया कि शुरुआती 3 से 4 साल की उम्र में किताबों से ज्यादा अपने आस-पास के माहौल से जुड़ना जरूरी है।
- **सादगी और व्यावहारिक दृष्टिकोण:** संभ्रांत परिवार और मेडिकल पृष्ठभूमि से आने के बावजूद वह दिखावे की जीवनशैली के बजाय जमीनी और सरल जीवन मूल्यों में विश्वास रखती हैं। परिवार के संशय के बाद भी उन्होंने अपने इस निर्णय को दृढ़ता से लागू किया।

## सवाल-जवाब

### 1. मिताली सेठी कौन हैं और वह वर्तमान में किस पद पर हैं?
मिताली सेठी 2017 बैच की आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल नंदुरबार जिले में कलेक्टर के पद पर कार्यरत हैं।

### 2. उन्होंने अपने जुड़वां बच्चों का दाखिला कहां कराया है?
उन्होंने अपने 3 साल के जुड़वां बेटों का दाखिला किसी महंगे निजी प्ले स्कूल के बजाय स्थानीय सरकारी आंगनवाड़ी केंद्र में कराया है।

### 3. आंगनवाड़ी में ऐसा क्या हुआ जिसने महिला कलेक्टर का दिल जीत लिया?
निरीक्षण के दौरान उन्होंने देखा कि वजन तौलते समय बच्चों के रोने की समस्या को हल करने के लिए एक आंगनवाड़ी वर्कर ने खुद दर्जी से आरामदायक झोली बनवाई थी।

### 4. आईएएस बनने से पहले मिताली सेठी किस पेशे में थीं?
सिविल सेवा में आने से पहले वह एक प्रशिक्षित डेंटिस्ट थीं और उन्होंने ऑर्थोडॉन्टिक्स में मास्टर डिग्री (MDS) पूरी की थी।

### 5. यूपीएससी परीक्षा में मिताली सेठी को कौन सी रैंक मिली थी?
शुरुआती 2 प्रयासों में असफल होने के बाद उन्होंने साल 2017 की यूपीएससी परीक्षा में ऑल इंडिया 56वीं रैंक हासिल की थी।

### 6. अब उनके बच्चों की उम्र कितनी है और क्या वे अब भी आंगनवाड़ी जा रहे हैं?
उनके बच्चे अब 4 साल के हो चुके हैं और वे आज भी पूरे गर्व के साथ आंगनवाड़ी केंद्र में जा रहे हैं।

## प्रेरणा और सबक
डॉक्टर से आईएएस अधिकारी बनीं मिताली सेठी का जीवन और उनके जमीनी फैसले हर किसी को सादगी और दृढ़ संकल्प की प्रेरणा देते हैं।

- **सादगी ही सबसे बड़ा संस्कार:** ऊंचे पद और प्रतिष्ठा के बावजूद दिखावे से दूर रहकर सामान्य व्यवस्था में भरोसा जताना सच्चा नेतृत्व दिखाता है।
- **असफलताओं से न घबराना:** शुरुआती 2 प्रयासों में असफल होने के बाद भी उन्होंने यूपीएससी की तैयारी नहीं छोड़ी और 56वीं रैंक पाकर लक्ष्य हासिल किया।
- **लीक से हटकर सोचने का साहस:** समाज या परिवार की परंपरागत सोच के विपरीत जाकर अपने सही और सकारात्मक फैसले पर अडिग रहना आत्मविश्वास की निशानी है।
- **मानवीय संवेदनाओं का सम्मान:** एक साधारण आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के सेवाभाव को पहचानना और उसका आदर करना सिखाता है कि हर कर्म और समर्पण का अपना मूल्य होता है।

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