# नौकरी की दौड़ छोड़ गोंडा के इस युवा ने चुनी खेती की राह, जैविक अरबी उगाकर कमा रहे बंपर मुनाफा

> उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के रहने वाले राघवेंद्र मिश्रा ने ग्रेजुएशन के बाद नौकरी के बजाय जैविक खेती का रास्ता चुना, और आज वह सिर्फ आधा बीघा जमीन से ही शानदार कमाई कर रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-07-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/naukari-ki-daura-chhora-gonda-ke-isa-yuva-ne-chuni-kheti-ki-raha-jaivika-arabi-ugakara-kama-rahe-bnpara-munapha-9170 · **Language:** Hindi
**Tags:** जैविक खेती, सक्सेस स्टोरी, युवा किसान, अरबी की खेती, उत्तर प्रदेश न्यूज़, गोंडा न्यूज़, कृषि व्यवसाय

आज के दौर में जहां ज्यादातर युवा कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद किसी कॉर्पोरेट कंपनी या सरकारी नौकरी के लिए जद्दोजहद करते हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के एक युवक ने एक बिल्कुल अलग और प्रेरणादायक रास्ता चुना है। राघवेंद्र मिश्रा ने पारंपरिक नौकरी की दौड़ से बाहर निकलकर अपनी शिक्षा और ऊर्जा को कृषि क्षेत्र में लगाने का फैसला किया। आधुनिक और पूरी तरह से जैविक खेती की तकनीकों को अपनाकर, उन्होंने अरबी (जिसे घुईया भी कहा जाता है) उगाने का सफल प्रयोग किया है, जिसने उनकी छोटी सी जमीन को एक बेहद लाभदायक व्यवसाय में बदल दिया है।

## रासायनिक खेती से दूरी और नई शुरुआत
राघवेंद्र मिश्रा का परिवार पहले से ही पारंपरिक खेती से जुड़ा हुआ था। लेकिन उन्होंने बहुत कम उम्र में ही यह समझ लिया था कि रासायनिक खादों और जहरीले कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता वाली पारंपरिक खेती से मिट्टी की सेहत खराब हो रही है और फसल की गुणवत्ता भी गिर रही है। कुछ नया और बेहतर करने की चाह में, उन्होंने अपने परिवार की कृषि पद्धतियों को पूरी तरह से जैविक तरीके में बदल दिया। महंगे और नुकसानदायक रसायनों को खरीदने के बजाय, वह अपने खेतों की मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए प्राकृतिक विकल्पों का उपयोग करते हैं। वह मुख्य रूप से सड़ी हुई गोबर की खाद, पोषक तत्वों से भरपूर वर्मी कम्पोस्ट और जीवामृत का इस्तेमाल करते हैं। यह बदलाव न केवल रसायनों से मुक्त और सुरक्षित फसल की गारंटी देता है, बल्कि लंबे समय तक जमीन की प्राकृतिक उर्वरता को भी बनाए रखता है।

## फसल चक्र और जैविक तरीके के फायदे
जैविक तरीके से अरबी की खेती करने में धैर्य और सटीक देखभाल की जरूरत होती है। राघवेंद्र मिश्रा बताते हैं कि इस फसल को पूरी तरह से तैयार होने और कटाई के लायक बनने में लगभग छह से सात महीने का समय लगता है। इस पूरी अवधि के दौरान खेतों का लगातार ध्यान रखना पड़ता है। वह समय पर सिंचाई सुनिश्चित करते हैं और खेत में नियमित रूप से निराई गुड़ाई करते हैं ताकि खरपतवार मुख्य फसल को नुकसान न पहुंचा सकें। इसके अलावा, वह पौधों को कीटों और बीमारियों से बचाने के लिए समय समय पर प्राकृतिक जैविक घोल का छिड़काव भी करते हैं। राघवेंद्र मिश्रा कहते हैं, "इन प्राकृतिक तरीकों से पौधों का विकास बहुत अच्छा होता है और बीमारियों का खतरा भी काफी कम हो जाता है।" उनका मानना है कि रासायनिक चीजों का उपयोग न करने से खेती की कुल लागत में भारी कमी आती है और मिट्टी आने वाले कई सालों तक खेती के लिए उपयुक्त बनी रहती है।

## कम लागत में बंपर पैदावार और शानदार मुनाफा
इस जैविक खेती के वित्तीय आंकड़े विशेष रूप से ध्यान खींचने वाले हैं। राघवेंद्र मिश्रा पिछले 4 वर्षों से अरबी की खेती कर रहे हैं और वर्तमान में लगभग आधा बीघा जमीन पर यह फसल उगा रहे हैं। जब उन्होंने पहली बार शुरुआत की थी, तब उनकी शुरुआती लागत बेहद कम थी, जो केवल 300 से 400 रुपये के बीच थी। आज, उनके बार बार होने वाले खर्चे लगभग न के बराबर हैं क्योंकि वह हर नई बुवाई के मौसम के लिए घर पर ही अपने बीजों को शोधित और तैयार करते हैं। उनका एकमात्र चालू खर्च निराई गुड़ाई और खेत के सामान्य रखरखाव से जुड़ा हुआ मामूली लेबर खर्च है।

## भविष्य के लिए बड़ी योजनाएं
इतने कम निवेश पर मिलने वाला रिटर्न बहुत ही उत्साहजनक रहा है। राघवेंद्र मिश्रा अपने आधा बीघा खेत से लगातार 8 से 9 क्विंटल अरबी की शानदार पैदावार प्राप्त करते हैं। बाजार में जैविक रूप से उगाई गई सब्जियों की भारी मांग है, जिसके कारण आम अरबी की तुलना में उन्हें अपनी फसल के लिए प्रीमियम दाम मिलते हैं। उनकी यह शुद्ध जैविक अरबी बाजार में आसानी से 40 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक जाती है। इस शानदार कीमत के चलते उन्हें एक बड़ी और स्थिर आय प्राप्त हो रही है, जो कि इतने ही आकार के खेत में पारंपरिक खेती करने से होने वाली कमाई से कहीं अधिक है। अपनी इस लगातार बढ़ती आर्थिक सफलता और खेती के पर्यावरण के अनुकूल तरीकों से उत्साहित होकर, राघवेंद्र मिश्रा आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर अपने जैविक खेती के व्यवसाय का विस्तार करने की योजना बना रहे हैं।

## इसका आप पर असर
- **पूरे भारत में:** यह कहानी साबित करती है कि कॉर्पोरेट नौकरियों के लिए संघर्ष कर रहे शिक्षित युवाओं के लिए आधुनिक, रसायन मुक्त कृषि एक बेहद लाभदायक करियर विकल्प हो सकती है।
- **किसानों के लिए:** वर्मी कम्पोस्ट जैसे जैविक उर्वरकों को अपनाने और घर पर ही बीजों को शोधित करने से खेती की लागत में भारी कमी आ सकती है और उपज के बेहतर दाम मिल सकते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. राघवेंद्र मिश्रा कौन हैं?
राघवेंद्र मिश्रा उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के एक शिक्षित युवा हैं, जिन्होंने ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद जैविक खेती को अपने करियर के रूप में चुना है।

### 2. वह मुख्य रूप से किस चीज की खेती करते हैं?
वह अपनी आधा बीघा कृषि भूमि पर मुख्य रूप से अरबी (घुईया) की खेती करते हैं।

### 3. अरबी की फसल को तैयार होने में कितना समय लगता है?
राघवेंद्र मिश्रा के अनुसार, अरबी की फसल को पूरी तरह से तैयार होने और कटाई के लायक बनने में लगभग छह से सात महीने का समय लगता है।

### 4. इस खेती में किस प्रकार के उर्वरकों का उपयोग किया जाता है?
वह रासायनिक खादों का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं करते हैं, बल्कि मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए गोबर की सड़ी खाद, वर्मी कम्पोस्ट और जीवामृत का उपयोग करते हैं।

### 5. इस खेती की शुरुआत में उनकी कितनी लागत आई थी?
जब उन्होंने चार साल पहले अरबी की खेती शुरू की थी, तब उनका शुरुआती खर्च केवल 300 से 400 रुपये आया था।

### 6. उन्हें आधा बीघा खेत से कितनी पैदावार मिलती है?
वह अपने आधा बीघा खेत से लगातार आठ से नौ क्विंटल अरबी की शानदार पैदावार प्राप्त करते हैं।

### 7. वह अपनी जैविक फसल को बाजार में किस दाम पर बेचते हैं?
जैविक रूप से उगाई गई सब्जियों की भारी मांग के कारण, उनकी फसल स्थानीय बाजार में आसानी से 40 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम के ऊंचे दाम पर बिक जाती है।

## प्रेरणा और सबक
- **भीड़ का हिस्सा न बनें:** ग्रेजुएशन के बाद पारंपरिक नौकरियों के पीछे भागने के बजाय, राघवेंद्र ने अपने परिवार के मौजूद संसाधनों का सही इस्तेमाल किया और एक नई सोच के साथ काम किया।
- **छोटी शुरुआत करें:** उन्होंने साबित कर दिया कि किसी भी सफल व्यवसाय के लिए बहुत बड़े निवेश की आवश्यकता नहीं है; उन्होंने केवल 300 से 400 रुपये की लागत के साथ शुरुआत की।
- **गुणवत्ता पर ध्यान दें:** रासायनिक खादों को पूरी तरह से छोड़कर जैविक विकल्प अपनाने से, उन्होंने एक ऐसा उत्पाद तैयार किया जिसकी बाजार में अधिक कीमत मिलती है।
- **आत्मनिर्भरता:** हर बार नए बीज खरीदने के बजाय घर पर ही बीजों को तैयार करने से उनकी कृषि लागत लगभग शून्य हो गई, जिससे उनका मुनाफा बढ़ गया।

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