# पहलवान के दूध-जलेबी प्रेम से खड़ा हुआ 75 साल पुराना कारोबार, कोटा दशहरा मेले में उमड़ रही भीड़

> कोटा में चार पीढ़ियों से चल रही शंभू लाल की मशहूर दूध-जलेबी की दुकान पहली बार दशहरा मेले में पहुंची है, जहां हर दिन 500 से 1000 ग्राहक देसी घी की जलेबी और शुद्ध रबड़ी का लुत्फ उठा रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-11-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/pahalavana-ke-dudha-jalebi-prema-se-khara-hua-75-sala-purana-karobara-kota-dussehra-mele-men-umara-rahi-bhira-55648 · **Language:** Hindi
**Tags:** कोटा, दशहरा मेला, दूध जलेबी, शंभू लाल, रामपुरा, हाड़ौती, पारंपरिक खानपान

व्यायाम और कसरत के बाद गरमागरम दूध-जलेबी खाने की एक निजी आदत किस तरह शहर की ऐतिहासिक पहचान बन सकती है, इसकी जीती-जागती मिसाल राजस्थान के कोटा शहर में देखने को मिलती है। चार पीढ़ियों से पारंपरिक स्वाद परोस रहा शंभू लाल का प्रतिष्ठान इन दिनों कोटा दशहरा मेले में पहली बार अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। मेले के परिसर में लगे इस स्टॉल पर रोजाना 500 से 1000 लोग पारंपरिक मिठास का आनंद लेने पहुंच रहे हैं, जिससे यह आयोजन के प्रमुख आकर्षणों में शुमार हो गया है।

## रामपुरा की तंग गलियों से हुई थी स्वाद के सफर की शुरुआत
इस पारिवारिक व्यापार की जड़ें कोटा के रामपुरा इलाके से जुड़ी हुई हैं। सबसे पहले परदादा ओंकार लाल जी सैनी ने इस कार्य की नींव रखी थी। उनके बाद परिवार की कमान दादाजी शंभू लाल जी के हाथों में आई, जिनके नाम पर यह दुकान आज भी पूरे शहर में पहचानी जाती है। शंभू लाल जी स्वयं अखाड़े में पहलवानी करते थे और कसरत पूरी करने के उपरांत नाश्ते में दूध-जलेबी का सेवन करना उनका खास शौक था। अखाड़े के साथियों और स्थानीय पड़ोसियों ने जब उनके साथ इस नाश्ते का स्वाद चखा, तो वे इसके कायल हो गए। लोगों की बढ़ती रुचि और मांग को देखते हुए उन्होंने नियमित तौर पर दुकान शुरू कर दी, जो देखते ही देखते पूरे क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करने लगी।

## चार पीढ़ियों की विरासत और शुद्धता की परंपरा
समय बीतने के साथ कारोबार की बागडोर पिता चंद्रप्रकाश जी और चाचा भरत प्रकाश जी के पास आई, जिन्होंने इसे पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाया। अब इस पारिवारिक विरासत को चौथी पीढ़ी संभाल रही है। परिवार के सदस्य अभय सैनी बताते हैं कि पूरा कुनबा मिलकर इस कारोबार को चला रहा है। उनके अनुसार पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन दुकान के मूल स्वाद में कोई बदलाव नहीं आने दिया गया।

प्रतिष्ठान की सफलता का सबसे बड़ा आधार सामग्री की गुणवत्ता है। अभय सैनी के अनुसार वे पूरी तरह शुद्धता पर ध्यान देते हैं और किसी भी तरह की मिलावट से दूर रहते हैं। जलेबी को तैयार करने में केवल शुद्ध देसी घी का उपयोग किया जाता है। वहीं दूसरी तरफ, रबड़ी तैयार करने के लिए गाय और भैंस के शुद्ध दूध का इस्तेमाल होता है। दुकान का कामकाज हर रोज तड़के 5 बजे शुरू हो जाता है और सुबह 6:30 बजे तक खरीदारों को ताजी जलेबी, खौलते दूध और गाढ़ी रबड़ी की सेवा मिलने लगती है।

## हाड़ौती अंचल की मांग पर मेले में पहली बार स्टॉल
हाड़ौती संभाग और आसपास के कस्बों से लगातार यह बात सामने आ रही थी कि इस ऐतिहासिक प्रतिष्ठान को कोटा दशहरा मेले का भी हिस्सा बनना चाहिए। लोगों के इसी विश्वास और आग्रह का मान रखते हुए परिवार ने इस वर्ष मेले में अपनी दुकान लगाने का निर्णय लिया। स्टॉल शुरू होते ही ग्राहकों का जबरदस्त रुझान देखने को मिला है और हर दिन 500 से 1000 लोग यहां स्वाद चखने आ रहे हैं। अभय ने नगर निगम द्वारा की गई व्यवस्थाओं की सराहना करते हुए कहा कि मेले का माहौल बेहतरीन है और वे उसी पारंपरिक गुणवत्ता को बड़े जनसमूह तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

## इसका आप पर असर
कोटा दशहरा मेले में पहुंचे आगंतुकों को अब शहर के चार दशक पुराने मशहूर नाश्ते का स्वाद सीधे मेला परिसर में मिल रहा है।

- **भारत में:** देश भर से मेलों और उत्सवों में आने वाले पर्यटकों को स्थानीय पारंपरिक पाक शैलियों की प्रामाणिक पहचान एक ही स्थान पर उपलब्ध हो रही है। इससे क्षेत्रीय विरासत और पारंपरिक खानपान उद्यमों को राष्ट्रीय पहचान तथा बाजार मिलता है।
- **कोटा में:** स्थानीय निवासियों और हाड़ौती क्षेत्र के लोगों को रामपुरा जाने के बजाय मेले के भीतर ही सुबह से रात तक शुद्ध देसी घी की जलेबी और रबड़ी मिल रही है। मेले में घूमने आए परिवारों को भरोसेमंद और शुद्ध नाश्ते का सीधा विकल्प सुलभ हो गया है।
- **ग्राहकों के समय पर:** दुकान सुबह 5 बजे से सक्रिय होकर सुबह 6:30 बजे ताजा नाश्ता परोसने के लिए तैयार हो जाती है। मेले में सुबह जल्दी पहुंचने वाले दर्शक या व्यायाम करने वाले लोग इसका तुरंत लाभ उठा सकते हैं।
- **गुणवत्ता पर:** मिलावट रहित गाय-भैंस के दूध और देसी घी से तैयार खाद्य पदार्थ उपलब्ध होने से स्वास्थ्य के प्रति जागरूक मेले के खरीदारों को सुरक्षित विकल्प मिल रहा है। स्थानीय व्यापार में प्रामाणिक सामग्रियों के प्रयोग से छोटे उत्पादकों को भी बढ़ावा मिलता है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह कारोबार एक पहलवान की व्यक्तिगत दिनचर्या से शुरू होकर जनता के जबर्दस्त समर्थन के कारण एक स्थायी पारिवारिक संस्थान में बदला।

- **शुरुआती कारण:** अखाड़े में कसरत के बाद दादाजी शंभू लाल जी रोजाना दूध-जलेबी का नाश्ता करते थे, जिसे उनके आसपास के लोगों ने बेहद पसंद किया। स्थानीय लोगों की निरंतर मांग और प्रोत्साहन ने उन्हें इसे व्यावसायिक दुकान का रूप देने के लिए प्रेरित किया।
- **स्थिरता का आधार:** परदादा ओंकार लाल जी द्वारा स्थापित नींव को चंद्रप्रकाश जी और भरत प्रकाश जी ने संभाला, जबकि आज चौथी पीढ़ी के अभय सैनी शुद्धता को प्राथमिकता देकर इसे चला रहे हैं। गाय-भैंस के दूध की शुद्ध रबड़ी और देसी घी की जलेबी की निरंतरता ने ग्राहकों का दशकों पुराना भरोसा बनाए रखा।
- **मेले में विस्तार:** हाड़ौती अंचल और दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले ग्राहकों ने बार-बार आग्रह किया कि यह प्रामाणिक स्वाद कोटा दशहरा मेले में भी मिलना चाहिए। इस व्यापक जनआग्रह और नगर निगम की अनुकूल व्यवस्थाओं के चलते इस बार मेले में पहली बार स्टॉल लगाया गया।

## सवाल-जवाब

### 1. शंभू लाल की दुकान की शुरुआत कैसे हुई थी?
इसकी नींव परदादा ओंकार लाल जी सैनी ने रखी थी, जिसके बाद पहलवान दादाजी शंभू लाल जी के दूध-जलेबी के शौक और लोगों की मांग के चलते यह नियमित दुकान बनी।

### 2. यह दुकान वर्तमान में कौन सी पीढ़ी चला रही है?
इस दुकान को वर्तमान में चौथी पीढ़ी के अभय सैनी अपने परिवार के साथ मिलकर संचालित कर रहे हैं।

### 3. दुकान में जलेबी और रबड़ी बनाने के लिए कौन सी सामग्री इस्तेमाल होती है?
जलेबी शुद्ध देसी घी में बनाई जाती है और रबड़ी तैयार करने के लिए गाय तथा भैंस के शुद्ध दूध का उपयोग होता है।

### 4. कोटा दशहरा मेले में इस दुकान पर रोजाना कितने ग्राहक आ रहे हैं?
मेले में लगे स्टॉल पर प्रतिदिन 500 से 1000 ग्राहक दूध, जलेबी और रबड़ी का स्वाद लेने पहुंच रहे हैं।

### 5. दुकान का संचालन सुबह किस समय शुरू होता है?
दुकान सुबह 5 बजे खुल जाती है और सुबह 6:30 बजे तक गरमागरम दूध, जलेबी और रबड़ी ग्राहकों के लिए तैयार हो जाती है।

### 6. इस वर्ष दुकान को दशहरा मेले में लगाने का मुख्य कारण क्या था?
हाड़ौती क्षेत्र के लोगों की लगातार यह मांग थी कि इस पुराने और विश्वसनीय स्वाद को दशहरा मेले में भी उपलब्ध कराया जाए।

## प्रेरणा और सबक
चार पीढ़ियों से चल रहे इस व्यवसाय से पता चलता है कि शुद्धता और निरंतरता से एक साधारण शौक को भी स्थायी विरासत बनाया जा सकता है।

- **व्यक्तिगत रुचि को अवसर बनाएं:** एक पहलवान की निजी नाश्ते की पसंद सही दिशा मिलने पर 75 साल पुराने सफल व्यापार में तब्दील हो गई। अपनी सच्ची पसंद और कौशल को पहचानकर उसे उद्यम का रूप दिया जा सकता है।
- **गुणवत्ता से समझौता न करें:** चार पीढ़ियों तक ग्राहकों का अटूट भरोसा केवल इसलिए टिका रहा क्योंकि शुद्ध देसी घी और असली दूध की गुणवत्ता कभी नहीं घटाई गई। कारोबार में लंबे समय तक टिके रहने के लिए मिलावट से बचना और शुद्धता कायम रखना सबसे अनिवार्य नियम है।
- **पारिवारिक एकता और सहयोग:** परदादा से लेकर पोते-पड़पोते तक पूरे परिवार ने मिलकर इस काम को आगे बढ़ाया और स्वाद को बरकरार रखा। जब नई पीढ़ी विरासत की कद्र करती है, तो पारंपरिक उद्यम दशकों तक प्रगति करते हैं।
- **ग्राहकों के सुझावों का सम्मान:** हाड़ौती के स्थानीय लोगों की मांग को सुनकर ही परिवार ने दशहरा मेले में स्टॉल लगाने का फैसला किया। ग्राहकों की जरूरतों और सुझावों को गंभीरता से लेने से कारोबार के विस्तार के नए रास्ते खुलते हैं।

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