# पांच साल पुरानी भूली परीक्षा के ईमेल ने बदली तकदीर, जानिए गांव के सरकारी स्कूल से विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बने डॉ. नीरज कुमार सिंह का सफर

> वाराणसी के एक छोटे से गांव पुराशिव के सरकारी स्कूल से पढ़ाई शुरू कर डॉ. नीरज कुमार सिंह ने संघर्षों के बीच यूपी में तीसरी रैंक हासिल की और बलिया विश्वविद्यालय में सहायक आचार्य बने।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-09-25 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/pancha-sala-purani-bhuli-pariksha-ke-imela-ne-badali-takadira-janie-ganva-ke-sarakari-skula-se-vishvavidyalaya-men-assistant-profe-38401 · **Language:** Hindi
**Tags:** नीरज कुमार सिंह, जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया, सफलता की कहानी, उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग, सहायक आचार्य, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, उच्च शिक्षा

दृढ़ निश्चय और निरंतर लगन से विपरीत परिस्थितियों को भी बड़ी कामयाबी में बदला जा सकता है। वाराणसी जिले के एक साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठित मंच तक पहुंचने वाले डॉ. नीरज कुमार सिंह की जीवन यात्रा इसका जीवंत प्रमाण है। वर्तमान समय में वे जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया के अंग्रेजी विभाग में सहायक आचार्य के पद पर अध्यापन कार्य कर रहे हैं। गांव की चौपाल और बुनियादी सरकारी स्कूल से शुरू हुआ उनका यह शैक्षणिक सफर कई कठिन पड़ावों, बेरोजगारी के दबाव और लंबे इंतजार से होकर गुजरा है।

## गांव के सरकारी स्कूल से उच्च शिक्षा का बुनियादी सफर
डॉ. नीरज कुमार सिंह का पैतृक निवास वाराणसी जिले का पुराशिव गांव है। उनकी शुरुआती स्कूली शिक्षा पूरी तरह गांव के ही सरकारी स्कूल में संपन्न हुई। कक्षा 1 से लेकर कक्षा 12 तक की संपूर्ण पढ़ाई उन्होंने यूपी बोर्ड के माध्यम से की। ग्रामीण पृष्ठभूमि और सीमित संसाधनों के बीच रहते हुए उन्होंने जीवन की वास्तविक जमीनी चुनौतियों को बहुत करीब से देखा और समझा।

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्नातक यानी बीए में दाखिला लिया। इसके पश्चात उन्होंने इसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय में एमए की डिग्री हासिल की। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्नातकोत्तर प्रवेश परीक्षा में उन्होंने पूरे स्तर पर 24वीं रैंक हासिल कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया था।

## शोध कार्य, अतिथि प्रवक्ता की भूमिका और महामारी का संकट
एमए की पढ़ाई पूरी करने के उसी वर्ष डॉ. नीरज ने कंबाइंड रिसर्च एंट्रेंस टेस्ट के जरिए पीएचडी पाठ्यक्रम में दाखिला लिया। शोध के दौरान उन्हें पांच भाषाओं की विद्वान डॉ. अनुराधा बनर्जी का बहुमूल्य मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। उनके निर्देशन में डॉ. नीरज ने प्रख्यात साहित्यकार विद्याधर सूरजप्रसाद नाइपॉल के कृतित्व पर अपना शोध कार्य सफलतापूर्वक संपन्न किया।

उच्च शिक्षा की उपाधि हासिल करने के बाद भी रोजगार का रास्ता आसान नहीं था। बेरोजगारी के कठिन दौर में उन्हें महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में गेस्ट फैकल्टी के रूप में पढ़ाने का मौका मिला। वहां उन्होंने लगभग आठ महीने तक अध्यापन का कार्य किया, जिसने उन्हें तात्कालिक आर्थिक सहारा प्रदान किया। इसके बाद चौधरी महादेव प्रसाद कॉलेज इलाहाबाद में कॉन्ट्रैक्चुअल फैकल्टी की भर्ती निकली। इस चयन प्रक्रिया में कुल नौ अभ्यर्थी मैदान में थे, जिनमें से एकमात्र डॉ. नीरज कुमार सिंह का चयन हुआ। इलाहाबाद के इस कॉलेज में उन्होंने करीब डेढ़ साल तक अपनी सेवाएं दीं। इस दौरान उन्होंने तत्कालीन विभागाध्यक्ष के साथ मिलकर एक पुस्तक का संपादन और प्रकाशन भी कराया। हालांकि वैश्विक कोरोना महामारी के अचानक फैलने से उनकी यह संविदा आधारित नौकरी छूट गई और उनके सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया।

## पांच साल बाद आया अप्रत्याशित ईमेल और 13 दिनों की तपस्या
कठिन आर्थिक और मानसिक दबाव के बावजूद डॉ. नीरज ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। वर्ष 2015 में उन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज में अंग्रेजी प्रवक्ता पद के लिए आयोजित लिखित परीक्षा दी थी। समय के लंबे अंतराल के कारण वे इस परीक्षा के बारे में पूरी तरह भूल चुके थे। तभी वर्ष 2020 में अचानक उनके ईमेल इनबॉक्स में लोक सेवा आयोग का एक आधिकारिक संदेश पहुंचा, जिसमें उन्हें साक्षात्कार के लिए चुने जाने की जानकारी दी गई थी।

यह बुलावा उनके लिए किसी अप्रत्याशित चमत्कार जैसा था, लेकिन चुनौती यह थी कि इंटरव्यू की तैयारी के लिए उनके पास मात्र 13 दिन का समय शेष था। उस समय उन पर पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ शादी के बाद की नई गृहस्थी का भी दायित्व था। सीमित समय का सदुपयोग करते हुए उन्होंने दिन-रात एक कर तैयारी की। इस मेहनत का परिणाम यह रहा कि उन्होंने न सिर्फ इंटरव्यू में शानदार सफलता हासिल की, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में तीसरी रैंक प्राप्त की। यह उनकी पहली स्थायी सरकारी सेवा की उपलब्धि थी, जिससे उनके और उनके पिता की आंखों में भावुकता के आंसू आ गए।

## इंटर कॉलेज से विश्वविद्यालय के स्थायी मंच तक
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग से चयनित होने के बाद उन्हें राजकीय इंटर कॉलेज बहराइच में अंग्रेजी प्रवक्ता के पद पर नियुक्ति मिली। बहराइच में उन्होंने लगभग डेढ़ वर्ष तक निष्ठापूर्वक अध्यापन कार्य किया। सेवा में रहते हुए भी उन्होंने उच्च शिक्षा की दिशा में प्रयास जारी रखे।

इसी सेवाकाल के दौरान उन्होंने उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग की सहायक आचार्य पद की परीक्षा में हिस्सा लिया, जिसमें उन्होंने 27 में से 25 अंक हासिल कर लिखित परीक्षा व इंटरव्यू दोनों उत्तीर्ण किए। इसके समानांतर उन्होंने जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया की लिखित परीक्षा और साक्षात्कार में भी अपनी श्रेष्ठता साबित की। सभी औपचारिकताओं को पूरा करते हुए अगस्त 2022 में उन्होंने जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया के अंग्रेजी विभाग में स्थायी सहायक आचार्य के रूप में कार्यभार ग्रहण किया।

## इसका आप पर असर
यह जीवन गाथा प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा की तैयारी कर रहे साधारण पृष्ठभूमि के युवाओं के लिए व्यावहारिक सबक प्रदान करती है।

- **भारत में:** सरकारी और उच्च शिक्षण भर्तियों में लंबी प्रक्रिया के कारण हताश होने वाले अभ्यर्थियों को यह धैर्य रखने की सीख देती है। अपने पुराने आवेदनों और आधिकारिक ईमेल संचार पर नियमित नजर रखना जरूरी अवसर दिला सकता है।
- **उत्तर प्रदेश में:** यूपी बोर्ड और ग्रामीण हिंदी माध्यम से पढ़े छात्र भी राज्य स्तरीय उच्च सेवा परीक्षाओं में शीर्ष स्थान प्राप्त कर सकते हैं। संविदा और अस्थायी नौकरियों के दौरान भी मुख्य लक्ष्य की दिशा में निरंतर पढ़ाई जारी रखना सफलता सुनिश्चित करता है।
- **कैरियर योजना:** अल्पकालिक रोजगार और अतिथि प्रवक्ता पद आर्थिक सहारा देने के साथ अकादमिक अनुभव को समृद्ध करते हैं। इन अनुभवों का उपयोग बड़ी परीक्षाओं और साक्षात्कारों में आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।
- **सीमित समय में तैयारी:** साक्षात्कार या परीक्षा के लिए कम समय मिलने पर भी सुनियोजित अध्ययन से बेहतरीन परिणाम लाए जा सकते हैं। 13 दिन जैसे छोटे अंतराल में भी एकाग्र अध्ययन प्रदेश स्तर पर शीर्ष रैंक दिला सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह सफलता ग्रामीण परिवेश की बुनियादी शिक्षा, लंबे समय तक की गई अकादमिक तैयारी और विपरीत हालातों में भी अध्ययन न छोड़ने के कारण संभव हुई।

- **मूल कारण:** डॉ. नीरज कुमार सिंह ने 2015 में प्रवक्ता पद की परीक्षा दी थी, जिसकी चयन प्रक्रिया पांच साल बाद 2020 में इंटरव्यू चरण तक पहुंची। आयोग द्वारा शॉर्टलिस्ट किए जाने का ईमेल आने पर उन्होंने तत्काल उपलब्ध 13 दिनों का पूरा सदुपयोग किया।
- **पृष्ठभूमि और परिस्थितियां:** काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा और पीएचडी के दौरान साहित्य पर गहन शोध ने उनके ज्ञान का मजबूत आधार तैयार किया था। संविदा नौकरी छूटने और पारिवारिक दायित्वों के दबाव ने उन्हें इस अवसर को भुनाने के लिए अतिरिक्त प्रेरित किया।
- **अकादमिक निरंतरता:** इंटर कॉलेज में चयन के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई रोकी नहीं और उच्चतर सेवा चयन आयोग तथा विश्वविद्यालय स्तर की परीक्षाओं की तैयारी जारी रखी। इसी निरंतर अध्ययन के परिणामस्वरूप वे अगस्त 2022 में विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में स्थायी पद हासिल करने में सफल रहे।

## सवाल-जवाब

### 1. डॉ. नीरज कुमार सिंह वर्तमान में किस पद पर कार्यरत हैं?
वे जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया के अंग्रेजी विभाग में सहायक आचार्य (असिस्टेंट प्रोफेसर) के पद पर कार्यरत हैं।

### 2. डॉ. नीरज कुमार सिंह की प्राथमिक और स्कूली शिक्षा कहां से हुई?
उनकी कक्षा 1 से 12 तक की संपूर्ण शिक्षा वाराणसी जिले के पुराशिव गांव स्थित सरकारी स्कूल से यूपी बोर्ड के माध्यम से हुई।

### 3. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा और शोध कार्य किस संस्थान से पूरा किया?
उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से बीए, एमए और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनका शोध कार्य विद्याधर सूरजप्रसाद नाइपॉल के साहित्य पर आधारित था।

### 4. उन्हें प्रवक्ता परीक्षा के इंटरव्यू की सूचना कब और कैसे मिली?
वर्ष 2015 में दी गई परीक्षा के पांच साल बाद, वर्ष 2020 में उन्हें लोक सेवा आयोग से ईमेल के जरिए साक्षात्कार की सूचना मिली।

### 5. प्रवक्ता पद के साक्षात्कार में उन्हें तैयारी के लिए कितना समय मिला और उनका परिणाम क्या रहा?
उन्हें तैयारी के लिए केवल 13 दिन का समय मिला, जिसमें उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए पूरे उत्तर प्रदेश में तीसरी रैंक हासिल की।

### 6. बलिया विश्वविद्यालय में उन्होंने कब कार्यभार संभाला?
उन्होंने लिखित परीक्षा और साक्षात्कार उत्तीर्ण करने के बाद अगस्त 2022 में जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया में सहायक आचार्य के पद पर कार्यभार ग्रहण किया।

## प्रेरणा और सबक
डॉ. नीरज कुमार सिंह का संघर्षशील जीवन हर उस विद्यार्थी के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के कारण बड़े सपने देखने से झिझकता है।

- **धैर्य और निरंतरता:** परिणाम आने में वर्षों लग जाएं तब भी अपनी क्षमता पर भरोसा बनाए रखना आवश्यक है। पांच साल पहले दी गई परीक्षा का बुलावा आने पर घबराने के बजाय तत्परता से आगे बढ़ना चाहिए।
- **संसाधनों की कमी रुकावट नहीं:** गांव के प्राथमिक और माध्यमिक सरकारी स्कूल से पढ़कर भी विश्वविद्यालय के सर्वोच्च मंच तक पहुंचा जा सकता है। परिवेश से ज्यादा व्यक्ति की लगन और अनुशासन मायने रखता है।
- **संकट को अवसर में बदलना:** संविदा नौकरी छूटने जैसी विपरीत परिस्थितियों में निराश होने के बजाय नए अवसरों के लिए स्वयं को तैयार रखना चाहिए। मुश्किल समय में की गई कड़ी मेहनत ही सबसे बड़े मुकाम तक ले जाती है।

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